BRICS की नई दिल्ली घोषणा: बदलने जा रही है विश्व व्यवस्था! डॉलर, पश्चिमी वर्चस्व और वैश्विक संस्थाओं को खुली चुनौती

नई दिल्ली BRICS Summit 2026 की 140-बिंदु वाली संयुक्त घोषणा ने वैश्विक व्यवस्था में बड़े बदलाव के संकेत दिए हैं। स्थानीय मुद्रा में व्यापार, वैकल्पिक भुगतान प्रणाली, NDB, डॉलर निर्भरता, IMF-World Bank सुधार, Global South की भूमिका, आतंकवाद, पश्चिम एशिया, AI, ऊर्जा, जलवायु और किसान-केंद्रित कृषि सहयोग पर BRICS के रुख का गहन विश्लेषण। क्या BRICS पश्चिमी वर्चस्व का विकल्प बन सकता है और भारत इस बदलती विश्व व्यवस्था में कितनी निर्णायक भूमिका निभा सकता है?

BRICS की नई दिल्ली घोषणा: बदलने जा रही है विश्व व्यवस्था! डॉलर, पश्चिमी वर्चस्व और वैश्विक संस्थाओं को खुली चुनौती

पश्चिमी वर्चस्व को चुनौती, लेकिन क्या भारत इसे ठोस वैश्विक शक्ति में बदल पाएगा?

By- Chaudhary Sudhir Talyan

नई दिल्ली में 12–13 सितंबर 2026 को हुआ 18वां BRICS शिखर सम्मेलन केवल एक और कूटनीतिक बैठक नहीं था। इस सम्मेलन का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि दुनिया एक साथ युद्ध, प्रतिबंध, व्यापार युद्ध, ऊर्जा संकट, डॉलर-निर्भरता, तकनीकी वर्चस्व और वैश्विक संस्थाओं की प्रतिनिधित्वहीनता से जूझ रही है। ऐसे समय भारत की अध्यक्षता में जारी “नई दिल्ली घोषणा” ने BRICS को केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह बनाए रखने के बजाय वैश्विक शासन-व्यवस्था को बदलने की महत्वाकांक्षा को अधिक स्पष्ट रूप दिया है। घोषणा में 140 बिंदु हैं और इसमें राजनीतिक सुरक्षा, आर्थिक- वित्तीय सहयोग तथा सामाजिक-सांस्कृतिक सहयोग के तीनों स्तंभों को आगे बढ़ाने की बात कही गई है।

लेकिन इस घोषणा की असली परीक्षा उसके शब्दों में नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन में होगी। दुनिया में घोषणाओं की कमी नहीं है; कमी उन संस्थाओं और नीतियों की है जो घोषणाओं को वास्तविक शक्ति में बदल सकें।

BRICS अब केवल पांच देशों का क्लब नहीं

BRICS की पुरानी छवि अब अप्रासंगिक हो चुकी है। इसके वर्तमान ढांचे में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। यही विस्तार इसकी ताकत भी है और कमजोरी भी।

एक तरफ यह समूह एशिया, अफ्रीका, मध्य-पूर्व और लैटिन अमेरिका के बड़े हिस्से को एक मंच पर लाता है। दूसरी तरफ इसके सदस्य देशों के बीच राजनीतिक और रणनीतिक मतभेद भी गंभीर हैं।

भारत और चीन के बीच सीमा और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है। ईरान और UAE के क्षेत्रीय हित कई मामलों में टकराते हैं। रूस पश्चिम के साथ युद्ध और प्रतिबंधों में घिरा है, जबकि भारत और UAE पश्चिमी देशों के साथ भी गहरे आर्थिक संबंध रखते हैं।

इसलिए BRICS को NATO जैसा सैन्य गठबंधन समझना भूल होगी।

BRICS की ताकत एकरूपता में नहीं, बल्कि विविधता के बावजूद सहमति बनाने की क्षमता में है।

नई दिल्ली में यही सबसे कठिन परीक्षा थी।


ईरान युद्ध ने BRICS की असली परीक्षा ली

सम्मेलन ऐसे समय हुआ जब पश्चिम एशिया में युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा और व्यापार व्यवस्था को झकझोर दिया है। ईरान और UAE दोनों BRICS के सदस्य हैं, लेकिन युद्ध को लेकर उनकी परिस्थितियां अलग हैं। इस पृष्ठभूमि में संयुक्त घोषणा पर सहमति बनाना आसान नहीं था। Reuters के अनुसार, भारत को मतभेदों को पाटने के लिए लगातार बातचीत करनी पड़ी और अंततः दोनों पक्षों ने ऐसी भाषा स्वीकार की जिसमें किसी एक देश को सीधे निशाना नहीं बनाया गया।

नई दिल्ली घोषणा ने पश्चिम एशिया की स्थिति पर गंभीर चिंता जताई और सभी पक्षों से “अधिकतम संयम” बरतने का आह्वान किया। साथ ही नागरिकों और नागरिक ढांचे की सुरक्षा तथा संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान पर जोर दिया गया।

यह भाषा कूटनीतिक रूप से सावधानीपूर्ण है, लेकिन इसका महत्व कम नहीं है।

BRICS ने यह संदेश दिया है कि वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था केवल पश्चिमी शक्तियों द्वारा तय नहीं की जा सकती।


BRICS की सबसे बड़ी लड़ाई डॉलर से ज्यादा वैश्विक संस्थाओं पर है

BRICS के बारे में अक्सर कहा जाता है कि इसका उद्देश्य डॉलर को खत्म करना है। यह अतिरंजित निष्कर्ष है।

नई दिल्ली घोषणा ने कोई साझा BRICS मुद्रा स्थापित नहीं की। इसके बजाय सदस्य देशों की स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और निवेश को बढ़ाने तथा सीमा-पार भुगतान प्रणालियों की पारस्परिकता पर काम आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है। BRICS Payment Task Force को तेज, कम लागत वाली और सुरक्षित सीमा-पार भुगतान व्यवस्था विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ाया जा रहा है।

इसका अर्थ डॉलर का तत्काल अंत नहीं है।

इसका अर्थ है—एकाधिकार पर निर्भरता कम करने की कोशिश।

यह अंतर समझना जरूरी है।

यदि भारत रूस से व्यापार रुपये-रूबल में कर सके, चीन अपने व्यापारिक साझेदारों के साथ युआन का इस्तेमाल बढ़ा सके, UAE और अन्य सदस्य स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन कर सकें और इन प्रणालियों को जोड़ने के लिए सुरक्षित डिजिटल ढांचा तैयार हो सके, तो वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में विकल्प पैदा होंगे।

यही BRICS की असली आर्थिक रणनीति है।


IMF और विश्व बैंक पर सीधा सवाल

BRICS वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक प्रमुखों ने भी IMF और विश्व बैंक जैसी वैश्विक विकास वित्त संस्थाओं में सुधार की मांग की है। उनका तर्क है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में उभरती अर्थव्यवस्थाओं का वजन बढ़ चुका है, लेकिन वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में उनका प्रतिनिधित्व उसी अनुपात में नहीं बढ़ा।

यह सिर्फ कूटनीतिक शिकायत नहीं है।

दुनिया की आर्थिक शक्ति का भूगोल बदल चुका है। लेकिन संस्थागत ढांचा अभी भी काफी हद तक उस दौर की राजनीतिक वास्तविकताओं से प्रभावित है जिसमें पश्चिमी औद्योगिक शक्तियां वैश्विक अर्थव्यवस्था पर निर्णायक नियंत्रण रखती थीं।

BRICS का प्रश्न सीधा है:

यदि आर्थिक योगदान बदल गया है, तो निर्णय लेने की शक्ति क्यों नहीं बदले?

यही नई दिल्ली घोषणा की राजनीतिक रीढ़ है।


NDB: घोषणाओं से ज्यादा महत्वपूर्ण संस्थान

BRICS का सबसे ठोस संस्थागत प्रयोग New Development Bank (NDB) है।

यदि BRICS वास्तव में वैकल्पिक वैश्विक आर्थिक ढांचा बनाना चाहता है, तो उसे भाषणों से आगे बढ़कर वित्त उपलब्ध कराना होगा।

इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा, परिवहन, डिजिटल नेटवर्क, स्वास्थ्य, जल और कृषि में विकासशील देशों को दीर्घकालिक वित्त की आवश्यकता है।

NDB को स्थानीय मुद्रा में वित्तपोषण, संसाधनों के विविधीकरण और विकास परियोजनाओं के विस्तार की दिशा में मजबूत करने की बात की गई है।

यहीं BRICS की वास्तविक क्षमता छिपी है।

एक नई वैश्विक व्यवस्था नारे से नहीं बनती; बैंक, भुगतान नेटवर्क, बाजार, तकनीक और संस्थान बनाकर बनती है।


व्यापार युद्ध के खिलाफ BRICS का कठोर संदेश

नई दिल्ली घोषणा ने एकतरफा शुल्क और गैर-शुल्क व्यापारिक बाधाओं पर गंभीर चिंता जताई है। BRICS ने अधिक न्यायपूर्ण, समावेशी और नियम-आधारित बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था की आवश्यकता दोहराई।

यह संदेश वर्तमान वैश्विक व्यापार युद्ध के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

आज टैरिफ केवल राजस्व का साधन नहीं हैं। उनका इस्तेमाल राजनीतिक दबाव, राष्ट्रीय सुरक्षा, औद्योगिक नीति और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के हथियार के रूप में भी हो रहा है।

समस्या यह है कि शक्तिशाली देश जब व्यापार नियमों को अपने हित में मोड़ते हैं, तो सबसे ज्यादा चोट विकासशील देशों को लगती है।

BRICS इस व्यवस्था को चुनौती दे रहा है।

लेकिन यहां भी सवाल वही है—क्या BRICS खुद एक पारदर्शी और न्यायपूर्ण व्यापार व्यवस्था बना पाएगा?


किसान और कृषि को लेकर घोषणा का महत्व

नई दिल्ली घोषणा का एक कम चर्चित लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष कृषि है।

BRICS ने छोटे किसानों, पारिवारिक किसानों, पशुपालकों, मछुआरों, महिलाओं और युवाओं की भूमिका को स्वीकार किया है। कृषि में agroecology, regenerative agriculture, climate resilience, digital technology और genetic resources पर सहयोग बढ़ाने की दिशा में पहल की गई है।

BRICS AGRIN, किसान-केंद्रित बीज और आनुवंशिक संसाधन सहयोग तथा BRICS Grain Exchange जैसे विचार भविष्य में कृषि व्यापार और खाद्य सुरक्षा की दिशा बदल सकते हैं।

लेकिन यहां भारत को विशेष सावधानी बरतनी होगी।

यदि BRICS कृषि सहयोग का अर्थ केवल बड़े व्यापारिक घरानों के लिए सीमा-पार कृषि बाजार खोलना बन गया, तो किसान फिर वही पुराना शिकार बनेगा—उत्पादक किसान और मुनाफा किसी और का।

किसान-केंद्रित BRICS कृषि नीति का अर्थ होना चाहिए:

  • स्थानीय बीजों की सुरक्षा,
  • फसल विविधता,
  • किसान की बीज पर पहुंच,
  • छोटे किसानों की बाजार शक्ति,
  • उचित मूल्य,
  • जलवायु-सहिष्णु कृषि,
  • सार्वजनिक कृषि अनुसंधान,
  • सस्ती कृषि तकनीक।

कृषि को केवल व्यापार की वस्तु बनाना BRICS की सबसे बड़ी भूल होगी।


ऊर्जा पर पश्चिमी मॉडल को चुनौती

नई दिल्ली घोषणा ने ऊर्जा संक्रमण को “न्यायपूर्ण, व्यवस्थित, समान और समावेशी” बनाने की बात कही है। साथ ही यह स्वीकार किया गया है कि विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए जीवाश्म ईंधन अभी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

यह भारत के लिए महत्वपूर्ण है।

विकसित देशों ने औद्योगिकीकरण के दौरान दशकों तक जीवाश्म ईंधन का उपयोग किया। अब यदि विकासशील देशों से कहा जाए कि वे उसी गति से अपने ऊर्जा स्रोत बदलें, लेकिन उन्हें पर्याप्त वित्त और तकनीक न मिले, तो यह न्यायपूर्ण व्यवस्था नहीं होगी।

भारत इसलिए ऊर्जा संक्रमण को विकास, ऊर्जा सुरक्षा और वहनीयता से जोड़ रहा है।

BRICS ने critical minerals, resilient supply chains और ऊर्जा प्रणालियों के डिजिटलकरण पर भी सहयोग का समर्थन किया है।


AI: अगली आर्थिक लड़ाई

नई दिल्ली घोषणा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कृत्रिम बुद्धिमत्ता है।

AI आने वाले दशक में वही रणनीतिक भूमिका निभा सकता है जो तेल, परमाणु ऊर्जा और इंटरनेट ने अलग-अलग दौर में निभाई।

यदि AI के मॉडल, डेटा, कंप्यूटिंग शक्ति और डिजिटल अवसंरचना कुछ ही देशों और कंपनियों के नियंत्रण में रहती है, तो विकासशील देशों की तकनीकी निर्भरता और बढ़ेगी।

BRICS ने इसलिए AI को अधिक समावेशी, भरोसेमंद और Global South की जरूरतों के अनुरूप बनाने पर जोर दिया है।

भारत के लिए यह बड़ा अवसर है।

भारत के पास डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, विशाल डिजिटल बाजार और तकनीकी प्रतिभा है। यदि भारत BRICS के भीतर डिजिटल सार्वजनिक ढांचे और AI सहयोग को वास्तविक संस्थागत रूप दे सके, तो वह केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि नियम बनाने वाली शक्ति बन सकता है।


आतंकवाद पर भारत की स्पष्ट जीत

नई दिल्ली घोषणा में आतंकवाद, उसके वित्तपोषण, सुरक्षित ठिकानों और कट्टरपंथी नेटवर्क के खिलाफ कठोर रुख अपनाया गया।

भारत के लिए यह मुद्दा केवल विदेश नीति का विषय नहीं है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मूल प्रश्न है।

BRICS द्वारा आतंकवाद के खिलाफ साझा प्रतिबद्धता भारत की लंबे समय से चली आ रही मांग को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूती देती है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि भारत ने BRICS को केवल आर्थिक मंच के रूप में नहीं चलाया। उसने आतंकवाद, संघर्ष, वैश्विक सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानून को भी एजेंडे में प्रमुख स्थान दिया।


फिलिस्तीन और पश्चिम एशिया पर Global South की आवाज

BRICS ने फिलिस्तीनी प्रश्न को भी प्रमुखता दी है और दो-राष्ट्र समाधान, मानवीय सहायता तथा फिलिस्तीनी आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन किया है।

यह पश्चिमी देशों और Global South के बीच बढ़ते राजनीतिक अंतर को दिखाता है।

BRICS का संदेश साफ है:

अंतरराष्ट्रीय कानून का इस्तेमाल चयनात्मक तरीके से नहीं हो सकता।

यदि संप्रभुता और नागरिक सुरक्षा का सिद्धांत कहीं लागू होता है, तो उसे हर जगह लागू होना चाहिए।

यही BRICS की नैतिक और राजनीतिक चुनौती भी है—उसे अपने सभी सदस्यों के व्यवहार पर समान सिद्धांत लागू करने होंगे।


भारत की असली उपलब्धि क्या है?

भारत ने इस सम्मेलन में सबसे बड़ी उपलब्धि कोई नया संगठन बनाकर नहीं, बल्कि सहमति बचाकर हासिल की है।

मई में BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक में संयुक्त बयान जारी नहीं हो पाया था। ईरान और UAE के बीच मतभेद बड़ी बाधा बने थे। सितंबर में भारत ने उन्हीं परिस्थितियों के बीच सर्वसम्मत घोषणा हासिल की।

यह भारत की कूटनीतिक क्षमता की परीक्षा थी।

भारत का मॉडल स्पष्ट है:

अमेरिका का विरोध करके चीन के साथ खड़ा होना नहीं; चीन का विरोध करके अमेरिका के साथ खड़ा होना भी नहीं।

भारत की नीति है—रणनीतिक स्वायत्तता।

भारत रूस से ऊर्जा और रक्षा संबंध रखता है। अमेरिका और यूरोप के साथ तकनीकी और आर्थिक साझेदारी बढ़ाता है। चीन के साथ प्रतिस्पर्धा भी करता है और संवाद भी। ईरान और खाड़ी देशों से संबंध भी बनाए रखता है।

यही बहुध्रुवीय दुनिया में भारत की उपयोगिता है।


लेकिन BRICS की सबसे बड़ी कमजोरी भी सामने है

BRICS जितना बड़ा हो रहा है, उतना ही विविध हो रहा है।

और विविधता सहमति को कठिन बनाती है।

यदि हर महत्वपूर्ण मुद्दे पर सदस्य देश अपने-अपने राष्ट्रीय हित के कारण अलग-अलग दिशा में खड़े होंगे, तो BRICS केवल घोषणाओं का मंच बनकर रह जाएगा।

इसलिए अगला चरण निर्णायक है।

स्थानीय मुद्रा भुगतान कब बड़े पैमाने पर चलेगा?

NDB कितना बड़ा वित्तीय विकल्प बनेगा?

BRICS Grain Exchange किसानों के लिए क्या बदलेगा?

AI सहयोग किस रूप में दिखाई देगा?

क्या IMF और World Bank सुधार की मांग वास्तविक दबाव में बदल पाएगी?

क्या BRICS अपने राजनीतिक मतभेदों के बावजूद आर्थिक एकीकरण कर पाएगा?

इन सवालों के उत्तर ही BRICS के भविष्य का निर्धारण करेंगे।


2027 में चीन की अध्यक्षता असली परीक्षा होगी

नई दिल्ली घोषणा के अंतिम बिंदु में चीन की 2027 की अध्यक्षता और अगले BRICS शिखर सम्मेलन के चीन में आयोजन को समर्थन दिया गया है।

यहीं से नई चुनौती शुरू होगी।

भारत ने जिस BRICS को बहुध्रुवीय, समावेशी और Global South-केंद्रित मंच बनाने की कोशिश की है, क्या चीन उसी दिशा को आगे बढ़ाएगा?

या BRICS धीरे-धीरे चीनी आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव का मंच बनने लगेगा?

यह प्रश्न भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भारत को BRICS के भीतर सक्रिय रहना होगा, लेकिन उसे यह सुनिश्चित भी करना होगा कि बहुध्रुवीयता का अर्थ एक पश्चिमी वर्चस्व की जगह चीनी वर्चस्व स्थापित करना न बन जाए।


निष्कर्ष: नई दिल्ली घोषणा इतिहास नहीं, एक संभावना है

नई दिल्ली में BRICS ने कोई नई विश्व सरकार नहीं बनाई। उसने डॉलर को समाप्त नहीं किया। कोई साझा सेना नहीं बनाई। कोई साझा मुद्रा नहीं बनाई।

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लेकिन उसने एक अधिक महत्वपूर्ण काम शुरू किया है—विकल्पों का निर्माण।

वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था।
वैकल्पिक विकास वित्त।

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स्थानीय मुद्रा व्यापार।
तकनीकी सहयोग।
कृषि सहयोग।
AI शासन।

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ऊर्जा सुरक्षा।
Global South की राजनीतिक आवाज।

यही नई दिल्ली घोषणा का वास्तविक महत्व है।

आज की दुनिया में शक्ति केवल सैन्य हथियारों से तय नहीं होती। भुगतान प्रणाली, डेटा, AI, ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, तकनीक, बैंकिंग और आपूर्ति श्रृंखलाएं भी शक्ति हैं।

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BRICS इन सभी क्षेत्रों में धीरे-धीरे अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है।

लेकिन कठोर सच यह है कि घोषणा-पत्र से विश्व व्यवस्था नहीं बदलती।

विश्व व्यवस्था तब बदलती है जब घोषणा संस्थान बनती है, संस्थान पूंजी बनाते हैं, पूंजी उत्पादन को बदलती है और उत्पादन लोगों के जीवन में बदलाव लाता है।

नई दिल्ली ने BRICS को दिशा दी है।

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अब असली सवाल है—क्या सदस्य देश उस दिशा में चलने का साहस दिखाएंगे?

अगर ऐसा हुआ तो BRICS पश्चिम के खिलाफ कोई नया गुट नहीं, बल्कि एक ऐसी बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था की आधारशिला बन सकता है जिसमें Global South केवल बाजार और संसाधनों का स्रोत नहीं, बल्कि नियम बनाने वाली शक्ति भी हो।

और यही नई दिल्ली 2026 का सबसे बड़ा संदेश है।

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