किसान को फसल नहीं, पूरी कृषि अर्थव्यवस्था बदलनी होगी—वरना धरना, लाठी,बदनामी,मुकद्दमे, घाटा और कर्ज का चक्र चलता रहेगा

MSP, सरकारी खरीद और बढ़ती लागत के बीच किसान लगातार घाटा क्यों उठाए? जानिए क्यों फसल योजना बदलकर नकदी, औषधीय, बागवानी और मूल्यवर्धित खेती की ओर बढ़ने का समय आ गया है।

किसान को फसल नहीं, पूरी कृषि अर्थव्यवस्था बदलनी होगी—वरना धरना, लाठी,बदनामी,मुकद्दमे, घाटा और कर्ज का चक्र चलता रहेगा

By- Chaudhary Sudhir Talyan

भारतीय कृषि की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि किसान जिस फसल को पैदा करता है, उसी फसल को बेचने के लिए उसे बार-बार संघर्ष करना पड़ता है। खेत में पसीना किसान बहाता है, जोखिम किसान उठाता है, लागत किसान लगाता है, मौसम की मार किसान झेलता है और अंत में बाजार में कीमत तय करने की ताकत अक्सर किसी और के हाथ में होती है। फिर किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP की मांग करता है। खरीद केंद्र पर जाता है। खरीद में देरी होती है तो धरना देता है। सड़क पर उतरता है। पुलिस की लाठियां खाता है। मुकदमे झेलता है। राजनीतिक आरोपों का सामना करता है। फसल औने-पौने दाम पर बेचता है और अंततः कर्ज के चक्र में फंस जाता है।

यह स्थिति सामान्य नहीं मानी जानी चाहिए।

सवाल अब केवल यह नहीं है कि सरकार MSP देगी या नहीं। सवाल यह भी है कि क्या किसान ऐसी फसल-व्यवस्था में लगातार उत्पादन करता रहे जिसमें उत्पादन के बाद कीमत, खरीद और बाजार—तीनों के लिए उसे संघर्ष करना पड़ता है?

यहीं से भारतीय किसान के लिए फसल-योजना पर पुनर्विचार का प्रश्न पैदा होता है।

खाद्यान्न उत्पादन आवश्यक है, लेकिन किसान का घाटा भी राष्ट्रीय चिंता है

देश की खाद्य सुरक्षा के लिए गेहूं, धान, दाल और अन्य खाद्यान्नों का उत्पादन अनिवार्य है। भारत जैसे विशाल देश में खाद्य सुरक्षा को बाजार के भरोसे पूरी तरह नहीं छोड़ा जा सकता। लेकिन खाद्य सुरक्षा का पूरा बोझ किसान की आय पर डाल देना भी कोई स्थायी समाधान नहीं है।

यदि किसी फसल में किसान की लागत लगातार बढ़ती जाए, पानी और बिजली की लागत बढ़े, मजदूरी बढ़े, डीजल और कृषि मशीनरी महंगी हो, उर्वरक एवं कीटनाशक महंगे हों और इसके बावजूद बिक्री मूल्य लागत और जोखिम के अनुपात में पर्याप्त न हो, तो केवल उत्पादन बढ़ाते जाने को कृषि नीति की सफलता नहीं कहा जा सकता।

किसान को यह अधिकार होना चाहिए कि वह पूछे—मेरी जमीन, मेरा पानी, मेरी पूंजी और मेरा श्रम किस फसल में सबसे बेहतर आर्थिक परिणाम देगा?

कृषि नीति का उद्देश्य केवल देश के लिए अनाज पैदा करवाना नहीं हो सकता। उसका उद्देश्य किसान को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना भी होना चाहिए।

कमजोर मानसून ने फिर खोल दी कृषि व्यवस्था की कमजोरी

कमजोर मानसून या वर्षा के असमान वितरण का असर केवल खेत की पैदावार पर नहीं पड़ता। इसका असर सीधे बाजार पर जाता है। कम उत्पादन होने पर अनाज, दलहन, तिलहन और सब्जियों की कीमतों में दबाव बढ़ सकता है। उत्पादन घटता है तो घरेलू आपूर्ति प्रभावित होती है और आयात की आवश्यकता बढ़ सकती है।

विशेषकर दलहन और तिलहन के मामले में भारत की आयात-निर्भरता का प्रश्न बार-बार सामने आता है। उत्पादन घटने पर खाद्य तेलों और दालों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

लेकिन यहां भी किसान की स्थिति विचित्र है।

जब उत्पादन अधिक होता है तो बाजार भाव गिरने का खतरा रहता है। जब उत्पादन कम होता है तो उपभोक्ता महंगाई बढ़ती है और सरकार बाजार को नियंत्रित करने के लिए आयात, स्टॉक सीमा या अन्य उपायों पर विचार करती है। किसान दोनों स्थितियों में दबाव में आ सकता है।

यानी कृषि बाजार में जोखिम किसान का, लेकिन निर्णय और नियंत्रण का बड़ा हिस्सा दूसरे हाथों में।

यह व्यवस्था कब तक चलेगी?

MSP की घोषणा पर्याप्त नहीं

धान की खरीद में देरी को लेकर हरियाणा में किसानों की नाराजगी इसी मूल समस्या की ओर संकेत करती है। MSP घोषित होना एक बात है और उस MSP पर समय पर, पर्याप्त मात्रा में और पारदर्शी तरीके से सरकारी खरीद होना दूसरी बात।

किसान के लिए MSP केवल सरकारी अधिसूचना का शब्द नहीं है। उसके लिए MSP तब मायने रखता है जब वह अपनी फसल को वास्तविक रूप से उस कीमत के आसपास बेच सके।

यदि किसान को फसल बेचने के लिए कई दिन मंडी में खड़ा रहना पड़े, नमी या गुणवत्ता के नाम पर कटौती हो, खरीद में देरी हो या अंततः मजबूरी में कम कीमत पर फसल बेचनी पड़े, तो कागज पर मौजूद MSP किसान की आय सुरक्षा नहीं बन सकता।

इसीलिए किसान संगठनों की MSP संबंधी मांगों को केवल राजनीतिक मांग मानकर खारिज करना समस्या का समाधान नहीं है। लेकिन दूसरी ओर किसान के सामने भी एक कठिन आर्थिक प्रश्न है—क्या हर बार ऐसी फसल उगाना समझदारी है जिसकी बिक्री के समय कीमत और खरीद व्यवस्था दोनों अनिश्चित हों?

यहीं किसान की फसल-रणनीति महत्वपूर्ण हो जाती है।

किसान को अब केवल उत्पादन नहीं, बाजार भी उगाना होगा

किसान को अपनी कृषि योजना बदलने के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए।

इसका अर्थ यह नहीं कि किसान खाद्यान्न उत्पादन पूरी तरह छोड़ दे। भारत को इसकी आवश्यकता नहीं है और अनेक क्षेत्रों में भौगोलिक, जलवायु तथा खाद्य-सुरक्षा कारणों से ऐसा करना व्यावहारिक भी नहीं होगा।

लेकिन इसका अर्थ यह अवश्य है कि किसान को अपनी पूरी जमीन एक ही ऐसी फसल के हवाले नहीं करनी चाहिए जिसका अंतिम मूल्य निर्धारण उसके हाथ में नहीं है।

जहां परिस्थितियां अनुकूल हों, वहां किसान को नकदी फसलों, बागवानी, औषधीय एवं सुगंधित पौधों, मसालों, बीज उत्पादन, फूलों, फल-सब्जियों तथा अन्य उच्च-मूल्य कृषि गतिविधियों की संभावनाओं का अध्ययन करना चाहिए।

और इससे भी महत्वपूर्ण है—Value Addition यानी मूल्यवर्धन।

कच्चा उत्पाद बेचने वाला किसान और उसी उत्पाद को साफ करके, ग्रेडिंग करके, पैक करके, प्रोसेस करके या ब्रांड बनाकर बेचने वाला किसान आर्थिक रूप से एक जैसी स्थिति में नहीं रहता।

गेहूं बेचने वाला किसान और गेहूं से उत्पाद बेचने वाला किसान

मान लीजिए किसान गेहूं पैदा करता है और उसे मंडी में बेच देता है। उसका संबंध फसल की कीमत पर समाप्त हो जाता है।

लेकिन स्थानीय स्तर पर यदि किसान समूह आटा, दलिया, सूजी, सत्तू या अन्य प्रसंस्कृत उत्पाद तैयार कर सके, तो उत्पादन का एक अतिरिक्त आर्थिक स्तर पैदा हो सकता है।

इसी तरह सरसों केवल सरसों के रूप में बेचने की वस्तु नहीं है। उसके तेल, खली और अन्य उत्पादों का बाजार है।

मूंगफली केवल मंडी की जिंस नहीं है। उससे तेल, मूंगफली उत्पाद और खाद्य प्रसंस्कृत वस्तुएं बनाई जा सकती हैं।

मिर्च, हल्दी, धनिया, अदरक और अनेक मसालों को साफ-सफाई, सुखाने, पीसने, पैकिंग और ब्रांडिंग के माध्यम से स्थानीय बाजार में अधिक मूल्य दिया जा सकता है।

फल और सब्जियां केवल थोक मंडी तक सीमित क्यों रहें? अचार, मुरब्बा, प्यूरी, पाउडर, सूखे उत्पाद, जूस, मसाला मिश्रण और अन्य प्रसंस्कृत वस्तुओं के रूप में उनका आर्थिक उपयोग बढ़ाया जा सकता है।

यही वह रास्ता है जिसमें किसान फसल का उत्पादक भर नहीं, कृषि-उत्पाद का उद्यमी बन सकता है।

औषधीय और विशेष फसलों में अवसर हैं, लेकिन अंधी दौड़ नहीं

औषधीय पौधों या विशेष नकदी फसलों की चर्चा करते समय सावधानी भी जरूरी है। हर फसल हर किसान के लिए लाभकारी नहीं होती। बाजार की मांग, अनुबंध की शर्तें, खरीदार की विश्वसनीयता, प्रसंस्करण की सुविधा, सिंचाई, मिट्टी और स्थानीय जलवायु—इन सबका अध्ययन आवश्यक है।

किसान को केवल सोशल मीडिया के किसी वीडियो या व्यापारी के आश्वासन पर नई फसल नहीं बोनी चाहिए।

फसल बदलने का अर्थ जोखिम बदलना नहीं, जोखिम को समझकर प्रबंधित करना होना चाहिए।

कृषि विभाग, कृषि विश्वविद्यालय, किसान उत्पादक संगठन, सहकारी संस्थाएं और स्थानीय बाजार मिलकर ऐसी फसल-योजनाएं तैयार कर सकते हैं जिनमें उत्पादन से पहले बाजार की पहचान हो।

सबसे बड़ी गलती: पहले उत्पादन, बाद में बाजार की तलाश

भारतीय कृषि की पुरानी व्यवस्था अक्सर यही रही है—पहले किसान उत्पादन करता है और बाद में पूछता है कि इसे बेचेंगे कहां?

अब क्रम बदलना होगा।

पहले बाजार की पहचान।

फिर संभावित खरीदार।

फिर मूल्यवर्धन की संभावना।

फिर लागत का हिसाब।

फिर पानी और मिट्टी की उपलब्धता।

फिर जोखिम का आकलन।

और उसके बाद उत्पादन।

यानी Market First, Crop Later.

किसान को हर सीजन से पहले अपनी फसल का आर्थिक हिसाब तैयार करना चाहिए।

कितनी लागत?

कितना पानी?

कितने श्रम-दिवस?

कितना संभावित उत्पादन?

कितना बाजार मूल्य?

कितना मूल्यवर्धन संभव?

कितना जोखिम?

और सबसे महत्वपूर्ण—यदि बाजार मूल्य अनुमान से 20 या 30 प्रतिशत कम हो जाए तो क्या किसान फिर भी घाटे से बच सकता है?

यदि उत्तर नहीं है, तो फसल योजना पर पुनर्विचार आवश्यक है।

सरकार की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है

किसान को फसल बदलने की सलाह देकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती।

यदि सरकार चाहती है कि किसान पानी बचाने वाली फसलें उगाए, तो उसे बाजार उपलब्ध कराना होगा।

यदि वह दलहन और तिलहन का उत्पादन बढ़ाना चाहती है, तो खरीद और मूल्य सुरक्षा की विश्वसनीय व्यवस्था बनानी होगी।

यदि वह बागवानी और औषधीय फसलों को प्रोत्साहित करना चाहती है, तो भंडारण, प्रसंस्करण और परिवहन की व्यवस्था करनी होगी।

यदि मूल्यवर्धन गांव में करना है, तो ग्रामीण स्तर पर छोटे प्रसंस्करण केंद्र, कोल्ड स्टोरेज, वेयरहाउस, पैकेजिंग इकाइयां और खाद्य प्रसंस्करण सुविधाएं विकसित करनी होंगी।

किसान को केवल यह कहना कि "फसल बदलो" पर्याप्त नहीं है। फसल बदलने के साथ बाजार की संरचना भी बदलनी होगी।

किसान को अपनी जमीन का आर्थिक ऑडिट करना चाहिए

अब प्रत्येक किसान परिवार को साल में कम से कम एक बार अपनी कृषि का आर्थिक ऑडिट करना चाहिए।

किस फसल में वास्तविक लाभ हुआ?

किस फसल में केवल सकल आय दिखाई दी लेकिन शुद्ध आय नहीं?

कितना पैसा बीज, खाद, दवा, पानी, मशीन, मजदूरी और ब्याज में गया?

कितना उत्पादन घर के लिए रहा?

कितना बाजार में गया?

किस फसल में भुगतान जल्दी मिला और किसमें देर?

किस फसल में बाजार भाव सबसे अधिक अस्थिर रहा?

यह गणना भावनाओं से नहीं, आंकड़ों से करनी होगी।

किसान का खेत केवल परंपरा से नहीं चल सकता। उसे आर्थिक तर्क से भी चलना होगा।

हर साल MSP आंदोलन की नौबत क्यों आए?

यह प्रश्न असुविधाजनक है, लेकिन आवश्यक है।

यदि किसान हर साल वही फसल पैदा करता है, फिर कीमत के लिए संघर्ष करता है, फिर सरकारी खरीद की मांग करता है, फिर मंडी में परेशान होता है, फिर नुकसान उठाता है और अंत में कर्ज लेता है—तो क्या केवल अगली बार उसी चक्र को दोहराना समाधान है?

MSP की लड़ाई अपनी जगह महत्वपूर्ण हो सकती है। सरकारी खरीद की मांग भी अपनी जगह वैध नीति प्रश्न हो सकती है। लेकिन किसान की आर्थिक रणनीति केवल सरकारी खरीद पर निर्भर नहीं रह सकती।

जिस उत्पादन पर किसान का नियंत्रण समाप्त हो जाता है, उस उत्पादन का आर्थिक जोखिम भी बढ़ जाता है।

इसलिए अब किसान आंदोलन को केवल "मेरी फसल की कीमत बढ़ाओ" तक सीमित रहने के बजाय "मेरी कृषि अर्थव्यवस्था को बदलो" के प्रश्न तक पहुंचना होगा।

किसान को अपनी कृषि का मालिक बनना होगा

किसान को केवल उत्पादक नहीं, निर्णयकर्ता बनना होगा।

उसे तय करना होगा कि कितनी जमीन खाद्यान्न में जाएगी, कितनी नकदी फसल में, कितनी बागवानी में और कितनी ऐसी गतिविधि में जहां स्थानीय स्तर पर मूल्यवर्धन किया जा सके।

जहां सामूहिक उत्पादन संभव हो वहां किसान उत्पादक संगठन और सहकारी मॉडल अपनाए जा सकते हैं।

जहां एक किसान अकेले प्रसंस्करण नहीं कर सकता, वहां दस, पचास या सौ किसान मिलकर छोटी इकाई बना सकते हैं।

गांव में उत्पाद पैदा हो और गांव में ही उसकी सफाई, ग्रेडिंग, पैकिंग, प्रसंस्करण और ब्रांडिंग हो—तो कृषि की आय श्रृंखला में किसान की हिस्सेदारी बढ़ाने की संभावना पैदा होती है।

अब किसान को केवल फसल नहीं, अपना भविष्य बोना होगा

किसान को हमेशा यह सिखाया गया कि अधिक उत्पादन करो।

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अब समय है कि उसे यह भी बताया जाए—अधिक लाभकारी और बाजार-संगत उत्पादन करो।

अधिक उपज अपने आप में सफलता नहीं है।

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यदि दस क्विंटल अतिरिक्त उत्पादन किसान को अतिरिक्त आय देने के बजाय अतिरिक्त कर्ज देता है, तो वह उत्पादन किसके लिए है?

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यदि किसान फसल पैदा करता है, MSP मांगता है, खरीद के लिए धरना देता है, लाठियां खाता है, मुकदमे झेलता है, बदनाम होता है, फिर भी घाटा उठाता है और अंततः कर्जदार बनता है, तो कृषि की इस पूरी श्रृंखला पर पुनर्विचार करना होगा।

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किसान को हमेशा संघर्ष के लिए मजबूर करना किसी भी कृषि व्यवस्था की उपलब्धि नहीं हो सकती।

अब समय है कि किसान अपनी फसल योजना को आर्थिक स्वतंत्रता का दस्तावेज बनाए।

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खाद्यान्न देश के लिए आवश्यक हैं, लेकिन किसान का लगातार घाटे में खाद्यान्न उत्पादक बने रहना अनिवार्य नहीं है। 

किसान को अपनी जमीन से यह सवाल पूछना होगा—

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मैं क्या पैदा कर रहा हूं?

और उसके बाद उससे भी बड़ा सवाल—

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मैं इसे पैदा करके कितना कमा रहा हूं?

जब तक दूसरा सवाल पहले सवाल पर भारी नहीं पड़ेगा, तब तक किसान केवल उत्पादन करता रहेगा और बाजार उसकी मेहनत का मूल्य तय करता रहेगा।

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अब किसान को फसल उगाने से पहले फसल की अर्थव्यवस्था उगानी होगी।

क्योंकि किसान का लक्ष्य केवल खेत को हरा रखना नहीं होना चाहिए।

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किसान का खेत हरा भी रहे और किसान का परिवार आर्थिक रूप से सुरक्षित भी रहे—यही टिकाऊ कृषि की असली कसौटी है।

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