“62 MMT CBG की ताकत, फिर भी सरकार नाकाम: कचरे के खजाने पर बैठा भारत”खेत की पराली से गैस बन सकती है, फिर किसान ही दोषी क्यों?
भारत के कृषि अवशेष, गोबर, सीवेज और जैविक कचरे से करीब 62 MMT CBG की संभावित क्षमता है, लेकिन वास्तविक उपयोग बेहद कम है। यह लेख सरकार की CBG नीति, किसान की पराली, कॉरपोरेट हित, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा के बीच मौजूद विरोधाभासों की कठोर पड़ताल करता है।
फिर सरकार अब तक क्या करती रही?
By- Chaudhary Sudhir Talyan
भारत में कचरा अब केवल गंदगी का पर्याय नहीं रह गया है। वह ऊर्जा है, खाद है, रोजगार है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए आय का नया स्रोत है। देश के कृषि अवशेष, पशु अपशिष्ट, सीवेज और नगरों के जैविक कचरे से हर वर्ष लगभग 62 मिलियन मीट्रिक टन यानी 6.2 करोड़ टन Compressed Biogas (CBG) उत्पादन की संभावित क्षमता का अनुमान सामने आया है। लेकिन इस आंकड़े की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि भारत के पास संसाधन तो है, पर उसे आर्थिक शक्ति में बदलने की सरकारी क्षमता अभी तक बेहद कमजोर दिखाई देती है।
सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि 62 MMT वर्तमान उत्पादन नहीं है। यह अनुमानित संभावित क्षमता है। उपलब्ध अध्ययनों के अनुसार कृषि अवशेषों से लगभग 20 MMT, पशु अपशिष्ट से लगभग 25 MMT, सीवेज से करीब 10 MMT, नगरों के जैविक कचरे से लगभग 5 MMT और अन्य स्रोतों से करीब 2 MMT CBG की संभावना आंकी गई है। यानी भारत की सबसे बड़ी ऊर्जा क्षमता किसी विदेशी तेल क्षेत्र के नीचे नहीं, बल्कि हमारे खेतों, गांवों, गौशालाओं, मंडियों और शहरों के कचरे में पड़ी है।
फिर सवाल सीधा है—जब यह क्षमता वर्षों से सामने है तो सरकार ने इसका वास्तविक उपयोग क्यों नहीं किया?
सरकार ने कचरे को समस्या माना, संसाधन नहीं
भारत में दशकों से किसान की पराली को अपराध की तरह देखा गया। किसान पराली जलाता है तो उस पर जुर्माना, मुकदमा और प्रशासनिक दबाव आता है। लेकिन जिस व्यवस्था ने किसान को पराली का लाभकारी बाजार नहीं दिया, उसने उसके सामने विकल्प भी क्या छोड़ा?
एक तरफ सरकार पराली जलाने पर किसान को दोषी ठहराती है और दूसरी तरफ उसी पराली से CBG बनाने की संभावित विशाल अर्थव्यवस्था को विकसित करने में वर्षों लगा देती है।
यही सरकारी नीति की मूल समस्या है।
किसान को समस्या घोषित करना आसान है, समस्या का आर्थिक समाधान बनाना कठिन।
अगर धान का अवशेष किसान के लिए बोझ है तो उसे बाजार क्यों नहीं दिया गया? यदि वही अवशेष CBG संयंत्र के लिए feedstock है तो गांव-गांव संग्रह केंद्र क्यों नहीं बनाए गए? किसानों को निश्चित खरीद मूल्य क्यों नहीं मिला? FPO और सहकारी समितियों को इस कारोबार का मालिकाना हिस्सा क्यों नहीं दिया गया?
सरकार ने कागजों पर योजनाएं बनाईं, लेकिन खेत और प्लांट के बीच जो वास्तविक supply chain चाहिए थी, वह आज भी अधूरी है।
62 MMT का सपना और 1 प्रतिशत से कम वास्तविकता
इस पूरे मामले का सबसे कठोर तथ्य यह है कि अनुमानित 62 MMT क्षमता के मुकाबले भारत का व्यावसायिक CBG उपयोग अभी भी बेहद छोटा है। उपलब्ध उद्योग आकलनों में वास्तविक commercial utilisation को 1 प्रतिशत से भी कम बताया गया है।
यानी देश में संभावित रूप से करोड़ों टन CBG बनाने की क्षमता है, लेकिन उसका एक बहुत छोटा हिस्सा ही जमीन पर आर्थिक गतिविधि बन पाया है।
यह केवल उद्योग की समस्या नहीं है।
यह नीतिगत विफलता है।
सरकार ने SATAT जैसी योजनाएं शुरू कीं, CBG blending obligation लाया, GOBARdhan जैसी योजनाओं की घोषणा की और हजारों परियोजनाओं के पंजीकरण की बात की। लेकिन पंजीकरण और उत्पादन में जमीन-आसमान का अंतर है।
किसी परियोजना का सरकारी पोर्टल पर registered होना यह साबित नहीं करता कि गांव में किसान को भुगतान मिल रहा है, प्लांट चल रहा है और देश को गैस मिल रही है।
भारत को अब कागजी परियोजनाओं की संख्या नहीं, चलते हुए संयंत्रों और किसानों की आय का हिसाब देना चाहिए।
किसान की पराली पर उद्योग कमाएगा, किसान को क्या मिलेगा?
यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
यदि CBG उद्योग तेजी से बढ़ता है लेकिन किसान केवल सस्ता biomass supplier बनकर रह जाता है तो इसे ग्रामीण क्रांति कहना धोखा होगा।
किसान के खेत से निकलने वाली सामग्री का मूल्य तय करने में किसान की भागीदारी होनी चाहिए।
सरकार को एक ऐसा ढांचा बनाना चाहिए जिसमें:
- कृषि अवशेष की पारदर्शी खरीद हो;
- वजन डिजिटल हो;
- भुगतान सीधे किसान या FPO को मिले;
- स्थानीय संग्रह केंद्र हों;
- परिवहन लागत का वैज्ञानिक निर्धारण हो;
- किसानों को न्यूनतम खरीद मूल्य की सुरक्षा मिले;
- FPO और सहकारी समितियां CBG कंपनियों की केवल supplier नहीं, equity partner बनें।
आज सबसे बड़ा खतरा यह है कि सरकार "waste-to-wealth" का नारा लगाए और वास्तविक wealth किसी और के खाते में चली जाए।
अगर ऐसा हुआ तो यह किसान की आय बढ़ाने वाली नीति नहीं, किसान के अवशेष से नया कॉरपोरेट कारोबार खड़ा करने की नीति बन जाएगी।
सरकार की ऊर्जा नीति में विरोधाभास
भारत प्राकृतिक गैस और कच्चे तेल के लिए आयात पर भारी निर्भर है। दूसरी तरफ देश के पास विशाल मात्रा में जैविक biomass है।
यह विरोधाभास वर्षों से मौजूद है।
हम विदेशी मुद्रा खर्च करके ऊर्जा खरीदते हैं और अपने गांवों में उपलब्ध जैविक संसाधन को अक्सर जला देते हैं, सड़ा देते हैं या कचरे के ढेर में डाल देते हैं।
इससे बड़ी नीति विफलता क्या होगी?
यदि CBG का उपयोग बढ़ता है तो प्राकृतिक गैस आयात पर कुछ दबाव कम किया जा सकता है। इससे ग्रामीण रोजगार और स्थानीय ऊर्जा अर्थव्यवस्था भी विकसित हो सकती है।
लेकिन इसके लिए सरकार को केवल उद्घाटन करने की राजनीति छोड़कर पूरी value chain बनाने की राजनीति करनी होगी।
असली बाधा प्लांट नहीं, feedstock है
CBG प्लांट बनाना इस उद्योग का पहला चरण है, अंतिम समाधान नहीं।
किसी संयंत्र को पूरे साल लगातार biomass चाहिए। खेतों में biomass बिखरा हुआ है और कृषि उत्पादन मौसम आधारित है। अगर सरकार ने feedstock aggregation, storage और logistics की व्यवस्था नहीं की तो महंगे संयंत्र भी आर्थिक रूप से कमजोर पड़ेंगे।
यही कारण है कि CBG नीति में गांव को केंद्र बनाना होगा।
प्रत्येक बड़े संयंत्र के आसपास biomass collection centres बनने चाहिए। ग्राम पंचायत, FPO, PACS और स्थानीय उद्यमियों को इसमें शामिल करना चाहिए।
लेकिन सरकारी योजनाओं की एक पुरानी बीमारी है—योजना दिल्ली में बनती है और उसकी असली लागत गांव भुगतता है।
CBG में यह मॉडल नहीं चलेगा।
गोबर से गैस की राजनीति नहीं, गोबर की अर्थव्यवस्था चाहिए
GOBARdhan जैसी योजनाओं में गोबर और जैविक अपशिष्ट को ऊर्जा में बदलने की बड़ी संभावना है। लेकिन केवल योजना का नाम बदल देने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था नहीं बदलती।
गांव में पशुधन है, गोबर है, कृषि अवशेष है। लेकिन इन संसाधनों को इकट्ठा करने, प्रसंस्करण करने और बाजार से जोड़ने की संस्थागत व्यवस्था कमजोर है।
यदि सरकार वास्तव में ग्रामीण जैव-अर्थव्यवस्था चाहती है तो हर जिले में Bioenergy Resource Map होना चाहिए।
कितना गोबर है?
कितना कृषि अवशेष है?
कहां कौन-सी फसल होती है?
कहां कितने CBG संयंत्र आर्थिक रूप से व्यवहार्य हैं?
कितने गांवों से biomass आएगा?
किसान को कितनी कीमत मिलेगी?
प्लांट को कितनी परिवहन लागत आएगी?
Digestate कहां बिकेगा?
इन सवालों के जवाब बिना CBG नीति केवल घोषणाओं का संग्रह है।
CBG की असली ताकत—गैस के साथ खाद
CBG संयंत्र की अर्थव्यवस्था केवल गैस पर आधारित नहीं होनी चाहिए।
Biogas प्रक्रिया के बाद बचने वाला digestate कृषि में जैविक खाद के रूप में उपयोग किया जा सकता है। इसका अर्थ है कि एक सही ढंग से डिजाइन की गई परियोजना किसान को दो तरफ से लाभ दे सकती है—कृषि अवशेष बेचकर आय और खेत के लिए जैविक पोषक पदार्थ।
लेकिन यहां भी सरकार को केवल उत्पादन की बात नहीं करनी चाहिए।
यदि digestate की गुणवत्ता, certification, packaging और marketing की व्यवस्था नहीं होगी तो वह प्लांट के लिए एक और disposal problem बन सकता है।
भारत की नीति को waste-to-gas-to-fertiliser-to-farm चक्र बनाना होगा।
यही circular economy है।
5,000 संयंत्रों का लक्ष्य पर्याप्त नहीं
सरकार ने 2030 तक लगभग 5,000 CBG plants और 15 MMT वार्षिक उत्पादन का लक्ष्य रखा है।
लक्ष्य सुनने में बड़ा है।
लेकिन लक्ष्य की घोषणा और उसकी आर्थिक व्यवहार्यता दो अलग चीजें हैं।
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भारत को यह बताना होगा कि इनमें से कितने संयंत्र वास्तव में चल रहे हैं, कितने construction में हैं, कितने बंद हैं और कितनों के पास पर्याप्त feedstock उपलब्ध है।
सरकारी रिपोर्टों में "registered" और "operational" परियोजनाओं को अलग-अलग दिखाना अनिवार्य होना चाहिए।
क्योंकि भारत को निवेश सम्मेलन नहीं, उत्पादन चाहिए।
CBG blending obligation अच्छी शुरुआत है, लेकिन अधूरी
CNG और PNG में CBG blending obligation ने बाजार बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। निर्धारित व्यवस्था के तहत blending लक्ष्य धीरे-धीरे बढ़ाया जा रहा है।
यह demand certainty पैदा कर सकता है।
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लेकिन सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि CBG producer को उचित कीमत मिले और downstream कंपनियों पर ऐसा आर्थिक दबाव न बने जिससे छोटे उत्पादक टिक ही न सकें।
सरकार को CBG की पूरी supply chain में transparency लानी होगी।
किसने कितना खरीदा?
किसने कितना बेचा?
किस किसान से biomass खरीदा?
किस कीमत पर खरीदा?
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कितना CBG बना?
कितना digestate निकला?
कितना बिका?
इन आंकड़ों को सार्वजनिक करने से ही इस क्षेत्र में वास्तविक जवाबदेही आएगी।
अब किसान को दंड नहीं, भागीदारी चाहिए
पराली जलाने के मुद्दे पर सरकार वर्षों से दंडात्मक दृष्टिकोण अपनाती रही है।
अब समय बदलने का है।
यदि पराली से ऊर्जा बन सकती है तो किसान को प्रदूषण का अपराधी नहीं, ऊर्जा अर्थव्यवस्था का भागीदार बनाया जाना चाहिए।
जिस किसान के खेत से biomass निकलता है, उसे उस biomass की आर्थिक value chain में हिस्सा मिलना चाहिए।
सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि CBG उद्योग से ग्रामीण क्षेत्र में कितनी नई आय पैदा होगी और उसमें किसानों का हिस्सा कितना होगा।
निष्कर्ष: असली सवाल कचरे का नहीं, सरकार की क्षमता का है
भारत के पास संसाधनों की कमी नहीं है।
कमी है तो संगठन, बाजार निर्माण, स्थानीय भागीदारी और जवाबदेही की।
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62 MMT CBG potential भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, कृषि आय, ग्रामीण रोजगार और प्रदूषण नियंत्रण का बड़ा अवसर है। लेकिन अवसर को उपलब्धि समझ लेना सरकार की सबसे बड़ी भूल होगी।
भारत ने पहले भी अनेक क्षेत्रों में लक्ष्य बनाए हैं, योजनाएं शुरू की हैं और आंकड़ों की बड़ी घोषणाएं की हैं। लेकिन गांव में किसान को तब तक फर्क नहीं पड़ता जब तक उसकी आय नहीं बढ़ती।
CBG के मामले में भी वही कसौटी होनी चाहिए।
कितने प्लांट बने—यह दूसरा सवाल है।
कितने चले—यह पहला सवाल है।
कितनी गैस बनी—यह महत्वपूर्ण है।
लेकिन किसान को कितनी आय मिली—यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
सरकार यदि वास्तव में 62 MMT की संभावित क्षमता को हासिल करना चाहती है तो उसे दिल्ली से घोषणा करने वाली सरकार की भूमिका से आगे बढ़कर गांव में आर्थिक ढांचा बनाने वाली सरकार बनना होगा।
किसान की पराली को जलाने पर अपराध बताना आसान है।
उसे खरीदकर ऊर्जा में बदलना कठिन है।
गोबर को कचरा कहना आसान है।
उसे गैस और खाद में बदलना कठिन है।
शहर के कचरे पर भाषण देना आसान है।
उसकी पूरी supply chain बनाना कठिन है।
अब सरकार को आसान रास्ता छोड़ना होगा।
भारत का कचरा वास्तव में ऊर्जा का भंडार बन सकता है—लेकिन तभी जब सरकार उसे केवल आंकड़ों और योजनाओं में नहीं, किसान की आय, गांव के रोजगार और देश की ऊर्जा सुरक्षा में बदलने की राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाए।
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