किसान को सस्ता बेचने पर मजबूर करके देश महंगा क्यों खरीद रहा है? खेत से बाजार तक छिपा है असली खेल
किसान महंगाई का दोषी नहीं है। जानिए खाद्य कीमतों के अलावा स्टील, सीमेंट, डीजल, ऊर्जा, टैक्स, परिवहन और सरकारी नीतियां महंगाई को कैसे प्रभावित करती हैं।
खेत से बाजार तक सरकार को जवाब देना होगा
By- Chaudhary Sudhir Talyan
भारत में महंगाई की बहस को लंबे समय से एक सुविधाजनक दिशा दी जाती रही है—जब खाद्य वस्तुओं की कीमत बढ़े तो निगाह किसान पर डाल दीजिए। प्याज महंगा हुआ तो किसान, टमाटर महंगा हुआ तो किसान, गेहूँ या दाल की कीमत बढ़ी तो किसान। यह नैरेटिव इतना बार दोहराया गया है कि महंगाई से परेशान आम नागरिक भी कई बार यह मानने लगता है कि उसकी जेब पर पड़ने वाले बोझ का मूल कारण खेत में खड़ा किसान है।
अब इस नैरेटिव को समाप्त करने का समय है।
किसान महंगाई पैदा करने वाला वर्ग नहीं है। वह स्वयं महंगाई का शिकार है। जिस किसान की फसल की कीमत बढ़ने पर उसे महंगाई का दोषी ठहराया जाता है, उसी किसान को डीजल, खाद, बीज, कीटनाशक, बिजली, मशीनरी, मजदूरी, सिंचाई, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य और निर्माण सामग्री के लिए लगातार अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। उसकी आय की तुलना उसकी लागत से कीजिए—तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है।
किसान की फसल की कीमत बढ़ना और किसान का अमीर हो जाना एक ही बात नहीं है।
यह बुनियादी अंतर यदि देश नहीं समझेगा तो महंगाई पर वास्तविक बहस कभी शुरू नहीं होगी।
महंगाई का ठीकरा किसान के सिर क्यों?
खाद्य वस्तुओं की कीमत आम नागरिक को प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देती है। बाजार में सब्जी महंगी होती है, घर का बजट तुरंत बिगड़ता है। लेकिन उस कीमत के पीछे पूरी supply chain दिखाई नहीं देती।
खेत से उपभोक्ता तक पहुंचने में कृषि उत्पाद कई चरणों से गुजरता है—संग्रहण, परिवहन, मंडी, थोक व्यापार, भंडारण, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और खुदरा बिक्री। प्रत्येक चरण में लागत और मार्जिन जुड़ते हैं।
RBI के कृषि supply-chain अध्ययन में विभिन्न कृषि उत्पादों के लिए किसान को मिलने वाली farm-gate कीमत और अंतिम retail कीमत के बीच महत्वपूर्ण अंतर पाया गया था। यानी उपभोक्ता द्वारा चुकाई गई कीमत का पूरा पैसा किसान के पास नहीं जाता।
फिर सवाल किसान से ही क्यों?
यदि किसी वस्तु का retail price दोगुना हो जाता है, तो यह मान लेना कि किसान की कीमत भी उसी अनुपात में दोगुनी हुई होगी, आर्थिक अज्ञानता है।
कई मामलों में किसान को खेत पर कम कीमत मिलती है और उपभोक्ता शहर में उसी उत्पाद के लिए कई गुना कीमत चुकाता है। यह अंतर किसके कारण पैदा हुआ—इसका जवाब supply chain, logistics, storage और market structure में तलाशना होगा।
किसान को कटघरे में खड़ा करके यह सवाल दबाया नहीं जा सकता।
भारत की पूरी महंगाई खाद्य महंगाई नहीं है
यहाँ आंकड़े सबसे बड़ा भ्रम तोड़ते हैं।
नई CPI-2024 संरचना में Food & Beverages का भार लगभग 36.75% है। इसका सीधा अर्थ है कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में लगभग दो-तिहाई भार खाद्य पदार्थों के बाहर की वस्तुओं और सेवाओं का है।
इसमें आवास, ऊर्जा, परिवहन, स्वास्थ्य, शिक्षा, कपड़े, संचार, घरेलू सामान, होटल-रेस्तरां और अन्य सेवाएँ शामिल हैं।
तो फिर जब महंगाई की चर्चा होती है तो पूरी बहस किसान और उसकी फसल तक क्यों सीमित कर दी जाती है?
यदि पेट्रोल-डीजल महंगा होता है तो उसका प्रभाव ट्रक से लेकर फैक्ट्री और खेत तक पड़ता है। परिवहन महंगा होता है। उत्पादन लागत बढ़ती है। निर्माण सामग्री महंगी होती है। बाजार में लगभग हर वस्तु की लागत संरचना प्रभावित होती है।
अगर बिजली महंगी है तो उद्योग और व्यापार की लागत बढ़ती है।
अगर स्टील महंगा है तो घर, दुकान, ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, पुल, सड़क, फैक्ट्री और मशीनरी—सब महंगे होते हैं।
अगर सीमेंट महंगा है तो मकान निर्माण से लेकर ग्रामीण infrastructure तक की लागत बढ़ती है।
लेकिन इन वस्तुओं की कीमतों पर चर्चा करते समय किसान को महंगाई का मुख्य आरोपी नहीं बनाया जाता। खाद्य कीमत बढ़ते ही दोष खेत तक पहुंच जाता है।
यह दोहरा मापदंड अब स्वीकार नहीं किया जा सकता।
स्टील और सीमेंट महंगे हों तो महंगाई नहीं?
भारत में परिवार की आर्थिक कठिनाई केवल रसोई से तय नहीं होती। घर बनाना है तो सीमेंट चाहिए, स्टील चाहिए, ईंट चाहिए, मजदूरी चाहिए। खेती करनी है तो ट्रैक्टर चाहिए, डीजल चाहिए, पाइप चाहिए, पंप चाहिए, मशीनरी चाहिए।
इनकी कीमतों में वृद्धि किसान और आम नागरिक दोनों की purchasing power को कम करती है।
एक किसान के लिए यह स्थिति और गंभीर है।
वह अपनी फसल बेचकर जिस आय की उम्मीद करता है, उसी आय से उसे अगली फसल की लागत भी निकालनी होती है। यदि कृषि लागत लगातार बढ़ती जाए और उसकी उपज की कीमत राजनीतिक दबाव में नियंत्रित रखी जाए, तो nominal price stability का लाभ उपभोक्ता को दिख सकता है, लेकिन उसका बिल किसान भरता है।
यह आर्थिक न्याय नहीं है।
फसल की कीमत लागत और महंगाई के अनुपात में बढ़ना न्यायसंगत है
किसान से यह उम्मीद करना कि उसकी फसल की कीमत वर्षों तक लगभग स्थिर रहे, जबकि बाकी अर्थव्यवस्था में मजदूरी, डीजल, मशीनरी, निर्माण सामग्री, शिक्षा और स्वास्थ्य की लागत बढ़ती रहे—यह बाजार नहीं, असंतुलित व्यवस्था है।
यदि उत्पादन लागत बढ़ती है तो उत्पाद का मूल्य भी बढ़ना स्वाभाविक है।
किसान की फसल कोई मुफ्त सार्वजनिक सेवा नहीं है।
किसान बीज खरीदता है। खाद खरीदता है। खेत तैयार करता है। सिंचाई करता है। मजदूर लगाता है। मशीनरी का इस्तेमाल करता है। मौसम का जोखिम उठाता है। बीमारी और कीट का जोखिम उठाता है। फसल कटने के बाद भी बाजार मूल्य का जोखिम उसके सामने रहता है।
इसके बावजूद यदि उसे लाभकारी मूल्य चाहिए तो उसे महंगाई का अपराधी बना दिया जाता है।
यह तर्क पलटना होगा।
जिस प्रकार कर्मचारी अपनी आय में महंगाई के अनुरूप वृद्धि चाहता है, उद्योग अपनी लागत के अनुसार उत्पाद का मूल्य तय करता है, सेवा क्षेत्र अपनी कीमतें बदलता है, उसी प्रकार किसान को भी अपनी उत्पादन लागत और सामान्य महंगाई के अनुरूप अपनी उपज का मूल्य पाने का अधिकार है।
किसान की कीमत को रोककर पूरे देश को सस्ता भोजन देने की नीति अंततः कृषि संकट पैदा कर सकती है।
किसान की फसल सस्ती होने से जनता हमेशा खुश नहीं होती
किसान के लिए कम कीमत का अर्थ है कम आय।
कम आय का अर्थ है:
कम निवेश।
कम निवेश का अर्थ है:
कम उत्पादकता।
कम उत्पादकता का अर्थ है:
भविष्य में supply shock का अधिक जोखिम।
और supply shock का अर्थ है:
भविष्य में और अधिक खाद्य महंगाई।
इसलिए दीर्घकाल में किसान की आय और उपभोक्ता के हित को एक-दूसरे का दुश्मन बनाना गलत नीति है।
सही नीति वह है जिसमें किसान को उचित farm-gate price मिले और उपभोक्ता को अनावश्यक supply-chain margins और लागत से राहत मिले।
किसान को दबाकर नहीं, बिचौलिया लागत, wastage, logistics और बाजार की अक्षमता घटाकर महंगाई नियंत्रित की जानी चाहिए।
सरकार को सही सवालों का सामना करना होगा
महंगाई पर जनता को यह पूछना चाहिए:
पेट्रोल-डीजल की कीमतों का उत्पादन और परिवहन लागत पर क्या प्रभाव पड़ा?
बिजली की कीमतों का उद्योग और कृषि पर क्या असर पड़ा?
स्टील और सीमेंट की कीमतें क्यों बढ़ीं?
कृषि input की कीमत कितनी बढ़ी?
किसान को फसल की कीमत में कितनी वृद्धि मिली?
उसी फसल की retail कीमत कितनी बढ़ी?
Farm-gate और retail price के बीच कितना अंतर है?
भंडारण में कितनी क्षमता है?
कितना कृषि उत्पादन wastage में चला जाता है?
आयात-निर्यात नीति कितनी स्थिर है?
क्या सरकार ने किसी वस्तु की कीमत नियंत्रित करने के लिए किसानों को आर्थिक नुकसान पहुँचाया?
इन सवालों के बिना महंगाई की बहस अधूरी है।
सबसे खतरनाक बात: महंगाई की गलत व्याख्या
लोकतंत्र में केवल महंगाई होना समस्या नहीं है। उससे भी बड़ी समस्या है महंगाई के कारणों की गलत पहचान।
यदि जनता को यह विश्वास करा दिया जाए कि उसकी महंगाई का कारण किसान है, तो जनता ऊर्जा नीति, कर नीति, आयात नीति, बाजार संरचना, corporate margins, logistics, housing और सेवाओं की कीमतों पर सवाल पूछना बंद कर सकती है।
यही किसी भी गलत economic narrative का सबसे खतरनाक परिणाम है।
जनता जिस दिशा में देखती है, राजनीतिक जवाबदेही भी उसी दिशा में जाती है।
यदि जनता प्याज के भाव को देखकर किसान से नाराज है लेकिन यह नहीं पूछ रही कि किसान को उस प्याज का कितना मूल्य मिला, तो असली सवाल गायब हो गया।
यदि जनता बाजार में ₹40 की सब्जी देखकर किसान को दोष देती है लेकिन यह नहीं पूछती कि खेत से निकलते समय उसका भाव क्या था, तो कीमत की पूरी कहानी छिप जाती है।
किसान और उपभोक्ता को आमने-सामने खड़ा करना बंद होना चाहिए
भारत का किसान और भारत का उपभोक्ता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
एक ही व्यक्ति कई बार दोनों है।
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ग्रामीण परिवार किसान भी है और उपभोक्ता भी। किसान अपना गेहूँ बेचता है और फिर वही किसान स्कूल की फीस, दवा, कपड़े, पेट्रोल, बिजली और निर्माण सामग्री खरीदता है।
इसलिए किसान के खिलाफ consumer बनाम farmer की राजनीति खड़ी करना दोनों के हितों के विरुद्ध है।
असल संघर्ष किसान और उपभोक्ता के बीच नहीं होना चाहिए।
असल सवाल होना चाहिए:
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उत्पादन से उपभोग तक कीमत का कितना हिस्सा किसके पास जा रहा है?
महंगाई का स्थायी समाधान क्या है?
सरकार यदि वास्तव में महंगाई नियंत्रित करना चाहती है तो उसे केवल किसान की कीमत पर नजर रखने के बजाय पूरी अर्थव्यवस्था की price chain पर निगरानी रखनी होगी।
कृषि में storage बढ़ाना होगा।
Cold chain विकसित करनी होगी।
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गांवों के पास processing units बनाने होंगे।
Transport और logistics cost घटानी होगी।
Market competition बढ़ानी होगी।
Price information को पारदर्शी बनाना होगा।
आयात-निर्यात नीति को अचानक बदलने से बचना होगा।
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ऊर्जा लागत पर व्यापक नीति बनानी होगी।
निर्माण सामग्री की कीमतों पर competition और supply की स्थिति देखनी होगी।
और सबसे महत्वपूर्ण—किसान को उसकी वास्तविक लागत से नीचे बेचने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
अब नैरेटिव बदलना होगा
किसान को महंगाई का villain बनाने का दौर खत्म होना चाहिए।
जब किसान की फसल की कीमत लागत और सामान्य महंगाई के अनुरूप बढ़ती है, तो उसे अपराध नहीं कहा जा सकता। यह उसके श्रम और पूंजी का आर्थिक मूल्य है।
यदि सरकार को उपभोक्ता के लिए खाद्य वस्तुएँ सस्ती रखनी हैं तो उसका समाधान किसान की आय कुचलना नहीं हो सकता।
सरकार को अपनी नीतिगत क्षमता का इस्तेमाल करना होगा।
किसान की कीमत दबाना सबसे आसान रास्ता है।
लेकिन आसान रास्ता हमेशा सही रास्ता नहीं होता।
महंगाई को नियंत्रित करने के लिए किसान को कमजोर करना नीति नहीं, जिम्मेदारी से बचने का तरीका बन सकता है।
भारत को अब यह तय करना होगा कि वह महंगाई की वास्तविक अर्थव्यवस्था पर बहस करेगा या सुविधाजनक आरोपों पर।
जनता को अब पूछना होगा:
किसान को कितनी कीमत मिली?
उपभोक्ता ने कितनी कीमत चुकाई?
बीच का अंतर किसने लिया?
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ऊर्जा और परिवहन लागत कितनी बढ़ी?
स्टील और सीमेंट कितने महंगे हुए?
सरकारी कर और शुल्क कितने हैं?
आयात-निर्यात नीति का कीमतों पर क्या प्रभाव पड़ा?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या सरकार महंगाई की वास्तविक वजहों से लड़ रही है या केवल किसान को दोष देकर अपनी नीतिगत विफलताओं से ध्यान हटाने की कोशिश कर रही है?
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इस सवाल से बचना अब संभव नहीं होना चाहिए।
क्योंकि किसान महंगाई का स्रोत नहीं है।
वह उस महंगाई से लड़ रहा है जो उसकी खेती की लागत बढ़ाती है, उसकी आय को खाती है और उसके परिवार की क्रय शक्ति को कम करती है।
इसलिए भारत को एक नया आर्थिक सिद्धांत स्वीकार करना होगा:
उचित किसान मूल्य महंगाई का अपराध नहीं है। किसान की लागत और आय के बीच असंतुलन ही वास्तविक समस्या है।
और जब तक देश इस अंतर को नहीं समझेगा, तब तक महंगाई पर बहस होती रहेगी—लेकिन सही सवाल पूछे बिना।
एक सही सवाल समस्या को समाप्त कर देता हैl
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