“नशे में डूबता युवा, मोबाइल में कैद पीढ़ी और भ्रष्टाचार में डूबती व्यवस्था—आखिर गलती किसकी है?

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“नशे में डूबता युवा, मोबाइल में कैद पीढ़ी और भ्रष्टाचार में डूबती व्यवस्था—आखिर गलती किसकी है?

जिस दिन समाज ने सवाल पूछना छोड़ दिया, उसी दिन भ्रष्टाचार जीत गया

शिक्षा की असमानता, बेरोजगार युवा, नशे का फैलता जाल और डिजिटल युग की सामाजिक विडंबना पर एक जरूरी सवाल

लेखक: Ch. Sudhir Taliyan

किसी देश का संकट हमेशा उसकी अर्थव्यवस्था के आंकड़ों में दिखाई नहीं देता। कई बार संकट उस युवा की आंखों में दिखाई देता है, जिसने पढ़ाई तो की है लेकिन रोजगार नहीं मिला; उस गरीब पिता के चेहरे पर दिखाई देता है, जो अपने बच्चे को अच्छे स्कूल में पढ़ाना चाहता है लेकिन फीस उसके सामर्थ्य से बाहर है; उस मां की चिंता में दिखाई देता है जिसका बेटा देर रात तक मोबाइल पर है और उसे पता नहीं कि वह ज्ञान अर्जित कर रहा है या किसी अदृश्य डिजिटल जाल में फंस रहा है।

और संकट उस नागरिक की चुप्पी में सबसे अधिक दिखाई देता है, जो भ्रष्टाचार को देखकर कहता है—“यह तो ऐसे ही चलता है।”

यही वाक्य किसी भी लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।

भारत आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। हमारे पास डिजिटल भुगतान है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता है, अंतरिक्ष अभियान हैं, एक्सप्रेसवे हैं और विश्व राजनीति में बढ़ता प्रभाव है। लेकिन विकास की चमक के पीछे एक दूसरा भारत भी खड़ा है—वह भारत जहां अवसर समान नहीं हैं, शिक्षा समान नहीं है, रोजगार सुनिश्चित नहीं है और भविष्य का भरोसा कमजोर पड़ रहा है।

सवाल यह नहीं कि भारत आगे बढ़ रहा है या नहीं।

सवाल यह है कि भारत के साथ कौन आगे बढ़ रहा है और कौन पीछे छूट रहा है?

असमानता केवल पैसे की नहीं, अवसरों की भी है

World Inequality Lab के अनुमानों के अनुसार 2022-23 में भारत की कुल संपत्ति का लगभग 40.1 प्रतिशत हिस्सा शीर्ष 1 प्रतिशत के पास था।

यह आंकड़ा केवल अमीर और गरीब के बीच अंतर नहीं बताता। यह उस व्यवस्था की तस्वीर प्रस्तुत करता है जिसमें आर्थिक संसाधनों के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, नेटवर्क, पूंजी और अवसर भी कुछ हाथों में केंद्रित हो सकते हैं।

गरीबी का सबसे क्रूर रूप वह है जिसमें गरीब व्यक्ति केवल आज गरीब नहीं रहता, बल्कि उसके बच्चों के भविष्य पर भी गरीबी की मुहर लग जाती है।

एक संपन्न परिवार का बच्चा खराब परीक्षा दे सकता है और फिर भी दूसरा अवसर पा सकता है। गरीब परिवार का बच्चा यदि एक अवसर खो दे तो उसके सामने दूसरा अवसर अक्सर होता ही नहीं।

यही अवसरों की असमानता है।

और यही वह बिंदु है जहां सरकार की नीतियों की परीक्षा होती है।

सरकार का काम केवल आर्थिक वृद्धि का वातावरण बनाना नहीं है। उसकी जिम्मेदारी यह भी है कि आर्थिक वृद्धि का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने योग्य अवसरों में बदले।

शिक्षा का अर्थ स्कूल की इमारत नहीं

हमने शिक्षा को अक्सर भवन, नामांकन और परीक्षा परिणामों के आंकड़ों में सीमित कर दिया है।

लेकिन असली सवाल है—बच्चा सीख क्या रहा है?

ASER 2024 ने ग्रामीण भारत की शिक्षा की तस्वीर को व्यापक स्तर पर सामने रखा। रिपोर्ट ने 26 राज्यों और दो केंद्रशासित प्रदेशों में छह लाख से अधिक बच्चों को सर्वेक्षण में शामिल किया और पहली बार 14-16 वर्ष के बच्चों की डिजिटल पहुंच, उपयोग और डिजिटल कौशल पर भी प्रतिनिधि आंकड़े जुटाए।

रिपोर्ट में आठवीं कक्षा के बच्चों में बुनियादी अंकगणित करने की क्षमता 2024 में 45.8 प्रतिशत दर्ज हुई।

यह आंकड़ा किसी सरकार के खिलाफ आरोप-पत्र नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है।

हम बच्चों को स्मार्टफोन दे रहे हैं, लेकिन क्या हम उन्हें पर्याप्त पुस्तकें दे रहे हैं?

हम डिजिटल कक्षाओं की बात कर रहे हैं, लेकिन क्या हर बच्चा बुनियादी गणित और भाषा में सक्षम हो रहा है?

हम शिक्षा को भविष्य की चाबी कहते हैं, लेकिन यदि उस चाबी से दरवाजा खुल ही न सके तो समस्या बच्चे में नहीं, व्यवस्था में है।

युवा बेरोजगार ही नहीं, अनिश्चित भविष्य का शिकार है

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका युवा है—यह वाक्य हम वर्षों से सुनते आए हैं।

लेकिन युवा शक्ति तभी राष्ट्रीय शक्ति बनती है जब उसके पास शिक्षा, कौशल, रोजगार और सम्मानजनक जीवन की संभावना हो।

PLFS 2025 के अनुसार 15-29 वर्ष आयु वर्ग की अखिल भारतीय बेरोजगारी दर 9.9 प्रतिशत रही। ग्रामीण युवाओं के लिए यह 8.3 प्रतिशत और शहरी युवाओं के लिए 13.6 प्रतिशत थी। युवा महिलाओं के लिए तस्वीर और कठिन रही—शहरी युवा महिलाओं की बेरोजगारी दर 18.9 प्रतिशत थी।

इन आंकड़ों को केवल सांख्यिकीय तालिका समझना भूल होगी।

हर प्रतिशत के पीछे लाखों जीवन हैं।

एक युवा जिसने वर्षों तक पढ़ाई की, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की, परिवार से पैसे लिए, उम्र की सीमा पार होने का डर झेला और अंततः नौकरी नहीं मिली—उसके भीतर पैदा होने वाली निराशा को किसी GDP आंकड़े से नहीं मापा जा सकता।

जब व्यवस्था मेहनत और परिणाम के बीच भरोसेमंद संबंध स्थापित नहीं कर पाती, तब युवा का विश्वास कमजोर होता है।

और जिस युवा का व्यवस्था पर विश्वास टूटता है, वह किसी भी नकारात्मक प्रभाव के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकता है।

नशे का कारोबार केवल सीमा पार से नहीं आता

नशे के खिलाफ लड़ाई को केवल पुलिस और कानून का विषय मानना पर्याप्त नहीं है।

नशे का बाजार वहां फलता है जहां मांग पैदा होती है।

और मांग केवल अपराधी नहीं पैदा करते। कभी-कभी निराशा, अकेलापन, बेरोजगारी, सामाजिक दबाव और भविष्य का भय भी इसके लिए जमीन तैयार करते हैं।

इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि हर बेरोजगार युवा नशे की ओर जाता है। ऐसा निष्कर्ष आंकड़ों के बिना गलत होगा।

लेकिन यह जरूर समझना होगा कि सामाजिक असुरक्षा जोखिम बढ़ाने वाली परिस्थितियां पैदा कर सकती है।

इसलिए नशामुक्ति नीति के तीन स्तंभ होने चाहिए—तस्करी पर कठोर कार्रवाई, नशे के आदी व्यक्ति का उपचार और युवाओं के लिए स्वस्थ सामाजिक विकल्प।

हर जिले में खेल परिसर क्यों नहीं?

हर बड़े शिक्षण संस्थान में परामर्श केंद्र क्यों नहीं?

हर ब्लॉक में कौशल और रोजगार सहायता केंद्र क्यों नहीं?

हर गांव में युवाओं के लिए पुस्तकालय और सामुदायिक गतिविधियों की जगह क्यों नहीं?

जिस समाज ने युवा के लिए मैदान नहीं बनाया, वह नशे के बाजार को मैदान क्यों दे रहा है?

मोबाइल ने सुविधा दी है, लेकिन हमारी एकाग्रता भी छीन रहा है

मोबाइल को खलनायक बनाना आसान है। लेकिन समस्या इतनी सरल नहीं है।

मोबाइल शिक्षा का साधन भी है, रोजगार का माध्यम भी, बैंकिंग की सुविधा भी और सूचना का विशाल स्रोत भी।

समस्या तब शुरू होती है जब तकनीक उपकरण से आदत और आदत से निर्भरता में बदल जाती है।

ASER 2024 ने 14-16 वर्ष के बच्चों के बीच डिजिटल पहुंच और कौशल को भी मापा।

अब चुनौती केवल यह नहीं है कि बच्चे के पास स्मार्टफोन है या नहीं।

असली चुनौती है—वह उसका इस्तेमाल किसलिए करता है?

क्या वह सीखने के लिए इंटरनेट का उपयोग करता है या केवल अंतहीन मनोरंजन के लिए?

क्या वह सूचना को जांचना जानता है?

क्या उसे फर्जी खबर और तथ्य में अंतर करना आता है?

क्या वह अपनी निजी जानकारी की सुरक्षा समझता है?

हमें बच्चों को डिजिटल उपकरणों से दूर करने की नहीं, उन्हें डिजिटल दुनिया का विवेकपूर्ण नागरिक बनाने की आवश्यकता है।

भ्रष्टाचार व्यवस्था की बीमारी से समाज की आदत कैसे बन गया?

भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी सफलता यह नहीं कि वह सरकारी कार्यालय में मौजूद है।

उसकी सबसे बड़ी सफलता यह है कि उसने समाज के एक हिस्से को यह समझा दिया है कि उसके बिना काम नहीं चलता।

जब नागरिक रिश्वत देकर अपना काम जल्दी कराने को सामान्य मान लेता है, जब ठेके में कमीशन को व्यापार का हिस्सा समझा जाता है, जब राजनीतिक संरक्षण को योग्यता से ऊपर रखा जाता है और जब भ्रष्ट व्यक्ति को सामाजिक सम्मान मिलता है—तब भ्रष्टाचार केवल प्रशासनिक समस्या नहीं रहता।

वह सामाजिक संस्कार बनने लगता है।

यहीं से राष्ट्र का नैतिक ढांचा टूटता है।

भ्रष्टाचार गरीब के लिए सबसे महंगा है। जिसके पास पैसा नहीं है, वह अपनी वैध सेवा पाने के लिए भी भुगतान करने को मजबूर होता है। उसके लिए रिश्वत केवल पैसा नहीं—उसकी मजबूरी की कीमत है।

इसलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार केवल छापा नहीं, बल्कि पारदर्शी व्यवस्था है।

सरकारी सेवाओं की समय सीमा हो।

प्रक्रियाएं सरल हों।

अधिकतम सेवाएं ऑनलाइन हों, लेकिन डिजिटल बहिष्कार से बचने के लिए सहायता केंद्र भी हों।

सरकारी खर्च का सार्वजनिक ऑडिट हो।

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स्थानीय स्तर पर सामाजिक अंकेक्षण मजबूत हो।

शिकायतकर्ता को सुरक्षा मिले।

और भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई पद देखकर नहीं, अपराध देखकर हो।

लेकिन सरकार को दोष देकर समाज मुक्त नहीं हो सकता

यहां समाज को भी कठघरे में खड़ा करना होगा।

हमने गलत के खिलाफ बोलना छोड़ दिया है।

पड़ोसी के बच्चे को नशे में देखते हैं—चुप।

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सरकारी कार्यालय में रिश्वत मांगी जाती है—चुप।

गरीब के साथ भेदभाव होता है—चुप।

स्कूल में शिक्षक नहीं आते—चुप।

सार्वजनिक धन की बर्बादी होती है—चुप।

फिर घर लौटकर व्यवस्था को गाली देते हैं।

यह विरोध नहीं है।

यह सुविधा की राजनीति है।

लोकतंत्र में नागरिक केवल मतदाता नहीं होता। वह निगरानीकर्ता भी होता है।

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सरकार को जनता के सवालों से डरना नहीं चाहिए और जनता को सरकार से सवाल पूछने में डरना नहीं चाहिए।

समाधान केवल घोषणाओं में नहीं, प्राथमिकताओं में है

भारत को अब कुछ स्पष्ट राष्ट्रीय प्राथमिकताओं की आवश्यकता है।

पहली—शिक्षा में समान अवसर। सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता को राजनीतिक मुद्दा बनाया जाए। हर जिले में सीखने के परिणामों का सार्वजनिक मूल्यांकन हो।

दूसरी—युवा रोजगार का वास्तविक रोडमैप। केवल भर्ती की घोषणा पर्याप्त नहीं। कौशल, अप्रेंटिसशिप, स्थानीय उद्योग, कृषि-आधारित रोजगार और छोटे उद्यमों को मजबूत करना होगा।

तीसरी—नशामुक्ति की समग्र नीति। तस्करों पर कठोर कार्रवाई के साथ उपचार और पुनर्वास को स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाए।

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चौथी—डिजिटल अनुशासन। स्कूलों में डिजिटल साक्षरता, साइबर सुरक्षा, सूचना की सत्यता और स्क्रीन व्यवहार को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए।

पांचवीं—भ्रष्टाचार के खिलाफ संस्थागत पारदर्शिता। व्यक्ति बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती; प्रक्रिया बदलनी पड़ती है।

छठी—नागरिक भागीदारी। ग्रामसभा, नगर निकाय, स्कूल प्रबंधन समितियां और सामाजिक अंकेक्षण केवल कागजी संस्थाएं न रहें।

असली संकट सरकार से बड़ा है

हमारी समस्या केवल यह नहीं कि सरकार दूरदर्शी है या अदूरदर्शी।

समस्या यह भी है कि समाज ने अपनी सामूहिक शक्ति को पहचानना बंद कर दिया है।

सरकारें बदलती रहती हैं। नीतियां बदलती रहती हैं। राजनीतिक चेहरे आते-जाते रहते हैं।

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लेकिन समाज की चेतना यदि सो जाए तो कोई सरकार उसे हमेशा के लिए नहीं जगा सकती।

परिवर्तन संसद से भी शुरू हो सकता है और सड़क से भी। वह किसी नीति से भी शुरू हो सकता है और किसी शिक्षक के एक निर्णय से भी। वह किसी आंदोलन से भी जन्म ले सकता है और किसी नागरिक के उस छोटे-से फैसले से भी कि वह रिश्वत नहीं देगा।

इतिहास में हर बड़ी सामाजिक हलचल से पहले एक छोटा-सा सवाल पैदा हुआ है।

क्यों?

क्यों गरीब का बच्चा पीछे रहे?

क्यों युवा नौकरी के लिए वर्षों भटके?

क्यों नशा हमारे बच्चों तक पहुंचे?

क्यों भ्रष्ट व्यक्ति सम्मान पाए?

क्यों गलत देखकर हम चुप रहें?

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और शायद सबसे महत्वपूर्ण—

क्यों हम यह मान लें कि कुछ बदला ही नहीं जा सकता?

परिवर्तन की पहली शर्त है—मौन तोड़ना

आज भारत को केवल आर्थिक विकास की नहीं, नैतिक और सामाजिक पुनर्निर्माण की भी आवश्यकता है।

हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो नौकरी के साथ विवेक दे।

ऐसा विकास चाहिए जो अवसरों का विस्तार करे।

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ऐसी राजनीति चाहिए जो भविष्य की पीढ़ियों के बारे में सोचे।

ऐसा प्रशासन चाहिए जिसमें नागरिक को अपना काम कराने के लिए किसी बिचौलिए की आवश्यकता न हो।

और ऐसा समाज चाहिए जो गलत को देखकर सिर झुकाने के बजाय आवाज उठाए।

क्योंकि भ्रष्टाचार की ताकत भ्रष्ट लोगों की संख्या से नहीं बढ़ती; वह ईमानदार लोगों की चुप्पी से बढ़ती है।

और परिवर्तन भीड़ से नहीं, चेतना से पैदा होता है।

शायद आज जरूरत किसी बड़े नारे की नहीं है।

जरूरत केवल एक नागरिक के उस निर्णय की है—

मैं गलत को सामान्य नहीं मानूंगा।

एक शिक्षक कहे—मैं बच्चे की क्षमता को उसकी आर्थिक स्थिति से नहीं आंकूंगा।

एक अभिभावक कहे—मैं अपने बच्चे को केवल नौकरी नहीं, जिम्मेदारी भी सिखाऊंगा।

एक युवा कहे—मैं निराशा को अपनी पहचान नहीं बनने दूंगा।

एक नागरिक कहे—मैं भ्रष्टाचार में भागीदार नहीं बनूंगा।

और समाज कहे—

अन्याय चाहे कितना भी पुराना हो, उसे स्वीकार करना हमारी नियति नहीं है।

यही वह क्षण होगा जब लोकतंत्र केवल संविधान की किताब में नहीं, नागरिक के चरित्र में दिखाई देगा।

क्योंकि अंततः किसी भी देश का भविष्य उसकी सरकारों से अधिक उसके नागरिकों की चेतना तय करती है।

और परिवर्तन के लिए कभी-कभी सचमुच केवल एक आवाज काफी होती है—बशर्ते वह आवाज बिके नहीं, डरे नहीं और थके नहीं।

— Ch. Sudhir Taliyan

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