किसान गरीब क्यों है? खेत में मेहनत, बाजार में मजबूरी और सरकारी नीतियों का कड़वा सच
देविंदर शर्मा के सवालों के बीच बड़ा मुद्दा—क्या भारत की कृषि नीति छोटे किसान को स्थायी आय, प्रत्यक्ष सहायता और आर्थिक सुरक्षा देने में विफल रही है?
By- Ch. Sudhir Talyan
भारत अपने किसानों पर गर्व करता है। भाषणों में किसान को अन्नदाता कहा जाता है, चुनावों में उसकी मेहनत का सम्मान किया जाता है और सरकारी विज्ञापनों में खेतों को समृद्ध भारत की तस्वीर के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
लेकिन खेत की मेड़ पर खड़ा किसान इन नारों से अपना हिसाब नहीं करता।
वह पूछता है—मेरी फसल की कीमत क्या है? मेरी लागत कितनी है? मेरे परिवार की आय कितनी है? मेरे ऊपर कितना कर्ज है? और अगर अगली फसल खराब हो गई तो मेरा परिवार कैसे चलेगा?
यही वे सवाल हैं जिनसे भारतीय कृषि नीति अक्सर बचती दिखाई देती है।
सरकार उत्पादन के आंकड़े गिनाती है। योजनाओं की संख्या बताती है। बजट में कृषि के लिए आवंटन बताती है। लेकिन किसान की आर्थिक हालत का सबसे सीधा पैमाना—उसकी वास्तविक और स्थिर आय—अब भी राष्ट्रीय कृषि बहस के केंद्र में नहीं है।
कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा लंबे समय से इसी विरोधाभास की ओर ध्यान दिलाते रहे हैं। उनका मूल प्रश्न सीधा है: यदि किसान देश को भोजन उपलब्ध कराने के लिए लगातार जोखिम उठा रहा है, तो उसकी आय इतनी अस्थिर और कमजोर क्यों है कि उसे अपनी अगली फसल के लिए भी कर्ज की जरूरत पड़ती है?
यह सवाल असुविधाजनक है।
और सरकार को इससे बचना नहीं चाहिए।
किसान उत्पादन बढ़ाता रहा, लेकिन उसकी आर्थिक ताकत क्यों नहीं बढ़ी?
भारत ने खाद्यान्न उत्पादन में उल्लेखनीय प्रगति की है। हरित क्रांति से लेकर आधुनिक कृषि तक देश ने खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं।
लेकिन खाद्य उत्पादन बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि किसान की आय भी उसी अनुपात में बढ़ी।
यही भारतीय कृषि की सबसे बड़ी विडंबना है।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के 2018-19 के Situation Assessment Survey के अनुसार एक कृषि परिवार की औसत मासिक आय ₹10,218 थी। इसमें खेती से आय लगभग ₹3,798 थी, जबकि मजदूरी से लगभग ₹4,063 प्राप्त हुए।
यह आंकड़ा एक कठोर सच्चाई सामने रखता है।
जिस व्यक्ति की मुख्य पहचान किसान की है, उसके परिवार की आय का सबसे बड़ा हिस्सा खेती से नहीं, मजदूरी से आ रहा था।
इससे बड़ा सवाल कृषि नीति की सफलता पर और क्या हो सकता है?
यदि किसान को खेती से पर्याप्त आय नहीं मिलती, तो वह मजदूरी करता है। यदि मजदूरी से भी पर्याप्त आय नहीं होती, तो वह कर्ज लेता है। और यदि कर्ज बढ़ता जाता है, तो खेती उसकी आर्थिक स्वतंत्रता का माध्यम बनने के बजाय ऋण चुकाने का माध्यम बन जाती है।
यह स्थिति किसी भी कृषि-प्रधान देश के लिए चेतावनी होनी चाहिए।
कर्ज किसान की बीमारी नहीं, व्यवस्था का लक्षण है
किसान कर्जदार क्यों होता है?
क्योंकि खेती में पहले खर्च होता है और आय बाद में।
बीज आज खरीदना है।
खाद आज खरीदनी है।
सिंचाई आज करनी है।
मजदूरी आज देनी है।
कीटनाशक आज खरीदना है।
डीजल आज चाहिए।
लेकिन पैसा फसल बिकने के बाद आएगा।
और जब फसल बाजार में पहुंचती है, तब कीमत किसान के हाथ में नहीं होती।
यहीं से संकट शुरू होता है।
2018-19 के सरकारी सर्वेक्षण में लगभग आधे कृषि परिवारों के ऋणी होने की तस्वीर सामने आई थी। औसत बकाया ऋण भी महत्वपूर्ण था।
लेकिन किसी किसान के कर्ज को केवल उसके व्यक्तिगत वित्तीय व्यवहार का परिणाम बताना वास्तविकता से आंखें मूंदना है।
अगर उत्पादन लागत बढ़ रही हो, बाजार कीमत अस्थिर हो, मौसम का जोखिम बढ़ रहा हो और किसान के पास भंडारण की क्षमता न हो, तो कर्ज उसकी मजबूरी बन सकता है।
किसान का कर्ज अक्सर उसकी असफलता का प्रमाण नहीं होता; वह उस आर्थिक व्यवस्था की विफलता का प्रमाण हो सकता है जिसमें जोखिम किसान का है और मूल्य-निर्धारण की ताकत दूसरे हाथों में।
छोटी जोत: सबसे बड़ा अनदेखा संकट
भारत का औसत किसान अमेरिकी या यूरोपीय किसान जैसा बड़ा landholding वाला उत्पादक नहीं है।
भारत में छोटी और सीमांत जोतों का प्रभुत्व है।
औसत परिचालन जोत का आकार लगातार घटा है। NABARD के विश्लेषणों में भी भारतीय कृषि की छोटी जोत वाली संरचना को प्रमुख चुनौती के रूप में रेखांकित किया गया है।
छोटा किसान एक साथ कई नुकसान उठाता है।
वह कम मात्रा में खरीद करता है, इसलिए input पर उसकी bargaining power कमजोर होती है।
वह कम मात्रा में बेचता है, इसलिए बाजार में उसकी bargaining power कमजोर होती है।
उसके पास storage कम है।
उसके पास processing नहीं है।
उसके पास सस्ती पूंजी सीमित है।
और सबसे महत्वपूर्ण—वह बाजार के खिलाफ इंतजार करने की स्थिति में नहीं होता।
यही कारण है कि छोटे किसान के लिए केवल उत्पादन बढ़ाने की सलाह अपर्याप्त है।
उसे आर्थिक सुरक्षा की छतरी चाहिए।
सरकार किसान को सब्सिडी देती है—लेकिन सवाल यह है कि किसान को आय कितनी मिलती है?
सरकार कहती है कि वह किसानों की सहायता करती है।
यह तथ्य सही है।
PM-KISAN के माध्यम से पात्र किसान परिवारों को ₹6,000 सालाना प्रत्यक्ष सहायता दी जाती है। उर्वरक, बिजली, सिंचाई, कृषि ऋण, बीमा और सरकारी खरीद जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से भी सार्वजनिक समर्थन दिया जाता है।
लेकिन यहां असली सवाल सरकार के खर्च का नहीं है।
सवाल किसान की जेब का है।
सरकार हजारों करोड़ रुपये खर्च कर सकती है। मंत्रालय योजनाओं की सूची जारी कर सकता है। प्रेस विज्ञप्तियां उपलब्धियां गिना सकती हैं।
लेकिन यदि किसान की शुद्ध आय अस्थिर रहती है, तो सरकारी नीति की अंतिम परीक्षा अभी बाकी है।
₹6,000 सालाना का अर्थ लगभग ₹500 प्रति माह है।
क्या एक छोटे किसान परिवार की आय-सुरक्षा ₹500 महीने से सुनिश्चित हो सकती है?
यह प्रश्न सरकार को स्वयं से पूछना चाहिए।
और यदि उत्तर “नहीं” है, तो किसान आय नीति को कहीं अधिक गंभीरता से पुनर्गठित करना होगा।
सब्सिडी पर बहस का असली चेहरा
कृषि सब्सिडी को लेकर अक्सर कहा जाता है कि सरकार किसान को बहुत सहायता देती है।
लेकिन कृषि समर्थन को केवल एक बजट संख्या में बदल देना नीति-विश्लेषण नहीं है।
OECD के अनुसार दुनिया के प्रमुख कृषि उत्पादक देश किसानों को भारी सार्वजनिक समर्थन देते हैं। चीन, अमेरिका, यूरोपीय संघ और जापान सहित प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में कृषि सहायता के अनेक रूप हैं—प्रत्यक्ष भुगतान, बाजार समर्थन, बीमा, पर्यावरणीय सहायता और अन्य जोखिम प्रबंधन।
भारत भी कृषि सहायता देता है।
फिर भी प्रश्न बना रहता है:
क्या भारतीय किसान को उसकी आय के जोखिम के अनुपात में पर्याप्त सुरक्षा मिल रही है?
यहीं देविंदर शर्मा का दृष्टिकोण महत्वपूर्ण हो जाता है।
वे लंबे समय से कृषि नीति में input subsidies के बजाय किसान-केंद्रित आय सहायता और कृषि की आर्थिक व्यवहार्यता पर जोर देते रहे हैं।
यह विचार सरकार के लिए असुविधाजनक है क्योंकि इससे कृषि नीति का केंद्र बदल जाता है।
अभी तक सरकार अक्सर पूछती रही है—
“किसान को कितनी सब्सिडी दी?”
लेकिन किसान को पूछना चाहिए—
“मेरी सालाना सुरक्षित आय कितनी है?”
दोनों सवालों में जमीन-आसमान का अंतर है।
किसान को खाद सस्ती चाहिए, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि उसकी फसल सही दाम पर बिके
यह कृषि नीति का मूल सिद्धांत होना चाहिए।
यदि किसान को एक तरफ सस्ती खाद मिलती है लेकिन दूसरी तरफ उसकी फसल का मूल्य लागत के अनुरूप नहीं मिलता, तो केवल input subsidy से समस्या हल नहीं होती।
किसान को सस्ता input चाहिए।
लेकिन उसे सुरक्षित output price उससे भी अधिक चाहिए।
यही कारण है कि MSP की बहस इतनी महत्वपूर्ण है।
MSP केवल एक प्रशासनिक घोषणा नहीं होनी चाहिए।
किसान के लिए MSP तभी अर्थपूर्ण है जब बाजार में उसे वास्तविक सुरक्षा मिले।
यदि मंडी में किसान मजबूरी में MSP से नीचे बेच रहा है, तो कागज पर घोषित MSP उसकी आय की रक्षा नहीं करता।
किसान को घोषणा नहीं, प्रभावी मूल्य-सुरक्षा चाहिए।
व्यापार नीति किसान के खिलाफ प्रयोगशाला नहीं बन सकती
किसान महीनों पहले अपनी फसल की योजना बनाता है।
वह बीज खरीदता है।
वह उत्पादन का खर्च करता है।
फसल तैयार करता है।
लेकिन यदि उसी समय सरकार आयात शुल्क बदल दे, आयात खोल दे, निर्यात रोक दे या किसी commodity के व्यापार नियमों में अचानक परिवर्तन करे, तो किसान की पूरी आर्थिक गणना बदल सकती है।
यहां सरकार की जिम्मेदारी है।
उपभोक्ता को सस्ता भोजन उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है।
महंगाई नियंत्रित करना भी महत्वपूर्ण है।
लेकिन महंगाई नियंत्रित करने का पूरा बोझ किसान की आय पर डाल देना न्यायपूर्ण कृषि नीति नहीं हो सकती।
यदि शहर में सस्ता भोजन उपलब्ध कराने की कीमत गांव का किसान अपनी कम आय से चुकाता है, तो सरकार को इस हस्तांतरण को स्पष्ट रूप से स्वीकार करना चाहिए और किसान को प्रतिपूरक सुरक्षा देनी चाहिए।
WTO की बहस में किसान कहां है?
अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों के तहत कृषि सहायता और public stockholding जैसे मुद्दों पर भारत को लगातार अपनी स्थिति स्पष्ट करनी पड़ती है।
भारत के लिए यह सिर्फ व्यापार वार्ता नहीं है।
यह खाद्य सुरक्षा का प्रश्न है।
सरकारी खरीद और खाद्य भंडारण व्यवस्था करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा से जुड़ी है।
लेकिन यहां भी एक बुनियादी सवाल है:
जिस किसान से देश खाद्य सुरक्षा के लिए अनाज खरीदता है, क्या उसकी आय सुरक्षा भी खाद्य सुरक्षा का हिस्सा नहीं होनी चाहिए?
अगर किसान आर्थिक रूप से असुरक्षित होगा, तो लंबे समय में खाद्य सुरक्षा भी असुरक्षित होगी।
छोटे किसान के लिए प्रत्यक्ष आय सहायता क्यों जरूरी है?
छोटे किसान की स्थिति बड़े किसान से अलग है।
एक बड़े किसान के पास कुछ जोखिमों को फैलाने की क्षमता हो सकती है।
छोटे किसान के पास नहीं।
एक हेक्टेयर से कम भूमि पर खेती करने वाले परिवार के लिए एक खराब फसल का अर्थ केवल उस मौसम का नुकसान नहीं हो सकता। उसका असर अगले मौसम की बुवाई, बच्चों की शिक्षा, घरेलू खर्च और पुराने ऋण की अदायगी तक पहुंच सकता है।
इसलिए छोटे और सीमांत किसानों के लिए प्रत्यक्ष आय सहायता कृषि नीति का स्थायी स्तंभ बननी चाहिए।
लेकिन सहायता का आकार भी वास्तविक आर्थिक जरूरत के अनुरूप होना चाहिए।
₹6,000 सालाना जैसी सहायता प्रतीकात्मक राहत दे सकती है, लेकिन इसे किसान की वास्तविक आय-सुरक्षा नहीं कहा जा सकता।
नीति का लक्ष्य होना चाहिए कि छोटे किसान परिवार को एक ऐसी न्यूनतम आय सुरक्षा मिले जो उसे संकट में ऊंचे ब्याज वाले कर्ज की ओर जाने से रोके।
लेकिन प्रत्यक्ष भुगतान में सबसे बड़ी शर्त है—वास्तविक किसान तक पैसा पहुंचे
यहां एक महत्वपूर्ण समस्या है।
भारत में जमीन का मालिक और खेती करने वाला व्यक्ति हमेशा एक नहीं होता।
बटाईदार किसान हैं।
पट्टेदार किसान हैं।
मौखिक पट्टे पर खेती करने वाले किसान हैं।
कई परिवार दूसरों की जमीन पर खेती करते हैं।
यदि सरकारी सहायता केवल land ownership records पर आधारित होगी, तो वास्तविक cultivator सहायता से बाहर रह सकता है।
इसलिए किसान आय सुरक्षा की नई व्यवस्था में “भूमि का मालिक कौन है?” से आगे बढ़कर “खेती कौन कर रहा है?” को भी पहचानना होगा।
छोटे किसान की सुरक्षा का यही असली परीक्षण होगा।
किसान सुरक्षा: फसल बीमा से आगे की व्यवस्था
किसान को केवल फसल बीमा देकर सरकार अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर सकती।
किसान सुरक्षा एक व्यापक व्यवस्था होनी चाहिए।
उसमें शामिल हों:
आय सुरक्षा।
मूल्य सुरक्षा।
फसल बीमा।
सस्ता संस्थागत ऋण।
प्राकृतिक आपदा में तत्काल सहायता।
भंडारण की सुविधा।
स्थिर व्यापार नीति।
बाजार तक सीधी पहुंच।
और गंभीर संकट में ऋण राहत।
किसान को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें एक खराब मौसम उसे फिर से शून्य पर न पहुंचा दे।
सरकार को किसान के लिए “आय आयोग” क्यों बनाना चाहिए?
भारत में किसान के लिए एक स्वतंत्र कृषक आय आयोग की आवश्यकता पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
यह आयोग केवल उत्पादन लागत नहीं देखे।
यह देखे:
- परिवार की वास्तविक कृषि आय;
- क्षेत्रवार लागत;
- फसलवार लाभ;
- बाजार मूल्य;
- ऋण बोझ;
- मौसम जोखिम;
- सिंचाई लागत;
- छोटे किसानों की आय;
- किरायेदार किसानों की स्थिति;
- और किसान परिवार के लिए आवश्यक न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा।
सरकार हर साल यह घोषित करे कि देश के छोटे किसान की वास्तविक आय कितनी है और पिछले वर्ष की तुलना में उसमें कितना परिवर्तन हुआ।
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तभी कृषि नीति का मूल्यांकन वास्तविक आधार पर होगा।
किसान की आय बढ़ानी है तो गांव में मूल्य श्रृंखला बनानी होगी
छोटे किसान को केवल मंडी तक पहुंचाने से समस्या खत्म नहीं होगी।
उसे value chain में ऊपर ले जाना होगा।
गांव के आसपास:
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वेयरहाउस हों।
कोल्ड स्टोरेज हों।
प्रसंस्करण इकाइयां हों।
पैकेजिंग और grading की व्यवस्था हो।
किसान उत्पादक संगठन मजबूत हों।
स्थानीय कृषि मशीनरी बैंक हों।
सीधी बिक्री के बाजार विकसित हों।
जब किसान अपनी उपज को कुछ समय रोक सकता है, उसे grade कर सकता है, process कर सकता है और सामूहिक रूप से बेच सकता है, तभी उसकी bargaining power बढ़ेगी।
वरना किसान उत्पादन करेगा और मूल्य श्रृंखला का सबसे कम लाभ पाने वाला व्यक्ति बना रहेगा।
सरकार को यह तय करना होगा कि वह किसान को बाजार का शिकार बनाएगी या बाजार का भागीदार
भारत की कृषि नीति लंबे समय तक उत्पादन-केंद्रित रही है।
अब उसे income-centric होना होगा।
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सरकार का लक्ष्य होना चाहिए:
कम लागत वाली खेती + सुनिश्चित बाजार + बेहतर कीमत + जोखिम सुरक्षा + प्रत्यक्ष आय सहायता।
इनमें से किसी एक को चुनना पर्याप्त नहीं है।
किसान की समस्या भी एकल नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल: किसान की आय की गारंटी कौन देगा?
यह सवाल आखिरकार सरकार के सामने लौटता है।
सरकार उद्योगों को प्रोत्साहन देती है।
निर्यातकों को प्रोत्साहन देती है।
बुनियादी ढांचे में निवेश करती है।
रणनीतिक क्षेत्रों में सार्वजनिक धन लगाती है।
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तो फिर देश को भोजन उपलब्ध कराने वाले छोटे किसान के लिए न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा को नीति का केंद्रीय उद्देश्य क्यों नहीं बनाया जा सकता?
यह मुफ्त पैसा नहीं है।
यह खाद्य सुरक्षा की कीमत है।
यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में निवेश है।
यह रोजगार की सुरक्षा है।
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यह देश की उत्पादन क्षमता को बचाने का तरीका है।
और सबसे बढ़कर—यह उस व्यक्ति के प्रति आर्थिक न्याय है जो अपनी जमीन, श्रम और जोखिम से देश का भोजन पैदा करता है।
किसान को राहत नहीं, शक्ति चाहिए
किसान को हर संकट के बाद राहत की लाइन में खड़ा करना स्थायी समाधान नहीं है।
आज सूखा आया—राहत।
कल बाढ़ आई—राहत।
परसों कीमत गिरी—राहत।
फिर कर्ज बढ़ा—ऋण माफी।
यह मॉडल किसान को मजबूत नहीं करता।
यह उसे संकट के बाद सहायता लेने पर निर्भर बनाता है।
भारत को इससे आगे बढ़ना होगा।
किसान को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें संकट आने से पहले सुरक्षा मौजूद हो।
आय सुरक्षा हो।
मूल्य सुरक्षा हो।
बीमा हो।
भंडारण हो।
सस्ता ऋण हो।
प्रत्यक्ष सहायता हो।
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और यदि बाजार किसान के खिलाफ चला जाए, तो राज्य के पास उसे संभालने का प्रभावी तंत्र हो।
अंतिम बात: किसान की गरीबी को सामान्य मत मानिए
सबसे खतरनाक बात यह नहीं कि किसान गरीब है।
सबसे खतरनाक बात यह है कि हमने किसान की गरीबी को सामान्य मान लिया है।
हमने यह स्वीकार कर लिया है कि किसान कर्ज लेगा।
हमने मान लिया कि किसान की आय मौसम पर निर्भर करेगी।
हमने मान लिया कि किसान अपनी फसल मजबूरी में बेच देगा।
हमने मान लिया कि किसान का बेटा खेती छोड़कर शहर चला जाएगा।
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हमने मान लिया कि कृषि संकट भारतीय गांव की स्थायी नियति है।
इसे सामान्य मानना ही सबसे बड़ी नीति विफलता है।
देविंदर शर्मा की कृषि संबंधी बहस का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि कृषि को केवल उत्पादन की मशीन की तरह नहीं देखा जा सकता। किसान को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाए बिना खाद्य सुरक्षा भी लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रह सकती।
भारत को अब कृषि नीति की भाषा बदलनी होगी।
किसान को “सहायता पाने वाला” नहीं, आर्थिक अधिकार रखने वाला उत्पादक समझना होगा।
छोटे किसान को बाजार के हवाले करके फिर उसकी असफलता पर राहत देना बंद करना होगा।
सरकार को स्पष्ट रूप से स्वीकार करना होगा कि किसान के पास जोखिम उठाने की सीमित क्षमता है और राज्य को उसके साथ जोखिम साझा करना होगा।
प्रत्यक्ष आय सहायता बढ़ाइए।
छोटे और सीमांत किसानों को प्राथमिकता दीजिए।
किरायेदार और वास्तविक cultivator को व्यवस्था में शामिल कीजिए।
MSP को प्रभावी मूल्य सुरक्षा से जोड़िए।
कृषि व्यापार नीति को स्थिर और पूर्वानुमेय बनाइए।
भंडारण और processing गांव तक ले जाइए।
कृषि ऋण व्यवस्था को किसान-केंद्रित बनाइए।
और किसान परिवार को इतनी आर्थिक सुरक्षा दीजिए कि एक खराब फसल उसके पूरे जीवन को कर्ज में न बदल दे।
क्योंकि अंततः सवाल केवल किसान की आय का नहीं है।
सवाल यह है कि क्या भारत अपने अन्नदाता को इतनी आर्थिक सुरक्षा दे सकता है कि वह अपनी मेहनत से सम्मानजनक जीवन जी सके?
यदि इसका उत्तर अभी “हां” नहीं है, तो सरकार को उपलब्धियों के विज्ञापन नहीं—कृषि नीति का पुनर्निर्माण करना चाहिए।
किसान को भाषण नहीं चाहिए।
उसे ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जिसमें मेहनत का मूल्य मिले, जोखिम साझा हो और भविष्य सुरक्षित हो।
यही वास्तविक किसान सम्मान है।
और यही भारत की कृषि का अगला बड़ा एजेंडा होना चाहिए।
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