उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्था गंभीर बीमार: सरकारी अस्पतालों की हालत ने खोल दी सिस्टम की पोल

उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्था गंभीर बीमार है। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी, दवाओं और बेड का संकट, लंबी कतारें और कमजोर स्वास्थ्य सुविधाएं आम आदमी की मुश्किल बढ़ा रही हैं। आखिर इलाज के लिए गरीब जाए तो जाए कहां?

उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्था गंभीर बीमार: सरकारी अस्पतालों की हालत ने खोल दी सिस्टम की पोल

By- Chaudhary Sudhir Talyan

भारत में बीमारी सिर्फ शरीर पर हमला नहीं करती। वह परिवार की जेब पर भी हमला करती है। गरीब आदमी के लिए बीमारी का मतलब कई बार अस्पताल की चारदीवारी से बाहर शुरू होने वाली एक लंबी आर्थिक त्रासदी होता है—बस का किराया, जांच का खर्च, बाहर से खरीदी गई दवा, खोई हुई मजदूरी, साथ गए परिजन का खर्च और इलाज के लिए शहर-दर-शहर भटकना।

सरकार स्वास्थ्य व्यवस्था की उपलब्धियां गिनाती है। नए अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों, स्वास्थ्य केंद्रों, बीमा योजनाओं और स्वास्थ्य मिशनों की सूची सामने रखी जाती है। इन योजनाओं और विस्तारों को नकारना तथ्यात्मक नहीं होगा। लेकिन आम आदमी का सवाल इससे कहीं सीधा है:

“जब मेरे घर में रात को मरीज बीमार पड़ता है, तब मुझे इलाज कहां मिलेगा?”

यहीं सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे कठिन परीक्षा शुरू होती है।

और इसी परीक्षा में भारत की व्यवस्था की कई कमजोरियां सरकारी आंकड़ों में भी दिखाई देती हैं।


गरीब आदमी के लिए सरकारी अस्पताल आखिरी उम्मीद है

मध्यवर्ग के पास विकल्प हैं। वह निजी अस्पताल जा सकता है, स्वास्थ्य बीमा खरीद सकता है, बड़े शहर की यात्रा कर सकता है और जरूरत पड़ने पर दूसरे शहर या विदेश तक इलाज के लिए जा सकता है।

लेकिन दिहाड़ी मजदूर के पास विकल्प सीमित हैं।

छोटा किसान, रिक्शा चालक, घरेलू कामगार, ग्रामीण मजदूर, छोटा दुकानदार या कम आय वाला कर्मचारी गंभीर बीमारी की स्थिति में सबसे पहले सरकारी अस्पताल की तरफ देखता है।

यही कारण है कि सरकारी अस्पताल को केवल एक “सरकारी सुविधा” समझना गलत है।

यह करोड़ों लोगों की आर्थिक सुरक्षा की आखिरी दीवार है।

अगर वह दीवार कमजोर है तो बीमारी सीधे परिवार की अर्थव्यवस्था को तोड़ देती है।


कागज पर अस्पताल, जमीन पर दूरी

सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक infrastructure gap है।

PRS के 2026-27 के स्वास्थ्य क्षेत्र के विश्लेषण के अनुसार 2022-23 में ग्रामीण क्षेत्रों में Sub-Centres की कमी लगभग 22%, Primary Health Centres की कमी 30% और Community Health Centres की कमी 36% थी। उत्तर प्रदेश में PHCs की कमी लगभग 49% बताई गई। 

इसका अर्थ किसी सरकारी रिपोर्ट की तालिका में सिर्फ प्रतिशत नहीं है।

इसका अर्थ है कि किसी गांव में रहने वाले व्यक्ति के लिए स्वास्थ्य केंद्र अपेक्षित दूरी पर मौजूद नहीं हो सकता। जिस सुविधा को आबादी के एक निश्चित हिस्से को संभालना था, उस पर उससे अधिक आबादी निर्भर हो सकती है।

PRS के अनुसार 2022-23 में एक PHC औसतन लगभग 35,602 लोगों को कवर कर रहा था, जबकि निर्धारित मानक 30,000 का था। CHC के लिए मानक 1.20 लाख की आबादी था, जबकि औसत कवरेज करीब 1.64 लाख था।

यानी समस्या केवल अस्पताल बनाने की नहीं है।

समस्या यह है कि उपलब्ध सुविधा पर जरूरत से ज्यादा बोझ है।


अस्पताल की इमारत बनाना आसान है, स्वास्थ्य व्यवस्था बनाना कठिन

भारत में स्वास्थ्य नीति अक्सर इमारत, योजना और घोषणा के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है।

लेकिन अस्पताल की असली ताकत उसकी दीवारों से नहीं आती।

वह आती है:

डॉक्टर + नर्स + विशेषज्ञ + दवा + जांच + उपकरण + बेड + बिजली + ऑक्सीजन + एम्बुलेंस + साफ-सफाई + प्रबंधन।

इनमें से एक महत्वपूर्ण कड़ी कमजोर हुई तो मरीज के लिए पूरी व्यवस्था कमजोर हो जाती है।

ग्रामीण CHCs में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी इसका सीधा उदाहरण है। PRS के अनुसार 2023 में CHCs में specialist positions में कुल मिलाकर करीब 68% पद खाली थे। Surgeons के पदों में कमी 73%, physicians में 68%, paediatricians में 66% और gynaecologists/obstetricians में 59% थी। 

अब उस परिवार की कल्पना कीजिए जिसे प्रसव, बच्चे की गंभीर बीमारी, दुर्घटना या अचानक बिगड़ी हुई हालत में विशेषज्ञ चाहिए।

भवन मौजूद होना और विशेषज्ञ उपलब्ध होना एक ही बात नहीं है।


सरकारी अस्पताल में बेड मिलना भी कई बार संघर्ष है

PRS के अनुसार 2020 में भारत में कुल अस्पताल बेड लगभग 1.4 प्रति 1,000 आबादी थे, लेकिन केवल सरकारी अस्पतालों को देखें तो यह करीब 0.6 बेड प्रति 1,000 आबादी रह जाता है। National Health Policy का लक्ष्य 2 बेड प्रति 1,000 आबादी था। 

यह आंकड़ा आम आदमी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

क्योंकि बीमारी यह पूछकर नहीं आती कि अस्पताल में बेड खाली है या नहीं।

दिल का दौरा, दुर्घटना, प्रसव की जटिलता, स्ट्रोक, गंभीर संक्रमण या किसी बच्चे की अचानक बिगड़ी हालत में परिवार को तत्काल इलाज चाहिए।

उस समय अस्पताल की क्षमता और मरीज की जरूरत के बीच का अंतर जीवन और मृत्यु जितना गंभीर हो सकता है।


सबसे बड़ी विडंबना: इलाज मुफ्त बताया जाता है, खर्च फिर भी जारी रहता है

सरकार ने 2025 के राष्ट्रीय सर्वेक्षण के आधार पर बताया कि public health facilities में outpatient care के लिए median out-of-pocket expenditure शून्य था और public facilities में hospitalisation के आधे से अधिक मामलों में median OOPE ₹1,100 था। सरकार ने इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की affordability में सुधार के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया है। 

यह उपलब्धि महत्वपूर्ण है।

लेकिन आम आदमी की पूरी कहानी सिर्फ median खर्च से नहीं समझी जा सकती।

मरीज अस्पताल तक कैसे पहुंचा?

कितने दिन काम नहीं किया?

दवा अस्पताल में मिली या बाहर से खरीदनी पड़ी?

सभी जांच वहीं हुईं या निजी लैब जाना पड़ा?

परिजन कितने दिन साथ रहा?

एक छोटे शहर से बड़े शहर के अस्पताल तक जाने का खर्च कितना आया?

इन सवालों का जोड़ मरीज के वास्तविक आर्थिक बोझ को बताता है।

मुफ्त consultation और मुफ्त healthcare एक ही चीज नहीं हैं।


सरकार आंकड़े दिखाती है, मरीज अनुभव दिखाता है

यहीं से सरकारी दावों और आम आदमी के अनुभव के बीच तनाव पैदा होता है।

सरकार ने अप्रैल 2026 में जारी NSO 80th Round Health Survey के आधार पर बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में public facilities के outpatient utilisation का हिस्सा 2014 के 28% से बढ़कर 2025 में 35% हुआ। सरकार ने health insurance/financing schemes के coverage में भी बड़ी वृद्धि बताई। 

इन आंकड़ों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है।

लोग सरकारी अस्पताल का इस्तेमाल इसलिए करते हैं क्योंकि वह सस्ता या मुफ्त है। इसलिए utilisation बढ़ना अपने आप में quality की गारंटी नहीं है।

किसी गरीब परिवार के सामने जब निजी अस्पताल का भारी बिल और सरकारी अस्पताल की लंबी लाइन में से चुनाव हो, तो उसका सरकारी अस्पताल चुनना यह साबित नहीं करता कि सरकारी अस्पताल की सेवा उत्कृष्ट है।

यह सिर्फ यह भी बता सकता है कि उसके पास दूसरा विकल्प नहीं है।


असली सवाल है: लोग सरकारी अस्पताल छोड़कर निजी अस्पताल क्यों जाते हैं?

NFHS-5 से संबंधित आंकड़ों के विश्लेषण में सरकारी स्वास्थ्य सुविधा का इस्तेमाल न करने वाले परिवारों ने कई कारण बताए। PRS द्वारा उद्धृत आंकड़ों में poor quality care 47.6%, long waiting time 45.7%, nearby facility का अभाव 40.2%, inconvenient timings 25.3% और health personnel की अनुपलब्धता 15% प्रमुख कारण थे। 

यहां सरकार के सामने सबसे कठिन सवाल खड़ा होता है।

अगर नागरिक सरकारी अस्पताल की सुविधा को इसलिए छोड़ रहा है क्योंकि उसे गुणवत्ता पर भरोसा नहीं, इंतजार बहुत लंबा है या पास में सुविधा नहीं है, तो केवल नए भवन और नई योजनाएं समस्या का पूरा समाधान नहीं करतीं।

स्वास्थ्य व्यवस्था की असली सफलता utilisation नहीं, भरोसा है।

मरीज यह महसूस करे कि यहां इलाज मिलेगा, जांच होगी, डॉक्टर मिलेगा और उसे सिर्फ इसलिए निजी अस्पताल नहीं भागना पड़ेगा क्योंकि सरकारी अस्पताल में व्यवस्था उपलब्ध नहीं है।


डॉक्टरों की कमी सिर्फ आंकड़ा नहीं, मरीज की परेशानी है

सरकार अक्सर डॉक्टरों की राष्ट्रीय संख्या बताती है।

लेकिन राष्ट्रीय औसत किसी मरीज का इलाज नहीं करता।

मरीज को डॉक्टर अपने जिले में, अपने अस्पताल में, अपने समय पर चाहिए।

PRS के अनुसार 2024 में आधुनिक चिकित्सा में प्रशिक्षित डॉक्टरों का अनुपात लगभग 1 डॉक्टर प्रति 1,263 आबादी था और राज्यों के बीच वितरण में असमानता भी मौजूद है। 

ग्रामीण क्षेत्र में समस्या और गंभीर हो जाती है।

एक जिला अस्पताल में भीड़ है तो मरीज को tertiary centre भेज दिया जाता है। वहां भीड़ है तो बड़े शहर भेजा जाता है।

धीरे-धीरे इलाज एक medical referral system से बदलकर medical migration बन जाता है।

गांव से कस्बा।

कस्बे से जिला।

जिले से महानगर।

और गंभीर बीमारी में कभी-कभी देश से बाहर तक।

यह किसी एक अस्पताल की समस्या नहीं है।

यह healthcare architecture की समस्या है।


विदेश में इलाज की चर्चा क्यों इतनी चुभती है?

जब कोई संपन्न या प्रभावशाली भारतीय विदेश में इलाज कराता है तो सोशल मीडिया पर सवाल उठता है—अगर भारत में स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी विकसित है तो विदेश क्यों?

किसी व्यक्ति के विदेश जाने को देखकर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं कि भारत में उपचार उपलब्ध नहीं है। कुछ अत्यंत विशिष्ट उपचारों के लिए विदेश जाना व्यक्तिगत या चिकित्सकीय निर्णय हो सकता है।

लेकिन इस बहस ने एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर पैदा किया है:

अगर देश के पास विश्वस्तरीय निजी अस्पताल और चिकित्सा विशेषज्ञ हैं, तो वही गुणवत्ता सामान्य भारतीय की पहुंच में क्यों नहीं होनी चाहिए?

यही असली मुद्दा है।

भारत की समस्या यह नहीं कि यहां अच्छे डॉक्टर नहीं हैं।

समस्या यह है कि अच्छी चिकित्सा क्षमता हर नागरिक की समान पहुंच में नहीं है।


सरकार को सिर्फ अस्पतालों की संख्या नहीं, मरीज की यात्रा गिननी चाहिए

स्वास्थ्य मंत्रालय को एक नए तरीके से health performance मापने की जरूरत है।

यह नहीं कि कितने भवन बने।

बल्कि:

  • मरीज को डॉक्टर मिलने में कितना समय लगा?

  • जांच कितने घंटे/दिन में हुई?

  • आवश्यक दवा अस्पताल में मिली या नहीं?

  • referral में कितना समय लगा?

  • emergency response कितना तेज था?

  • कितने specialist पद खाली हैं?

  • कितने मरीज इलाज के लिए दूसरे जिले गए?

  • कितने मरीज निजी अस्पताल में जाने को मजबूर हुए?

  • कितने परिवारों ने बीमारी के कारण कर्ज लिया?

  • कितने मरीज इलाज अधूरा छोड़कर घर लौटे?

इन सवालों का जवाब सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का वास्तविक report card होगा।


आम आदमी को भाषण नहीं, भरोसेमंद अस्पताल चाहिए

भारत ने स्वास्थ्य क्षेत्र में कई सुधार किए हैं। सरकारी spending बढ़ी है, insurance coverage का विस्तार हुआ है, public health utilisation में भी कुछ क्षेत्रों में वृद्धि दर्ज हुई है और infrastructure programmes चल रहे हैं। इन उपलब्धियों को नकारना उचित नहीं होगा। 

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लेकिन सरकार का काम केवल उपलब्धियां गिनाना नहीं है।

सरकार का काम उस नागरिक तक स्वास्थ्य सेवा पहुंचाना है जो अपनी बीमारी के साथ अस्पताल के बाहर लाइन में खड़ा है।

National Health Policy ने सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च को GDP के 2.5% तक ले जाने का लक्ष्य रखा था। PRS के अनुसार 2021-22 में combined government health expenditure करीब 1.8% GDP था, जो उस लक्ष्य से नीचे था।

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इस अंतर को सिर्फ बजट की तालिका न समझा जाए।

इस अंतर का अर्थ है:

कम बेड, कम विशेषज्ञ, कम infrastructure और कमजोर financial protection का जोखिम।


अब स्वास्थ्य व्यवस्था को “योजना” नहीं, “अधिकार” की तरह देखना होगा

आम आदमी को यह नहीं चाहिए कि हर साल स्वास्थ्य क्षेत्र की नई योजना की घोषणा हो।

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उसे चाहिए कि उसके गांव या कस्बे में प्राथमिक उपचार उपलब्ध हो।

उसे चाहिए कि जिला अस्पताल में विशेषज्ञ मिले।

उसे चाहिए कि emergency में बेड मिले।

उसे चाहिए कि जरूरी जांच अस्पताल में हो।

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उसे चाहिए कि डॉक्टर द्वारा लिखी जरूरी दवा सरकारी व्यवस्था में उपलब्ध हो।

उसे चाहिए कि गरीब मरीज को बीमारी के कारण जमीन, पशु, बचत या घर बेचने की नौबत न आए।

और सबसे जरूरी—

उसे यह भरोसा चाहिए कि बीमारी उसके परिवार को आर्थिक रूप से बर्बाद नहीं करेगी।

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निष्कर्ष: अस्पताल की इमारत से बड़ा सवाल है मरीज का भरोसा

भारत की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को केवल इसलिए सफल नहीं कहा जा सकता कि नई योजनाएं शुरू हुईं, नए केंद्र बनाए गए या insurance cards की संख्या बढ़ी।

उसी तरह इसे पूरी तरह विफल कहना भी उपलब्ध आंकड़ों के साथ न्याय नहीं होगा।

लेकिन कठोर सच यह है कि infrastructure gaps, specialist vacancies, bed shortages, uneven access और quality-related concerns अभी भी इतने बड़े हैं कि आम आदमी को सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर पूरी तरह निर्भर रहने में जोखिम महसूस हो सकता है।

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सरकार को अब प्रचार की भाषा से आगे बढ़ना होगा।

गरीब आदमी के लिए अस्पताल कोई उद्घाटन समारोह नहीं है।

वह उसकी जिंदगी का सवाल है।

जब उसकी मां सांस लेने के लिए संघर्ष कर रही हो, जब उसका बच्चा तेज बुखार में तड़प रहा हो, जब पिता को अचानक सीने में दर्द हो, जब गर्भवती महिला को रात में अस्पताल ले जाना पड़े—तब उसे यह नहीं जानना कि कितने करोड़ रुपये की योजना स्वीकृत हुई।

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उसे सिर्फ एक चीज चाहिए:

डॉक्टर मौजूद हो।

दवा मौजूद हो।

जांच मौजूद हो।

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बेड मौजूद हो।

और अस्पताल उसे इंसान समझकर इलाज करे।

यही किसी भी सरकार की स्वास्थ्य नीति की अंतिम कसौटी होनी चाहिए।

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क्योंकि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण सरकारी विज्ञापन नहीं, उस गरीब मरीज की वह सांस है जो इलाज मिलने के बाद राहत से चलती है।

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