मनरेगा का पैसा कहाँ अटका? गांव के मजदूर की जेब तक पहुंचते-पहुंचते व्यवस्था क्यों दम तोड़ देती है

मनरेगा का पैसा मजदूरों तक पहुंचने में क्यों अटकता है? रोजगार, मजदूरी भुगतान, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक विफलता और जमीनी हकीकत की पड़ताल करता यह लेख गांव के श्रमिकों की आवाज और सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल उठाता है।

मनरेगा का पैसा कहाँ अटका? गांव के मजदूर की जेब तक पहुंचते-पहुंचते व्यवस्था क्यों दम तोड़ देती है

By- Chaudhary Sudhir Talyan

सुबह का अंधेरा अभी पूरी तरह छंटा नहीं है। गांव के बाहर कच्ची सड़क पर मजदूरों की एक छोटी-सी कतार निकलती है। किसी के हाथ में फावड़ा है, किसी के पास तसला। किसी ने बच्चे को पड़ोसी के भरोसे छोड़ा है, किसी ने घर में चूल्हे के लिए थोड़ा अनाज बचाकर रखा है। उन्हें पता है कि आज काम मिलेगा तो आज की मजदूरी का हिसाब बनेगा। मजदूरी का मतलब उनके लिए सरकार की फाइल में दर्ज कोई संख्या नहीं है। वह घर का राशन है, बच्चे की फीस है, दवा है, बिजली का बिल है और कभी-कभी साहूकार से बचने की आखिरी कोशिश है।

दिन बीतता है। काम पूरा होता है। हाजिरी लगती है। मजदूर घर लौट आता है।

फिर शुरू होता है असली इंतजार।

“पैसा कब आएगा?”

यही वह सवाल है जहां भारत की ग्रामीण रोजगार व्यवस्था का चमकदार डिजिटल चेहरा उतर जाता है और प्रशासनिक व्यवस्था का कठोर, बेरहम चेहरा सामने आता है।

सरकार के रिकॉर्ड में काम हो चुका होता है। भुगतान प्रक्रिया शुरू हो चुकी होती है। सिस्टम में transaction दिखाई देता है। लेकिन मजदूर के खाते में पैसा नहीं होता।

यह सिर्फ भुगतान में देरी नहीं है। गरीब मजदूर के लिए यह आय पर प्रशासनिक कब्जा है।

कागज पर रोजगार, जमीन पर इंतजार

मनरेगा की मूल भावना सरल थी—ग्रामीण परिवार काम मांगे और सरकार रोजगार उपलब्ध कराए। काम करने के बाद मजदूरी समय पर मिले। यदि रोजगार नहीं दिया गया तो कानून के मुताबिक बेरोजगारी भत्ते का प्रावधान हो।

लेकिन वर्षों के ऑडिट और जमीनी जांचों ने दिखाया है कि समस्या केवल पैसा आवंटित करने की नहीं है। समस्या उस पूरी मशीनरी की है जो बजट को मजदूर की मजदूरी में बदलती है।

CAG की विभिन्न performance audits में रोजगार की मांग दर्ज करने, मजदूरी भुगतान, failed transactions, social audit और grievance redressal में गंभीर कमियां सामने आई हैं।

उत्तराखंड की एक CAG performance audit में 2019-20 से 2023-24 के दौरान जांचे गए रिकॉर्ड में ₹269.27 करोड़ की मजदूरी muster roll बंद होने के 16 से 90 दिन बाद भुगतान होने का उल्लेख है। ₹39.24 करोड़ का भुगतान तीन महीने से अधिक समय बाद हुआ। इसी audit में हजारों transactions के लंबे समय तक लंबित रहने की बात सामने आई।

ये आंकड़े किसी सरकारी भाषण के नहीं हैं। ये सरकारी व्यवस्था की जांच करने वाली संवैधानिक संस्था के audit findings हैं।

सवाल इसलिए और बड़ा हो जाता है—

जब काम मजदूर ने समय पर किया, तो उसकी मजदूरी समय पर क्यों नहीं मिली?

गरीब के पैसे पर इतनी धीमी व्यवस्था क्यों?

एक मजदूर की मजदूरी का रास्ता लंबा है।

काम की मांग से शुरुआत होती है। फिर muster roll बनता है। हाजिरी दर्ज होती है। काम का measurement होता है। wage list तैयार होती है। Fund Transfer Order बनता है। उसके बाद वित्तीय प्रणाली, बैंक और DBT की प्रक्रिया आती है।

कागज पर यह आधुनिक प्रशासन है।

लेकिन मजदूर के नजरिए से यह एक लंबी सुरंग है, जिसके दूसरे छोर पर उसका पैसा खड़ा है।

इस सुरंग में कहीं भी फाइल रुकी, डेटा गलत हुआ, transaction fail हुआ, account mapping में समस्या आई या प्रशासनिक स्वीकृति देर से हुई—मजदूर का भुगतान अटक गया।

सरकार के लिए यह “process issue” हो सकता है।

मजदूर के लिए यह भूख का issue है।

यही फर्क शासन और नागरिक के अनुभव के बीच सबसे बड़ा अंतर पैदा करता है।

डिजिटल इंडिया, लेकिन मजदूर को पैसा कब मिलेगा?

सरकार ने मनरेगा को लगातार डिजिटल बनाने पर जोर दिया। MIS, DBT, FTO, attendance monitoring, geo-tagging और online records जैसी व्यवस्थाएं विकसित की गईं।

तकनीक पारदर्शिता का साधन बन सकती है।

लेकिन तकनीक जवाबदेही का विकल्प नहीं है।

यदि मजदूर के पास स्मार्टफोन नहीं है, उसे अंग्रेजी या तकनीकी भाषा समझ नहीं आती, पंचायत कार्यालय में जानकारी नहीं मिलती और payment failure का कारण कोई स्पष्ट नहीं करता, तो उसके लिए डिजिटल व्यवस्था का वास्तविक अर्थ क्या बचता है?

CAG audits में failed transactions और उनके regeneration में लंबित मामलों का उल्लेख हुआ है। ऐसे मामलों में सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि लाभार्थी को साफ-साफ पता चले कि भुगतान किस चरण में है और समस्या क्या है।

यह कोई विशेष सुविधा नहीं है।

यह नागरिक का अधिकार है।

गरीब आदमी को अपने ही पैसे की खोज में पंचायत से ब्लॉक और ब्लॉक से बैंक तक भटकना पड़े, तो डिजिटल शासन की सफलता का दावा अधूरा है।

सबसे खतरनाक समस्या—मजदूर की मांग का रिकॉर्ड ही कमजोर हो जाए

मनरेगा में रोजगार की मांग केवल कागज नहीं है। यही उस परिवार का कानूनी दावा बनाती है।

लेकिन CAG audit में ऐसे मामलों की पहचान हुई जहां रोजगार मांगने वाले लाभार्थियों को dated receipt नहीं मिली। इसका सीधा असर accountability पर पड़ता है।

अगर आवेदन की तारीख का प्रमाण नहीं है, तो यह साबित करना कठिन हो जाता है कि रोजगार कब मांगा गया।

और जब मांग का रिकॉर्ड कमजोर हो जाता है, तो 15 दिन की रोजगार गारंटी और बेरोजगारी भत्ते जैसे अधिकार भी कमजोर पड़ते हैं।

यानी व्यवस्था का सबसे पहला दरवाजा ही कमजोर कर दिया जाए तो आगे की पूरी कानूनी प्रक्रिया कागज पर मजबूत दिखते हुए भी जमीन पर कमजोर हो सकती है।

बेरोजगारी भत्ता: अधिकार या सरकारी फाइल?

मनरेगा का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत था—काम नहीं मिला तो निर्धारित परिस्थितियों में बेरोजगारी भत्ता।

लेकिन audit findings में unemployment allowance के भुगतान में कमी और pendency सामने आई है।

यह सवाल किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं, बल्कि शासन की बुनियादी जवाबदेही के पक्ष में है:

यदि सरकार रोजगार देने में असफल रही, तो कानून में दिए गए वैकल्पिक अधिकार का भुगतान किसने सुनिश्चित किया?

गरीब आदमी को काम भी नहीं मिला और भत्ता भी नहीं मिला, तो कानून उसके लिए किस हद तक वास्तविक रहा?

कानून की किताब में अधिकार होना और गांव में उस अधिकार का मिलना—दो अलग चीजें हैं।

भ्रष्टाचार केवल चोरी का नाम नहीं है

ग्रामीण योजनाओं पर चर्चा होते ही भ्रष्टाचार का अर्थ अक्सर घोटाला, फर्जीवाड़ा या पैसा चोरी करना समझ लिया जाता है।

लेकिन शासन की विफलता इससे कहीं व्यापक है।

यदि मजदूर ने काम किया और भुगतान महीनों देर से हुआ, तो वह भी प्रशासनिक अन्याय है।

यदि मजदूर को आवेदन की रसीद नहीं मिली, तो transparency कमजोर हुई।

यदि social audit नहीं हुआ, तो जनता की निगरानी कमजोर हुई।

यदि शिकायत महीनों लंबित रही, तो accountability कमजोर हुई।

यदि जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई हुई लेकिन वसूली नहीं हुई, तो deterrence कमजोर हुआ।

इसलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई केवल “चोरी पकड़ने” तक सीमित नहीं हो सकती।

भ्रष्टाचार वह पूरा तंत्र भी है जिसमें जिम्मेदारी धुंधली होती जाती है और नुकसान हमेशा कमजोर आदमी का होता है।

Social audit कमजोर हुआ तो गांव की आवाज भी कमजोर हुई

मनरेगा की एक बड़ी ताकत social audit थी।

ग्रामसभा यह पूछ सकती थी कि किसे काम मिला, कितने दिन मिला, कितना भुगतान हुआ, कौन-सा काम हुआ और कितना खर्च हुआ।

लेकिन CAG की audit findings में social audit coverage और observations के follow-up में गंभीर कमियां सामने आई हैं। एक audit में social audit coverage में भारी कमी दर्ज की गई।

यह सिर्फ प्रशासनिक आंकड़ा नहीं है।

ग्रामसभा लोकतांत्रिक निगरानी का सबसे निचला और सबसे सीधा मंच है।

जब वह कमजोर होती है, तो पंचायत के गरीब मजदूर की आवाज भी कमजोर होती है।

और जब मजदूर की आवाज कमजोर होती है, तो सरकारी रिकॉर्ड को चुनौती देने वाला कोई नहीं बचता।

शिकायत करने वाला गरीब कितनी दूर जाएगा?

कल्पना कीजिए—एक मजदूर ने काम किया। भुगतान नहीं आया। वह पंचायत गया। वहां कहा गया, “ऑनलाइन देखिए।”

वह ऑनलाइन नहीं देख सकता।

वह बैंक गया। बैंक ने कहा, “पंचायत से पूछिए।”

वह पंचायत लौटा। कहा गया, “FTO हो चुका है।”

वह ब्लॉक गया। वहां कहा गया, “payment process में है।”

महीना गुजर गया।

फिर दूसरा महीना।

मजदूर के लिए यह सिर्फ प्रशासनिक चक्कर नहीं है। हर चक्कर में मजदूरी का एक हिस्सा यात्रा, समय और उम्मीद में खर्च होता है।

यही वह जगह है जहां governance की असली परीक्षा होती है।

जिस व्यवस्था को गरीब की मदद करने के लिए बनाया गया था, वही व्यवस्था गरीब को अपने पैसे के लिए भटकाने लगे तो शासन की सफलता का दावा खोखला हो जाता है।

नया ढांचा, पुरानी चुनौती

1 जुलाई 2026 से ग्रामीण रोजगार व्यवस्था में बड़ा संस्थागत बदलाव हुआ और VB-G RAM G व्यवस्था लागू हुई। इसमें रोजगार गारंटी को 100 से बढ़ाकर 125 दिन किया गया। केंद्र ने 2026-27 के लिए ₹95,692.31 करोड़ का बजटीय प्रावधान बताया है।

सरकार ने नई व्यवस्था में समय पर भुगतान, DBT और अन्य प्रशासनिक सुधारों पर जोर दिया है।

यह एक बड़ा बदलाव है।

लेकिन नया नाम, नया पोर्टल या नया payment architecture अपने आप पुरानी समस्याओं को खत्म नहीं करता।

नई व्यवस्था की असली परीक्षा किसी मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति में नहीं होगी।

https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra

उसकी परीक्षा होगी—

गांव के उस मजदूर के बैंक खाते में, जिसने आज सुबह काम किया है।

सरकार को जवाब देना होगा—पैसा किस चरण पर रुका?

अब समय आ गया है कि रोजगार योजनाओं की सफलता का पैमाना केवल “कितना खर्च हुआ” न हो।

https://politicsinsightindia.com/mmdr-amendment-bill-2026-farmer-land-acquisition-partnership

हर पंचायत के लिए सार्वजनिक रूप से यह दिखना चाहिए:

  • कितने परिवारों ने रोजगार मांगा?
  • कितनों को रोजगार मिला?
  • कितने दिनों का रोजगार मिला?
  • https://politicsinsightindia.com/mehangai-ka-dosh-kisan-par-kyon
  • कितने भुगतान pending हैं?
  • कितने transactions failed हैं?
  • कितने FTO pending हैं?
  • कितनी मजदूरी delayed हुई?
  • कितने मजदूरों को compensation मिला?
  • कितने बेरोजगारी भत्ते के दावे बने?
  • https://politicsinsightindia.com/uttar-pradesh-health-system-seriously-ill-government-hospitals-common-man
  • कितने भुगतान हुए?
  • कितनी शिकायतें लंबित हैं?
  • social audit में कितनी आपत्तियां उठीं?
  • कितनी आपत्तियों पर कार्रवाई हुई?
  • कितनी राशि वास्तव में recover हुई?

https://politicsinsightindia.com/vishwakarma-se-karjdar-tak-karigar-ko-mazdoor-banati-arthvyavastha-ka-sach

जब ये आंकड़े पंचायत स्तर पर सार्वजनिक होंगे, तभी “पारदर्शिता” शब्द का अर्थ निकलेगा।

आखिरी सवाल मजदूर का है

भारत में योजनाएं बहुत हैं। बजट बड़े हैं। पोर्टल हैं। ऐप हैं। dashboard हैं। प्रेस विज्ञप्तियां हैं।

लेकिन लोकतंत्र की असली कसौटी इन सबके बाहर खड़ी है।

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वह कसौटी है गांव का मजदूर।

वह पूछता है:

“मैंने काम किया। मेरी मजदूरी कहां है?”

इस सवाल का जवाब किसी भाषण, विज्ञापन या सरकारी उपलब्धि पुस्तिका से नहीं दिया जा सकता।

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जवाब उसके बैंक खाते में दिखाई देना चाहिए।

मनरेगा हो या नई ग्रामीण रोजगार व्यवस्था—सरकार को यह समझना होगा कि मजदूर की मजदूरी कोई सरकारी कृपा नहीं है। वह उसके श्रम का प्रतिफल है। उसे महीनों रोकना केवल प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि उस परिवार की आर्थिक सुरक्षा को कमजोर करना है।

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भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कार्रवाई जरूरी है। लेकिन उससे भी पहले जरूरी है कि ऐसी व्यवस्था बने जिसमें पैसा गायब होने, फाइल में अटकने, transaction में फंसने या जिम्मेदारी एक विभाग से दूसरे विभाग पर डालने की गुंजाइश न्यूनतम हो।

सरकार का काम केवल पैसा मंजूर करना नहीं है।

सरकार का काम यह सुनिश्चित करना है कि मजदूर का पसीना मजदूरी में बदले—और वह मजदूरी समय पर उसके हाथ तक पहुंचे।

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क्योंकि जिस दिन एक गरीब मजदूर को अपने ही मेहनत के पैसे के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे, उसी दिन ग्रामीण रोजगार योजना सचमुच “गारंटी” कहलाने के योग्य होगी।

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