“जनता पर लाठी, सत्ता के आगे सलामी? पुलिस जनता की है या सरकार की—विजय के बयान ने छेड़ी बड़ी बहस”

पुलिस जनता की है या सत्ता की? लाठीचार्ज, हिरासत, राजनीतिक दबाव और पुलिस जवाबदेही पर विजय के बयान के बहाने उठते गंभीर सवाल।

“जनता पर लाठी, सत्ता के आगे सलामी? पुलिस जनता की है या सरकार की—विजय के बयान ने छेड़ी बड़ी बहस”

जब वर्दी कानून से ऊपर दिखने लगे

By- Ch. Sudhir Talyan

तमिलनाडु विधानसभा में मुख्यमंत्री विजय का यह कहना कि “पुलिस को पावर सेंटर नहीं बनना चाहिए” केवल एक राजनीतिक बयान नहीं है। यह उस सवाल को सामने लाता है जिसे भारतीय लोकतंत्र ने दशकों से टाल रखा है—पुलिस आखिर किसकी सेवा करती है? संविधान की, जनता की या सत्ता की?

लोकतंत्र में पुलिस का जन्म नागरिकों को डराने के लिए नहीं, उन्हें डर से मुक्त करने के लिए हुआ है। उसकी वर्दी कानून की ताकत का प्रतीक होनी चाहिए, सरकार की ताकत का नहीं। लेकिन जब किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन में नागरिकों की आवाज का जवाब लाठी से दिया जाता है, जब FIR सत्ता की सुविधा के हिसाब से दर्ज होने लगे, जब पुलिस कार्रवाई का पैमाना राजनीतिक पहचान से बदलता दिखाई दे, तब सवाल केवल कानून-व्यवस्था का नहीं रहता—लोकतंत्र की आत्मा पर सवाल खड़ा होता है।

भारत में पुलिस सुधार की मांग नई नहीं है। 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने Prakash Singh मामले में पुलिस को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करने और जवाबदेह बनाने के लिए महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। State Security Commission, Police Establishment Board, Police Complaints Authority, वरिष्ठ अधिकारियों के निश्चित कार्यकाल और पारदर्शी नियुक्ति जैसी व्यवस्थाओं का उद्देश्य यही था कि पुलिस सरकार की निजी संस्था न बन जाए।

लेकिन लगभग दो दशक बाद भी सवाल वहीं खड़ा है।

सरकार बदलती है, पुलिस पर राजनीतिक नियंत्रण का ढांचा नहीं बदलता।

यही भारतीय पुलिस व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना है।


लाठी कानून का विकल्प नहीं है

लोकतंत्र में प्रदर्शन अपराध नहीं है। असहमति राष्ट्र-विरोध नहीं है। सरकार की आलोचना शासन के खिलाफ साजिश नहीं है।

फिर भी देश के अलग-अलग हिस्सों में जब किसान, छात्र, कर्मचारी, बेरोजगार, महिलाएं या राजनीतिक कार्यकर्ता अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतरते हैं तो कई बार सबसे पहले दिखाई देती है—पुलिस की बैरिकेडिंग, उसके बाद धक्कामुक्की और फिर लाठी।

लाठीचार्ज किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अत्यंत गंभीर कदम होना चाहिए। भीड़ नियंत्रण और अंधाधुंध बल प्रयोग एक ही चीज नहीं हैं।

प्रश्न यह होना चाहिए कि प्रदर्शनकारी हिंसक थे या नहीं? पुलिस के पास बातचीत, चेतावनी, रास्ता बदलने, सीमित नियंत्रण और अन्य कम-बल वाले विकल्प उपलब्ध थे या नहीं? बल का इस्तेमाल वास्तव में आवश्यक और अनुपातिक था या केवल भीड़ को डराने का आसान तरीका?

जब इन सवालों की जगह सिर्फ यह कहा जाए कि “कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई करनी पड़ी”, तो लोकतंत्र की जवाबदेही खत्म होने लगती है।

क्योंकि कानून-व्यवस्था का अर्थ यह नहीं कि सत्ता के खिलाफ कोई आवाज सुनाई ही न दे।


BJP शासित राज्यों के सवाल से बचा नहीं जा सकता

यह कहना गलत होगा कि राजनीतिक दबाव में पुलिस केवल BJP शासित राज्यों में काम करती है। यह समस्या भारत की पुलिस व्यवस्था में लंबे समय से मौजूद है और अलग-अलग दलों की सरकारों के दौरान इसके उदाहरण मिलते रहे हैं।

लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

BJP शासित राज्यों में पुलिस कार्रवाई, हिरासत, कथित पुलिस बर्बरता और नागरिक अधिकारों से जुड़े अनेक मामले सामने आए हैं।

उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पुलिस निष्क्रियता, कथित अवैध हिरासत, रिश्वत और पुलिसकर्मियों द्वारा महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार जैसे मामलों पर हस्तक्षेप किया है। बुलंदशहर के खुर्जा क्षेत्र से जुड़े एक मामले में आयोग ने कथित पुलिस निष्क्रियता और पीड़िता को वरिष्ठ पुलिस अधिकारी तक पहुंचने से रोकने के आरोपों पर संज्ञान लिया। एक अन्य मामले में कथित अवैध हिरासत, रिश्वत की मांग और SHO पर महिला के यौन उत्पीड़न के आरोपों के संबंध में आयोग ने रिपोर्ट मांगी।

इन मामलों को पुलिस के हर अधिकारी के चरित्र का प्रमाण नहीं कहा जा सकता। लेकिन इन्हें नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।

जब देश की सर्वोच्च मानवाधिकार संस्था को पुलिस के खिलाफ बार-बार हस्तक्षेप करना पड़े, तो व्यवस्था से सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है।

गुजरात में भी NHRC ने राजकोट के एक पुलिस थाने में एक किशोर के कथित पुलिस उत्पीड़न के मामले में स्वतः संज्ञान लिया। मध्य प्रदेश में भी कथित पुलिस बर्बरता से जुड़ी मौतों के मामलों में NHRC ने रिपोर्ट मांगी।

ये दोषसिद्धियां नहीं हैं। ये जांच और आरोपों से जुड़े मामले हैं। लेकिन लोकतंत्र में चेतावनी के लिए अदालत का अंतिम फैसला आने तक इंतजार करना भी आवश्यक नहीं होता।

संस्थागत खतरे के संकेत समय रहते दिखाई देने चाहिए।


असली बीमारी: राजनीतिक पुलिस

पुलिस की सबसे बड़ी कमजोरी केवल भ्रष्टाचार या संसाधनों की कमी नहीं है।

सबसे बड़ी समस्या है—राजनीतिक निर्भरता।

एक पुलिस अधिकारी जानता है कि उसका तबादला कौन कर सकता है। किसके आदेश से पोस्टिंग मिल सकती है। किस अधिकारी का करियर तेजी से आगे बढ़ सकता है। कौन-सा मामला “संवेदनशील” है। किस मामले में तेजी दिखानी है और किसमें फाइल धीमी करनी है।

यही वह जगह है जहां संविधान की किताब और प्रशासन की वास्तविकता के बीच दूरी पैदा होती है।

यदि पुलिस अधिकारी को यह भय रहे कि कानून के अनुसार कार्रवाई करने से राजनीतिक संरक्षण समाप्त हो सकता है, तो वह कानून से ज्यादा सत्ता की ओर देख सकता है।

और फिर पुलिस जनता की संस्था नहीं रह जाती।

वह सत्ता और नागरिक के बीच खड़ी हुई शक्ति-संरचना बन जाती है।


FIR से लेकर लाठी तक—समानता कहां है?

कानून की नजर में हर नागरिक बराबर होना चाहिए।

लेकिन वास्तविक लोकतंत्र की परीक्षा संसद में नहीं, थाने के दरवाजे पर होती है।

एक गरीब व्यक्ति थाने पहुंचता है तो क्या उसकी शिकायत उसी गंभीरता से सुनी जाती है जिस गंभीरता से किसी प्रभावशाली व्यक्ति की शिकायत सुनी जाती है?

एक विपक्षी कार्यकर्ता प्रदर्शन करता है तो क्या पुलिस का व्यवहार वैसा ही होता है जैसा सत्ता समर्थक समूह के प्रदर्शन के समय?

किसान सड़क पर बैठता है तो क्या वह “कानून-व्यवस्था की समस्या” बन जाता है?

बेरोजगार युवा नौकरी मांगता है तो क्या उसकी आवाज को बैरिकेड और लाठी से जवाब दिया जाना चाहिए?

इन सवालों का उत्तर किसी पार्टी के घोषणापत्र में नहीं मिलेगा।

इनका उत्तर पुलिस थाने और सड़क पर दिखाई देता है।


प्रदर्शनकारी दुश्मन नहीं हैं

लोकतंत्र की सड़क पर खड़े प्रदर्शनकारी को अपराधी मान लेना लोकतंत्र को छोटा कर देता है।

प्रदर्शन सरकार के खिलाफ हो सकता है, लेकिन संविधान के खिलाफ नहीं।

किसान MSP मांग सकता है। कर्मचारी वेतन मांग सकता है। छात्र रोजगार मांग सकता है। महिला सुरक्षा मांग सकती है। नागरिक किसी कानून का विरोध कर सकता है।

सरकार का काम हर असहमति को कुचलना नहीं, उसे सुनना और कानून के दायरे में संभालना है।

पुलिस का काम भीड़ को हराना नहीं, कानून-व्यवस्था बनाए रखना है।

इसलिए लाठीचार्ज को प्रशासन की सफलता का प्रतीक बनाना खतरनाक है।

एक ऐसी सरकार जो अपने नागरिकों की आवाज सुनने के बजाय पुलिस की लाठी दिखाती है, वह कानून-व्यवस्था तो शायद संभाल ले, लेकिन लोकतांत्रिक विश्वास खो सकती है।


पुलिस की ताकत जरूरी है—लेकिन पुलिस की जवाबदेही उससे भी जरूरी

यह भी समझना होगा कि पुलिस को कमजोर करना समाधान नहीं है।

अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। हिंसक भीड़ को नियंत्रित करना चाहिए। महिलाओं, बच्चों और आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।

लेकिन पुलिस की शक्ति कानून से आती है, सरकार की इच्छा से नहीं।

इसीलिए Police Complaints Authority जैसी स्वतंत्र संस्थाओं की आवश्यकता है। पुलिस द्वारा किए गए कथित मानवाधिकार उल्लंघन की जांच केवल उसी पुलिस तंत्र के भीतर सीमित नहीं रहनी चाहिए।

वरना सवाल उठेगा:

पुलिस पुलिस की जांच करेगी तो पीड़ित न्याय के लिए कहां जाएगा?


सत्ता बदले, पुलिस संस्कृति क्यों नहीं बदलती?

भारत की राजनीति में सरकारें बदलती रही हैं। लेकिन सत्ता में आने वाला लगभग हर दल पुलिस व्यवस्था को अपने नियंत्रण में रखने का लाभ उठाना चाहता है।

यही असली संकट है।

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विपक्ष में रहते हुए राजनीतिक दल पुलिस की निष्पक्षता की मांग करते हैं। सत्ता में आते ही वही व्यवस्था उन्हें सुविधाजनक लगने लगती है।

इसलिए पुलिस सुधार किसी एक पार्टी के खिलाफ अभियान नहीं हो सकता।

यह लोकतंत्र बनाम राजनीतिक नियंत्रण का प्रश्न है।

यदि BJP सत्ता में है तो BJP से सवाल पूछना चाहिए।

जहां कांग्रेस या कोई क्षेत्रीय दल सत्ता में है, वहां उससे भी वही सवाल पूछे जाने चाहिए।

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लोकतंत्र में पुलिस की निष्ठा किसी झंडे से नहीं, संविधान से होनी चाहिए।


विजय का बयान इसलिए महत्वपूर्ण है

तमिलनाडु में विजय का “पुलिस को power centre नहीं बनना चाहिए” वाला कथन इस बहस को एक सरल लेकिन असाधारण रूप से महत्वपूर्ण प्रश्न देता है:

क्या पुलिस राज्य के भीतर एक और सत्ता-केंद्र बन रही है?

अगर पुलिस नागरिक को सुरक्षा देने के बजाय भय का अनुभव कराने लगे, अगर प्रदर्शनकारी अपनी मांग रखने से पहले पुलिस की लाठी के बारे में सोचने लगे, अगर FIR न्याय का पहला कदम होने के बजाय राजनीतिक शक्ति का औजार दिखाई देने लगे, तो सुधार केवल प्रशासनिक नहीं रहेगा।

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वह लोकतांत्रिक आवश्यकता बन जाएगा।


अब समय है पुलिस को सरकार से नहीं, संविधान से जोड़ने का

भारत को ऐसी पुलिस चाहिए जो मुख्यमंत्री बदलने पर अपना चरित्र न बदले।

ऐसी पुलिस चाहिए जो मंत्री के फोन और संविधान के बीच चुनाव करे तो संविधान चुने।

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ऐसी पुलिस चाहिए जो गरीब की शिकायत को VIP शिकायत जितना महत्व दे।

ऐसी पुलिस चाहिए जो प्रदर्शनकारी को दुश्मन नहीं, नागरिक समझे।

ऐसी पुलिस चाहिए जो अपराधी से कठोर हो, लेकिन कानून से बाहर न जाए।

और सबसे बढ़कर—

ऐसी पुलिस चाहिए जिसके सामने आम नागरिक को डर नहीं, भरोसा महसूस हो।

क्योंकि पुलिस की वर्दी का सम्मान उसकी लाठी से नहीं बढ़ता।

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उसका सम्मान तब बढ़ता है जब सबसे कमजोर नागरिक भी उसके सामने खड़े होकर कह सके—“मुझे न्याय मिलेगा।”

तमिलनाडु विधानसभा में उठी आवाज इसलिए केवल तमिलनाडु की आवाज नहीं है।

यह देश के हर उस नागरिक का सवाल है जिसने कभी थाने के बाहर इंतजार किया है, जिसने अपनी शिकायत दर्ज कराने के लिए संघर्ष किया है, जिसने किसी प्रदर्शन में पुलिस की बैरिकेडिंग देखी है, जिसने लाठीचार्ज का डर महसूस किया है या जिसने सत्ता और पुलिस के रिश्ते को अपनी आंखों से देखा है।

पुलिस लोकतंत्र की ढाल होनी चाहिए, सत्ता की तलवार नहीं।

और अगर पुलिस जनता से डर पैदा करने लगे, तो सवाल पुलिस से भी बड़ा हो जाता है—

फिर लोकतंत्र में जनता आखिर किससे सुरक्षा मांगे?yy

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