₹13.35 लाख का मूंग घोटाला: किसान MSP को तरसा, कर्ज में डूबा—गलत नीतियों ने आत्महत्या की मजबूरी तक पहुंचाया?

मध्य प्रदेश के रायसेन में कथित मूंग खरीद फर्जीवाड़े ने MSP व्यवस्था, किसानों की जमीन के कथित दुरुपयोग और सरकारी निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। किसान MSP के लिए धरना देते रहे, वहीं जांच में बाजार से सस्ती मूंग खरीदकर सरकारी MSP पर बेचने के आरोप सामने आए। EOW FIR के बाद अब सवाल है—क्या जांच केवल छोटे कर्मचारियों तक सीमित रहेगी या पूरे सरकारी तंत्र की जवाबदेही तय होगी?

₹13.35 लाख का मूंग घोटाला: किसान MSP को तरसा, कर्ज में डूबा—गलत नीतियों ने आत्महत्या की मजबूरी तक पहुंचाया?

मूंग के दानों में छिपा सरकारी भ्रष्टाचार

By- Chaudhary Sudhir Talyan

जब किसान अपनी मूंग बेचने के लिए सड़क पर बैठा था, उसी समय सरकारी खरीद व्यवस्था के भीतर बैठे कुछ लोगों पर आरोप है कि वे बाजार से सस्ती मूंग खरीदकर उसी सरकार को MSP पर बेच रहे थे। यह केवल खरीद में गड़बड़ी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के चरित्र पर सवाल है जिसे किसान के संरक्षण के नाम पर बनाया गया था।

मध्य प्रदेश के रायसेन से सामने आया मूंग खरीद फर्जीवाड़ा सरकारी व्यवस्था के चेहरे पर पड़ा कोई मामूली दाग नहीं है। यह उस पूरी प्रशासनिक सोच पर गंभीर सवाल है जिसमें किसान को अपने ही उत्पाद का उचित मूल्य पाने के लिए धरना देना पड़ता है, सड़क रोकनी पड़ती है, अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ते हैं—और दूसरी तरफ उसी सरकारी खरीद व्यवस्था का कथित दुरुपयोग करके कुछ लोग बाजार से सस्ती मूंग खरीदकर सरकार को MSP पर बेचने में सफल हो जाते हैं।

यह विडंबना नहीं, व्यवस्था का आईना है।

जुलाई 2026 में मध्य प्रदेश में किसान मूंग की सरकारी खरीद की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे थे। हरदा में किसानों ने MSP पर मूंग खरीद की मांग को लेकर राष्ट्रीय राजमार्ग तक जाम किया। भोपाल में भी किसानों के आंदोलन के बाद सरकार के साथ बातचीत हुई और खरीद सीमा बढ़ाने जैसे फैसले सामने आए।

और इसी दौर के आसपास रायसेन में सामने आया कथित फर्जीवाड़ा बताता है कि एक ही कृषि अर्थव्यवस्था में दो अलग-अलग भारत चल रहे थे।

एक भारत का किसान अपनी उपज बेचने के लिए संघर्ष कर रहा था।

दूसरे भारत में सरकारी व्यवस्था के भीतर मौजूद लोगों पर आरोप है कि उन्होंने किसानों की जमीन और पहचान का इस्तेमाल करके सरकारी खरीद का रास्ता अपने लिए खोल लिया।

यही इस प्रकरण का सबसे शर्मनाक पक्ष है।

किसान ने मूंग नहीं बोई, फिर सरकारी रिकॉर्ड में बेच कैसे दी?

रायसेन जिले की बाड़ी तहसील में तीन कृषक सेवा सहकारी समितियों—देहरीकला, भारकच्छ कला और गूगलवाड़ा—में 2024-25 और 2025-26 के मूंग उपार्जन सीजन के दौरान कथित फर्जी पंजीयन की जांच हुई।

आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ यानी EOW ने 8 सितंबर 2026 को FIR दर्ज की। जांच के अनुसार कुछ किसानों की कृषि भूमि का इस्तेमाल उनकी जानकारी के बिना सरकारी खरीद पंजीयन में किया गया। आरोप है कि ऐसे किसानों की जमीन, जिन्होंने सरकारी खरीद के लिए पंजीयन नहीं कराया था, को दूसरे लोगों के नाम से जोड़ा गया और स्वयं को सिकमीदार बताया गया। संबंधित किसानों ने जांच में कथित तौर पर कहा कि उन्होंने न ऐसी अनुमति दी, न कौलीनामा किया और न ही उन्हें इस खरीद की जानकारी थी।

यहां सवाल केवल फर्जी कागज का नहीं है।

सवाल यह है कि किसान की जमीन का डेटा किसके पास था?

किसने पहचाना कि किस किसान ने पंजीयन नहीं कराया?

किसने उसके नाम या जमीन को सिस्टम में इस्तेमाल किया?

किसने पंजीयन सत्यापित किया?

किसने फसल की मात्रा स्वीकार की?

किसने भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ाई?

और सबसे महत्वपूर्ण—किसने यह सुनिश्चित किया कि सरकारी पैसा वास्तविक किसान तक जाए?

यदि इन सवालों के जवाब केवल “तीन कंप्यूटर ऑपरेटर” हैं, तो सरकार को यह भी बताना पड़ेगा कि उसकी पूरी निगरानी व्यवस्था आखिर कर क्या रही थी।

बाजार से सस्ती मूंग, सरकार को MSP पर बिक्री

EOW की जांच के अनुसार कथित तौर पर बाजार और मंडी से मूंग लगभग ₹1,500 से ₹3,300 प्रति क्विंटल के दाम पर खरीदी गई और उसे सरकारी खरीद व्यवस्था में लगभग ₹8,558 तथा ₹8,682 प्रति क्विंटल के MSP पर बेचा गया।

यहीं इस कहानी का सबसे भयावह आर्थिक सवाल पैदा होता है।

अगर कोई व्यक्ति बाजार से ₹3,000 के आसपास मूंग खरीदकर सरकार को ₹8,500 से अधिक में बेच सकता था, तो वह किसान से कितने दाम पर मूंग खरीद रहा होगा?

और अगर बाजार में किसान को मजबूरी में MSP से बहुत नीचे बेचने के लिए मजबूर किया गया, तो फिर MSP का पूरा ढांचा किसके लिए था?

किसान के लिए या उस व्यक्ति के लिए जो सिस्टम की कमजोरी पहचान चुका था?

MSP का अर्थ यह है कि किसान को उसकी उपज के लिए एक घोषित न्यूनतम मूल्य की सुरक्षा मिले। लेकिन यदि सरकारी खरीद केंद्र तक पहुंचने से पहले किसान को सस्ते में बेचने पर मजबूर होना पड़े और बाद में वही उपज किसी दूसरे नाम से MSP पर सरकार को बेची जाए, तो MSP का उद्देश्य ही उलट जाता है।

यह किसान संरक्षण नहीं है।

यह किसान के नाम पर बने संरक्षण तंत्र की लूट है—यदि जांच में आरोप सिद्ध होते हैं।

₹13.35 लाख केवल आंकड़ा नहीं, व्यवस्था का परीक्षण है

EOW के अनुसार तीन आरोपियों से जुड़े मामलों में लगभग ₹13.35 लाख का अनुचित लाभ और शासन को लगभग इतनी ही राशि की आर्थिक क्षति सामने आई है। तीनों के खिलाफ FIR दर्ज की गई है और मामला अभी जांचाधीन है।

लेकिन इस आंकड़े को पूरे राज्य के घोटाले की अंतिम रकम मान लेना भी गलत होगा।

क्योंकि जांच अभी यह बताती है कि तीन समितियों में ऐसा कथित खेल हुआ।

असल सवाल यह है:

क्या यही तरीका दूसरी समितियों में भी इस्तेमाल हुआ?

अगर हां, तो कितने किसान?

कितनी जमीन?

कितने क्विंटल?

कितना भुगतान?

कितने बैंक खाते?

और कितनी सरकारी राशि?

सरकार यदि वास्तव में पारदर्शिता चाहती है तो उसे केवल एक FIR पर संतोष नहीं करना चाहिए। पूरे राज्य के मूंग उपार्जन डेटा का forensic audit होना चाहिए।

सबसे गंभीर सवाल: विभागीय जांच ने पहले क्या किया?

इस पूरे प्रकरण का सबसे असहज हिस्सा यही है।

Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार अक्टूबर 2025 में हुई पहली विभागीय जांच ने श्रीराम ठाकुर की भूमिका पर सवाल उठाए और अगले वर्ष उन्हें सेवा से बर्खास्त किया गया। मई 2026 की दूसरी शिकायत के बाद हुई जांच में भी अन्य कर्मचारियों की भूमिका पर सवाल उठे। दोनों विभागीय जांचों में कानूनी कार्रवाई की सिफारिश की गई थी, लेकिन विभागीय स्तर पर मामला बर्खास्तगी तक सीमित रहने की बात EOW की FIR में दर्ज है।

यहीं से भ्रष्टाचार की असली कहानी शुरू होती है।

किसी सरकारी कर्मचारी को नौकरी से निकाल देना पर्याप्त नहीं है, यदि मामला सरकारी धन, फर्जी दस्तावेज, धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र तक पहुंचता हो।

क्योंकि नौकरी जाना एक विभागीय परिणाम है।

सरकारी धन की वसूली, आपराधिक मुकदमा, जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान और न्यायिक दंड—ये अलग सवाल हैं।

अब EOW ने FIR दर्ज कर दी है। लेकिन यह सवाल फिर भी कायम रहेगा कि अगर विभागीय जांच पहले ही गंभीर अनियमितताओं की ओर इशारा कर चुकी थी, तो आपराधिक कार्रवाई में देरी क्यों हुई?

और उससे भी बड़ा सवाल—

क्या विभागीय तंत्र ने केवल निचले स्तर पर कार्रवाई करके ऊपर बैठे संभावित जिम्मेदार लोगों तक पहुंचने से परहेज किया?

इसका उत्तर जांच को देना होगा।

इतने बड़े खेल को केवल छोटे कर्मचारियों का खेल मानना खतरनाक होगा

यह कहना अभी उचित नहीं होगा कि बड़े अधिकारी निश्चित रूप से शामिल थे। इसका प्रमाण जांच से ही सामने आ सकता है।

लेकिन प्रशासनिक तर्क बेहद सरल है।

अगर किसी सरकारी खरीद व्यवस्था में कोई कर्मचारी किसानों की जमीन की जानकारी देख सकता है, फर्जी पंजीयन करा सकता है, खरीद दर्ज कर सकता है, बैंक विवरण जोड़ सकता है और सरकारी भुगतान हासिल करने की प्रक्रिया पूरी कर सकता है, तो वहां supervisory controls की जांच अनिवार्य है।

किसी सिस्टम में भ्रष्टाचार केवल उस व्यक्ति से नहीं बनता जो बटन दबाता है।

कई बार भ्रष्टाचार उस व्यवस्था से बनता है जो बटन दबाने वाले को रोकती नहीं।

और उससे भी ज्यादा खतरनाक वह संस्कृति है जिसमें कर्मचारी को यह भरोसा हो जाए कि पकड़े जाने पर भी मामला विभागीय नोटिस, निलंबन या बर्खास्तगी से आगे नहीं जाएगा।

भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा ईंधन रिश्वत नहीं, दंड से मुक्ति है।

जब अपराधी को लगता है कि सरकारी फाइलें धीरे चलेंगी, जांच वर्षों चलेगी, FIR देर से होगी और अंततः जिम्मेदारी नीचे के स्तर पर सीमित कर दी जाएगी, तब भ्रष्टाचार एक जोखिम नहीं रह जाता—वह व्यवसाय बन जाता है।

किसान को पहले बाजार में हराया जाता है, फिर कर्ज में धकेला जाता है

यह घटना कृषि संकट की एक बड़ी तस्वीर का छोटा-सा हिस्सा है।

किसान उत्पादन करता है।

बीज खरीदता है।

खाद खरीदता है।

डीजल खरीदता है।

कीटनाशक खरीदता है।

बिजली, सिंचाई, मजदूरी और मशीनरी का खर्च उठाता है।

फिर जब फसल तैयार होती है तो उसे उचित मूल्य के लिए सरकारी खरीद केंद्र का दरवाजा खटखटाना पड़ता है।

और अगर सरकारी खरीद ही पर्याप्त नहीं है, तो उसे बाजार में औने-पौने दाम पर बेचने की मजबूरी पैदा होती है।

फिर वही किसान घाटे की भरपाई के लिए कर्ज लेता है।

कर्ज बढ़ता है।

अगली फसल के लिए फिर कर्ज।

पुराना कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज।

फिर ब्याज।

फिर कम कीमत।

फिर घाटा।

यह केवल आर्थिक गणित नहीं है।

यह ऋण-जाल है।

और इस जाल में फंसे किसान को फिर सरकार कहती है—किसान को सस्ता ऋण देंगे।

लेकिन सवाल यह है कि किसान को बार-बार कर्ज की जरूरत पड़ती ही क्यों है?

अगर उसकी उपज का लागत-सम्मत और विश्वसनीय मूल्य मिले, बाजार में शोषण न हो, सरकारी खरीद पारदर्शी हो और भुगतान समय पर मिले, तो कर्ज उसकी मजबूरी क्यों बने?

किसान को पहले घाटे में धकेलना और फिर उसी घाटे के लिए कर्ज उपलब्ध कराना समस्या का समाधान नहीं है।

https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra

यह समस्या को आगे बढ़ाना है।

किसान कमजोर नहीं है, उसे कमजोर किया जा रहा है

भारत के किसान को अक्सर कमजोर, पिछड़ा या सहायता का मोहताज बताने की आदत बन चुकी है।

लेकिन वास्तविकता उलटी है।

किसान देश की खाद्य व्यवस्था को चलाता है।

वह मौसम के जोखिम को उठाता है।

https://politicsinsightindia.com/aatmanirbhar-bharat-ya-aayaatnirbhar-rasoi-ghar-kisan-tel-aayaat

वह कीमत के जोखिम को उठाता है।

वह उत्पादन का जोखिम उठाता है।

वह बाजार का जोखिम उठाता है।

 नीति का जोखिम भी वही उठाता है।

फिर जब इन सभी जोखिमों के बीच उसका आर्थिक ढांचा टूटता है, तो चर्चा अक्सर किसान की व्यक्तिगत परिस्थितियों पर पहुंच जाती है।

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किसान आत्महत्या के मामलों में किसी एक व्यक्ति की मृत्यु का कारण बिना विश्वसनीय जांच के मानसिक बीमारी, पारिवारिक विवाद, नशा या किसी अन्य व्यक्तिगत कारण को घोषित कर देना गंभीर विषय है। ऐसे निष्कर्ष व्यक्ति-विशेष की जांच और प्रमाण पर आधारित होने चाहिए।

क्योंकि कृषि संकट को किसान की कथित “कमजोरी” में बदल देना असली सवाल से बच निकलने का रास्ता बन सकता है।

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सवाल किसान की कमजोरी का नहीं है। सवाल उस आर्थिक व्यवस्था का है जिसमें लगातार घाटा, कर्ज, बाजार जोखिम और प्रशासनिक विफलताएं किसान पर जमा होती जाती हैं।

किसान कमजोर पैदा नहीं हुआ।

उसे कमजोर करने वाली आर्थिक परिस्थितियों की जांच होनी चाहिए।

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सरकार के सामने अब असली परीक्षा है

रायसेन का मामला सरकार के लिए एक अवसर भी है—लेकिन राजनीतिक सफाई देने का नहीं, व्यवस्था को खोलकर देखने का।

सरकार को सार्वजनिक करना चाहिए:

  • किन किसानों की जमीन का कथित रूप से गलत इस्तेमाल हुआ;
  • कितनी खरीद संदिग्ध पाई गई;
  • कितना सरकारी भुगतान हुआ;
  • पैसा किन खातों में गया;
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  • कितनी रकम की वसूली हुई;
  • किन अधिकारियों ने सत्यापन किया;
  • विभागीय जांच में किन अधिकारियों की जिम्मेदारी तय हुई;
  • और क्या पूरे प्रदेश में समान मामलों की जांच होगी।

इसके साथ हर किसान को यह अधिकार मिलना चाहिए कि उसकी जमीन पर किसी भी फसल के सरकारी खरीद पंजीयन की सूचना उसे तत्काल मिले।

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किसान की जमीन पर किसान की जानकारी के बिना सरकारी खरीद पंजीयन होना ही नहीं चाहिए।

यदि कोई कर्मचारी ऐसा करता है तो केवल नौकरी जाना पर्याप्त नहीं होना चाहिए; जांच कानून के अनुसार पूरे नेटवर्क और supervisory chain तक जानी चाहिए।

यह मूंग का घोटाला नहीं, भरोसे का घोटाला है

किसान सरकार पर भरोसा करके अपनी जमीन और उत्पादन व्यवस्था को सरकारी रिकॉर्ड से जोड़ता है।

जब उसी रिकॉर्ड का कथित दुरुपयोग करके कोई दूसरा व्यक्ति सरकारी पैसा हासिल करता है, तो केवल धन की चोरी नहीं होती।

विश्वास की चोरी होती है।

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और जब एक किसान MSP के लिए धरने पर बैठा हो तथा उसी समय उसी व्यवस्था से कोई दूसरा व्यक्ति बाजार की सस्ती मूंग को सरकारी MSP पर बेचने में सफल हो जाए, तो सरकार को सिर्फ FIR दर्ज करके संतुष्ट नहीं होना चाहिए।

उसे अपने सिस्टम से सवाल करना चाहिए।

क्योंकि किसान को भाषण नहीं चाहिए।

उसे घोषणा नहीं चाहिए।

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उसे कर्ज की एक और लाइन नहीं चाहिए।

उसे यह चाहिए कि उसकी मेहनत का मूल्य उसके हाथ पहुंचे।

मध्य प्रदेश की सरकार के सामने अब सबसे कठिन सवाल यही है:

क्या वह केवल उन तीन आरोपियों तक जांच सीमित रखेगी जिनके खिलाफ EOW ने FIR दर्ज की है, या यह पता लगाएगी कि किसानों की जमीन और सरकारी MSP खरीद व्यवस्था के बीच इतनी बड़ी दरार पैदा ही कैसे हुई?

रायसेन का कथित मूंग फर्जीवाड़ा यदि सचमुच केवल तीन कर्मचारियों की करतूत है, तो सरकार को पूरे सिस्टम की मजबूती साबित करनी होगी।

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और अगर जांच में इससे ऊपर तक जिम्मेदारी निकलती है, तो जिम्मेदारी वहीं तक जानी चाहिए—चाहे पद कितना भी बड़ा क्यों न हो।

क्योंकि भ्रष्टाचार का कोई छोटा-बड़ा पद नहीं होता।

सरकारी धन जनता का धन है। किसान की जमीन किसान की है। MSP किसान के लिए है।

इन तीनों के बीच अगर कोई भ्रष्ट गठजोड़ बनता है, तो उसे बर्खास्तगी की फाइल में दफन करना नहीं, कानून के सामने लाना सरकार की जिम्मेदारी है।

वरना किसान को यह संदेश जाएगा कि इस देश में उसकी फसल से ज्यादा ताकतवर उसका बिचौलिया है, उसकी मेहनत से ज्यादा प्रभावशाली सरकारी फाइल है और उसके अधिकार से ज्यादा सुरक्षित भ्रष्ट व्यवस्था।

और तब सवाल केवल मूंग का नहीं रहेगा।

सवाल यह होगा कि जिस सरकार को किसान की रक्षा करनी थी, उसकी अपनी व्यवस्था किसान के नाम पर किसकी रक्षा कर रही है?

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