पितृ तीर्थ जहां भगवान शिव और पांडवों ने किया श्राद्ध
बदरीनाथ स्थित ब्रह्मकपाल तीर्थ पितृ श्राद्ध और पिंडदान की प्राचीन परंपरा से जुड़ा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यहां भगवान शिव और पांडवों ने पितरों का श्राद्ध किया था। जानिए ब्रह्मकपाल तीर्थ का महात्म्य, पौराणिक कथाएं, पितृ ऋण से मुक्ति की मान्यता और यहां देश-विदेश से पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की आस्था।
देव ऋण और पितृ ऋण से मुक्ति
डॉ बृजेश सती
श्राद्ध का मूल भाव ही श्रद्धा माना गया है। श्रद्धाया इति श्रद्धाम। पितृपक्ष अश्विन मास की प्रतिपदा से अमावस्या होता है। इस दौरान पिंडदान और तर्पण का विशेष महत्व है।
भारत में चार स्थानों गया, काशी, हरिद्वार और बदरीनाथ स्थित ब्रह्मकपाल तीर्थ में पिंडदान और श्राद्ध करने का महात्म्य है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जिन्होंने अपने पितरों के निमित्त इन प्रमुख तीर्थों में पिंडदान कर दिया है। उन्हें पितृपक्ष के दौरान केवल तर्पण करना चाहिए। विशेष रूप से बदरीनाथ के ब्रह्मकपाल तीर्थ को लेकर मान्यता है कि यहां पिंडदान करने के बाद किसी अन्य तीर्थ में पिंडदान नहीं किया जाता है। यहां बदरीनाथ मंदिर के कपाट खुलने से कपाट बंद होने की तिथि तक निरंतर श्राद्ध किया जाता है।
ब्रहा कपाल तीर्थ माहात्म्य
बदरीनाथ मंदिर से कुछ दूरी पर स्थित ब्रह्माकपाल तीर्थ है। यहां की मान्यता है कि इस तीर्थ में पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को मुक्ति मिलती है। स्कंद पुराण में ब्रह्मकपाल को गया से आठ गुणा अधिक फलदायी पित्र तीर्थ कहा गया है।
मान्यता है कि देश में चार स्थानों गया, काशी, हरिद्वार और ब्रह्म कपाल कपाल में पितरों के निमित्त श्राद्ध कार्य किया जाता है। यदि कोई तीन तीर्थ में किन्ही कारणों से श्राद्ध नहीं कर पाए तो वह बदरीनाथ स्थित ब्रह्म कपाल में अपने पितरों का उद्धार कर सकता है।
यहां के बारे में कहा गया है कि
अन्य तीर्थो न च श्राद्धम, केवलम तर्पणम विधिः
यहां पर पितरों का श्राद्ध के करने बाद ही श्राद्ध पक्ष में घरों में तर्पण करने का शास्त्रीय विधान है।
पितरों के उद्धार के बाद ही भगवान बदरी विशाल के दर्शन का महात्म्य है। बदरी पुरी यात्रा का दो फल बताया कि है। एक पितरों का उद्धार दूसरा नारायण का दर्शन।
शिव को लगा ब्रह्म हत्या का दोष
ब्रहमाजी का सृष्टि रचना कर्म प्रयास जब सफल न हुआ तो उन्होंने अपना शरीर दो भागों में विभाजित कर दिया। उनके शरीर का एक माग पुरुष और दूसरा भाग स्त्री रूप में परिवर्तित हो गया। पुरुष का नाम मनु और स्त्री का नाम ब्रहमी रखा गया। इस तरह मनु ब्रह्मा का पुत्र और ब्रहमी उनकी पुत्री हुई। देवर्षि नारद का ब्रहमाजी को शाप था। जिसके चलते उनके मन में अपनी पुत्री ब्रहमी के प्रति कामना उत्पन्न हो गई। ब्रहमी का सौंदर्य अप्रतिम था, जिसे देखकर सृष्टिकर्ता स्वयं भ्रमित हो गए। ब्रह्म के इस रूप को देख शिव अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं रख सके। उन्होंने ब्रह्म का विचलित सर काट दिया। यह सर उनके हाथ में चिपक गया। सारे ब्रह्मांड के चक्कर लगाने के बाद भी यह सिर उनके हाथ से नहीं छूटा। बदरीनाथ में सर, जिस स्थान पर गिरा,वह ब्रह्म कपाल तीर्थ है। सर्व प्रथम भगवान शिव ने यहां पिंडदान।
पांडवों ने भी किया था, यहां पिंडदान
भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध
के होने के बाद पाण्डवों को ब्रह्मकपाल में जाकर पितरों का श्राद्ध करने का निर्देश दिया। श्रीकृष्ण की आज्ञा से गोत्र वंश की हत्या से पाप मुक्ति के लिए पाण्डवों ने ब्रह्मकपाल तीर्थ में अपने वंशजों एवं युद्ध में कालकवलित हुए लोगों का श्राद्ध किया।
अन्य तीर्थे न च श्राद्धम केवलम तर्पणम श्ररेत:
ब्रहम कपाल तीर्थ को कपाल मोचन तीर्थ भी कहा गया है। यहां मृतकों को मोक्ष मिलता है, इसलिए यह मोक्ष धाम भी है। तीर्थ की विशेषता यह है कि यहां बदरीनाथ मंदिर की भोग मंडी से प्रसाद आता है और इसके पिंड बनाकर श्राद्ध किया जाता है।
ऐसी मान्यता है कि जिन पितरों को गया और काशी में मुक्ति नहीं मिलती या अन्य किसी और स्थान पर मुक्ति नहीं मिलती। उनको ब्रह्म कपाल तीर्थ में मुक्ति मिलती है।
इस तीर्थ में पिण्डदान के बाद किसी भी अन्य तीर्थ में श्राद्ध करना वर्जित है।
पिंडम्म कृत्वा विशालायम, पितृम उद्देश्य मामनीम,
अन्य तीर्थे न च श्राद्ध: केवलं दर्पण विधि:।
पुराणों के अनुसार यह स्थान महान तपस्वियों और पवित्र आत्माओं का है। श्रीमद्भागवत पुराण अनुसार यहां सूक्ष्म रूप में महान आत्माएं निवासरत है।
विदेशी भी कर रहे यहां श्राद्ध
बदरीनाथ मंदिर के कपाट खुलने के साथ ही ब्रह्म कपाल स्थित तीर्थ में पितरों के निमित्त पिंडदान और तर्पण प्रारंभ हो जाता है। यहां प्रतिवर्ष देश भर से लाखों की संख्या यात्री अपने पितरों का श्राद्ध करते हैं।
पिछले कुछ वर्षों से विदेशी श्रद्धालु भी पिंडदान कर रहे है और सनातन धर्म में अपनी आस्था जता रहे हैं। पहले नेपाल और मॉरीशस आदि देशों के श्रद्धालु पिंडदान करते थे। अब यहा नया बदलाव देखने को मिल रहा है। जर्मन, मलेशिया, रूस, अमेरिका आदि देशों के नागरिक भी सनातन धर्म में आस्था जताते हुए अपने पितरों की मोक्ष प्राप्ति के लिए पिंडदान और तर्पण कर रहे हैं। विदेशियों के साथ भाषा एक समस्या रहती है, लेकिन अनुवादक काम आसान कर देते हैं। विदेशी श्रद्धालु भगवान नारायण को साक्षी मानकर अपने पितरों के निमित्त यहां श्राद्ध कार्य करते हैं।
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