“गन्ने का 1 क्विंटल ₹1,366 की कमाई देता है, किसान को सिर्फ ₹365! आखिर बाकी पैसा किसकी जेब में?”

एक क्विंटल गन्ने से चीनी, एथेनॉल, बैगास, प्रेसमड और अन्य उत्पादों के जरिए कितनी आर्थिक वैल्यू बनती है? ₹365 FRP के मुकाबले ₹1,366 के illustrative value-chain मॉडल की पड़ताल और किसान को 70% हिस्सेदारी देने के प्रस्ताव का कठोर विश्लेषण।

“गन्ने का 1 क्विंटल ₹1,366 की कमाई देता है, किसान को सिर्फ ₹365! आखिर बाकी पैसा किसकी जेब में?”

गन्ने का असली गणित

By- Chaudhary Sudhir Talyan

क्या गन्ना किसान केवल गन्ना बेचता है, या उसके खेत से निकलने वाली पूरी औद्योगिक अर्थव्यवस्था का मालिक भी होना चाहिए?

भारत में गन्ने की कहानी वर्षों से एक ही ढर्रे पर लिखी जाती रही है। किसान खेत में गन्ना पैदा करता है, मिल उसे खरीदती है, सरकार FRP घोषित करती है और फिर यह मान लिया जाता है कि किसान को उसका “उचित और लाभकारी मूल्य” मिल गया।

लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है।

क्या किसान को केवल गन्ने के वजन का मूल्य मिलना चाहिए, या उसके गन्ने से पैदा होने वाली पूरी value chain में हिस्सा मिलना चाहिए?

आज गन्ना केवल चीनी बनाने का कच्चा माल नहीं है। आधुनिक चीनी उद्योग एक integrated biorefinery की दिशा में बढ़ चुका है—जहां गन्ने से चीनी के साथ ethanol, bagasse से ऊर्जा, press mud से जैविक खाद और molasses आधारित अनेक उत्पाद बनाए जा सकते हैं।

फिर किसान की कीमत केवल गन्ने के लिए तय क्यों हो?

यही भारत की गन्ना मूल्य नीति का सबसे असुविधाजनक प्रश्न है।

एक क्विंटल गन्ने का नया गणित

मान लीजिए 100 किलो यानी एक क्विंटल गन्ने को एक illustrative value-chain model में रखा जाए।

यदि लगभग 12 किलो चीनी की recovery मानें और चीनी का मूल्य ₹50 प्रति किलो रखें, तो:

12 × ₹50 = ₹600

अब गन्ने से निकलने वाला bagasse लें। लगभग 30–33 किलो bagasse का उत्पादन तकनीकी परिस्थितियों के अनुसार संभव है। इसका इस्तेमाल boiler, steam और cogeneration में किया जा सकता है। इसलिए इसे केवल “कचरा” मानना आर्थिक अज्ञानता होगी।

फिर molasses से ethanol का मूल्य आता है। यदि illustrative रूप से 6 लीटर ethanol और ₹61 प्रति लीटर का मूल्य माना जाए:

6 × ₹61 = ₹366

इसके बाद press mud है, जिसे compost और organic manure जैसे value-added उत्पादों में बदला जा सकता है। यदि इसके लिए illustrative मूल्य ₹200 माना जाए तो कुल गणित बनता है:

₹600 + ₹366 + ₹200 + bagasse-energy value

और इसी तरह एक विस्तृत illustrative model में ₹1,366 प्रति क्विंटल या उससे अधिक की gross value का सवाल उठता है।

यह संख्या कोई सरकारी घोषित “गन्ना मूल्य” नहीं है। यह यह दिखाने के लिए है कि गन्ने की आर्थिक उपयोगिता केवल उस रकम तक सीमित नहीं है जो किसान को मिल के गेट पर मिलती है।

सरकार स्वयं गन्ना और चीनी क्षेत्र को व्यापक रूप से regulate करती है तथा गन्ना नियंत्रण आदेश और चीनी नियंत्रण आदेश के माध्यम से मूल्य और उद्योग की संरचना पर प्रभाव डालती है।

सरकार का FRP और किसान की वास्तविक स्थिति

2026-27 के लिए केंद्र सरकार ने गन्ने का FRP ₹365 प्रति क्विंटल निर्धारित किया है, जिसकी basic recovery rate 10.25% है। 10.25% से अधिक recovery पर प्रत्येक 0.1 percentage point की वृद्धि के लिए ₹3.56 प्रति क्विंटल का premium निर्धारित किया गया है।

सरकार का तर्क है कि यह मूल्य किसान के हित में है। सरकार ने 2026-27 के लिए गन्ने की A2+FL उत्पादन लागत ₹182 प्रति क्विंटल बताई है और FRP को इससे 100.5% अधिक बताया है।

लेकिन यहीं नीति की सबसे बड़ी कमजोरी दिखाई देती है।

किसान के लिए लागत की गणना एक तरफ है और गन्ने से बनने वाली पूरी औद्योगिक value chain दूसरी तरफ।

यदि उद्योग गन्ने को लेकर चीनी, ethanol, energy और अन्य by-products बनाता है, तो किसान को केवल एक fixed procurement price देकर यह मान लेना कि उसका आर्थिक संबंध समाप्त हो गया—यह मूल्य श्रृंखला की अधूरी accounting है।

सरकार ने 2025-26 में ₹355 प्रति क्विंटल FRP तय किया था और 2026-27 में इसे ₹365 किया। यानी एक वर्ष में वृद्धि ₹10 प्रति क्विंटल हुई।

लेकिन सवाल यह है कि गन्ने से पैदा होने वाली पूरी economic value में किसान की हिस्सेदारी कितनी बढ़ी?

यही वह सवाल है जिसे नीति निर्माता अक्सर टाल देते हैं।

किसान को 70 प्रतिशत क्यों?

यहां एक नया नीति प्रस्ताव सामने आता है:

Total Cane Realisation — TCR

गन्ने से पैदा होने वाली कुल सकल आर्थिक प्राप्ति को इस तरह परिभाषित किया जाए:

TCR = Sugar Value + Ethanol Value + Bagasse Energy Value + Molasses Value + Press Mud Value + CO₂ + Other By-products

इसके बाद वास्तविक processing और industrial costs को पारदर्शी तरीके से दर्ज किया जाए।

लेकिन इस मॉडल का मूल सिद्धांत यह हो:

कुल मूल्य का 70% किसान के लिए और 30% उद्योग के लिए।

यहां 70% का अर्थ यह नहीं कि किसान को उद्योग के हर उत्पाद का 70% cash revenue बिना लागत घटाए दे दिया जाए। बल्कि इसका अर्थ होना चाहिए कि गन्ने से पैदा हुई audited economic value में किसान की निर्णायक हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए, जबकि उद्योग को processing, capital, technology, labour, finance और risk के लिए पर्याप्त 30% हिस्सा मिले।

यानी किसान को केवल “raw material supplier” नहीं, बल्कि value-chain partner माना जाए।

30% उद्योग के लिए कम नहीं है

चीनी उद्योग को यह कहकर किसान की हिस्सेदारी को खारिज नहीं करना चाहिए कि उद्योग पर खर्च बहुत है।

निश्चित रूप से खर्च हैं।

मिल चलाने में:

  • labour
  • electricity
  • boiler
  • maintenance
  • chemicals
  • depreciation
  • finance
  • transportation
  • storage
  • distillery cost
  • administrative expenditure
  • environmental compliance

जैसे खर्च होते हैं।

लेकिन यही तो transparent accounting का विषय है।

किसान यह नहीं कह रहा कि उद्योग बिना खर्च के चले।

किसान का सवाल है:

खर्च निकालने के बाद वास्तविक आर्थिक surplus का वितरण कैसे होगा?

यदि किसी उद्योग को कुल value का 30% मिलता है और उसी हिस्से के भीतर processing तथा अन्य वैध लागतों का भुगतान किया जाता है, तो industry को technology, management और capital investment के साथ reasonable net return अर्जित करने का अवसर मिल सकता है।

लेकिन यदि उद्योग कहे कि पहले पूरा product revenue उसका है, फिर सारी लागतें उसकी हैं, फिर profit भी उसका है—तो किसान के लिए केवल FRP बचता है।

यही असंतुलन समाप्त होना चाहिए।

असली समस्या FRP नहीं, accounting है

गन्ने की राजनीति में सबसे बड़ा विवाद अक्सर FRP बनाम SAP तक सीमित कर दिया जाता है।

यह अधूरी बहस है।

असल प्रश्न होना चाहिए:

एक क्विंटल गन्ने से कुल कितना आर्थिक मूल्य पैदा हुआ?

उस मूल्य में चीनी का योगदान कितना है?

ethanol से कितना मिला?

bagasse से बिजली या fuel saving कितनी हुई?

molasses का मूल्य कितना रहा?

press mud का commercial value कितना रहा?

CO₂ और अन्य by-products से कितना revenue आया?

और सबसे महत्वपूर्ण:

इस पूरी value chain में किसान को कितना मिला?

जब तक इन सवालों के जवाब सार्वजनिक नहीं होंगे, तब तक “किसान को उचित मूल्य मिल रहा है” कहना केवल प्रशासनिक दावा रहेगा।

गन्ना अब केवल चीनी नहीं है

भारत की ethanol policy ने इस उद्योग का स्वरूप बदल दिया है।

सरकार ethanol blending को energy security और fossil fuel dependence कम करने की रणनीति का हिस्सा मानती है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2026-27 के लिए गन्ने का FRP ₹365 है, जबकि ethanol और sugar sector को एक साथ विकसित करने की नीति जारी है।

इसका सीधा अर्थ है कि गन्ना अब केवल sugar economy का हिस्सा नहीं रहा।

यह:

Food + Fuel + Fibre + Energy + Fertilizer + Industrial Raw Material

का स्रोत बन रहा है।

ऐसे में किसान की कीमत केवल “गन्ने की कीमत” के पुराने फार्मूले से तय करना 21वीं सदी की bioeconomy को 20वीं सदी के procurement model में कैद करना है।

सरकार को डर किस बात का है?

सरकार को सबसे पहले transparency लानी होगी।

हर चीनी मिल को season-wise सार्वजनिक करना चाहिए:

  1. कुल खरीदा गया गन्ना।
  2. औसत recovery।
  3. कुल चीनी उत्पादन।
  4. चीनी की औसत realization।
  5. ethanol production।
  6. ethanol realization।
  7. molasses production और realization।
  8. bagasse की मात्रा।
  9. cogeneration से बिजली उत्पादन।
  10. captive consumption।
  11. grid को बेची गई बिजली।
  12. press mud production।
  13. press mud की बिक्री।
  14. CO₂ तथा अन्य by-products से प्राप्त आय।
  15. कुल processing cost।
  16. finance cost।
  17. depreciation।
  18. administrative expenditure।
  19. tax और अन्य statutory payments।
  20. अंततः किसान और उद्योग के बीच value distribution।

यह डेटा किसान को नहीं दिया जाएगा तो किसान हमेशा अंधेरे में रहेगा।

और जिस किसान के गन्ने से करोड़ों रुपये का industrial turnover बनता है, उसे केवल weighbridge slip और payment advice देकर चुप करा देना आर्थिक न्याय नहीं है।

किसान subsidy नहीं, हिस्सेदारी मांग रहा है

यह अंतर समझना जरूरी है।

किसान को subsidy देना सरकार की कृपा जैसा दिखाया जा सकता है।

लेकिन value-chain में हिस्सा देना आर्थिक अधिकार है।

किसान कहता है:

“मैं तुम्हें कच्चा माल नहीं दे रहा। मैं तुम्हारी पूरी industrial economy का आधार पैदा कर रहा हूं।”

बिना गन्ने के sugar mill नहीं।

बिना गन्ने के molasses नहीं।

बिना molasses के कई ethanol pathways नहीं।

बिना bagasse के कई mills में cogeneration model नहीं।

बिना press mud के वह by-product stream नहीं।

अर्थात factory का पहला economic input किसान के खेत से आता है।

फिर सबसे बड़ा सवाल वही है:

जिसका raw material पूरी व्यवस्था की नींव है, उसे केवल fixed procurement price देकर value chain से बाहर क्यों रखा जाए?

सरकार और उद्योग के बीच किसान कहां है?

भारत में कृषि नीति की सबसे बड़ी समस्या यह है कि किसान को अक्सर “beneficiary” मान लिया जाता है।

किसान beneficiary नहीं है।

वह producer है।

वह raw-material owner है।

वह food system का आधार है।

और sugar industry में वह industrial supply chain का पहला economic stakeholder है।

https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra

इसलिए नई नीति में किसान को beneficiary नहीं बल्कि value-chain shareholder की तरह देखना होगा।

70:30 मॉडल क्यों जरूरी है?

70:30 मॉडल को अंतिम सत्य नहीं, बल्कि नीतिगत negotiation का प्रारंभिक आधार समझना चाहिए।

अगर स्वतंत्र audited costing से साबित होता है कि processing cost अधिक है, तो आंकड़े सामने आएं।

अगर उद्योग कहता है कि 30% पर्याप्त नहीं है, तो audited books सामने रखे।

https://politicsinsightindia.com/mehangai-ka-dosh-kisan-par-kyon

बहस आंकड़ों पर होनी चाहिए, दावों पर नहीं।

यही वास्तविक किसान-हित है।

अब समय है “Cane Value Commission” का

भारत में केवल FRP घोषित करने वाली व्यवस्था पर्याप्त नहीं है।

एक स्वतंत्र National Cane Value Commission बनाया जाना चाहिए।

https://politicsinsightindia.com/seed-bill-kisan-ka-beej-company-ka-raj-chhote-kisan-fasal-vividhta-ki-ladai

इसका काम केवल FRP तय करना नहीं बल्कि:

गन्ना → चीनी → ethanol → energy → molasses → press mud → CO₂ → अन्य उत्पाद

की पूरी value chain का annual audit करना होना चाहिए।

हर मिल की audited value realization सार्वजनिक हो।

किसान प्रतिनिधि उसमें शामिल हों।

कृषि अर्थशास्त्री शामिल हों।

https://politicsinsightindia.com/india-62-mmt-cbg-potential-government-failure-farmer-waste-energy

चीनी तकनीक विशेषज्ञ शामिल हों।

स्वतंत्र auditor शामिल हों।

और सबसे महत्वपूर्ण—मिल मालिकों की commercial confidentiality के नाम पर किसान से आर्थिक जानकारी छिपाने की गुंजाइश न्यूनतम हो।

सरकार को एक बात समझनी होगी

सरकार यदि केवल FRP बढ़ाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मानती रहेगी तो विवाद समाप्त नहीं होगा।

2025-26 में FRP ₹355 था और 2026-27 में ₹365 हुआ।

https://politicsinsightindia.com/gaon-ke-loktantra-par-ias-rajnitik-gathjod-ka-kabza

लेकिन किसान का असली सवाल ₹10 की वृद्धि से कहीं बड़ा है।

वह पूछ रहा है:

मेरे 100 किलो गन्ने से कुल कितनी आर्थिक संपत्ति पैदा हुई?

उसमें मेरा हिस्सा कितना है?

और यही सवाल भविष्य की गन्ना राजनीति को तय करेगा।

निष्कर्ष: ₹365 की लड़ाई से आगे बढ़ना होगा

भारत का गन्ना किसान केवल ₹365 या ₹400 या ₹500 की लड़ाई नहीं लड़ रहा।

https://politicsinsightindia.com/kisan-atmahatya-10546-mauten-karz-mehangai-badhati-lagat-krishi-niti-ki-vifalta

वह उस आर्थिक व्यवस्था के खिलाफ सवाल उठा रहा है जिसमें उसका उत्पाद factory gate पर पहुंचते ही एक fixed-price commodity बन जाता है, जबकि उसी उत्पाद से आगे कई high-value industrial products पैदा होते हैं।

इसलिए अब गन्ने की कीमत का नया दर्शन होना चाहिए:

गन्ने की कीमत केवल गन्ने के वजन से नहीं, उससे पैदा हुई पूरी आर्थिक value से तय हो।

और यदि एक विस्तृत audited model में एक क्विंटल गन्ने की gross economic value ₹1,366 जैसी illustrative राशि तक पहुंचती है, तो सरकार को यह बताना होगा कि किसान को उसमें से कितना हिस्सा मिल रहा है और क्यों।

https://politicsinsightindia.com/pm-modi-81-year-old-schoolmate-15-year-mumbai-land-dispute-justice-system

किसान को दया नहीं चाहिए।

किसान को subsidy नहीं चाहिए।

किसान को राजनीतिक भाषण नहीं चाहिए।

उसे चाहिए—

पारदर्शी हिसाब।

लागत की स्वतंत्र गणना।

पूरी value chain में हिस्सेदारी।

और उसके उत्पादन से पैदा होने वाले आर्थिक surplus पर न्यायसंगत अधिकार।

सरकार अगर सचमुच किसान के साथ है तो उसे एक आसान काम करना चाहिए:

हर चीनी मिल का “एक क्विंटल गन्ना—पूरा आर्थिक हिसाब” सार्वजनिक कर दे।

फिर किसान और सरकार दोनों के सामने सच होगा।

क्योंकि असली सवाल यह नहीं है कि सरकार गन्ने का FRP कितना घोषित करती है।

असली सवाल है—किसान के गन्ने से पैदा होने वाली पूरी दौलत में किसान का हिस्सा कितना है?

और जब तक इस सवाल का पारदर्शी जवाब नहीं मिलता, तब तक “उचित और लाभकारी मूल्य” का दावा अधूरा रहेगा।

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