विश्वकर्मा की पूजा, कारीगर की बदहाली: कारीगर को मजदूर बनाने वाली अर्थव्यवस्था का सच
कारीगर का बढ़ता कर्ज भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की गहरी विडंबना है। विश्वकर्मा से मजदूर तक की यात्रा में हुनर तो बचा, लेकिन बाजार, पूंजी और उचित मूल्य पर नियंत्रण कमजोर हुआ। यह लेख कारीगरों की कर्जदारी, घटती आय, महंगी लागत और सरकारी नीतियों की विफलताओं की पड़ताल करता है।
विश्वकर्मा से मजदूर तक बदलती ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कठोर कहानी
By - Chaudhary Sudhir Talyan
भारत में विश्वकर्मा की पूजा होती है। कारीगर के हाथों को सम्मान दिया जाता है। भाषणों में उसे परंपरा का वाहक कहा जाता है, आत्मनिर्भर भारत का निर्माता बताया जाता है और उसकी कला को भारतीय सभ्यता की पहचान कहा जाता है। लेकिन इस चमकदार भाषा के पीछे ग्रामीण भारत की एक कड़वी कहानी छिपी है—जिस कारीगर के हुनर को देश अपनी विरासत बताता है, वही कारीगर अपनी जिंदगी चलाने के लिए कर्ज लेने को मजबूर हो रहा है।
यही विरोधाभास भारतीय आर्थिक नीति की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है।
जिस हाथ में कभी औजार उसकी पूंजी था, आज उसी हाथ को औजार खरीदने के लिए पूंजी चाहिए। जिस कारीगर का ग्राहक कभी उसके गांव और आसपास के इलाके में था, आज वह औद्योगिक उत्पादन, तैयार माल, बड़े व्यापारियों, ठेकेदारों और बदलती बाजार व्यवस्था के सामने खड़ा है। उसकी मेहनत बनी रहती है, लेकिन उसकी कमाई की निश्चितता खत्म होती जाती है।
और जब आमदनी अनिश्चित हो जाए तथा खर्च लगातार निश्चित रहे, तो कर्ज दरवाजे पर दस्तक नहीं देता—वह घर के भीतर प्रवेश कर जाता है।
भारत के ग्रामीण परिवारों की ऋण स्थिति का राष्ट्रीय सर्वेक्षण बताता है कि 2019 में लगभग 35 प्रतिशत ग्रामीण परिवार indebted थे। यह आंकड़ा केवल कारीगरों का नहीं है, इसलिए इसे कारीगरों की ऋण दर कहना गलत होगा। लेकिन यह उस ग्रामीण आर्थिक वातावरण की गंभीरता जरूर बताता है जिसमें कारीगर अपना जीवन और व्यवसाय चला रहा है।
कारीगर की त्रासदी यह है कि उसका कर्ज केवल घर चलाने के लिए नहीं होता। कई बार वह उत्पादन बचाने के लिए भी कर्ज लेता है।
उसे लकड़ी खरीदनी है। धातु खरीदनी है। धागा खरीदना है। चमड़ा खरीदना है। रंग और अन्य सामग्री खरीदनी है। मशीन की मरम्मत करनी है। दुकान का किराया देना है। बिजली का बिल भरना है। बच्चे की फीस देनी है। घर में बीमारी आ जाए तो अलग खर्च।
कारीगर की आय पूछिए तो जवाब मिलेगा—“काम मिलने पर।”
लेकिन खर्च पूछिए तो जवाब मिलेगा—“हर महीने।”
यहीं से कर्ज पैदा होता है।
कारीगर की सबसे बड़ी हार बाजार में हुई
कारीगर गरीब इसलिए नहीं हुआ कि उसका हुनर समाप्त हो गया।
वह इसलिए कमजोर हुआ क्योंकि हुनर के आर्थिक मूल्य पर उसका नियंत्रण कम होता गया।
बाजार में उत्पाद बेचने वाला अंतिम व्यक्ति अक्सर उत्पादन करने वाले व्यक्ति से कई गुना अधिक कमाता है। कारीगर वस्तु बनाता है, लेकिन उसका अंतिम मूल्य तय करने की शक्ति हमेशा उसके हाथ में नहीं होती।
यही भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कठोर सच्चाई है।
बढ़ई सामान बनाता है। लोहार औजार बनाता है। कुम्हार बर्तन बनाता है। दर्जी कपड़े तैयार करता है। बुनकर कपड़ा बनाता है। मोची जूते बनाता है। राजमिस्त्री मकान खड़ा करता है।
नीति बनाने वालों ने वर्षों तक कारीगर को “छोटा व्यवसायी”, “अनौपचारिक श्रमिक”, “लाभार्थी” या “कौशल प्रशिक्षण का उम्मीदवार” समझा। उसे आर्थिक शक्ति रखने वाला उत्पादक मानने में नीति लगातार कमजोर रही।
यह अंतर मामूली नहीं है।
यदि कारीगर को गरीब माना जाएगा तो उसे सहायता दी जाएगी।
यदि उसे उत्पादक माना जाएगा तो उसे बाजार दिया जाएगा।
यदि उसे उद्यमी माना जाएगा तो उसे पूंजी दी जाएगी।
यदि उसे आर्थिक नागरिक माना जाएगा तो उसकी आय, सामाजिक सुरक्षा और बाजार शक्ति सुनिश्चित करने की व्यवस्था की जाएगी।
भारत को तीसरे और चौथे रास्ते की जरूरत है।
मशीन आई, लेकिन कारीगर के हाथ में पूंजी नहीं आई
मशीनीकरण को रोकना समाधान नहीं है। मशीन उत्पादन बढ़ाती है, लागत घटाती है और उपभोक्ता को सस्ता माल दे सकती है। समस्या मशीन नहीं है।
समस्या यह है कि मशीन के युग में छोटे कारीगर को बराबर प्रतिस्पर्धा की क्षमता नहीं दी गई।
बड़ा उद्योग मशीन खरीद सकता है। उत्पादन बड़े पैमाने पर कर सकता है। कच्चा माल थोक में खरीद सकता है। बाजार में लंबे समय तक टिक सकता है।
छोटा कारीगर एक मशीन खरीदने के लिए भी ऋण पर निर्भर हो सकता है।
फिर बाजार में वही कारीगर उस उत्पाद से मुकाबला करता है जो किसी बड़े कारखाने ने हजारों की संख्या में बनाया है।
यह कैसी प्रतिस्पर्धा है?
एक तरफ सस्ता वित्त, बड़ी मशीन, थोक खरीद, ब्रांड और व्यापक बाजार।
दूसरी तरफ छोटा workshop, सीमित पूंजी, अस्थिर ऑर्डर और परिवार की जरूरतें।
फिर नीति निर्माता पूछते हैं कि कारीगर प्रतिस्पर्धी क्यों नहीं है।
यह सवाल कारीगर से नहीं, नीति से पूछा जाना चाहिए।
कर्ज देकर आत्मनिर्भरता नहीं आती
सरकार ने पारंपरिक कारीगरों की स्थिति सुधारने के लिए PM Vishwakarma जैसी योजना शुरू की। योजना में skill training, toolkit incentive, concessional credit और marketing support जैसी व्यवस्थाएं हैं। सरकारी dashboard पर लाखों पंजीकरण और ऋण स्वीकृतियों का आंकड़ा उपलब्ध है।
यह पहल यह स्वीकार करती है कि पारंपरिक कारीगरों को पूंजी, तकनीक और बाजार की जरूरत है।
लेकिन यहीं से दूसरा और ज्यादा कठिन प्रश्न शुरू होता है।
कारीगर को पैसा मिला या नहीं—यह पर्याप्त प्रश्न नहीं है।
प्रश्न होना चाहिए—
उसकी शुद्ध आय कितनी बढ़ी?
उसका कर्ज कितना घटा?
उसका उत्पाद कितने दाम पर बिकने लगा?
क्या उसे नया बाजार मिला?
क्या उसका बच्चा उसी पेशे में सम्मान और आय देखता है?
क्या कारीगर मजदूरी छोड़कर अपने उद्यम का मालिक बन रहा है?
यदि इन सवालों का उत्तर नहीं मिलता तो योजना का आंकड़ा बड़ा हो सकता है, लेकिन कारीगर की आर्थिक स्थिति बड़ी नहीं होगी।
सरकार के लिए registration एक उपलब्धि हो सकती है।
कारीगर के लिए स्थायी आय ही उपलब्धि है।
विश्वकर्मा से मजदूर बनने की त्रासदी
एक समय था जब पिता का हुनर बेटे को मिलता था।
बढ़ई का बेटा बढ़ई बनता था।
लोहार का बेटा लोहार।
बुनकर का बेटा बुनकर।
यह केवल परंपरा नहीं थी। यह आर्थिक हस्तांतरण था। कौशल एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाता था।
लेकिन आज युवा कारीगर परिवार का बच्चा पूछता है—“इस काम में कमाई कितनी है?”
यदि जवाब कमजोर है तो वह शहर चला जाता है।
वह construction site पर मजदूरी करता है। किसी factory में contract worker बनता है। किसी व्यापारी के यहां काम करता है। delivery करता है। छोटे शहर से बड़े शहर की ओर जाता है।
यहां भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सबसे गंभीर परिवर्तन दिखाई देता है।
कारीगर अपना हुनर नहीं छोड़ता; वह उसके आर्थिक स्वामित्व को छोड़ देता है।
यही अंतर है कारीगर और मजदूर के बीच।
राजमिस्त्री निर्माण जानता है, लेकिन contractor का कर्मचारी हो सकता है।
बढ़ई फर्नीचर बना सकता है, लेकिन किसी बड़े furniture business के लिए काम कर सकता है।
दर्जी कपड़े बना सकता है, लेकिन garment supply chain में piece-rate worker बन सकता है।
बुनकर कपड़ा बना सकता है, लेकिन किसी trader के order पर उत्पादन करने वाला व्यक्ति बन सकता है।
हुनर वही रहता है।
आर्थिक स्वतंत्रता चली जाती है।
असली संकट कर्ज नहीं, कर्ज की वजह है
कर्ज को केवल वित्तीय समस्या मानना गलत है।
कर्ज अक्सर किसी गहरी बीमारी का लक्षण है।
यदि कारीगर के पास पर्याप्त और स्थिर आय हो, तो छोटा productive loan निवेश बन सकता है।
लेकिन जब आय अस्थिर हो, बाजार अनिश्चित हो और परिवार की जरूरतें बढ़ती रहें, तो वही ऋण बोझ बन जाता है।
इसीलिए कारीगर की समस्या का समाधान केवल “और ऋण” नहीं हो सकता।
उसे चाहिए—
सस्ता working capital।
सुलभ उपकरण।
कच्चे माल की सामूहिक खरीद।
स्थानीय बाजार।
सरकारी खरीद में प्राथमिकता।
डिजाइन और technology support।
उत्पाद की branding।
परिवहन और storage।
डिजिटल बाजार तक पहुंच।
बीमा और सामाजिक सुरक्षा।
सरकार ने योजनाएं बनाईं, लेकिन बाजार किसके लिए बनाया?
भारत में गरीबों के लिए योजनाओं की कमी नहीं है।
कमी है तो ऐसी आर्थिक व्यवस्था की जिसमें गरीब उत्पादक लगातार गरीब न रहे।
कारीगर को subsidy देकर कुछ समय मदद की जा सकती है।
उसे toolkit देकर उत्पादन क्षमता बढ़ाई जा सकती है।
उसे loan देकर मशीन दिलाई जा सकती है।
लेकिन यदि उसका माल बिकेगा नहीं, तो ये सब उपाय अधूरे हैं।
सरकार को यह समझना होगा कि कारीगर की सबसे बड़ी जरूरत सरकारी फॉर्म नहीं, बाजार है।
उसे ऐसी procurement policy चाहिए जिसमें सरकारी विभाग, स्कूल, अस्पताल, पंचायतें, सार्वजनिक संस्थान और अन्य सरकारी निकाय स्थानीय कारीगरों से वस्तुओं की खरीद बढ़ाएं।
उसे ऐसे clusters चाहिए जहां मशीन, finishing, packaging, testing और storage जैसी सुविधाएं साझा हों।
उसे ऐसी cooperatives या producer organisations चाहिए जो बाजार में उसकी bargaining power बढ़ाएं।
और उसे ऐसी वित्तीय व्यवस्था चाहिए जिसमें repayment schedule उसकी वास्तविक आय के अनुरूप हो।
कारीगर के कर्ज को GDP की भाषा से बाहर मत रखिए
भारत की आर्थिक बहस में GDP, infrastructure, exports, manufacturing और investment पर बड़ी चर्चा होती है।
लेकिन उस व्यक्ति की चर्चा कम होती है जो गांव में बैठकर वास्तविक वस्तु बनाता है।
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कारीगर का श्रम आर्थिक उत्पादन है।
उसकी दुकान आर्थिक इकाई है।
उसका workshop पूंजीगत संपत्ति है।
उसका हुनर human capital है।
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उसका ग्राहक नेटवर्क market capital है।
फिर उसे केवल “गरीब” क्यों माना जाए?
भारत को artisan economy की अलग और मजबूत statistical पहचान की जरूरत है। हमें पता होना चाहिए कि देश में कितने कारीगर हैं, उनकी औसत शुद्ध आय क्या है, उनका औसत ऋण कितना है, कितना कर्ज informal sources से आता है, उनकी input cost कितनी है और उनके उत्पाद के अंतिम retail price में उन्हें कितना हिस्सा मिलता है।
जिस वर्ग के बारे में पर्याप्त आंकड़े नहीं होंगे, उसकी नीति भी अधूरी होगी।
विश्वकर्मा दिवस पर सबसे कठिन सवाल
हर साल विश्वकर्मा की पूजा होगी।
कारीगर के सम्मान में भाषण होंगे।
उसके हाथों की प्रशंसा होगी।
उसकी कला को भारतीय संस्कृति का गौरव बताया जाएगा।
लेकिन क्या उसके घर की आर्थिक स्थिति बदलेगी?
क्या उसका बेटा उसी पेशे में रहना चाहेगा?
क्या उसकी बेटी को अपने श्रम का उचित मूल्य मिलेगा?
क्या वह साहूकार के सामने मजबूर नहीं होगा?
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क्या बैंक उसे जोखिम नहीं बल्कि viable enterprise समझेगा?
क्या उसका उत्पाद गांव से निकलकर सीधे राष्ट्रीय और वैश्विक बाजार तक पहुंच पाएगा?
यही असली परीक्षा है।
कारीगर को माला नहीं, बाजार चाहिए।
उसे भाषण नहीं, उचित मूल्य चाहिए।
उसे केवल ऋण नहीं, आय चाहिए।
उसे दया नहीं, आर्थिक शक्ति चाहिए।
कर्जदार कारीगर—नीति की विफलता का आईना
कारीगर का कर्जदार होना किसी एक व्यक्ति की असफलता नहीं है।
यह उस आर्थिक व्यवस्था का आईना है जिसमें उत्पादन करने वाला व्यक्ति मूल्य श्रृंखला में सबसे कमजोर रह गया।
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यह उस नीति का आईना है जिसने कारीगर को प्रशिक्षित करने पर जोर दिया, लेकिन उसके उत्पाद की कीमत और बाजार शक्ति पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।
यह उस व्यवस्था का आईना है जिसमें कच्चा माल महंगा हो सकता है, मशीन महंगी हो सकती है, बिजली महंगी हो सकती है, परिवहन महंगा हो सकता है, लेकिन कारीगर अपनी वस्तु की कीमत मनमाने ढंग से नहीं बढ़ा सकता।
और यही कारण है कि कारीगर का कर्जदार होना भारतीय अर्थव्यवस्था की नीति के लिए अभिशाप है।
क्योंकि जिस अर्थव्यवस्था में निर्माता ही कर्ज में डूबता जाए, वहां विकास के आंकड़े सामाजिक सुरक्षा की गारंटी नहीं बन सकते।
भारत को कारीगर को बचाने के लिए केवल उसके पेशे को बचाने की जरूरत नहीं है।
उसे उसकी आर्थिक स्वतंत्रता वापस देनी होगी।
कारीगर को मजदूर बनने से रोकने का रास्ता उसके हाथ में केवल औजार देने से नहीं निकलेगा।
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रास्ता निकलेगा—
औजार + पूंजी + बाजार + उचित मूल्य + सामाजिक सुरक्षा + आर्थिक स्वामित्व
से।
विश्वकर्मा की असली प्रतिष्ठा तब होगी जब उसके हाथों से निकली वस्तु की कीमत तय करने में भी उसी हाथ की ताकत होगी।
वरना हम हर साल विश्वकर्मा की पूजा करते रहेंगे और उसी विश्वकर्मा के वंशज कर्ज की किश्त चुकाने के लिए मजदूरी करते रहेंगे।
यह केवल विडंबना नहीं है। यह भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सामने खड़ा हुआ एक कठोर नीति-सवाल है।
और इस सवाल का उत्तर भाषणों से नहीं—कारीगर की आय, कर्ज और आर्थिक स्वतंत्रता के आंकड़ों से देना होगा।
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