जनता मालिक या सरकारी लाभार्थी? गांव के लोकतंत्र को किसने बंधक बनाया?
ग्रामीण लोकतंत्र पर केंद्रीकरण, राजनीति और नौकरशाही के बढ़ते प्रभाव की पड़ताल। क्या जनता को वोट मिला, लेकिन निर्णय लेने का अधिकार नहीं? पंचायत, ग्राम सभा और IAS व्यवस्था की जवाबदेही पर तीखा विश्लेषण।
गांव की सत्ता पर कब्जा
By- Chaudhary Sudhir Talyan
सुबह का वक्त है। गांव की चौपाल पर किसान बैठे हैं। किसी के खेत में पानी नहीं पहुंचा, किसी की फसल का भुगतान अटका है, किसी के घर के सामने नाली नहीं बनी, किसी के बच्चे के स्कूल में शिक्षक नहीं है। पंचायत का चुनाव हुए कुछ समय बीत चुका है। लोगों ने अपना प्रतिनिधि चुन लिया है। कागज पर गांव लोकतांत्रिक है।
लेकिन जैसे ही गांव अपनी समस्या का समाधान करने के लिए पंचायत की ओर देखता है, लोकतंत्र की कहानी अचानक बदल जाती है।
प्रधान के पास जनता का वोट है, लेकिन पर्याप्त अधिकार नहीं। ग्राम सभा के पास जनता की संख्या है, लेकिन निर्णय की सीमित शक्ति। पंचायत के पास जिम्मेदारी है, लेकिन संसाधनों पर पूरा नियंत्रण नहीं। और प्रशासन के पास वह शक्ति है जिसके सामने पंचायत को बार-बार फाइल लेकर जाना पड़ता है।
यहीं से भारतीय ग्रामीण लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना शुरू होती है।
जिस जनता को संविधान ने सत्ता का स्रोत बनाया, उसी जनता को अपनी स्थानीय जरूरतों के लिए सत्ता के गलियारों में अनुमति मांगनी पड़ती है।
यह केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं है। यह लोकतंत्र के चरित्र पर सवाल है।
भारत ने 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक आधार दिया। ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला पंचायत की त्रिस्तरीय व्यवस्था बनाई गई। ग्राम सभा को स्थानीय लोकतंत्र की बुनियादी संस्था के रूप में स्थापित किया गया। 11वीं अनुसूची में 29 विषय पंचायतों से जुड़े। उद्देश्य साफ था—सत्ता दिल्ली और राज्य की राजधानियों से निकलकर गांव तक पहुंचे।
लेकिन तीन दशक से ज्यादा समय बाद सवाल यह है कि क्या सत्ता वास्तव में गांव तक पहुंची?
या केवल सत्ता की भाषा गांव तक पहुंची?
चुनाव गांव में आया, शासन नहीं
भारत में लोकतंत्र को अक्सर चुनाव से मापा जाता है।
पांच साल में चुनाव हुआ।
लोगों ने वोट दिया।
प्रधान चुना गया।
जिला पंचायत चुनी गई।
विधानसभा चुनी गई।
संसद चुनी गई।
फिर कहा गया—लोकतंत्र मजबूत है।
लेकिन लोकतंत्र केवल वोट डालने का अधिकार नहीं है।
लोकतंत्र का अर्थ है कि नागरिक उन फैसलों को प्रभावित कर सके जो उसके जीवन को प्रभावित करते हैं।
अगर किसान के खेत तक पानी कौन पहुंचाएगा, यह निर्णय किसान की ग्राम सभा नहीं कर सकती;
अगर गांव की सड़क की प्राथमिकता ग्राम सभा तय नहीं कर सकती;
अगर पंचायत अपने कर्मचारियों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं रखती;
अगर पंचायत के पास अपने निर्णय लागू करने के लिए पर्याप्त धन नहीं;
अगर हर महत्वपूर्ण निर्णय के लिए प्रशासनिक स्वीकृति की आवश्यकता है—
तो सवाल उठना चाहिए कि स्थानीय स्वशासन आखिर है कहां?
पंचायत को अगर केवल सरकारी योजनाओं को लागू करने वाली संस्था बना दिया जाए, तो उसे स्थानीय सरकार कहना लोकतंत्र के साथ शब्दों का खेल है।
राजनीतिक नेतृत्व की सबसे बड़ी बीमारी: सत्ता छोड़ने का डर
यहां बहस को सीधे राजनीति के केंद्र में ले जाना होगा।
भारत की राजनीतिक व्यवस्था में विकेंद्रीकरण की बातें बहुत हुई हैं। घोषणाएं हुईं। समितियां बनीं। आयोग बने। भाषण हुए। पंचायती राज दिवस मनाया गया।
लेकिन वास्तविक सत्ता का हस्तांतरण आज भी असमान और अधूरा है।
क्यों?
क्योंकि सत्ता का केंद्रीकरण राजनीतिक नेतृत्व के लिए सुविधाजनक है।
एक मजबूत स्थानीय सरकार का अर्थ है कि गांव अपनी प्राथमिकताएं खुद तय करे।
एक मजबूत ग्राम सभा का अर्थ है कि जनता सीधे सवाल पूछे।
एक मजबूत पंचायत का अर्थ है कि स्थानीय प्रतिनिधि अपने क्षेत्र में निर्णय ले।
एक आर्थिक रूप से सक्षम पंचायत का अर्थ है कि वह हर छोटी जरूरत के लिए विधायक, सांसद, मंत्री या अधिकारी की ओर न देखे।
और यहीं राजनीतिक सत्ता असहज होती है।
केंद्रीयकृत व्यवस्था में सत्ता ऊपर रहती है और नीचे के लोग निर्भर रहते हैं।
निर्भरता राजनीति का सबसे प्रभावी हथियार है।
जिस गांव को सड़क के लिए ऊपर देखना पड़े, पानी के लिए ऊपर देखना पड़े, बिजली के लिए ऊपर देखना पड़े, रोजगार के लिए ऊपर देखना पड़े और बजट के लिए ऊपर देखना पड़े, वह राजनीतिक रूप से स्वतंत्र नागरिक नहीं बनता—वह सत्ता का आश्रित बनता है।
यही केंद्रीयकरण की सबसे खतरनाक राजनीति है।
प्रशासन सत्ता का चेहरा बन जाता है
अब कहानी में IAS और उच्च नौकरशाही प्रवेश करती है।
यह कहना गलत होगा कि प्रत्येक IAS अधिकारी ग्रामीण लोकतंत्र का विरोध करता है। समस्या व्यक्ति नहीं, प्रशासनिक संरचना है।
भारत की प्रशासनिक व्यवस्था अत्यंत पदानुक्रमित है।
जिला स्तर पर जिलाधिकारी की संस्था का व्यापक प्रशासनिक प्रभाव है। विभागीय अधिकारी अपने-अपने क्षेत्र में शक्ति रखते हैं। ब्लॉक स्तर पर विकास प्रशासन पंचायतों के ऊपर निगरानी और नियंत्रण की भूमिका निभाता है।
परिणाम?
गांव का निर्वाचित प्रतिनिधि और नियुक्त अधिकारी समान लोकतांत्रिक स्थिति में नहीं खड़े होते।
एक जनता से चुना गया है।
दूसरा प्रशासनिक पद से आया है।
एक को हर पांच साल बाद जनता के पास जाना है।
दूसरे की जवाबदेही मुख्यतः प्रशासनिक श्रृंखला के प्रति है।
यहीं शक्ति का असंतुलन पैदा होता है।
प्रधान कहता है—ग्राम सभा ने यह तय किया है।
अधिकारी पूछता है—नियम क्या कहते हैं?
प्रधान कहता है—गांव की प्राथमिकता यह है।
अधिकारी पूछता है—योजना में प्रावधान है?
प्रधान कहता है—जनता यह चाहती है।
अधिकारी कहता है—बजट उपलब्ध नहीं है।
यहां कानून और प्रक्रिया जरूरी हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रक्रिया जनता के निर्णय को लागू करने का माध्यम है या जनता के निर्णय को रोकने का औजार बन चुकी है?
यही मूल प्रश्न है।
जनता को अधिकार न देकर उसे योजनाओं का लाभार्थी बनाया गया
यह भारतीय शासन की सबसे बड़ी राजनीतिक विडंबनाओं में से एक है।
नागरिक को अधिकार चाहिए।
व्यवस्था उसे योजना देती है।
नागरिक को निर्णय में भागीदारी चाहिए।
व्यवस्था उसे लाभार्थी सूची देती है।
नागरिक को स्थानीय सरकार चाहिए।
व्यवस्था उसे सरकारी योजना का implementation mechanism देती है।
इस फर्क को समझना जरूरी है।
अधिकार और लाभ में जमीन-आसमान का अंतर है।
लाभार्थी किसी योजना का इंतजार करता है।
नागरिक अपनी प्राथमिकता तय करता है।
लाभार्थी अधिकारी से पूछता है—मेरा नाम सूची में है या नहीं?
नागरिक पूछता है—मेरे गांव के लिए बजट कहां खर्च हुआ?
लाभार्थी सत्ता पर निर्भर होता है।
नागरिक सत्ता से जवाब मांगता है।
यही कारण है कि यदि राजनीति नागरिक को अधिकारों से हटाकर लाभार्थी की भूमिका में रखती है, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे कल्याणकारी दिखने वाला लेकिन राजनीतिक रूप से निर्भर समाज बना सकता है।
ग्राम सभा को कमजोर करना लोकतंत्र की जड़ काटना है
ग्राम सभा वह जगह है जहां लोकतंत्र पहली बार नागरिक के दरवाजे तक आता है।
संसद दूर है।
विधानसभा दूर है।
सचिवालय दूर है।
लेकिन ग्राम सभा गांव के बीच बैठती है।
यहीं किसान, मजदूर, महिला, युवा और बुजुर्ग अपने स्थानीय प्रश्न उठा सकते हैं।
अगर ग्राम सभा मजबूत है तो स्थानीय सत्ता पर जनता की निगरानी मजबूत होगी।
अगर ग्राम सभा कमजोर है तो पंचायत कुछ व्यक्तियों, स्थानीय प्रभावशाली समूहों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बीच फंस सकती है।
केंद्र सरकार के पंचायती राज मंत्रालय ने भी ग्राम सभा में कम भागीदारी को लेकर राष्ट्रीय अध्ययन कराया है। यह स्वयं इस बात का संकेत है कि संवैधानिक संस्था को वास्तविक जनभागीदारी में बदलना अभी अधूरा कार्य है।
यह स्थिति लोकतंत्र के लिए सामान्य नहीं मानी जा सकती।
जिस देश में चुनाव में जनता की भागीदारी पर गर्व किया जाता है, उसी देश में स्थानीय निर्णय प्रक्रिया से जनता की दूरी लोकतंत्र की गंभीर चेतावनी है।
29 विषय कागज पर, नियंत्रण व्यवहार में
73वें संविधान संशोधन के बाद पंचायतों से जुड़े 29 विषयों की कल्पना की गई थी।
लेकिन असली प्रश्न विषयों की सूची नहीं है।
असली प्रश्न है—
इन विषयों पर निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति किसके पास है?
अगर कृषि पंचायत के पास है लेकिन कृषि विभाग का नियंत्रण कहीं और है;
अगर ग्रामीण सड़क पंचायत की प्राथमिकता है लेकिन तकनीकी और प्रशासनिक नियंत्रण दूसरे स्तर पर है;
अगर पेयजल गांव की समस्या है लेकिन योजना और बजट का नियंत्रण ऊपर है;
अगर ग्रामीण विकास पंचायत की जिम्मेदारी है लेकिन कर्मचारी किसी दूसरे प्रशासनिक तंत्र के प्रति जवाबदेह हैं—
तो पंचायत की संवैधानिक स्थिति कमजोर ही रहेगी।
इसीलिए पंचायती राज की बहस में बार-बार तीन शब्द सामने आते हैं—
Funds, Functions, Functionaries.
पैसा।
कार्य।
कर्मचारी।
इन तीनों के बिना सत्ता का हस्तांतरण अधूरा है।
जिम्मेदारी नीचे और शक्ति ऊपर रखकर कोई भी लोकतांत्रिक ढांचा लंबे समय तक मजबूत नहीं रह सकता।
केंद्रीयकरण शासन की बीमारी है
केंद्रीयकरण शुरुआत में सुविधाजनक लगता है।
एक अधिकारी निर्णय लेगा।
एक विभाग आदेश देगा।
एक सरकार योजना बनाएगी।
एक फाइल में पूरा नियंत्रण रहेगा।
ऊपर से देखने पर व्यवस्था तेज और व्यवस्थित दिखाई देती है।
लेकिन नीचे से देखने पर तस्वीर अलग होती है।
एक ही निर्णय हजारों गांवों पर लागू होता है, जबकि हजारों गांवों की जरूरतें अलग होती हैं।
कहीं पानी प्राथमिकता है।
कहीं सिंचाई।
कहीं पशुपालन।
कहीं सड़क।
कहीं स्कूल।
कहीं स्वास्थ्य।
कहीं रोजगार।
केंद्रीकृत शासन इन विविधताओं को अक्सर एक ही प्रशासनिक प्रारूप में फिट करने की कोशिश करता है।
पर गांव कोई सरकारी फॉर्म नहीं है।
गांव जीवित समाज है।
उसकी जरूरत स्थानीय है।
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इसलिए स्थानीय निर्णय का अधिकार स्थानीय जनता को देना ही लोकतांत्रिक शासन का स्वाभाविक सिद्धांत है।
केंद्रीयकरण जितना बढ़ेगा, नागरिक उतना निर्भर होगा।
विकेंद्रीकरण जितना मजबूत होगा, नागरिक उतना सक्षम होगा।
सत्ता को जनता से डरना चाहिए, जनता को सत्ता से नहीं
लोकतंत्र का सबसे सुंदर सिद्धांत यही है।
सरकार जनता के प्रति जवाबदेह हो।
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लेकिन जब व्यवस्था उलट जाती है तो नागरिक सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाता है।
प्रमाणपत्र के लिए इंतजार करता है।
मंजूरी के लिए इंतजार करता है।
भुगतान के लिए इंतजार करता है।
योजना के लिए इंतजार करता है।
शिकायत के लिए इंतजार करता है।
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और अंत में वही नागरिक चुनाव के समय फिर सत्ता के दरवाजे पर खड़ा कर दिया जाता है।
यह लोकतंत्र की पूर्णता नहीं है।
यह निर्भरता की राजनीति है।
और निर्भरता जितनी अधिक होगी, सत्ता उतनी ही मजबूत होगी।
इसीलिए ग्रामीण लोकतंत्र का वास्तविक संघर्ष केवल पंचायत चुनाव का संघर्ष नहीं है।
यह निर्णय लेने की शक्ति के पुनर्वितरण का संघर्ष है।
अब IAS को खलनायक नहीं, जवाबदेह प्रशासन बनाना होगा
यहां सुधार का रास्ता स्पष्ट होना चाहिए।
IAS और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका समाप्त करना समाधान नहीं है।
लोकतंत्र को सक्षम प्रशासन चाहिए।
लेकिन प्रशासन को लोकतंत्र के ऊपर नहीं, लोकतंत्र के अधीन काम करना होगा।
जिला प्रशासन को पंचायतों का विकल्प नहीं, सहयोगी बनना होगा।
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अधिकारी को पंचायत की जगह निर्णय नहीं लेना चाहिए, बल्कि पंचायत को कानून के भीतर निर्णय लेने योग्य बनाना चाहिए।
जहां भ्रष्टाचार है, वहां कठोर कार्रवाई हो।
जहां वित्तीय अनियमितता है, वहां ऑडिट हो।
जहां कानून का उल्लंघन है, वहां कार्रवाई हो।
लेकिन केवल यह कहकर कि "प्रशासनिक प्रक्रिया ऐसी है", ग्राम सभा के लोकतांत्रिक अधिकार को निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता।
राजनीतिक दलों को अपना सबसे बड़ा डर छोड़ना होगा
राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि मजबूत पंचायतें उनकी दुश्मन नहीं हैं।
मजबूत पंचायतें लोकतंत्र की सुरक्षा दीवार हैं।
लेकिन यदि राजनीतिक दल हर स्तर पर अपने प्रभाव को बनाए रखने के लिए स्थानीय संस्थाओं को निर्भर रखते हैं, तो वे अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के बदले लोकतंत्र की दीर्घकालिक शक्ति नष्ट करते हैं।
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भारत को ऐसा लोकतंत्र नहीं चाहिए जिसमें जनता केवल चुनाव के दिन शक्तिशाली हो।
भारत को ऐसा लोकतंत्र चाहिए जिसमें हर दिन जनता की आवाज शासन का हिस्सा हो।
अंतिम फैसला जनता को करना होगा
अब प्रश्न यह नहीं है कि कौन-सा अधिकारी किस फाइल पर बैठा है।
प्रश्न इससे बड़ा है।
क्या गांव अपने भविष्य का फैसला खुद कर सकता है?
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अगर नहीं, तो लोकतंत्र अधूरा है।
क्या ग्राम सभा अपने गांव की प्राथमिकताओं को प्रभावी रूप से तय कर सकती है?
अगर नहीं, तो स्थानीय स्वशासन अधूरा है।
क्या पंचायत के पास अपने कार्यों को पूरा करने के लिए पर्याप्त धन, कर्मचारी और अधिकार हैं?
अगर नहीं, तो विकेंद्रीकरण अधूरा है।
क्या निर्वाचित प्रतिनिधि प्रशासनिक तंत्र के सामने सम्मानजनक संस्थागत स्थिति में खड़ा है?
अगर नहीं, तो लोकतांत्रिक सत्ता का संतुलन बिगड़ा हुआ है।
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और अगर राजनीतिक नेतृत्व सत्ता को लगातार ऊपर खींचता रहेगा, प्रशासनिक तंत्र उसे नीचे पहुंचने से रोकता रहेगा और जनता को केवल योजनाओं के लाभार्थी की भूमिका दी जाती रहेगी, तो हमें लोकतंत्र की चमकदार भाषा के पीछे छिपी कठोर सच्चाई को स्वीकार करना पड़ेगा—
केंद्रीकरण केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है; यह सत्ता का चरित्र है।
इस बीमारी का इलाज चुनाव से नहीं होगा।
इसका इलाज सत्ता के विकेंद्रीकरण से होगा।
ग्राम सभा को अधिकार देना होगा।
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पंचायत को वित्त देना होगा।
स्थानीय सरकार को कर्मचारी देना होगा।
निर्णय लेने की स्वतंत्रता देनी होगी।
और सबसे महत्वपूर्ण—राजनीतिक नेतृत्व तथा नौकरशाही दोनों को यह स्वीकार करना होगा कि लोकतंत्र में जनता शासन की वस्तु नहीं, शासन की मालिक है।
भारत के गांवों को सरकार की कृपा नहीं चाहिए।
उन्हें अपने संवैधानिक अधिकार चाहिए।
उन्हें किसी अधिकारी की दया नहीं चाहिए।
उन्हें अपने निर्णय लागू करने की शक्ति चाहिए।
उन्हें योजनाओं की भीख नहीं चाहिए।
उन्हें स्थानीय शासन का अधिकार चाहिए।
क्योंकि जिस दिन गांव अपनी सड़क, पानी, बिजली, सिंचाई, स्कूल, स्वास्थ्य, रोजगार और विकास की प्राथमिकताएं स्वयं तय करने लगेगा, उस दिन राजनीति की वह पुरानी संस्कृति टूटेगी जिसमें जनता चुनाव के बाद पांच साल तक सत्ता के दरवाजे पर खड़ी रहती है।
और शायद इसी कारण वास्तविक विकेंद्रीकरण सबसे कठिन राजनीतिक सुधार है।
क्योंकि विकेंद्रीकरण का अर्थ केवल अधिकार नीचे भेजना नहीं है।
विकेंद्रीकरण का अर्थ है—ऊपर बैठे लोगों की शक्ति कम करना और नीचे बैठे नागरिक की शक्ति बढ़ाना।
यही वह परिवर्तन है जिससे लोकतंत्र केवल संविधान की किताब में नहीं, बल्कि गांव की चौपाल पर दिखाई देगा।
और अगर भारत को सचमुच लोकतांत्रिक गणराज्य बनना है, तो अब समय आ गया है कि सत्ता के गलियारों से एक सीधा संदेश गांव तक जाए—
गांव जनता का है। पंचायत जनता की है। ग्राम सभा जनता की है। और अंतिम लोकतांत्रिक अधिकार भी जनता का ही है।
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