किसान की किस्मत- बीज तुम्हारा नहीं, खाद तुम्हारी नहीं, दवा तुम्हारी नहीं… फिर किसान “जहर” का दोषी क्यों? बीज से बाजार तक सबका खेल

बीज, खाद और कीटनाशक किसान नहीं बनाता, फिर रासायनिक खेती और जहरीले भोजन का दोष सिर्फ किसान पर क्यों? जानिए कृषि व्यवस्था की असली जवाबदेही।

किसान की किस्मत- बीज तुम्हारा नहीं, खाद तुम्हारी नहीं, दवा तुम्हारी नहीं… फिर किसान “जहर” का दोषी क्यों? बीज से बाजार तक सबका खेल

सलाह वैज्ञानिक की, दवा कंपनी की, सब्सिडी सरकार की—और बदनामी सिर्फ किसान की?

बीज भी किसान का नहीं, खाद भी किसान की नहीं, दवा भी किसान की नहीं—फिर “जहर” का दोषी अकेला किसान क्यों?

By- Ch. Sudhir Taliyan

भारत के किसान के खिलाफ शायद सबसे सुविधाजनक कहानी यह बना दी गई है कि किसान रासायनिक खेती करता है, किसान कीटनाशक डालता है, किसान मिट्टी खराब करता है और किसान ही जनता को “जहर” खिला रहा है।

लेकिन इस कहानी में एक बुनियादी सवाल जानबूझकर गायब कर दिया जाता है—

किसान को यह सब दिया किसने?

बीज किसान की अपनी प्रयोगशाला में तैयार नहीं हुआ।

खाद किसान ने अपने खेत में रासायनिक संयंत्र लगाकर नहीं बनाई।

कीटनाशक किसान ने अपनी दुकान पर नहीं बनाया।

उसने pesticide का molecular formula तय नहीं किया।

उसने यह तय नहीं किया कि कौन-सा रसायन बाजार में आएगा।

उसने यह तय नहीं किया कि किस उत्पाद को registration मिलेगा।

उसने subsidy policy नहीं बनाई।

उसने कृषि विश्वविद्यालयों की “recommended practices” नहीं लिखीं।

उसने agricultural extension system नहीं बनाया।

और जब कभी सरकारी या वैज्ञानिक व्यवस्था उसे कहती है कि इस फसल में यह बीज लगाइए, इतनी खाद डालिए, इस कीट पर यह दवा इस्तेमाल कीजिए—तो किसान उस व्यवस्था पर भरोसा करता है।

फिर दशकों बाद वही व्यवस्था किसान से कहती है—तुमने मिट्टी खराब कर दी, तुमने जहर डाल दिया, तुमने भोजन जहरीला कर दिया!

यह केवल विडंबना नहीं है।

यह जवाबदेही से भागने की कहानी है।


बीज भी किसान का नहीं—फिर “खराब फसल” का दोषी कौन?

किसान की कहानी बीज से शुरू होती है।

किसान चाहता है कि बीज अच्छा हो, अंकुरण अच्छा हो, पौधा मजबूत हो, रोग और कीट से लड़ सके और मौसम की मार सह सके।

लेकिन आधुनिक कृषि में बीज भी अब एक विशाल औपचारिक बाजार और नियामकीय व्यवस्था का हिस्सा है।

किसान हर बीज अपने खेत में विकसित नहीं करता।

वह बाजार से खरीदता है।

वह कंपनी पर भरोसा करता है।

वह dealer पर भरोसा करता है।

वह कृषि विभाग की सलाह पर भरोसा करता है।

वह दूसरे किसानों के अनुभव पर भरोसा करता है।

वह कभी-कभी कृषि वैज्ञानिकों की सिफारिश पर भरोसा करता है।

लेकिन अगर वही बीज खराब निकल जाए तो?

अगर अंकुरण कमजोर हो?

अगर किस्म वास्तविकता में advertised characteristics के अनुरूप न निकले?

अगर रोगग्रस्त planting material हो?

अगर climate के अनुरूप variety उपयुक्त न हो?

अगर किसान को गलत variety बेच दी जाए?

तब सबसे पहले कौन कटघरे में आता है?

किसान।

उससे कहा जाता है—

“तुमने सही बीज नहीं लिया।”

लेकिन सवाल यह होना चाहिए—

“अगर बाजार में बीज बेचने की अनुमति है, तो उसकी गुणवत्ता की गारंटी किसकी है?”

किसान seed laboratory नहीं है।

वह genetic purity laboratory नहीं है।

वह germination testing laboratory नहीं है।

वह plant pathology laboratory नहीं है।

फिर भी बीज विफल होने पर सबसे बड़ा आर्थिक नुकसान उसी का होता है।

बीज किसी और का, जोखिम किसान का।


बीमार बीज उपलब्ध क्यों कराते हो?

यह सवाल सरकार से सीधे पूछा जाना चाहिए।

अगर कोई बीज खराब है, तो वह खेत तक पहुंचा कैसे?

अगर कोई बीज निर्धारित गुणवत्ता का नहीं है, तो वह dealer तक पहुंचा कैसे?

अगर dealer ने गलत बीज बेचा, तो regulatory inspection कहाँ था?

अगर seed company ने गलत दावा किया, तो उसकी जांच किसने की?

और अगर किसान ने पूरी कीमत देकर बीज खरीदा और फसल चौपट हो गई, तो उसका नुकसान कौन भरेगा?

किसान को सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं है कि—

“अगली बार सावधान रहना।”

किसान की अगली फसल कोई प्रयोगशाला नहीं है।

उसके लिए एक crop failure का मतलब है—

कर्ज।

ब्याज।

परिवार का खर्च।

बच्चों की पढ़ाई।

अगले मौसम की बुवाई।

मजदूरी।

बिजली।

सिंचाई।

और फिर उसी खेत को दोबारा खड़ा करने की कोशिश।

जिसके पास गलती की कीमत चुकाने की क्षमता नहीं है, उसी को सबसे ज्यादा जोखिम क्यों दिया गया है?


खाद सरकार की नीति से सस्ती, फिर खाद डालने वाला किसान अपराधी?

अब खाद पर आइए।

भारत में उर्वरक नीति और subsidy व्यवस्था दशकों से कृषि उत्पादन की संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।

सरकार उर्वरकों पर भारी आर्थिक सहायता देती है।

इसका उद्देश्य किसानों के लिए input लागत को नियंत्रित करना है। यह अपने आप में गलत नहीं है।

लेकिन सवाल यह है कि subsidy architecture ने कृषि को किस दिशा में धकेला?

अगर किसी रासायनिक input को बड़े पैमाने पर subsidise किया जाए, उसकी उपलब्धता सुनिश्चित की जाए और उसके लिए एक विशाल distribution network बनाया जाए, तो स्वाभाविक रूप से किसान उसी input पर निर्भर होगा।

फिर जब मिट्टी में imbalance पैदा होता है, organic matter कम होता है या nutrient efficiency घटती है, तो किसान को दोष देना कितना उचित है?

किसान कोई अर्थशास्त्री नहीं है जो subsidy design देखकर उत्पादन प्रणाली का भविष्य तय करता रहे।

उसके सामने तत्काल प्रश्न होता है—

“फसल कैसे बचेगी?”

अगर सरकार ने एक input को सस्ता और आसानी से उपलब्ध बनाया है, जबकि जैविक विकल्पों के लिए infrastructure, quality control, supply chain और assured market कमजोर है, तो किसान के चुनाव को पूरी तरह स्वतंत्र चुनाव कहना कठिन है।


किसान ने रसायन नहीं बनाया—उसने व्यवस्था पर भरोसा किया

यह बात बार-बार कहनी होगी।

किसान ने कोई pesticide molecule invent नहीं किया।

उसने chemical formulation नहीं बनाया।

उसने उसकी toxicological testing नहीं की।

उसने registration application नहीं भरी।

उसने label claim नहीं लिखा।

उसने regulatory approval नहीं दिया।

उसने marketing campaign नहीं चलाया।

वह बाजार में गया और कहा—

“मेरी फसल बचाने के लिए कुछ दीजिए।”

और बाजार ने उसे product दिया।

कभी कृषि विशेषज्ञ ने बताया।

कभी dealer ने बताया।

कभी पड़ोसी किसान ने बताया।

कभी कंपनी के field representative ने बताया।

कभी सरकारी extension system ने बताया।

कभी packaging पर लिखा हुआ dose देखकर इस्तेमाल किया गया।

अब अगर उसी पूरी व्यवस्था के बाद खाद्य सुरक्षा पर प्रश्न उठता है तो केवल किसान को अपराधी की तरह प्रस्तुत करना नीतिगत बेईमानी है।


“किसान जहर खिला रहा है”—यह narrative बंद होना चाहिए

यह वाक्य सिर्फ गलत नहीं, किसान के प्रति अन्यायपूर्ण भी है।

किसान का उद्देश्य किसी उपभोक्ता को नुकसान पहुँचाना नहीं है।

वह अपनी फसल बचाने की कोशिश करता है।

वह अपने परिवार को पालने की कोशिश करता है।

वह बाजार के जोखिम से लड़ता है।

वह मौसम से लड़ता है।

वह कीटों से लड़ता है।

वह बढ़ती लागत से लड़ता है।

वह मंडी के भाव से लड़ता है।

वह कर्ज से लड़ता है।

और अंत में उसी से कहा जाता है—

“तुम जहर पैदा कर रहे हो।”

नहीं।

किसान इस व्यवस्था का सबसे बड़ा पीड़ित है।

उसके पास अक्सर विकल्प सीमित हैं।

उसे जिस input पर भरोसा करने को कहा गया, उसने इस्तेमाल किया।

उसे जिस बीज को बेहतर बताया गया, उसने खरीदा।

जिस दवा को फसल बचाने वाली बताया गया, उसने खरीदा।

जिस fertilizer को उत्पादन बढ़ाने वाला बताया गया, उसने खरीदा।

और जब पूरी व्यवस्था के दुष्परिणाम सामने आए, तो जिम्मेदारी ऊपर से नीचे सरकते-सरकते अंत में किसान के सिर पर डाल दी गई।


कृषि विज्ञान से सवाल है—विज्ञान की दिशा किसने तय की?

यह प्रश्न वैज्ञानिकों के खिलाफ नहीं है।

विज्ञान समाज के लिए है।

लेकिन विज्ञान की प्राथमिकताएँ कौन तय करता है, यह लोकतांत्रिक प्रश्न है।

अगर कृषि अनुसंधान का बड़ा हिस्सा उत्पादन बढ़ाने पर केंद्रित है लेकिन मिट्टी की दीर्घकालीन सेहत, biodiversity, water retention, low-input farming, farmer profitability और pesticide reduction को अपेक्षित महत्व नहीं मिलता, तो नीति की समीक्षा होनी चाहिए।

किसान को यह कह देना कि—

“अब प्राकृतिक खेती करो”

पर्याप्त नहीं है।

उसे वैज्ञानिक विकल्प चाहिए।

हर फसल के लिए चाहिए।

हर agro-climatic zone के लिए चाहिए।

हर किसान की लागत के हिसाब से चाहिए।

और सबसे महत्वपूर्ण—

वह विकल्प उसकी फसल को जोखिम में डाले बिना चाहिए।


प्राकृतिक खेती का नारा नहीं, वैज्ञानिक विकल्प चाहिए

सरकार यदि वास्तव में रसायन कम करना चाहती है तो किसान से केवल भाषण न करे।

उसे खेत पर विकल्प दे।

हर जिले में pest diagnostic laboratory हो।

हर block में soil testing की विश्वसनीय सुविधा हो।

हर किसान को crop-specific nutrient recommendation मिले।

हर गांव में trained agricultural extension worker उपलब्ध हो।

Biological control agents की गुणवत्ता सुनिश्चित हो।

Biofertilizers और biopesticides की नकली बिक्री पर कठोर कार्रवाई हो।

Natural farming के सफल मॉडल का वैज्ञानिक परीक्षण हो।

Organic transition के दौरान किसान को आर्थिक सुरक्षा मिले।

और यदि प्राकृतिक खेती की कोई पद्धति किसी क्षेत्र में yield कम करती है, तो सरकार ईमानदारी से बताए कि उस नुकसान की भरपाई कैसे होगी।

किसान प्रयोगशाला का चूहा नहीं है।

किसान के खेत पर “pilot project” चलाकर उसकी पूरी आजीविका जोखिम में नहीं डाली जा सकती।


अगर रसायन गलत हैं तो विकल्प कहाँ हैं?

यह सबसे असहज सवाल है।

यदि सरकार कहती है कि chemical-intensive agriculture नुकसानदायक है, तो किसान पूछेगा—

“तो मुझे विकल्प दीजिए।”

अगर विकल्प उपलब्ध नहीं है तो दोष किसान का नहीं, नीति का है।

अगर जैविक खाद महंगी है तो दोष किसान का नहीं।

अगर certified biological input नहीं मिलता तो दोष किसान का नहीं।

अगर pest outbreak के समय biological control उपलब्ध नहीं है तो दोष किसान का नहीं।

अगर natural farming की उपज का बाजार नहीं है तो दोष किसान का नहीं।

अगर organic certification की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि छोटा किसान उसमें प्रवेश ही नहीं कर सकता तो दोष किसान का नहीं।

अगर कृषि extension system गांव तक नहीं पहुंचता तो दोष किसान का नहीं।

किसान को बिना नाव दिए नदी पार करने के लिए कहना नीति नहीं, क्रूरता है।


कंपनियों से भी सवाल पूछिए

अगर सरकार वास्तव में किसान और उपभोक्ता दोनों की सुरक्षा चाहती है तो agro-chemical industry की supply chain पर पारदर्शिता बढ़ानी होगी।

किस product का registration किस evidence पर हुआ?

किस crop पर उसकी recommendation है?

उसका residue limit क्या है?

उसका pre-harvest interval कितना है?

उसकी environmental safety का assessment कैसे हुआ?

कितने samples की जांच हुई?

कितने products substandard निकले?

कितने dealers के खिलाफ कार्रवाई हुई?

कितने नकली pesticides पकड़े गए?

किसान को गलत dose बताने वाले retailers पर क्या कार्रवाई हुई?

इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।

क्योंकि अगर बाजार किसान को product बेचता है तो बाजार को भी जवाबदेह होना चाहिए।


और सरकार से सबसे बड़ा सवाल—आपकी निगरानी कहाँ थी?

जब बीज खराब होता है, किसान रोता है।

जब pesticide नकली निकलता है, किसान रोता है।

जब खाद नहीं मिलती, किसान लाइन में खड़ा होता है।

जब खाद महंगी होती है, किसान परेशान होता है।

जब कीट लगते हैं, किसान दवा खरीदता है।

जब फसल में residue मिलता है, किसान बदनाम होता है।

जब मिट्टी खराब होती है, किसान को दोष दिया जाता है।

लेकिन regulatory machinery कहाँ है?

Laboratories कहाँ हैं?

Extension workers कहाँ हैं?

Quality inspections कहाँ हैं?

Seed testing कहाँ है?

Pesticide enforcement कहाँ है?

Soil testing की वास्तविक पहुंच कहाँ है?

यह सवाल किसान से नहीं—व्यवस्था से पूछे जाने चाहिए।


किसान को दोषी बनाने की सबसे आसान राजनीति

किसान इस देश का सबसे आसान scapegoat बन गया है।

फसल खराब हो?

किसान ने गलत खेती की।

सब्जी महंगी हो?

किसान जमाखोर।

दाम गिर जाए?

किसान बाजार नहीं समझता।

रसायन मिले?

किसान जहर डालता है।

मिट्टी खराब हो?

किसान ने खाद ज्यादा डाली।

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लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि—

किसान को उत्पादन की पूरी व्यवस्था किसने सौंपी थी?

यह कैसी व्यवस्था है जिसमें किसान को निर्णय लेने का अधिकार सबसे कम और परिणाम भुगतने की जिम्मेदारी सबसे ज्यादा है?


किसान अपराधी नहीं—जोखिम का अंतिम वाहक है

किसान को समझना होगा।

वह “chemical farmer” पैदा नहीं हुआ।

वह अपनी जमीन बचाना चाहता है।

वह उत्पादन करना चाहता है।

वह बाजार में टिकना चाहता है।

वह अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित करना चाहता है।

उसे अगर कम लागत वाली, सुरक्षित, विश्वसनीय और वैज्ञानिक खेती का रास्ता मिलेगा तो वह उसे अपनाने में सबसे अधिक रुचि रखेगा—क्योंकि रसायन खरीदना भी किसान के लिए मुफ्त नहीं है।

हर spray किसान की जेब पर खर्च है।

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हर fertilizer bag खर्च है।

हर pesticide application मजदूरी और मशीनरी की लागत है।

हर अतिरिक्त input उसके जोखिम को बढ़ाता है।

इसलिए किसान को रसायनों का प्रेमी बताना भी वास्तविकता का अपमान है।

किसान अक्सर रसायन इसलिए इस्तेमाल करता है क्योंकि व्यवस्था ने उसे जोखिम से बचने के लिए यही सबसे तेज और उपलब्ध हथियार दिया है।


अब जिम्मेदारी तय होनी चाहिए

भारत को ऐसी कृषि नीति चाहिए जिसमें accountability ऊपर से नीचे जाए, नीचे से ऊपर नहीं।

बीज कंपनी जवाबदेह।

Dealer जवाबदेह।

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Testing laboratory जवाबदेह।

Regulator जवाबदेह।

Extension system जवाबदेह।

Research institution जवाबदेह।

Policy maker जवाबदेह।

और किसान?

किसान भी सुरक्षित उपयोग के लिए प्रशिक्षित और जवाबदेह हो—लेकिन उसे उस व्यवस्था का अकेला अपराधी न बनाया जाए जिसका निर्माण उसने नहीं किया।


अंतिम सवाल: किसान को कटघरे में क्यों?

देश को किसान से यह पूछने से पहले कि—

“तुमने खेत में क्या डाला?”

सरकार को खुद से पूछना चाहिए—

“हमने किसान को क्या उपलब्ध कराया?”

किसान से यह पूछने से पहले कि—

“तुमने यह बीज क्यों लगाया?”

सरकार से पूछा जाना चाहिए—

“यह बीज बाजार तक पहुँचा कैसे?”

किसान से पूछने से पहले कि—

“तुमने यह pesticide क्यों इस्तेमाल किया?”

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पूछा जाना चाहिए—

“यह product किसने बनाया, किसने बेचा, किसने approve किया और किसान को इसके इस्तेमाल की सलाह किसने दी?”

किसान से यह पूछने से पहले कि—

“तुमने मिट्टी क्यों खराब की?”

पूछना चाहिए—

“दशकों तक soil health, organic matter और sustainable nutrient management को कृषि नीति में पर्याप्त प्राथमिकता क्यों नहीं मिली?”

और जब थाली में residue का सवाल उठे तो किसान को कठघरे में खड़ा करने के बजाय पूरी कृषि supply chain को जांचना चाहिए।


किसान को दोषी बनाना बंद कीजिए

भारत के किसान को उपदेश नहीं, विकल्प चाहिए।

उसे आरोप नहीं, वैज्ञानिक सहायता चाहिए।

उसे भाषण नहीं, गुणवत्तापूर्ण बीज चाहिए।

उसे बाजार की चमकदार packaging नहीं, विश्वसनीय input चाहिए।

उसे “जहर मत डालो” कहने से पहले सुरक्षित pest-control technology चाहिए।

उसे “प्राकृतिक खेती करो” कहने से पहले प्राकृतिक खेती का आर्थिक मॉडल चाहिए।

उसे “मिट्टी बचाओ” कहने से पहले soil-health infrastructure चाहिए।

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और सबसे बढ़कर—

उसे दोषी नहीं, भागीदार समझना होगा।

क्योंकि किसान इस संकट का निर्माता नहीं है।

वह इस संकट का सबसे बड़ा पीड़ित है।

उसने कृषि नीति नहीं बनाई।

उसने seed industry नहीं बनाई।

उसने pesticide industry नहीं बनाई।

उसने fertilizer subsidy policy नहीं बनाई।

उसने regulatory framework नहीं बनाया।

उसने laboratory standards तय नहीं किए।

उसने agricultural research की प्राथमिकताएँ तय नहीं कीं।

फिर हर विफलता का नैतिक और आर्थिक बिल उसी किसान के नाम क्यों?

अब समय आ गया है कि देश की कृषि बहस का सवाल बदला जाए।

“किसान जहर क्यों डालता है?” नहीं।

सवाल होना चाहिए—

“किसान को ऐसी व्यवस्था में क्यों धकेला गया जहाँ सुरक्षित विकल्प कम, जोखिम अधिक और जिम्मेदारी पूरी तरह उसके सिर पर है?”

और उससे भी बड़ा सवाल—

“बीज भी आपका, दवा भी आपकी, सलाह भी आपकी, सब्सिडी की नीति भी आपकी—तो बदनामी सिर्फ किसान की क्यों?”

अगर सरकार सचमुच सुरक्षित भोजन चाहती है तो किसान को कटघरे में खड़ा करना बंद करना होगा।

किसान को दोषी बनाने से खेत सुरक्षित नहीं होगा।

किसान को सुरक्षित बनाने से खेत सुरक्षित होगा।

खेत सुरक्षित होगा तो मिट्टी सुरक्षित होगी।

मिट्टी सुरक्षित होगी तो भोजन सुरक्षित होगा।

और तभी भारत की थाली वास्तव में सुरक्षित होगी।

किसान को अपराधी मत बनाइए।
उसे उस व्यवस्था से मुक्त कीजिए जिसने उसके सामने विकल्प सीमित कर दिए हैं।

यही कृषि न्याय है।

यही खाद्य न्याय है।

और यही किसान के प्रति न्यूनतम ईमानदारी है।

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