“आशीर्वाद का दीया” या सत्ता की आरती? जब राजधर्म हार गया और चाटुकारिता जीत गई
“आशीर्वाद का दीया” के बहाने सरकारी मशीनरी के राजनीतिक इस्तेमाल, राजधर्म, राजशुचिता और सत्ता की बढ़ती व्यक्तिपूजा पर तीखा सवाल उठाता विश्लेषण।
जब राजधर्म की जगह चाटुकारिता ले ले
By- Chaudhary Sudhir Talyan
लोकतंत्र में किसी प्रधानमंत्री का जन्मदिन मनाना नागरिकों या किसी राजनीतिक दल का अधिकार हो सकता है। लेकिन जब किसी नेता के जन्मदिन पर दीप जलाने के लिए सरकारी तंत्र को सक्रिय किया जाए, अधिकारियों को जिम्मेदारियां दी जाएं, सरकारी संस्थानों को कार्यक्रमों से जोड़ा जाए और कार्यक्रम की तस्वीरें या वीडियो प्रशासनिक WhatsApp समूहों में भेजने की व्यवस्था हो, तब सवाल उत्सव का नहीं, राज्य की निष्पक्षता और राजधर्म का हो जाता है।
भारत का दुर्भाग्य यह नहीं है कि किसी प्रधानमंत्री के समर्थक उनका जन्मदिन मनाते हैं। राजनीतिक दल ऐसा करते रहे हैं और करते रहेंगे। असली दुर्भाग्य तब शुरू होता है जब सरकार और पार्टी की सीमा धुंधली पड़ने लगे, जब सरकारी अधिकारी जनसेवा की जगह राजनीतिक व्यक्तिपूजा के आयोजन में दिखाई देने लगें और सार्वजनिक संस्थाएं नागरिकों की नहीं, सत्ता के व्यक्तित्व की प्रशंसा का मंच बन जाएं।
17 सितंबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर “आशीर्वाद का दीया” कार्यक्रम इसी कारण गंभीर सार्वजनिक बहस का विषय है।
हरियाणा सरकार के आधिकारिक PRMS पोर्टल पर प्रकाशित सामग्री में 17 सितंबर को “आशीर्वाद का दीया” कार्यक्रम आयोजित करने का उल्लेख है। सरकारी सामग्री इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन और शासन के 25 वर्ष पूरे होने से जोड़ती है। एक सरकारी विज्ञप्ति में बूथ स्तर पर कार्यक्रम और लाभार्थी परिवारों को दीये वितरित करने की जानकारी दी गई है।
एक अन्य सरकारी विज्ञप्ति में स्पष्ट रूप से कहा गया कि मुख्य सचिव ने सभी उपायुक्तों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस की और अभियान की गतिविधियों के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए। जिला स्तर पर विभागाध्यक्षों के साथ समीक्षा बैठकें भी हुईं।
यहां से असली प्रश्न पैदा होता है।
क्या भारत का सरकारी प्रशासन अब नागरिकों की समस्याओं के समाधान के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक व्यक्तित्वों के जन्मदिन का आयोजन कराने के लिए बनाया गया है?
यह प्रश्न कठोर है, लेकिन लोकतंत्र में कठोर प्रश्न पूछना अपराध नहीं है।
सरकारी मशीनरी आखिर किसके लिए है?
सरकारी अधिकारी संविधान के प्रति उत्तरदायी होते हैं। वे किसी व्यक्ति के निजी प्रशंसक या राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में नियुक्त नहीं होते।
एक जिलाधिकारी का काम है—कानून-व्यवस्था, आपदा प्रबंधन, विकास योजनाओं का क्रियान्वयन, नागरिक सेवाएं और प्रशासनिक जवाबदेही।
एक शिक्षा अधिकारी का काम है—विद्यालयों में शिक्षक उपलब्ध कराना, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना, बच्चों की उपस्थिति और सीखने के स्तर पर काम करना।
एक सरकारी शिक्षक का काम है—बच्चों को शिक्षा देना।
एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता का काम है—पोषण, मातृ एवं बाल स्वास्थ्य तथा सामुदायिक सेवाओं से जुड़े दायित्व निभाना।
सरकारी कर्मचारी किसी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री के जन्मदिन पर राजनीतिक शैली के कार्यक्रम आयोजित करने के लिए नियुक्त नहीं किए जाते।
यदि किसी कर्मचारी की ड्यूटी किसी सरकारी योजना की जानकारी देने में लगाई जाती है, तो उसका औचित्य समझ में आता है। लेकिन यदि वही मशीनरी किसी व्यक्ति के जन्मदिन को केंद्र बनाकर दीप जलाने, आयोजन करने और उसकी तस्वीरें भेजने में लगाई जाए, तो राज्य की संस्थागत निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
“आशीर्वाद का दीया” और सरकारी प्रशासन
हरियाणा सरकार के आधिकारिक दस्तावेजों में “आशीर्वाद का दीया” को “सेवा संकल्प अभियान” से जोड़ा गया है। एक सरकारी विज्ञप्ति में लाभार्थी परिवारों को 3,97,664 दीये वितरित करने की योजना का उल्लेख है।
दूसरी सरकारी विज्ञप्ति में कहा गया कि “आशीर्वाद का दीया” से अभियान की शुरुआत होगी और विभिन्न विभागों को समन्वय से गतिविधियां आयोजित करने के निर्देश दिए गए।
अंबाला की सरकारी विज्ञप्ति और भी महत्वपूर्ण है। उसमें प्रशासनिक अधिकारियों और भाजपा पदाधिकारियों के साथ बैठक का उल्लेख है और उसी संदर्भ में “आशीर्वाद का दीया” कार्यक्रम की जानकारी दी गई है।
यही वह बिंदु है जहां लोकतंत्र की संस्थागत रेखा पर बहस जरूरी हो जाती है।
सरकारी अधिकारी और राजनीतिक दल के पदाधिकारी एक ही कार्यक्रम की तैयारी में किस संवैधानिक भूमिका में साथ बैठे हैं?
यदि कार्यक्रम सरकारी है, तो उसका संचालन सरकारी नियमों के अनुसार होना चाहिए।
यदि कार्यक्रम राजनीतिक दल का है, तो उसका संचालन राजनीतिक दल करे।
दोनों को मिला देने से लोकतंत्र मजबूत नहीं होता। इससे सत्ता और संगठन के बीच की दीवार कमजोर होती है।
और लोकतंत्र में यही दीवार सबसे जरूरी होती है।
बिहार की कहानी और WhatsApp का सवाल
बिहार से संबंधित रिपोर्टों में इससे भी अधिक गंभीर दावा सामने आया है। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में सरकारी शिक्षा तंत्र से जुड़े निर्देशों का हवाला देते हुए कहा गया कि सरकारी स्कूलों में “आशीर्वाद का दीया” जलाने की व्यवस्था की गई और दीप प्रज्वलन की तस्वीरें या वीडियो WhatsApp समूहों में भेजने को कहा गया। कुछ रिपोर्टों में न्यूनतम संख्या में दीप जलाने का निर्देश भी बताया गया है।
फिर सवाल होगा:
सरकारी प्रशासन किसी नागरिक कार्यक्रम की रिपोर्टिंग के लिए फोटो मांग रहा था या राजनीतिक कार्यक्रम में भागीदारी का प्रमाण?
फोटो और वीडियो मांगना मामूली बात नहीं है।
क्यों?
क्योंकि इससे कार्यक्रम “करने” से “करने और साबित करने” में बदल जाता है।
सरकारी WhatsApp समूह में तस्वीर भेजना प्रशासनिक monitoring का संकेत है। अगर सरकारी कर्मचारियों से कहा गया कि दीप जलाइए और प्रमाण भेजिए, तो यह पूछना पूरी तरह जायज है कि आदेश किस अधिकार से आया, किस बजट से कार्यक्रम हुआ और किस सरकारी दायित्व के तहत यह कार्य सौंपा गया।
राजस्थान में सरकारी कॉलेजों तक पहुंचा आयोजन
राजस्थान के सरकारी Higher Education portal पर Government Law College Ajmer की circular listing में 17 सितंबर 2026 को “विकसित भारत जन-सेवा अभियान अन्तर्गत आशीर्वाद का दीया गतिविधि” से संबंधित circular दर्ज है।
यह तथ्य और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यहां सरकारी शैक्षणिक संस्थान भी अभियान के प्रशासनिक ढांचे में दिखाई देते हैं।
शिक्षा संस्थानों को राजनीतिक व्यक्तित्वों के जन्मदिन समारोह का मंच बना देना लोकतंत्र के लिए स्वस्थ संकेत नहीं माना जा सकता—विशेषकर तब, जब छात्रों और शिक्षकों की भागीदारी किसी प्रशासनिक निर्देश से प्रभावित हो।
विद्यालय और कॉलेज किसी नेता की आरती उतारने के स्थान नहीं हैं।
वे नागरिक बनाने के स्थान हैं।
उनका काम प्रश्न पूछना सिखाना है, प्रश्न से डरना नहीं।
उनका काम संविधान समझाना है, सत्ता की स्तुति करवाना नहीं।
राजधर्म का अर्थ क्या है?
राजधर्म का अर्थ यह नहीं कि सरकार किसी व्यक्ति के प्रति सम्मान न दिखाए।
राजधर्म का अर्थ है कि व्यक्ति से ऊपर संस्था हो, सत्ता से ऊपर संविधान हो और सरकार से ऊपर नागरिक का अधिकार हो।
प्रधानमंत्री लोकतांत्रिक व्यवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण पद है। लेकिन प्रधानमंत्री का पद व्यक्ति को संविधान से ऊपर नहीं करता।
आज नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं। कल कोई दूसरा व्यक्ति होगा।
सरकारें बदलती हैं।
प्रधानमंत्री बदलते हैं।
मुख्यमंत्री बदलते हैं।
लेकिन प्रशासनिक संस्थाएं बनी रहती हैं।
यदि आज सरकारी स्कूलों में प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर दीप जलाना प्रशासनिक संस्कृति बनता है, तो कल किसी दूसरे प्रधानमंत्री के समर्थक भी यही परंपरा आगे बढ़ाने का दावा करेंगे।
फिर सवाल यह नहीं रहेगा कि कौन प्रधानमंत्री है।
सवाल यह होगा:
क्या भारत का प्रशासन व्यक्ति-केंद्रित होगा या संविधान-केंद्रित?
सुप्रीम कोर्ट की कसौटी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में Common Cause v. Union of India मामले में सरकारी विज्ञापनों के संदर्भ में महत्वपूर्ण दिशानिर्देश दिए थे। न्यायालय ने सार्वजनिक धन के उपयोग से राजनीतिक व्यक्तियों या दलों को अनुचित राजनीतिक लाभ पहुंचाने की समस्या को गंभीरता से देखा।
दिशानिर्देशों में सरकारी संचार को नागरिकों के अधिकारों, सरकारी नीतियों और सेवाओं से संबंधित रखने, उसे objective और fair बनाने तथा सत्तारूढ़ दल के राजनीतिक हितों को बढ़ावा देने से बचाने की बात कही गई है।
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी सावधानी भी जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट का मूल सिद्धांत बिल्कुल स्पष्ट है:
सार्वजनिक धन और सरकारी तंत्र का उपयोग राजनीतिक लाभ या व्यक्तित्व-प्रचार के लिए नहीं होना चाहिए।
और यही सिद्धांत इस पूरे विवाद को गंभीर बनाता है।
यह केवल दीये का मामला नहीं है
दीया अपने आप में समस्या नहीं है।
दीया भारतीय संस्कृति का प्रतीक है।
दीया आशा का प्रतीक है।
दीया ज्ञान का प्रतीक है।
दीया अंधकार के विरुद्ध प्रकाश का प्रतीक है।
लेकिन जब सरकारी आदेश, सरकारी अधिकारी, सरकारी संस्थान, सरकारी संसाधन और किसी राजनीतिक व्यक्तित्व का जन्मदिन एक ही आयोजन में मिल जाते हैं, तब दीया केवल दीया नहीं रहता।
वह राज्य की प्राथमिकताओं का प्रतीक बन जाता है।
लेखक के मत में यही इस पूरे प्रकरण का सबसे चिंताजनक पहलू है।
जब किसान अपनी फसल का उचित मूल्य मांगता है, बेरोजगार नौकरी मांगता है, सरकारी अस्पताल डॉक्टर मांगता है, सरकारी स्कूल शिक्षक मांगता है, बाढ़ पीड़ित राहत मांगता है और सरकारी कर्मचारी अपने मूल दायित्वों के दबाव में काम करता है—तब सरकार की ऊर्जा किस दिशा में जानी चाहिए?
जनसेवा या व्यक्तिपूजा?
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
यह चुनाव प्रशासन को नहीं करना चाहिए।
सत्ता की चाटुकारिता लोकतंत्र को भीतर से खोखला करती है
भारत ने लोकतंत्र इसलिए नहीं अपनाया था कि हर सत्ता अपने नेता की महिमा का सरकारी उत्सव मनाए।
लोकतंत्र में प्रधानमंत्री जनता का सेवक होता है—राजा नहीं।
मुख्यमंत्री जनता का प्रतिनिधि होता है—सम्राट नहीं।
मंत्री संवैधानिक पदाधिकारी होता है—दरबारी व्यवस्था का केंद्र नहीं।
लेकिन जब सरकारी तंत्र किसी नेता के जन्मदिन के आयोजन में उतरता है, तब सत्ता के भीतर एक खतरनाक संस्कृति जन्म लेती है:
चाटुकारिता।
और चाटुकारिता किसी भी शासन की सबसे खतरनाक बीमारी है।
https://politicsinsightindia.com/ias-police-satta-gathjod-janata-par-mukadme-samvidhan-ka-sankat
क्योंकि चाटुकार सत्ता को वास्तविकता नहीं बताते।
वे वही बताते हैं जो सत्ता सुनना चाहती है।
नतीजा यह होता है कि किसान की परेशानी फाइल में दब जाती है, बेरोजगार की पीड़ा आंकड़ों में खो जाती है, सरकारी अस्पताल की बदहाली रिपोर्ट में “सुधाराधीन” बन जाती है और सरकारी स्कूल की टूटी छत के बीच प्रशासन दीप जलाने की तस्वीर भेज देता है।
यह व्यवस्था की प्राथमिकताओं का संकट है।
सत्ता को आईना चाहिए, आरती नहीं
सरकार को प्रशंसा की आवश्यकता नहीं होती।
सरकार को जवाबदेही की आवश्यकता होती है।
प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर लाखों दीप जलाने से देश की गरीबी कम नहीं होती।
सरकारी कर्मचारी के हाथ में दिया देने से बेरोजगारी समाप्त नहीं होती।
https://politicsinsightindia.com/mehangai-ka-dosh-kisan-par-kyon
सरकारी स्कूल में दीप जलाने से शिक्षक की कमी पूरी नहीं होती।
सरकारी भवन को रोशन करने से अस्पताल में डॉक्टर नहीं आते।
और किसी नेता के 25 वर्ष के सार्वजनिक जीवन का उत्सव मनाने से नागरिक की जेब में अतिरिक्त आय नहीं आती।
सरकार का मूल्यांकन दीपों की संख्या से नहीं होना चाहिए।
सरकार का मूल्यांकन होना चाहिए:
- कितने युवाओं को रोजगार मिला;
- किसानों की आय और लागत में क्या बदलाव हुआ;
- सरकारी विद्यालयों की स्थिति कितनी सुधरी;
- अस्पतालों में डॉक्टर और दवाएं कितनी उपलब्ध हुईं;
- ग्रामीण परिवारों की वास्तविक आय कितनी बढ़ी;
- कितने नागरिकों को न्याय समय पर मिला;
- भ्रष्टाचार के विरुद्ध संस्थाएं कितनी स्वतंत्र रहीं;
- https://politicsinsightindia.com/india-62-mmt-cbg-potential-government-failure-farmer-waste-energy
- और सरकारी धन का कितना हिस्सा वास्तविक जनहित में गया।
राजशुचिता का अर्थ यही है
लेखक के मत में राजशुचिता सत्ता की सजावट नहीं, सत्ता की आत्म-अनुशासन क्षमता है।
राजशुचिता का अर्थ है कि सरकार अपने समर्थकों और सरकारी कर्मचारियों के बीच अंतर बनाए रखे।
राजशुचिता का अर्थ है कि सरकारी कर्मचारी किसी पार्टी का कार्यकर्ता न बने।
राजशुचिता का अर्थ है कि सरकारी विद्यालय किसी नेता की व्यक्तिगत लोकप्रियता का मंच न बने।
राजशुचिता का अर्थ है कि सार्वजनिक धन से जनता को सूचना मिले, किसी व्यक्ति को महिमामंडित करने की संस्कृति न बने।
और राजधर्म का अर्थ है कि सत्ता स्वयं पर भी वही कानून लागू करे जिसकी अपेक्षा वह नागरिकों से करती है।
अंतिम सवाल
“आशीर्वाद का दीया” वास्तव में कितने दीयों का सवाल है?
लाखों का?
करोड़ों का?
https://politicsinsightindia.com/ganna-1-quintal-1366-value-farmer-365-frp-70-percent-share
नहीं।
यह एक संवैधानिक चेतना के दीपक का सवाल है।
यदि सरकारी मशीनरी किसी नेता के जन्मदिन के लिए सक्रिय हो सकती है, तो नागरिक को यह पूछने का अधिकार है कि प्रशासन की प्राथमिकताएं कौन तय करता है।
यदि सरकारी अधिकारी किसी राजनीतिक व्यक्तित्व के सम्मान में कार्यक्रम की निगरानी कर सकते हैं, तो नागरिक पूछ सकता है कि क्या यही अधिकारी बेरोजगार युवाओं, किसानों, बाढ़ पीड़ितों और गरीब परिवारों की शिकायतों के लिए भी उतनी ही तत्परता दिखाते हैं।
यदि सरकारी संस्थानों में नेता के जन्मदिन पर उत्सव हो सकता है, तो क्या उन्हीं संस्थानों में संविधान दिवस, नागरिक अधिकार और लोकतांत्रिक जवाबदेही भी उतनी ही ताकत से मनाई जाती है?
भारत को नेताओं की आरती उतारने वाला प्रशासन नहीं चाहिए।
भारत को संविधान की शपथ निभाने वाला प्रशासन चाहिए।
भारत को जन्मदिन के दीयों से अधिक न्याय का प्रकाश चाहिए।
https://politicsinsightindia.com/upi-par-tax-nahi-04-mdr-digital-payment-system-ka-malik-kaun
भारत को सरकारी WhatsApp समूहों में भेजी गई दीपों की तस्वीरों से अधिक सरकारी अस्पतालों, स्कूलों, खेतों और रोजगार कार्यालयों की वास्तविक तस्वीर चाहिए।
और सबसे बढ़कर—भारत को ऐसी सत्ता चाहिए जिसे अपने चारों ओर रोशनी पैदा करने के लिए सरकारी दीयों की जरूरत न पड़े।
जिस शासन की उपलब्धियां वास्तविक होती हैं, उसे अपने लिए सरकारी आरती नहीं करवानी पड़ती।
वह अपने काम का हिसाब देता है।
लोकतंत्र में यही राजधर्म है।
यही राजशुचिता है।
और यही वह सीमा है जिसे सत्ता चाहे जितनी बड़ी क्यों न हो, पार करने का नैतिक अधिकार नहीं रखती।
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