किसान को घोषणा नहीं, परिणाम चाहिए: ‘करेंगे’ का दौर खत्म, अब ‘दिया, किया, हुआ’ का हिसाब

महाराष्ट्र के किसानों की कर्जमाफी, फसल के उचित दाम, बिजली, पानी, मुआवजा और कृषि की स्थायी आर्थिक व्यवस्था पर सवाल उठाता यह लेख सरकार के ‘करेंगे’ और किसान के ‘मिला क्या?’ के बीच का अंतर सामने रखता है। कर्जमाफी से आगे बढ़कर कर्जमुक्त खेती की जरूरत पर गंभीर विमर्श।

किसान को घोषणा नहीं, परिणाम चाहिए: ‘करेंगे’ का दौर खत्म, अब ‘दिया, किया, हुआ’ का हिसाब

किसानों के हिस्से में अच्छे दिन कब आएंगे?

‘देंगे, करेंगे, होगा’ की घोषणाओं से ‘दिया, किया, हुआ’ के यथार्थ तक सरकार कब पहुंचेगी?

किसानों के लिए घोषणा करते समय सरकार का काल हमेशा भविष्यकाल में होता है।

कर्जमाफी देंगे!

किसानों को बेसहारा नहीं छोड़ेंगे!

सरकार किसानों के साथ खड़ी रहेगी!

अतिवृष्टि के पंचनामे तुरंत करेंगे!

एक भी किसान सहायता से वंचित नहीं रहेगा!

दिन में बारह घंटे बिजली देंगे!

महाराष्ट्र को सूखामुक्त करेंगे!

इनपुट घोटाले में किसी को नहीं छोड़ेंगे!

नकली बीजों की जांच करेंगे!

पश्चिम महाराष्ट्र और कोंकण का अतिरिक्त पानी मराठवाड़ा की ओर मोड़ेंगे!

शब्द सुनने में अच्छे लगते हैं।
आश्वासनों पर तालियां भी मिलती हैं।

लेकिन किसान को तालियां नहीं चाहिए; उसे खाते में पैसे, पंप को बिजली, खेत में पानी और कर्ज के खाते पर ‘शून्य’ चाहिए।

इसलिए सवाल सिर्फ इतना है कि सरकार की घोषणाओं का भविष्यकाल किसान के जीवन में वर्तमानकाल कब बनेगा?

30 अक्टूबर 2025 को किसान कर्जमाफी की मांग को लेकर आंदोलन की पृष्ठभूमि में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 30 जून 2026 से पहले कर्जमाफी के संबंध में निर्णय लेने का आश्वासन दिया था। इसके लिए प्रवीण परदेशी की अध्यक्षता में समिति भी गठित की गई।

मई 2026 में भी सरकार की ओर से तैयारी अंतिम चरण में होने और कुछ जिलों से जानकारी मिलना बाकी होने की बात कही गई।

2 जून 2026 को आखिरकार मंत्रिमंडल ने ₹36,585 करोड़ की पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होलकर किसान कर्जमुक्ति योजना को मंजूरी दी। लगभग 55.72 लाख किसानों को इसका लाभ मिलने की उम्मीद जताई गई। दो लाख रुपये तक के पात्र फसल ऋण की बकाया राशि की कर्जमाफी और नियमित रूप से कर्ज चुकाने वालों को ₹50 हजार तक प्रोत्साहन राशि देने की योजना घोषित की गई।

लेकिन किसान के सामने सवाल है—

मेरा नाम सूची में है या नहीं?

मेरा KYC हुआ या नहीं?

मेरे खाते में पैसे आए या नहीं?

मेरे कर्ज खाते में कर्जमाफी की प्रविष्टि हुई या नहीं?

जून से अक्टूबर, तीन महीने हो गए, फिर भी कुछ जगहों पर यही प्रक्रिया जारी होने का चित्र दिखाई देता है। अमरावती जिला सूचना कार्यालय की 21 सितंबर की जानकारी के अनुसार, कर्जमाफी की सूचियां प्रकाशित होने के बावजूद कुछ किसानों को मृत कर्जदार या अन्य तकनीकी कारणों से KYC नहीं होने के कारण लाभ नहीं मिला है; इसके लिए निर्वाचन क्षेत्रवार सूची बनाकर यह समस्या एक महीने में हल करने के निर्देश दिए जाने की जानकारी है।

सरकार के भाषणों में नियमित रूप से कर्ज चुकाने वाले किसानों के लिए केवल 50 हजार रुपये तक की प्रोत्साहन राशि का प्रावधान किया गया। यानी नियमित कर्ज चुकाने वाले किसान मूर्ख साबित हुए!

जिसने समय पर कर्ज चुकाया, ब्याज भरा, बैंक का विश्वास बनाए रखा, उसे कोई खास इनाम नहीं; और जिस पर बकाया आया, उसे कर्जमाफी!

वाह रे फैसला!!

तो सरकार ने ईमानदारी से कर्ज चुकाने वाले किसान को आखिर कौन-सा संदेश दिया?

“कर्ज लेते रहो, उसे चुकाओ मत और अगली बार कर्जमाफी का इंतजार करो!”

अगर ऐसी मानसिकता तैयार हुई तो बैंकिंग व्यवस्था का अनुशासन ही खत्म नहीं हो जाएगा?

इसलिए कर्जमाफी से भी बड़ा सवाल यह है कि ईमानदारी से कर्ज चुकाने वाले किसान को भविष्य में फिर कर्जदार न बनना पड़े, ऐसी व्यवस्था सरकार कब खड़ी करेगी?

अतिवृष्टि हुई तो, “तुरंत पंचनामे करो।”

ओलावृष्टि हुई तो, “एक भी किसान वंचित नहीं रहेगा।”

फसलों का नुकसान हुआ तो, “सरकार किसानों के साथ खड़ी है।”

लेकिन वास्तविकता में किसान को फिर तलाठी, मंडल अधिकारी, तहसील कार्यालय, ऑनलाइन आवेदन, KYC, दस्तावेज और सूची के सफर से गुजरना पड़ता है।

प्रकृति की आपदा सब पर समान रूप से आती है, लेकिन प्रशासनिक प्रक्रिया सबको हमेशा करनी पड़ती है—जिसमें समय, पैसा और झुंझलाहट तीनों लगते हैं!

इनपुट घोटाला हुआ तो, “किसी को नहीं छोड़ेंगे।”

नकली बीज मिले तो, “गंभीरता से संज्ञान लिया है।”

खाद की कमी हुई तो, “कड़ी कार्रवाई के आदेश दिए हैं।”

ये वाक्य महाराष्ट्र के किसानों ने कितनी बार सुने होंगे?

लेकिन कार्रवाई की अंतिम जानकारी कितनी बार सामने आती है?

कितने दोषियों पर मामले दर्ज हुए?

कितनों पर कार्रवाई हुई?

कितने किसानों को मुआवजा मिला?

तो जवाब शून्य!!

हाल ही में फडणवीस ने मराठवाड़ा को स्थायी रूप से सूखामुक्त करने के लिए विभिन्न जल योजनाओं का उल्लेख करते हुए अगले सात वर्षों में सूखामुक्ति का विश्वास व्यक्त किया है। लेकिन पानी का आश्वासन किसान को बारिश होने के बाद काम नहीं आता; पानी वास्तव में बांध, नहर और खेत तक पहुंचे, तभी उसका अर्थ है।

और फिर आता है सबसे बड़ा सवाल—कर्ज!

महाराष्ट्र का कुल बकाया सार्वजनिक कर्ज 2014 में लगभग ₹2.94 लाख करोड़ था।

2026-27 के बजट अनुमान के अनुसार राज्य की कुल बकाया देनदारियां ₹11 लाख करोड़ हो गई हैं। यानी 2014 की तुलना में नाममात्र कर्जभार में बड़ी वृद्धि हुई है।

इस बढ़े हुए कर्ज में किसान का और उद्योगपति का कितना हिस्सा है?

किसान को बार-बार कर्जमाफी की जरूरत ही न पड़े, ऐसी खेती की स्थायी आर्थिक संरचना तैयार करना सरकार के सामने मुख्य चुनौती होनी चाहिए। लेकिन उस दिशा में क्या प्रयास हुए हैं?

तो शून्य!!

इसलिए अब महाराष्ट्र के किसान को एक और घोषणा नहीं चाहिए।

उसे घोषणा का हिसाब चाहिए।

कितने आश्वासन दिए?

कितने शासन निर्णय निकाले?

कितना पैसा मंजूर किया?

कितना पैसा वितरित किया?

कितने किसान बाकी हैं?

और बाकी हैं तो क्यों?

अब महाराष्ट्र को भविष्यकाल में एक वाक्य नहीं सुनना है—“करने वाले हैं...”

शेतकऱ्यांनी सरकारला एकच सांगायचे आहे की, आमच्या शेतमालाला उत्पादन खर्चावर आधारित भाव दिला नाही म्हणून १९७० पर्यंत बँकेत डिपॉझिट ठेवणारे आम्ही लोक कर्जबाजारी झालो.

हमने जो पैदा किया, आप उसे मुफ्त बांटते हैं, इसलिए बाजार में हमारे उत्पादन को कीमत नहीं मिलती। किसान को अब सिर्फ एक काम करना चाहिए—सरकार जो मुफ्त बांट रही है, उसका उत्पादन बंद करना और सरकार जो आयात कर रही है, उस आयात को बंद कराने के लिए आंदोलन करना।

कर्जमाफी कोई स्थायी समाधान नहीं है, क्योंकि कर्जमाफी होने पर उसमें से एक धेला भी किसान की जेब में नहीं आता, बल्कि वह बैंक की रिकवरी होती है। किसानों को बैंक की रिकवरी के लिए जिंदगी भर खेती नहीं करनी है; उन्हें अपने कर्जदार होने की समस्या के स्थायी समाधान के लिए खेती करनी है।

किसान फिर कर्जदार न बने, इसके लिए सरकार क्या करेगी?

आज कर्जमाफी।

कल फिर कर्ज।

फिर अतिवृष्टि, नुकसान और कर्ज।

यह चक्रव्यूह कितने वर्षों तक चलता रहेगा?

कर्जमाफी इलाज नहीं है; वह बीमारी के बिल का कुछ हिस्सा भरती है।

कर्जमाफी होने पर किसान के हाथ में नकद पैसा नहीं आता; बैंक के खाते में बकाया राशि कम होती है।

किसान को बैंक की रिकवरी के लिए जिंदगी भर खेती नहीं करनी है।

उसे ऐसी कृषि अर्थव्यवस्था चाहिए जो उसे कर्जदार बनने ही न दे!

तो स्थायी समाधान कहां है?

किसान को यदि उत्पादन लागत से कम कीमत मिलेगी, तो वह कर्जदार होगा ही।

सरकार एक तरफ उत्पादन बढ़ाने के लिए कहे और दूसरी तरफ सस्ता आयात करके भाव गिराए, तो किसान कर्जमुक्त कैसे होगा?

किसान कर्जमाफी का लाभार्थी नहीं, बल्कि उचित कीमत मिलने पर अपना कर्ज चुकाने की क्षमता रखने वाला एक दाने से हजार दाने पैदा करने वाला उत्पादक है।

इसलिए उसके उत्पादन को उत्पादन लागत पर आधारित उचित कीमत देने की व्यवस्था खड़ी करनी होगी।

सरकार की मुफ्त योजनाओं और कृषि उपज के आयात का देश के उत्पादक पर क्या असर होता है?

आयात के कारण कृषि उपज की कीमत कितनी नीचे आती है और सरकारी नीतियों के कारण किसान का कितना नुकसान होता है?

इन सवालों का हिसाब कब रखा जाएगा?

किसान सरकार की दया नहीं मांगता; वह अपने श्रम की कीमत मांगता है!

1970 के दशक तक किसान बैंक में पैसा जमा करने वाला था, ऐसी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की याद आज भी बहुतों के मन में है।

आज वही किसान कर्ज के बोझ तले क्यों चला गया?

क्योंकि खेती की उत्पादन लागत बढ़ गई। इनपुट, बिजली, डीजल, मजदूरी, दवाइयां, बीज और खाद महंगे हुए। उसके लिए जरूरी रोजमर्रा की अन्य चीजों की कीमतें भी बढ़ीं, लेकिन कृषि उपज की कीमत का फैसला किसान के हाथ में नहीं रहा।

तो सवाल यह है कि जो आदमी देश को अन्न देता है, उसी को अपने घर का आर्थिक हिसाब क्यों नहीं मिल पाता?

https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra

उत्तर किसान की आलसीपन में नहीं है।

उत्तर खेती की गलत अर्थव्यवस्था में है!

https://politicsinsightindia.com/barricade-ke-peeche-satta-janata-ke-sawal

इसलिए अब लड़ाई कर्जमाफी के लिए नहीं; कर्जमुक्त खेती के लिए!

कर्जमाफी हो जाने से किसान अमीर नहीं होता, फसल को कीमत नहीं मिलती, अगले सीजन का खर्च कम नहीं होता और न ही आयात रुकता है।

https://politicsinsightindia.com/kisan-fasal-yojana-msp-ghata-kheti-se-bahar-nikalne-ka-samay

नकली बीज, अतिवृष्टि और अगले कर्ज की समस्या भी इससे हल नहीं होती।

इसलिए कर्जमाफी अंतिम सीढ़ी नहीं, बल्कि बड़े आर्थिक सुधार की शुरुआत होनी चाहिए।

https://politicsinsightindia.com/foodgrain-centric-agriculture-to-value-added-agriculture-farmer-value-chain-india

किसान को ऐसी कृषि अर्थव्यवस्था चाहिए—

जिसमें उत्पादन लागत निकल सके।

जिसमें परिवार का खर्च चल सके।

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जिसमें अगले सीजन के लिए पूंजी बच सके।

जिसमें बैंक से कर्ज लेने की जरूरत ही न पड़े।

https://politicsinsightindia.com/dharma-jati-ke-shor-mein-daba-kisan-niti-ka-sawal

जिससे फिर कर्जमाफी की जरूरत ही न पड़े।

और इसलिए अब सवाल होना चाहिए—

“किसान को फिर कर्ज लेने की जरूरत न पड़े, ऐसी खेती व्यवस्था कब?”

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भविष्यकाल खत्म करो... वर्तमानकाल शुरू करो!

सरकार के पास योजनाएं, समितियां, शासन निर्णय, बजट और आश्वासन हैं। लेकिन किसान को अब इनमें से और कुछ नहीं चाहिए।

https://politicsinsightindia.com/mp-moong-scam-13-35-lakh-msp-kisan-karz-atmahatya-sarkari-bhrashtachar

उसे परिणाम चाहिए।

क्योंकि किसान का जीवन “करेंगे” शब्द पर नहीं चलता, उसका जीवन इस बात पर चलता है कि “आज क्या मिला?”

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फसल का भाव, बिजली, पानी, बीज और मुआवजा आज चाहिए।

कर्ज लेने की जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिए।

https://politicsinsightindia.com/kisan-atmahatya-10546-mauten-karz-mehangai-badhati-lagat-krishi-niti-ki-vifalta

कल के आश्वासन पर आज की खेती नहीं होती!

इसलिए सरकार को भी अब अपना राजनीतिक व्याकरण बदलना चाहिए—

https://politicsinsightindia.com/seed-bill-kisan-ka-beej-company-ka-raj-chhote-kisan-fasal-vividhta-ki-ladai

“दिया, किया, हुआ।”

क्योंकि किसान के जीवन में भविष्यकाल की तारीख अब समाप्त हो चुकी है!

उसे वर्तमानकाल चाहिए।

https://politicsinsightindia.com/mehangai-ka-dosh-kisan-par-kyon

और वर्तमानकाल का अर्थ खोखली घोषणा नहीं, बल्कि स्पष्ट परिणाम है!

और अगर सरकार यह नहीं देती, तो फिर सात दिसंबर यानी 7/12 की तारीख याद रखिए।

https://politicsinsightindia.com/kisan-garib-kyon-hai-khet-mein-mehnat-bazaar-mein-majboori-sarkari-nitiyon-ka-kadwa-sach

उस दिन आपको नागपुर पहुंचना है।

प्रकाश कमलताई गोपाळराव पोहरे
98225 93921

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