“ग्रेट निकोबार पर घमासान: UN की आपत्ति, भारत का पलटवार और आदिवासियों के बीच फंसा विकास का सबसे बड़ा सवाल”
ग्रेट निकोबार परियोजना पर UN-CERD की आपत्ति और भारत के तीखे पलटवार के बीच उठते सवाल—राष्ट्रीय सुरक्षा, पर्यावरण, जंगल, आदिवासी अधिकार और विकास के मॉडल की गहन पड़ताल।
By- Ch. Sudhir Taliyan
UN-CERD की सख्त टिप्पणियों पर भारत का पलटवार—क्या राष्ट्रीय हित और आदिवासी अधिकारों के बीच कोई तीसरा रास्ता संभव है?
भारत और संयुक्त राष्ट्र की Committee on the Elimination of Racial Discrimination (UN-CERD) के बीच Great Nicobar परियोजना को लेकर उठा विवाद अब केवल एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट और सरकार की प्रतिक्रिया का मामला नहीं रह गया है। यह बहस भारत के विकास मॉडल, पर्यावरणीय न्याय, आदिवासी अधिकारों, राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक जवाबदेही से जुड़ा एक बड़ा सवाल बन चुकी है।
25 अगस्त 2026 को UN-CERD ने भारत से संबंधित अपनी concluding observations जारी करते हुए Great Nicobar में प्रस्तावित बड़े infrastructure projects पर गंभीर चिंता जताई। समिति ने independent environmental, economic, social, cultural और spiritual impact assessments पूरी होने तक परियोजनाओं को रोकने की सिफारिश की।
अगले ही दिन भारत के विदेश मंत्रालय ने इस रिपोर्ट पर तीखी प्रतिक्रिया दी और कुछ टिप्पणियों को राजनीतिक रूप से प्रेरित तथा दुर्भावनापूर्ण बताया। सरकार का पक्ष है कि भारत में आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा मौजूद है तथा Great Nicobar परियोजना रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
लेकिन इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है—क्या राष्ट्रीय हित और आदिवासी अधिकार एक-दूसरे के विरोधी हैं?
मेरी राय में नहीं। असली समस्या तब पैदा होती है जब विकास के नाम पर सवाल पूछने की गुंजाइश कम हो जाए
Great Nicobar आखिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
Great Nicobar भारत के सबसे दक्षिणी द्वीपों में से एक है और इसकी भौगोलिक स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है। यह अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों के निकट स्थित है।
भारत सरकार यहां एक विशाल integrated infrastructure project विकसित करना चाहती है। इसके प्रमुख हिस्सों में international container transshipment terminal, airport, power plant और township शामिल हैं।
सरकार के अनुसार यह परियोजना भारत को अंतरराष्ट्रीय shipping और transshipment के क्षेत्र में मजबूत बनाएगी। विदेशी ports पर निर्भरता घटेगी, logistics infrastructure मजबूत होगा और Indian Ocean क्षेत्र में भारत की strategic presence बढ़ेगी।
राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से इस तर्क को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
भारत जिस समुद्री क्षेत्र में स्थित है, वहां global trade के साथ-साथ geopolitical competition भी बढ़ रही है। ऐसे समय में strategic islands को केवल पर्यटन या ecological reserve के रूप में देखना भी पर्याप्त नहीं है।
लेकिन सवाल यह है कि रणनीतिक महत्व के बावजूद क्या परियोजना की कीमत तय करने का अधिकार केवल सरकार के पास होना चाहिए?
यहीं से लोकतांत्रिक बहस शुरू होती है।
130 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा forest land का सवाल
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक परियोजना के लिए लगभग 166.10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र प्रस्तावित है, जिसमें करीब 130.75 वर्ग किलोमीटर forest land शामिल है।
सरकार का कहना है कि निर्धारित safeguards, compensatory afforestation और अन्य environmental measures के माध्यम से ecological नुकसान को नियंत्रित किया जाएगा।
लेकिन Great Nicobar कोई सामान्य भूभाग नहीं है।
द्वीपीय ecosystem अपनी प्रकृति में बेहद संवेदनशील होते हैं। यहां जंगल, समुद्री तट, coral ecosystems, wildlife और स्थानीय समुदायों का जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा होता है।
किसी mainland project में जंगल काटकर कहीं और plantation करना जितना सरल दिखाई देता है, island ecosystem में उसकी ecological equivalence उतनी सरल नहीं होती।
एक mature natural forest केवल पेड़ों की संख्या नहीं है। उसमें मिट्टी, जलचक्र, biodiversity, insects, birds, microorganisms और स्थानीय climatic systems शामिल होते हैं।
इसलिए सरकार से सवाल पूछना anti-development होना नहीं है।
यह सवाल पूछना public interest है।
आदिवासी अधिकार सबसे संवेदनशील प्रश्न
Great Nicobar में Shompen और Nicobarese समुदाय रहते हैं। ये समुदाय अपनी विशिष्ट संस्कृति और जीवन-पद्धति के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
सरकार का कहना है कि परियोजना से tribal population को विस्थापित नहीं किया जाएगा और tribal reserve के संबंध में net area बढ़ाने के उपाय किए गए हैं।
सरकार यह भी कहती है कि statutory procedures का पालन किया गया है और tribal welfare को project planning में शामिल किया गया है।
यह सरकार का महत्वपूर्ण पक्ष है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
लेकिन आदिवासी अधिकार केवल जमीन के कागज का सवाल नहीं है।
किसी समुदाय के लिए जंगल केवल “forest land” नहीं होता। वह भोजन, संस्कृति, परंपरा, धार्मिक विश्वास, औषधीय ज्ञान और सामुदायिक पहचान का आधार हो सकता है।
इसीलिए UN-CERD ने environmental impact के साथ-साथ social, cultural और spiritual impact का भी सवाल उठाया है।
यहां सरकार और आलोचकों के बीच वास्तविक बहस होनी चाहिए।
Gram Sabha और consent पर सवाल क्यों महत्वपूर्ण हैं?
Great Nicobar परियोजना से जुड़े कानूनी विवादों में Gram Sabha की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक बन गई है।
Forest Rights Act, 2006 ने आदिवासी और forest-dwelling communities के अधिकारों को एक महत्वपूर्ण कानूनी आधार दिया है। इसके तहत community forest rights और traditional rights को मान्यता देने की व्यवस्था है।
इसीलिए अगर किसी परियोजना के लिए यह कहा जाता है कि स्थानीय समुदाय की सहमति या consultation प्राप्त कर ली गई है, तो अगला सवाल स्वाभाविक है:
किसकी सहमति? किस प्रक्रिया से? कितनी भागीदारी के साथ?
Great Nicobar से संबंधित न्यायिक कार्यवाहियों में Gram Sabha resolutions, participation और quorum को लेकर सवाल उठे हैं।
यदि ये आरोप सही साबित होते हैं तो मामला बेहद गंभीर होगा।
क्योंकि किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर होना और किसी समुदाय की वास्तविक, स्वतंत्र और informed participation होना एक ही बात नहीं है।
लोकतंत्र में consent केवल कागज पर नहीं, प्रक्रिया में दिखाई देना चाहिए।
अदालतों की भूमिका ने विवाद को और महत्वपूर्ण बनाया
यह भी समझना जरूरी है कि Great Nicobar project को भारतीय न्यायपालिका ने पूरी तरह अवैध घोषित नहीं किया है।
National Green Tribunal ने environmental clearance से संबंधित चुनौतियों पर हस्तक्षेप नहीं किया और environmental safeguards के strict compliance पर जोर दिया।
दूसरी तरफ Calcutta High Court में forest rights और consultation से संबंधित सवालों पर judicial scrutiny जारी है।
इसका अर्थ साफ है:
भारत के भीतर भी इस परियोजना पर सभी सवाल समाप्त नहीं हुए हैं।
इसलिए UN-CERD की टिप्पणी को भारत की पूरी न्यायिक व्यवस्था के ऊपर अंतिम फैसला मानना गलत होगा।
उसी तरह यह कहना भी गलत होगा कि क्योंकि भारत में environmental clearance मिल चुकी है, इसलिए सभी environmental और tribal-rights questions स्वतः समाप्त हो गए।
कानून में clearance अंतिम शब्द हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र में public accountability उससे आगे जाती है।
क्या UN-CERD को यह recommendation करनी चाहिए थी?
यहां भारत की आपत्ति को भी गंभीरता से समझना होगा।
UN-CERD का मूल mandate racial discrimination के उन्मूलन से जुड़ा है। भारत का तर्क है कि committee ने कुछ मुद्दों पर अपने mandate की सीमाओं से आगे जाकर टिप्पणी की है।
भारत लंबे समय से caste और race के बीच अंतर पर जोर देता रहा है। भारतीय संविधान caste-based discrimination को अलग संवैधानिक संदर्भ में देखता है।
CERD की अपनी interpretation में “descent” आधारित discrimination के दायरे में caste-related discrimination को भी शामिल किया गया है।
इसलिए यह केवल Great Nicobar की बहस नहीं है। यह international treaty bodies और sovereign states के बीच अधिकार-क्षेत्र की पुरानी बहस का हिस्सा भी है।
भारत का यह कहना उचित है कि international institutions को किसी देश की जटिल सामाजिक और संवैधानिक परिस्थितियों को sweeping generalisations के आधार पर नहीं देखना चाहिए।
लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है।
अगर किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था को किसी परियोजना में indigenous rights या discrimination का genuine concern दिखाई देता है, तो केवल यह कह देना कि “यह हमारी sovereignty का मामला है” उस concern का जवाब नहीं है।
UN की recommendation आदेश नहीं है
यह distinction जनता के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
UN-CERD कोई domestic court नहीं है। उसकी concluding observations भारत पर उसी प्रकार बाध्यकारी judicial order नहीं हैं जैसे Supreme Court या किसी सक्षम भारतीय अदालत का फैसला।
इसलिए यह headline कि “UN ने भारत को Great Nicobar project रोकने का आदेश दिया” कानूनी रूप से भ्रामक होगी।
सही बात यह है कि UN-CERD ने परियोजनाओं को independent impact assessments पूरी होने तक suspend करने की recommendation की है।
भारत उस recommendation को स्वीकार करे या उस पर अपनी औपचारिक प्रतिक्रिया दे—यह diplomatic और policy process का हिस्सा है।
लेकिन recommendation का non-binding होना यह साबित नहीं करता कि उसमें उठाए गए सभी सवाल बेकार हैं।
असली समस्या: क्या development का मतलब mega-project ही है?
भारत के विकास मॉडल पर यह प्रश्न अब गंभीरता से पूछना चाहिए।
क्या किसी दूरस्थ और संवेदनशील आदिवासी क्षेत्र का विकास हमेशा बड़े airport, port, township और industrial infrastructure के माध्यम से ही होगा?
या development का एक दूसरा रास्ता भी हो सकता है—
अच्छे अस्पताल,
बेहतर communication,
स्थानीय रोजगार,
शिक्षा,
पेयजल,
स्थानीय transport,
sustainable tourism,
forest-based livelihoods,
community-led economic development।
यदि Great Nicobar के लोग वास्तव में infrastructure चाहते हैं, तो सबसे पहले यह पूछा जाना चाहिए कि उन्हें किस प्रकार का infrastructure चाहिए।
Development ऊपर से तय किया गया package नहीं होना चाहिए।
विकास का पहला सिद्धांत होना चाहिए:
जिसके जीवन पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ेगा, उसकी आवाज सबसे पहले सुनी जाए।
राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम पर्यावरण—यह झूठा द्वंद्व है
अक्सर भारत में environmental concerns उठते ही उन्हें development विरोधी और national security concerns उठते ही हर सवाल को देश-विरोधी मान लेने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।
दोनों दृष्टिकोण लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह हैं।
एक मजबूत राष्ट्र वही है जो अपनी सुरक्षा के लिए infrastructure बनाते समय environmental sustainability और नागरिक अधिकारों की रक्षा भी कर सके।
Great Nicobar भारत के लिए strategic asset है—यह मानने में कोई समस्या नहीं।
लेकिन strategic asset को sustainable asset बनाना भी राष्ट्रीय हित ही है।
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
अगर आज project बन गया और आने वाले दशकों में ecological damage irreversible साबित हुआ, तो उसकी कीमत भी भारत को ही चुकानी होगी।
सरकार को क्या करना चाहिए?
मेरी राय में सरकार को UN-CERD के शब्दों से राजनीतिक टकराव करने के बजाय उसके substantive questions का जवाब देना चाहिए।
सबसे पहले एक पूर्णतः स्वतंत्र और सार्वजनिक impact assessment कराया जाना चाहिए।
इसमें केवल environment नहीं, बल्कि:
- ecological impact,
- livelihood impact,
- tribal rights,
- cultural impact,
- social impact,
- disaster risk,
- climate change,
- coastal vulnerability
- https://politicsinsightindia.com/mmdr-amendment-bill-2026-farmer-land-acquisition-partnership
का अध्ययन हो।
दूसरा, tribal communities की participation को स्वतंत्र और पारदर्शी बनाया जाए।
तीसरा, Gram Sabha और Forest Rights Act से जुड़े सभी सवालों का judicially sustainable समाधान किया जाए।
चौथा, project की जानकारी सार्वजनिक की जाए ताकि नागरिक, researchers और independent experts उसकी समीक्षा कर सकें।
और पांचवां—जहां वैज्ञानिक अध्ययन project design में बदलाव की जरूरत बताए, वहां सरकार को बदलाव करने में संकोच नहीं करना चाहिए।
और UN को भी क्या करना चाहिए?
अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की credibility भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
यदि UN-CERD किसी देश पर गंभीर टिप्पणी करता है तो उसे:
- evidence-based assessment,
- precise terminology,
- balanced presentation,
- national constitutional context
का पूरा ध्यान रखना चाहिए।
किसी sovereign democracy के बारे में sweeping language अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकती है।
आलोचना मजबूत हो सकती है, लेकिन आलोचना की विश्वसनीयता उसके प्रमाण और निष्पक्षता से आती है।
निष्कर्ष: Great Nicobar सिर्फ एक द्वीप नहीं, विकास मॉडल की परीक्षा है
Great Nicobar का विवाद आने वाले वर्षों में भारत के development model के लिए एक मिसाल बन सकता है।
यदि भारत इस परियोजना को ऐसी प्रक्रिया के साथ आगे बढ़ाता है जिसमें national security, economic development, environmental protection और indigenous rights चारों को साथ रखा जाए, तो यह दुनिया के सामने एक मजबूत उदाहरण होगा।
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लेकिन यदि हर environmental objection को विकास-विरोध और हर tribal-rights concern को विदेशी हस्तक्षेप बताकर खारिज किया गया, तो समस्या केवल Great Nicobar तक सीमित नहीं रहेगी।
और अगर दूसरी ओर हर strategic infrastructure project को केवल ecological या human-rights arguments के आधार पर रोकने की मांग की जाएगी, तो भारत की legitimate security और economic needs भी प्रभावित होंगी।
इसलिए समाधान किसी एक पक्ष की पूर्ण जीत में नहीं है।
समाधान पारदर्शिता में है।
समाधान स्वतंत्र जांच में है।
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समाधान वास्तविक जनभागीदारी में है।
समाधान कानून के पालन में है।
भारत को UN-CERD की हर बात मानने की बाध्यता नहीं है।
लेकिन भारत को अपने ही नागरिकों—विशेषकर उन आदिवासी समुदायों—के सवालों का जवाब देना जरूर चाहिए जिनकी जमीन, जंगल, संस्कृति और भविष्य पर किसी परियोजना का सबसे सीधा असर पड़ता है।
और शायद Great Nicobar विवाद का सबसे बड़ा सबक यही है:
राष्ट्रीय हित का अर्थ केवल बड़े project बनाना नहीं है। राष्ट्रीय हित का अर्थ यह सुनिश्चित करना भी है कि विकास की कीमत उन लोगों से न वसूली जाए जिनकी आवाज सबसे कमजोर है।
Great Nicobar पर अंतिम फैसला चाहे जो हो, एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में भारत को इतना सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य जब इस परियोजना को देखे तो यह न पूछे कि “भारत ने कितना बनाया?”
बल्कि यह भी कह सके—
“भारत ने विकास किया, लेकिन अपनी प्रकृति, अपने कानून और अपने सबसे कमजोर नागरिकों को पीछे छोड़कर नहीं।”
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