“अनंत नागेश्वरन बोले—डिग्री के बाद Skill सीखो! युवा पूछ रहा है: डिग्री, Skill और Experience के बाद भी नौकरी नहीं मिली तो क्या करें?”
अनंत नागेश्वरन की युवाओं को डिग्री के बाद Skill Course करने की सलाह के बीच बड़ा सवाल—जब डिग्री, Skill और Experience के बाद भी नौकरी न मिले तो जिम्मेदारी किसकी? भारत के शिक्षित युवाओं, बेरोजगारी और रोजगार व्यवस्था की कठोर पड़ताल।
युवाओं को सलाह नहीं, जवाब चाहिए
By - Chaudhary Sudhir Talyan
17 सितंबर को जब देश में बेरोजगारी के सवाल पर बहस हो रही है, उसी समय सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन की युवाओं को दी गई सलाह ने एक बेहद असहज प्रश्न सामने ला दिया है। उन्होंने युवाओं से पारंपरिक शिक्षा के साथ-साथ trade और vocational skills के लिए खुले रहने की बात कही है और निजी क्षेत्र से निवेश, भर्ती तथा उचित वेतन देने का आग्रह भी किया है। (The Indian Express)
Skill सीखने में कोई बुराई नहीं है। दुनिया बदल रही है, तकनीक बदल रही है, AI बदल रहा है और नौकरियों का स्वरूप भी बदल रहा है। लेकिन असली सवाल यह है कि भारत के उच्च शिक्षित युवा को डिग्री हासिल करने के बाद फिर से रोजगार योग्य बनने के लिए एक और प्रमाणपत्र क्यों चाहिए?
अगर विश्वविद्यालय की डिग्री के बाद भी युवा रोजगार योग्य नहीं है, फिर skill course के बाद भी नौकरी नहीं मिलती, और उसके बाद भी उसे कहा जाता है कि “अपने आपको upgrade करो”, तो यह केवल skill gap की कहानी नहीं है। यह शिक्षा, अर्थव्यवस्था और रोजगार नीति की सामूहिक विफलता का सवाल है।
और यही वह बिंदु है जहां सरकार से मीठी भाषा में नहीं, कठोर सवाल पूछे जाने चाहिए।
डिग्री लेकर निकला युवा आखिर जाए तो जाए कहां?
एक सामान्य भारतीय परिवार अपने बच्चे की पढ़ाई के लिए वर्षों तक पैसा खर्च करता है।
स्कूल।
कॉलेज।
कोचिंग।
किताबें।
फीस।
यातायात।
कभी-कभी शहर बदलकर पढ़ाई।
परिवार की बचत खत्म होती है। माता-पिता अपनी जरूरतें रोकते हैं। किसान जमीन बेचकर पढ़ाता है। निम्न-मध्यवर्गीय परिवार कर्ज लेकर बच्चे को कॉलेज भेजता है।
बदले में युवा से कहा जाता है—
“डिग्री ले ली? अब skill सीखो।”
Skill सीख ली?
“अब experience चाहिए।”
Experience नहीं है?
“पहले internship करो।”
Internship हो गई?
“अब vacancy नहीं है।”
Vacancy आई?
“Exam दो।”
Exam दिया?
“Result का इंतजार करो।”
Result आया?
“अगली भर्ती का इंतजार करो।”
यह रोजगार व्यवस्था नहीं है।
यह युवा को प्रतीक्षा, परीक्षा और निराशा के अंतहीन चक्र में धकेलने वाली व्यवस्था है।
आंकड़े सरकार की चमकदार कहानी को चुनौती देते हैं
सरकार के नवीनतम PLFS आंकड़ों के अनुसार अगस्त 2026 में 15 वर्ष और उससे ऊपर की आबादी की बेरोजगारी दर 5% रही। लेकिन इसी आंकड़े को युवा रोजगार की वास्तविक स्थिति समझने के लिए अकेले इस्तेमाल करना भ्रामक होगा। 15–29 वर्ष के युवाओं की बेरोजगारी दर अगस्त में 15.1% थी—कुल बेरोजगारी दर की लगभग तीन गुनी। शहरी युवाओं में यह 18.7% और युवा महिलाओं में 18.5% थी। (Jagranjosh.com)
यानी headline में बेरोजगारी 5% हो सकती है, लेकिन जिस युवक ने अभी-अभी कॉलेज से निकलकर नौकरी की दुनिया में प्रवेश किया है, उसकी दुनिया बिल्कुल अलग है।
उसके सामने बेरोजगारी का आंकड़ा 15.1% है।
और यह सिर्फ नौकरी न मिलने का प्रश्न नहीं है।
यह उस उम्र का प्रश्न है जब युवा:
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परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी लेना चाहता है,
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विवाह और परिवार के बारे में सोचता है,
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अपना घर बनाना चाहता है,
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आर्थिक स्वतंत्रता चाहता है,
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अपने माता-पिता की मदद करना चाहता है,
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और अपने भविष्य की नींव रखना चाहता है।
जब उसी उम्र में उसे वर्षों तक नौकरी की तलाश करनी पड़े, तो नुकसान केवल आय का नहीं होता।
उसकी पूरी जीवन-योजना पीछे खिसक जाती है।
उच्च शिक्षित युवा के लिए बेरोजगारी केवल बेरोजगारी नहीं है
ग्रामीण मजदूर के लिए बेरोजगारी का अर्थ अलग हो सकता है। लेकिन एक graduate या postgraduate के लिए समस्या की प्रकृति अलग है।
उसने अपनी जिंदगी के 15–20 वर्ष शिक्षा में लगाए हैं।
उसके पास qualification है।
उसके पास आकांक्षा है।
उसने शिक्षा को सामाजिक गतिशीलता का माध्यम माना।
और फिर उसे पता चलता है कि उसकी डिग्री का नौकरी के बाजार से ही संबंध कमजोर है।
NITI Aayog की अगस्त 2026 की “Reimagining Skilling for Viksit Bharat@2047” रिपोर्ट में Economic Survey 2024-25 के हवाले से कहा गया है कि केवल 8.25% graduates ही ऐसे रोजगार में हैं जो उनकी qualification के अनुरूप हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि educated unemployment और practical तथा industry-linked skills का gap गंभीर समस्या है। (NITI Aayog)
कुछ रिपोर्टों में इसी NITI Aayog विश्लेषण के आधार पर graduate unemployment को 13% और graduate women के लिए 20.4% बताया गया है। (Hindustan Times)
ये आंकड़े किसी राजनीतिक भाषण के नहीं हैं।
ये उस व्यवस्था का आईना हैं जिसमें शिक्षा और रोजगार के बीच खाई लगातार दिखाई दे रही है।
फिर सवाल सरकार से है: चार साल की डिग्री किसलिए?
अगर B.A., B.Sc., B.Com जैसी डिग्रियां रोजगार बाजार से पर्याप्त रूप से जुड़ी नहीं हैं, तो सरकार और विश्वविद्यालयों को यह जवाब देना चाहिए कि curriculum में practical exposure क्यों नहीं था?
यदि उद्योग कहता है कि graduate के पास skills नहीं हैं, तो विश्वविद्यालयों और उद्योगों के बीच institutional partnership कहां है?
यदि कंपनियां कहती हैं कि युवाओं में employability नहीं है, तो apprenticeship व्यवस्था कितनी बड़ी है?
यदि सरकार कहती है कि युवाओं को skill चाहिए, तो skill को degree के भीतर क्यों नहीं जोड़ा गया?
युवाओं से यह कहना आसान है:
“खुद को बदलो।”
लेकिन शासन की असली परीक्षा यह है कि वह अपनी संस्थाओं को बदलता है या नहीं।
सलाह देना आसान है, रोजगार पैदा करना कठिन
यहां सरकार की सबसे बड़ी समस्या सामने आती है।
भारत में policy discourse अक्सर supply side पर अटक जाता है।
युवा skilled नहीं है।
युवा employable नहीं है।
युवा flexible नहीं है।
युवा vocational education नहीं लेना चाहता।
युवा सरकारी नौकरी के पीछे भागता है।
लेकिन कोई उतनी ताकत से यह नहीं पूछता:
नौकरी पैदा कौन करेगा?
Skill का उपयोग कौन करेगा?
Factory कौन लगाएगा?
नए enterprises कौन बनाएगा?
स्थायी jobs कौन देगा?
अच्छा वेतन कौन देगा?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या भारत की अर्थव्यवस्था इतनी productive, labour-intensive और employment-generating हो रही है कि करोड़ों नए entrants को सम्मानजनक काम मिल सके?
मुख्य आर्थिक सलाहकार ने स्वयं निजी क्षेत्र से निवेश, भर्ती और उचित compensation की मांग की है। (The Indian Express)
यानी समस्या केवल युवाओं की skill की नहीं है।
Demand side की समस्या भी है।
बेरोजगार को certificate देना रोजगार नीति नहीं है
भारत में skill training का विशाल ढांचा खड़ा किया गया है।
लेकिन training की संख्या और नौकरी की संख्या एक नहीं होती।
एक certificate किसी युवा को आर्थिक सुरक्षा नहीं देता।
उसे चाहिए:
काम।
और काम के साथ चाहिए:
उचित वेतन।
और वेतन के साथ चाहिए:
स्थायित्व।
और स्थायित्व के साथ चाहिए:
सामाजिक सुरक्षा।
अगर लाखों युवा एक course से दूसरे course तक घूमते रहें और employment नहीं मिले, तो सरकार यह दावा नहीं कर सकती कि उसने बेरोजगारी की समस्या का समाधान कर दिया।
NITI Aayog की नई रिपोर्ट स्वयं स्वीकार करती है कि training के बाद skills का sustained livelihood में बदलना एक बड़ी चुनौती है। (NITI Aayog)
इसलिए अब Skill India को certificate counting exercise से निकालकर employment outcome system बनाना होगा।
युवा अब केवल नौकरी नहीं, भविष्य मांग रहा है
यह फर्क समझना जरूरी है।
आज का educated youth केवल ₹15–20 हजार की कोई भी नौकरी नहीं चाहता।
वह अपनी qualification के अनुरूप career चाहता है।
वह professional growth चाहता है।
वह घर खरीदना चाहता है।
वह सामाजिक सम्मान चाहता है।
वह आर्थिक स्वतंत्रता चाहता है।
वह दुनिया के युवाओं से प्रतिस्पर्धा करना चाहता है।
वह AI सीखना चाहता है।
वह startup करना चाहता है।
वह research करना चाहता है।
वह manufacturing, technology, healthcare, finance, agriculture, renewable energy और नए industries में जाना चाहता है।
लेकिन अगर उसकी पूरी ऊर्जा केवल “नौकरी कहां है?” पूछते हुए निकल जाए, तो demographic dividend demographic disaster में बदल सकता है।
डिग्री की कीमत गिरती गई तो शिक्षा पर भरोसा भी टूटेगा
किसी भी समाज में शिक्षा एक सामाजिक अनुबंध है।
व्यक्ति शिक्षा में निवेश करता है क्योंकि उसे विश्वास होता है कि शिक्षा उसके जीवन की संभावनाएं बढ़ाएगी।
लेकिन यदि graduate होने के बाद भी qualification का labour market में मूल्य सीमित हो जाए, तो धीरे-धीरे शिक्षा के प्रति विश्वास टूटता है।
फिर युवा पूछता है:
“इतनी पढ़ाई करके मिला क्या?”
यही प्रश्न खतरनाक है।
क्योंकि इसका जवाब अगर व्यवस्था नहीं देगी, तो समाज अपने स्तर पर जवाब तलाशेगा।
कुछ युवा सरकारी परीक्षाओं की अंतहीन कतार में चले जाएंगे।
कुछ विदेश जाने की कोशिश करेंगे।
कुछ low-paid jobs स्वीकार करेंगे।
कुछ परिवार के व्यवसाय में लौटेंगे।
कुछ informal work करेंगे।
और कुछ labour market से बाहर हो जाएंगे।
सबसे कठोर प्रश्न: युवा को दोषी क्यों बनाया जा रहा है?
यह कहना कि युवा को नई skills सीखनी चाहिए—ठीक है।
लेकिन अगर हर बार रोजगार संकट का उत्तर यही है कि “युवा में skill नहीं है”, तो यह आधा सच है।
क्योंकि economy में skill की demand पैदा करने वाला कौन है?
उद्योग।
निवेश।
उत्पादन।
निर्यात।
Manufacturing।
Services।
Research।
Infrastructure।
Startups।
MSMEs।
और सबसे ऊपर—economic policy।
अगर demand कमजोर है तो केवल supply को train करते रहने से समस्या खत्म नहीं होगी।
आप लाखों युवाओं को coding सिखा सकते हैं।
AI सिखा सकते हैं।
drone technology सिखा सकते हैं।
data analytics सिखा सकते हैं।
electric vehicle technology सिखा सकते हैं।
लेकिन यदि पर्याप्त कंपनियां hiring नहीं कर रहीं, तो trained बेरोजगारों की संख्या ही बढ़ेगी।
Skilled unemployment भी unemployment ही है।
भारत को “Job Seekers” नहीं, “Job Creators” बनाने की बात भी अधूरी है
सरकार अक्सर युवाओं से entrepreneurship की बात करती है।
हर युवा entrepreneur नहीं बन सकता।
हर व्यक्ति startup founder नहीं बनना चाहता।
हर graduate के पास पूंजी नहीं है।
हर गांव में market access नहीं है।
हर युवा के पास risk लेने की आर्थिक क्षमता नहीं है।
और सबसे महत्वपूर्ण—एक अर्थव्यवस्था केवल entrepreneurs से नहीं चलती।
उसे teachers चाहिए।
Engineers चाहिए।
Scientists चाहिए।
Nurses चाहिए।
Accountants चाहिए।
Technicians चाहिए।
Administrators चाहिए।
Researchers चाहिए।
Factory workers चाहिए।
Skilled tradespeople चाहिए।
Managers चाहिए।
और इन सभी को नौकरी चाहिए।
इसलिए “हर युवा entrepreneur बने” रोजगार नीति का विकल्प नहीं हो सकता।
सरकार को अब युवाओं से वादे नहीं, रोजगार का हिसाब देना चाहिए
हर बजट में skill allocation बताने से ज्यादा जरूरी है employment outcome बताना।
सरकार को देश के सामने वार्षिक National Graduate Employment Report रखना चाहिए:
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एक वर्ष में कितने graduates निकले?
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कितनों को छह महीने में नौकरी मिली?
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कितनों को qualification-matched job मिली?
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median starting salary कितनी रही?
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कितने graduates contract jobs में हैं?
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कितने apprenticeship से permanent employment में गए?
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कितने विदेश चले गए?
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कितने competitive examinations की तैयारी में चले गए?
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कितने labour force से बाहर हो गए?
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कितनी नई graduate-level jobs वास्तव में पैदा हुईं?
जब तक ये सवाल नहीं पूछे जाएंगे, रोजगार नीति का मूल्यांकन अधूरा रहेगा।
https://politicsinsightindia.com/noida-dm-orwellian-dystopia-high-court-activist-nsa-detention
असली सुधार: Degree को रोजगार से जोड़ो
भारत को degree खत्म करने की नहीं, degree की गुणवत्ता बदलने की जरूरत है।
हर degree programme में:
Internship + Apprenticeship + Industry Project + Digital Skills + Communication + Problem Solving + Entrepreneurship + Real Workplace Exposure
को गंभीरता से शामिल करना होगा।
NITI Aayog की रिपोर्ट भी practical learning, industry alignment और apprenticeship को मजबूत करने की जरूरत रेखांकित करती है। (NITI Aayog)
यानी समाधान यह नहीं कि:
“डिग्री बेकार है, skill सीखो।”
बल्कि समाधान होना चाहिए:
https://politicsinsightindia.com/mehangai-ka-dosh-kisan-par-kyon
“डिग्री को इतना उपयोगी बनाओ कि skill उसी शिक्षा का हिस्सा हो।”
और अगर फिर भी नौकरी नहीं मिले?
यही सबसे बड़ा प्रश्न है।
मान लीजिए युवा ने:
Graduation की।
फिर:
Skill course किया।
फिर:
Internship की।
फिर:
Apprenticeship की।
फिर:
नई technology सीखी।
फिर:
AI का course किया।
और उसके बाद भी वह नौकरी की तलाश में है।
तब उसे क्या कहा जाएगा?
https://politicsinsightindia.com/india-62-mmt-cbg-potential-government-failure-farmer-waste-energy
एक और course करो?
यहीं से सलाह की राजनीति खत्म और रोजगार की राजनीति शुरू होनी चाहिए।
सरकार का काम केवल यह बताना नहीं कि युवा स्वयं को कैसे बदलें।
सरकार का काम ऐसी आर्थिक परिस्थितियां बनाना भी है जिसमें बदला हुआ, skilled और educated युवा अपनी क्षमता का उपयोग कर सके।
https://politicsinsightindia.com/gaon-ke-loktantra-par-ias-rajnitik-gathjod-ka-kabza
यह केवल बेरोजगारी नहीं—आशा का संकट है
सबसे खतरनाक बेरोजगारी वह नहीं है जिसमें व्यक्ति कुछ महीने नौकरी तलाशता है।
सबसे खतरनाक स्थिति वह है जिसमें युवा धीरे-धीरे विश्वास खो देता है कि उसकी मेहनत का कोई परिणाम होगा।
पहले उसे लगता है:
“डिग्री ले लूंगा, नौकरी मिल जाएगी।”
फिर:
“Skill सीख लूंगा, नौकरी मिल जाएगी।”
फिर:
“Experience हासिल कर लूंगा, नौकरी मिल जाएगी।”
फिर:
https://politicsinsightindia.com/ganna-1-quintal-1366-value-farmer-365-frp-70-percent-share
“एक और exam दे दूंगा।”
फिर:
“एक और course कर लूंगा।”
और अंततः:
“शायद इस देश में मेरे लिए कोई जगह ही नहीं है।”
किसी भी राष्ट्र के लिए इससे अधिक खतरनाक आर्थिक संकेत क्या हो सकता है?
भारत के पास विशाल युवा आबादी है। लेकिन युवा आबादी अपने-आप demographic dividend नहीं बनती।
काम करने योग्य युवा + उत्पादक अर्थव्यवस्था + पर्याप्त रोजगार + उचित वेतन = demographic dividend.
इनमें से रोजगार गायब हो जाए तो वही demographic advantage सामाजिक तनाव और निराशा का स्रोत बन सकता है।
निष्कर्ष: युवाओं को सलाह नहीं, अवसर चाहिए
मुख्य आर्थिक सलाहकार की skill वाली बात को तकनीकी बदलाव के संदर्भ में समझा जा सकता है। Skill की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन skill को बेरोजगारी की पूरी दवा बताना उतना ही गलत होगा जितना degree को नौकरी की गारंटी मान लेना।
भारत के युवाओं के सामने समस्या यह नहीं है कि वे सीखना नहीं चाहते।
समस्या यह है कि वे सीखते जा रहे हैं, प्रमाणपत्र लेते जा रहे हैं, परीक्षाएं देते जा रहे हैं—लेकिन रोजगार की कतार खत्म नहीं हो रही।
और जब NITI Aayog यह बताता है कि केवल 8.25% graduates ही qualification-aligned jobs में हैं, तो यह सवाल युवाओं से ज्यादा शिक्षा और रोजगार व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए। (NITI Aayog)
सरकार को अब युवाओं से यह कहना बंद करना होगा कि:
“तुममें skill नहीं है।”
उसे पूछना होगा:
“हमने तुम्हारी शिक्षा को रोजगार से क्यों नहीं जोड़ा?”
“हमने पर्याप्त productive jobs क्यों नहीं पैदा कीं?”
“Industry को hiring और investment के लिए किस तरह का ecosystem दिया?”
“Graduate के पांच साल बचाने के लिए हमने क्या किया?”
और सबसे कठिन प्रश्न—
अगर भारत का शिक्षित युवा डिग्री, skill और experience—तीनों हासिल करने के बाद भी नौकरी के लिए दर-दर भटकता है, तो फिर विकास की उस कहानी का लाभ आखिर किसे मिला?
युवा को हर बार नई परीक्षा मत दीजिए।
उसे अवसर दीजिए।
उसे हर बार नया certificate मत दीजिए।
उसे काम दीजिए।
उसे बेरोजगारी पर भाषण मत दीजिए।
उसे ऐसा आर्थिक भविष्य दीजिए जिसमें उसकी शिक्षा, मेहनत और प्रतिभा की वास्तविक कीमत हो।
क्योंकि जिस देश का युवा अपने भविष्य पर भरोसा खो देता है, वहां बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या नहीं रहती—
वह राष्ट्रीय विकास के मॉडल पर सबसे कठोर सवाल बन जाती है।
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