“फाइलों में विकास, गांव में सवाल: सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत और भ्रष्टाचार का तंत्र”

सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत पर गहन पड़ताल—गांव तक योजनाओं की पहुंच, भ्रष्टाचार, अपात्र लाभार्थी, अधूरे काम और ग्राम आधारित योजना निर्माण की जरूरत।

“फाइलों में विकास, गांव में सवाल: सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत और भ्रष्टाचार का तंत्र”

सरकार योजना बनाती है, गांव सिर्फ लाभार्थी बनकर रह जाता है—यहीं से असफलता शुरू होती है

By- Chaudhary Sudhir Talyan

सुबह का समय है।

गांव में एक किसान अपने खेत की मेड़ पर खड़ा है। उसके सामने सूखी नाली है। घर में पानी की टंकी लगी है, लेकिन नल में पानी कब आएगा, उसे मालूम नहीं। प्रधानमंत्री आवास योजना की सूची में उसके पड़ोसी का नाम है, लेकिन उसका नाम नहीं। बैंक में खाता है, आधार जुड़ा है, फिर भी किसी योजना का भुगतान अटक गया है। पंचायत भवन में योजनाओं की लंबी सूची लगी है—आवास, सड़क, नाली, शौचालय, पानी, रोजगार, किसान सहायता, पेंशन।

कागज पर गांव विकास की दौड़ में बहुत आगे है।

जमीन पर किसान अब भी पूछ रहा है—

“मेरे गांव में योजना है, लेकिन मेरे घर तक क्यों नहीं है?”

यही भारत की ग्रामीण विकास व्यवस्था का सबसे असहज सवाल है।

और इस सवाल का उत्तर केवल भ्रष्टाचार नहीं है।

लेकिन जहां व्यवस्था अपारदर्शी है, जहां निर्णय गांव की वास्तविक जरूरत के बजाय ऊपर से तय होते हैं, जहां लाभार्थी चयन की निगरानी कमजोर है और जहां शिकायत के बाद भी कार्रवाई लंबित रहती है—वहां भ्रष्टाचार के लिए जमीन तैयार होती है।


समस्या योजनाओं की संख्या नहीं है

भारत में योजनाओं की कोई कमी नहीं।

केंद्र सरकार का DBT पोर्टल वर्तमान में 56 मंत्रालयों की 320 योजनाओं को DBT व्यवस्था में दिखाता है और वित्त वर्ष 2026-27 में ₹2.14 लाख करोड़ से अधिक DBT दर्ज करता है। पोर्टल संचयी रूप से ₹53.32 लाख करोड़ से अधिक DBT और ₹5.14 लाख करोड़ से अधिक अनुमानित gains दिखाता है।

यह डिजिटल शासन के विस्तार का प्रमाण है।

लेकिन सवाल यह नहीं है कि सरकार ने कितने पैसे भेजे।

सवाल यह है—

क्या सही व्यक्ति तक सही लाभ पहुंचा?

और उससे भी बड़ा सवाल—

क्या उस लाभ ने उस व्यक्ति की समस्या हल की?

यहीं सरकारी सफलता का आधिकारिक पैमाना और ग्रामीण नागरिक का अनुभव अलग-अलग हो जाते हैं।


दिल्ली में बनी योजना, गांव में पैदा हुई समस्या

भारत में योजनाएं अक्सर ऊपर से नीचे उतरती हैं।

दिल्ली में नीति बनती है।

राज्य में उसका ढांचा तैयार होता है।

जिले को लक्ष्य मिलता है।

ब्लॉक को लक्ष्य मिलता है।

ग्राम पंचायत को लक्ष्य मिलता है।

फिर गांव से कहा जाता है—

“इस योजना को लागू करो।”

लेकिन जिस गांव में योजना लागू होनी है, उससे पहले यह पूछा ही नहीं जाता कि उसकी प्राथमिक समस्या क्या है।

किसी गांव को पानी चाहिए, लेकिन योजना पाइप डालने का लक्ष्य लेकर आती है।

किसी गांव को सिंचाई चाहिए, लेकिन योजना किसी दूसरे infrastructure indicator पर अपनी सफलता मापती है।

किसी गांव में भूमिहीन मजदूरों की संख्या ज्यादा है, लेकिन किसान-केंद्रित database केवल land records को प्राथमिक आधार बनाता है।

किसी गांव में नाली की समस्या है, लेकिन निर्माण की प्राथमिकता किसी दूसरी योजना के administrative target से तय होती है।

फिर रिपोर्ट आती है—

“लक्ष्य प्राप्त।”

गांव पूछता है—

“समस्या हल हुई?”

यही वह अंतर है जिसे अब खत्म करना होगा।


योजना गांव में बननी चाहिए, गांव पर नहीं

ग्रामीण भारत को विकास का ग्राहक नहीं, विकास का निर्माता बनाना होगा।

किसी भी नई ग्रामीण योजना की शुरुआत मंत्रालय से नहीं बल्कि ग्राम सभा से होनी चाहिए।

गांव को पहले अपनी समस्या बताने दीजिए।

फिर उसका सर्वे कराइए।

फिर प्राथमिकता तय कीजिए।

फिर बजट दीजिए।

फिर काम कराइए।

फिर ग्राम सभा से प्रमाणित कराइए कि समस्या वास्तव में हल हुई या नहीं।

यानी व्यवस्था का क्रम बदलना होगा—

आज:
सरकार → योजना → बजट → लक्ष्य → पंचायत → लाभार्थी

जरूरत:
ग्राम सभा → समस्या → प्राथमिकता → योजना → बजट → कार्य → सामाजिक ऑडिट → परिणाम

जब तक यह परिवर्तन नहीं होगा, ग्रामीण विकास मुख्यतः target-driven administration रहेगा, need-driven development नहीं।


भ्रष्टाचार सिर्फ रिश्वत नहीं है

ग्रामीण विकास पर चर्चा में भ्रष्टाचार को अक्सर केवल रिश्वत के रूप में देखा जाता है।

यह दृष्टि बहुत छोटी है।

भ्रष्टाचार के कई रूप हैं—

फर्जी लाभार्थी।

गलत लाभार्थी।

काम की घटिया गुणवत्ता।

कागज पर पूरा काम।

माप में हेराफेरी।

एक ही काम का अलग-अलग योजनाओं में भुगतान।

मृत या अपात्र व्यक्ति के नाम भुगतान।

ठेकेदार और स्थानीय तंत्र की मिलीभगत।

राजनीतिक प्रभाव में लाभार्थी चयन।

शिकायत दबा देना।

ऑडिट की आपत्ति पर कार्रवाई न करना।

और सबसे खतरनाक रूप—

ऐसी योजना बनाना जिसकी जरूरत ही वास्तविक रूप से निर्धारित नहीं हुई।

यह अंतिम रूप कानूनी भ्रष्टाचार की श्रेणी में हर मामले में नहीं आएगा, लेकिन शासन की दृष्टि से यह सार्वजनिक संसाधनों का गलत आवंटन हो सकता है।

जनता के पैसे का सबसे बड़ा नुकसान कभी-कभी चोरी से नहीं, गलत प्राथमिकता से होता है।


उत्तर प्रदेश में आवास योजना ने फाइल और जमीन का अंतर दिखा दिया

इस अंतर को समझने के लिए उत्तर प्रदेश की प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण का CAG audit बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

CAG के अनुसार 2016-17 से 2022-23 के दौरान उत्तर प्रदेश में 34.71 लाख PMAY-G मकान स्वीकृत हुए और मार्च 2024 तक 34.18 लाख यानी 98.47 प्रतिशत मकान पूर्ण बताए गए। यह प्रशासनिक उपलब्धि है।

लेकिन उसी audit में implementation की गंभीर कमियां भी सामने आईं।

2017-23 के दौरान उपलब्ध ₹40,231 करोड़ में से ₹37,984 करोड़ कार्यक्रम निधि का उपयोग हुआ। केंद्रीय हिस्से को State Nodal Account में भेजने में 74 से 105 दिन तक की देरी दर्ज हुई। 79 प्रतिशत लाभार्थियों के मामले में पहली किस्त निर्धारित सात कार्यदिवस से अधिक समय बाद जारी हुई। अगस्त 2024 तक 11,031 ऐसे लाभार्थी थे जिनके मकान पूरे हो चुके थे लेकिन ₹20.18 करोड़ की सहायता जारी नहीं हुई थी।

और फिर आता है वह आंकड़ा जिसे किसी भी सरकार को असहज करना चाहिए।

जांच किए गए जिलों में उचित verification के अभाव में 1,838 अपात्र लाभार्थियों को ₹9.52 करोड़ जारी किए गए, जिसमें सितंबर 2024 तक ₹2.62 करोड़ की राशि वसूल नहीं हुई थी।

159 मामलों में ₹86.20 लाख की किस्त इच्छित लाभार्थियों के बजाय दूसरे व्यक्तियों के खातों में चली गई; CAG ने इसे suspected cyber-crime से जुड़ा मामला बताया और अक्टूबर 2024 तक मामला unresolved था।

जहां अपात्र व्यक्ति को पैसा पहुंच गया और पात्र व्यक्ति का पैसा अटक गया, वहां verification और accountability की व्यवस्था विफल हुई।

और ऐसी विफलता भ्रष्टाचार के लिए अवसर पैदा करती है।

भ्रष्टाचार की सबसे खतरनाक मशीन: लक्ष्य

सरकारें संख्या चाहती हैं।

कितने घर?

कितने नल?

कितने शौचालय?

कितने लाभार्थी?

कितने किलोमीटर सड़क?

कितने job cards?

कितने खाते?

कितने transfers?

यह प्रशासन के लिए आवश्यक है।

लेकिन जब संख्या ही सफलता का अंतिम पैमाना बन जाए तो सिस्टम संख्या पैदा करने लगता है।

फिर सवाल बदल जाता है—

“समस्या हल हुई?”

से

“लक्ष्य पूरा हुआ?”

और यही बदलाव व्यवस्था को खतरनाक दिशा में ले जाता है।

क्योंकि target पूरा करने के लिए कभी-कभी गुणवत्ता पीछे छूटती है।


पंचायत को सिर्फ implementation agency बनाना बंद करना होगा

आज भी गांव की पंचायत को बहुत बार योजना लागू करने वाली इकाई के रूप में देखा जाता है।

यह दृष्टिकोण बदलना होगा।

ग्राम पंचायत को अपने क्षेत्र की लोकल प्लानिंग सरकार बनाना होगा।

गांव की ग्राम सभा तय करे—

पहले पानी।

या पहले सड़क।

या पहले सिंचाई।

या पहले नाली।

या पहले स्कूल।

या पहले स्वास्थ्य केंद्र।

या पहले रोजगार।

सरकार बजट और तकनीकी सहायता दे।

लेकिन प्राथमिकता का पहला अधिकार गांव को मिले।

क्योंकि गांव से बेहतर गांव की समस्या कोई मंत्रालय नहीं जान सकता।


भ्रष्टाचार रोकना है तो जानकारी गांव की दीवार पर लिखिए

भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे सस्ता हथियार है—

सार्वजनिक जानकारी।

हर पंचायत में एक बड़ा सार्वजनिक बोर्ड होना चाहिए।

हर योजना के लिए लिखा जाए—

  • योजना का नाम
  • कुल बजट
  • स्वीकृत राशि
  • जारी राशि
  • लाभार्थियों की संख्या
  • लाभार्थियों के नाम
  • काम की शुरुआत
  • काम पूरा होने की तारीख
  • एजेंसी/जिम्मेदार व्यक्ति
  • सामग्री की लागत
  • मजदूरी
  • निरीक्षण अधिकारी
  • शिकायत नंबर
  • अंतिम भुगतान
  • ग्राम सभा की पुष्टि

और यह जानकारी केवल इंटरनेट पर नहीं।

पंचायत भवन की दीवार पर।

क्योंकि जिस गरीब परिवार के पास smartphone नहीं है, वह भी नागरिक है।

जिस बुजुर्ग को portal चलाना नहीं आता, उसका भी पैसा है।

जिस मजदूर के पास डिजिटल साक्षरता नहीं है, उसका भी अधिकार है।

Digital governance का मतलब यह नहीं कि नागरिक को उसके अधिकार की जानकारी के लिए पहले digital होना पड़े।


Social Audit को सरकारी रस्म मत बनाइए

अगर ग्राम सभा योजना की निगरानी नहीं करेगी तो फिर निगरानी कौन करेगा?

ऊपर का अधिकारी साल में एक बार आएगा।

फाइल देखेगा।

फोटो देखेगा।

रिपोर्ट देखेगा।

और चला जाएगा।

लेकिन गांव का आदमी रोज उस सड़क पर चलता है।

रोज उस नल के सामने खड़ा होता है।

रोज उसी अधूरे घर में रहता है।

इसलिए Social Audit को शक्तिशाली बनाना होगा।

CAG के उत्तर प्रदेश PMAY-G audit में social audit से उठाए गए मुद्दों के लंबे समय तक unresolved रहने की समस्या भी सामने आई।

अगर audit ने गलती पकड़ ली लेकिन कार्रवाई नहीं हुई, तो audit लोकतांत्रिक नियंत्रण नहीं रह जाता।

वह सिर्फ रिपोर्ट बन जाता है।

और रिपोर्टों से भ्रष्टाचार नहीं रुकता। कार्रवाई से रुकता है।


गांव को “beneficiary” कहना बंद कीजिए

यह शब्द ही व्यवस्था की मानसिकता बताता है।

Beneficiary.

जैसे सरकार दे रही है और गांव ले रहा है।

लेकिन संविधान और लोकतंत्र का नागरिक सरकार का ग्राहक नहीं है।

वह करदाता है।

वह मतदाता है।

वह अधिकारधारी है।

सरकारी पैसा किसी मंत्री, अधिकारी या विभाग का निजी पैसा नहीं।

वह जनता का पैसा है।

इसलिए नागरिक को यह पूछने का पूरा अधिकार है—

“मेरे गांव के लिए कितने पैसे आए?”

“कहां खर्च हुए?”

“किसे मिले?”

“काम कितना हुआ?”

“किसने जांच की?”

“गलती हुई तो कार्रवाई किस पर हुई?”


अब योजना की परिभाषा बदलनी होगी

नई ग्रामीण योजना बनाने से पहले पांच अनिवार्य प्रश्न होने चाहिए।

पहला:

इस गांव की वास्तविक समस्या क्या है?

दूसरा:

समस्या का प्रमाण क्या है?

तीसरा:

गांव ने इसे प्राथमिकता क्यों दी?

चौथा:

लाभ मिलने के बाद परिणाम कैसे मापा जाएगा?

पांचवां:

अगर योजना विफल हुई तो जवाबदेह कौन होगा?

जब तक पांचवां प्रश्न नहीं पूछा जाएगा, पहली चार व्यवस्थाएं अधूरी रहेंगी।

क्योंकि भारत में योजनाओं की सबसे बड़ी कमजोरी अक्सर accountability का आखिरी सिरा है।


“गांव योजना बनाए—सरकार पैसा दे” मॉडल

भारत को ग्रामीण विकास का नया मॉडल अपनाना चाहिए।

ग्राम-आधारित योजना निर्माण

हर ग्राम पंचायत में वर्ष में कम से कम एक जन विकास सभा हो।

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गांव अपनी दस सबसे बड़ी समस्याओं की सूची बनाए।

फिर ग्रामीण स्वयं प्राथमिकता तय करें।

उदाहरण—

पहली प्राथमिकता — पेयजल

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दूसरी — सिंचाई

तीसरी — सड़क

चौथी — स्कूल

पांचवीं — स्वास्थ्य

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इसके बाद जिला और राज्य सरकार उस योजना को तकनीकी और वित्तीय सहायता दें।

इस मॉडल में सरकार मालिक नहीं होगी।

सरकार साझेदार होगी।


सरकार के लिए सबसे कठिन सुधार यही है

योजना को गांव के हाथ में देना आसान नहीं है।

क्योंकि इससे सत्ता का केंद्रीकरण कम होगा।

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स्थानीय लोगों को सवाल पूछने पड़ेंगे।

अधिकारी को जवाब देना पड़ेगा।

पंचायत को हिसाब देना पड़ेगा।

ठेकेदार की जानकारी सार्वजनिक करनी पड़ेगी।

लाभार्थी सूची छिपाना कठिन होगा।

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और सबसे महत्वपूर्ण—

जिस काम का फैसला गांव ने किया होगा, उसका हिसाब गांव खुद मांगेगा।

यही लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण है।

और यही भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे मजबूत स्थानीय दीवार हो सकती है।

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आखिरी बात: गांव प्रयोगशाला नहीं, देश की रीढ़ है

भारत ने योजनाओं पर बहुत पैसा खर्च किया है।

डिजिटल व्यवस्था बनाई है।

DBT को विशाल पैमाने पर लागू किया है।

लाखों-करोड़ों भुगतान किए हैं।

लेकिन अब समय है कि सरकारी सफलता की भाषा बदली जाए।

कितना पैसा खर्च हुआ—यह पर्याप्त नहीं।

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कितने लाभार्थी बने—यह पर्याप्त नहीं।

कितने काम पूरे हुए—यह भी पर्याप्त नहीं।

अंतिम सवाल एक ही होना चाहिए—

“गांव के आदमी की जिंदगी कितनी बदली?”

अगर सड़क बनी और पहली बारिश में टूट गई—तो योजना सफल नहीं।

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अगर नल लगा लेकिन पानी नहीं आया—तो योजना पूरी नहीं।

अगर घर कागज पर पूरा है लेकिन परिवार उसमें सुरक्षित नहीं रहता—तो लक्ष्य पूरा नहीं हुआ।

अगर पात्र किसान सूची से बाहर है और अपात्र को पैसा मिल गया—तो database सफल नहीं हुआ।

अगर Social Audit में गलती मिली लेकिन कार्रवाई नहीं हुई—तो accountability असफल हुई।

और अगर गांव से पूछे बिना गांव के लिए योजना बनाई गई—

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तो शुरुआत में ही गलती हो चुकी है।


अब विकास ऊपर से नीचे नहीं, नीचे से ऊपर जाना चाहिए

भारत को एक सरल लेकिन कठोर सिद्धांत स्वीकार करना होगा—

जिस गांव के लिए योजना बन रही है, उस गांव की ग्राम सभा को योजना बनाने का पहला अधिकार होना चाहिए।

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सरकार पैसा दे।

सरकार तकनीक दे।

सरकार विशेषज्ञ दे।

सरकार निगरानी करे।

लेकिन गांव बताए कि उसे क्या चाहिए।

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ग्राम सभा बताए कि काम हुआ या नहीं।

ग्रामीण बताए कि सेवा मिल रही है या नहीं।

और सार्वजनिक रिकॉर्ड बताए कि पैसा कहां गया।

तभी भ्रष्टाचार की गुंजाइश घटेगी।

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तभी योजनाएं लक्ष्य से परिणाम की ओर जाएंगी।

तभी सरकारी योजना लाभार्थी को दया नहीं, अधिकार के रूप में दिखाई देगी।

और तभी विकास की वह तस्वीर बनेगी जिसमें दिल्ली की फाइल और गांव की जमीन एक-दूसरे से झूठ नहीं बोलेंगी।

क्योंकि लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि उसने कितनी योजनाएं बनाईं।

सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने जनता की समस्या जनता से पूछकर हल की या नहीं।

और जब तक गांव योजना का केंद्र नहीं बनेगा—

योजनाएं ऊपर से आती रहेंगी, पैसा नीचे जाता रहेगा, फाइलें बंद होती रहेंगी और गांव वही सवाल पूछता रहेगा—

“साहब, योजना तो बहुत आईं… हमारे गांव में बदला क्या?”

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