यूरोप, अमेरिका और पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद: क्या भारत केवल एक बाजार है या एक रणनीतिक साझेदार?

क्या पाकिस्तान आतंकवाद को विदेश नीति की तरह इस्तेमाल करता है? जानिए भारत की सुरक्षा चुनौतियां, यूरोप और अमेरिका के दोहरे रवैये तथा वैश्विक राजनीति का विस्तृत विश्लेषण।

यूरोप, अमेरिका और पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद: क्या भारत केवल एक बाजार है या एक रणनीतिक साझेदार?

Writer- Sudhir Taliyan

Chaudhary- Talan Khap

यूरोप, अमेरिका और पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद: क्या भारत केवल एक बाजार है या एक रणनीतिक साझेदार?


प्रस्तावना

हाल के दिनों में जम्मू-कश्मीर को लेकर यूरोपीय संघ और पाकिस्तान के संयुक्त बयान पर भारत ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। भारत के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का आंतरिक विषय है और किसी बाहरी पक्ष को इस पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं है। (The Times of India)

इस घटना ने भारत में एक पुरानी बहस को फिर से जीवित कर दिया है—क्या पश्चिमी देशों, विशेषकर यूरोप और अमेरिका, का आतंकवाद के प्रति दृष्टिकोण सिद्धांतों पर आधारित है या उनके आर्थिक और सामरिक हितों पर?

भारत पिछले कई दशकों से सीमा पार आतंकवाद का सामना कर रहा है। हजारों नागरिक, सुरक्षाकर्मी और निर्दोष लोग आतंकवादी हमलों में अपनी जान गंवा चुके हैं। ऐसे में जब पश्चिमी देश आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक नेतृत्व का दावा करते हैं लेकिन पाकिस्तान के संदर्भ में अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाते दिखाई देते हैं, तब भारत में स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठते हैं।

यह लेख इसी जटिल विषय का विश्लेषण करता है।


भारत के लिए आतंकवाद केवल सुरक्षा का नहीं, अस्तित्व का प्रश्न

भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जिसने दशकों तक आतंकवाद की कीमत चुकाई है।

चाहे पंजाब में उग्रवाद का दौर हो, जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद, 1993 मुंबई बम विस्फोट, संसद हमला, 26/11 मुंबई हमला, पुलवामा हमला या हाल के वर्षों में विभिन्न आतंकी घटनाएं—भारत लगातार आतंकवाद का लक्ष्य रहा है।

भारत का आधिकारिक रुख लंबे समय से यह रहा है कि सीमा पार से संचालित आतंकवादी ढांचे और नेटवर्क देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हैं।

विभिन्न भारतीय सुरक्षा एजेंसियों और कई रणनीतिक अध्ययनों में यह दावा किया गया है कि पाकिस्तान की धरती पर सक्रिय कुछ आतंकी संगठन भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल रहे हैं। हाल के वर्षों में भारतीय जांच एजेंसियों ने भी कई मामलों में पाकिस्तान आधारित नेटवर्कों की भूमिका का आरोप लगाया है। (Reuters)


पाकिस्तान और "प्रॉक्सी वॉर" की बहस

भारत के कई सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि पारंपरिक युद्धों में सीमित सफलता के बाद पाकिस्तान ने "प्रॉक्सी वॉर" अर्थात् अप्रत्यक्ष युद्ध की रणनीति अपनाई।

दिल्ली स्थित थिंक टैंक NatStrat की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि पाकिस्तान ने दशकों से आतंकवाद को रणनीतिक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया है और समय के साथ उसकी रणनीति बदलती रही है। (The Times of India)

हालांकि पाकिस्तान इन आरोपों को लगातार खारिज करता रहा है, लेकिन भारत का तर्क है कि आतंकवादी ढांचे, प्रशिक्षण शिविरों और सीमा पार नेटवर्कों के बारे में पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं।

यही कारण है कि भारत आतंकवाद को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति का मुद्दा मानता है।


यूरोप का दृष्टिकोण: सिद्धांत या हित?

यूरोप स्वयं आतंकवादी हमलों का शिकार रहा है।

https://politicsinsightindia.com/new/dar-ke-bawajood-likhna-zaroori-hai

फ्रांस, बेल्जियम, जर्मनी और ब्रिटेन में आतंकवादी घटनाओं ने यूरोपीय समाज को गहराई से प्रभावित किया है।

फिर भी भारत में एक धारणा विकसित हुई है कि जब आतंकवाद भारत को प्रभावित करता है, तब यूरोप का स्वर अपेक्षाकृत कमजोर दिखाई देता है।

जम्मू-कश्मीर पर यूरोपीय संघ और पाकिस्तान के संयुक्त बयान के बाद भारत ने जिस प्रकार आपत्ति दर्ज की, वह इसी संवेदनशीलता को दर्शाता है। (The Times of India)

आलोचकों का कहना है कि यदि कोई क्षेत्रीय विवाद यूरोप के हितों से जुड़ा हो तो वह अधिक मुखर होता है, लेकिन भारत की सुरक्षा चिंताओं पर उतनी स्पष्टता नहीं दिखती।

हालांकि यूरोप का पक्ष यह है कि वह अंतरराष्ट्रीय कानून, संवाद और कूटनीतिक समाधान का समर्थन करता है।

यहीं से "दोहरे मानदंड" बनाम "सिद्धांत आधारित विदेश नीति" की बहस शुरू होती है।


अमेरिका की पाकिस्तान नीति: इतिहास का बोझ

भारत में अमेरिका की पाकिस्तान नीति को लेकर भी लंबे समय से प्रश्न उठते रहे हैं।

शीत युद्ध के दौरान पाकिस्तान अमेरिका का महत्वपूर्ण सहयोगी था।

अफगानिस्तान में सोवियत संघ के खिलाफ संघर्ष के समय भी पाकिस्तान को अमेरिका का व्यापक समर्थन मिला।

11 सितंबर 2001 के बाद आतंकवाद विरोधी युद्ध में भी पाकिस्तान अमेरिका का प्रमुख साझेदार बना रहा।

यही कारण है कि भारत के अनेक रणनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका अक्सर पाकिस्तान के प्रति ऐसी नीति अपनाता रहा है जिसमें सुरक्षा चिंताओं और रणनीतिक हितों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश दिखाई देती है।

भारत के आलोचकों का तर्क है कि इस संतुलन का परिणाम कई बार आतंकवाद के मुद्दे पर अस्पष्टता के रूप में सामने आया।

हालांकि हाल के वर्षों में भारत-अमेरिका संबंध अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुए हैं और दोनों देशों के बीच रक्षा, तकनीक और इंडो-पैसिफिक सहयोग लगातार बढ़ा है।


क्या भारत केवल एक विशाल बाजार है?

यह प्रश्न आज भारतीय जनमानस में तेजी से उभर रहा है।

यूरोपीय संघ और भारत के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर वर्षों से बातचीत चल रही थी और 2026 में वार्ताएं सफलतापूर्वक पूरी हुईं। यूरोपीय संघ भारत को दुनिया के सबसे बड़े और सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक मानता है। (Trade and Economic Security)

यूरोपीय आयोग के अनुसार भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार का आकार 120 अरब यूरो से अधिक है तथा यह आगे और बढ़ने की संभावना रखता है। (Trade and Economic Security)

यहीं से आलोचना जन्म लेती है।

भारत में कई विश्लेषकों का कहना है कि:

  • पश्चिमी देश भारत के विशाल उपभोक्ता बाजार तक पहुंच चाहते हैं।

  • वे भारत के बढ़ते मध्यम वर्ग को अवसर के रूप में देखते हैं।

  • भारत में निवेश और व्यापार उनके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

  • लेकिन सुरक्षा और आतंकवाद के मुद्दों पर वे हमेशा उतनी स्पष्टता नहीं दिखाते जितनी भारत अपेक्षा करता है।

दूसरी ओर, समर्थक तर्क देते हैं कि व्यापारिक संबंध और सुरक्षा मुद्दे अलग-अलग आयाम हैं तथा किसी देश का व्यापार करना इस बात का प्रमाण नहीं कि वह दूसरे देश की सुरक्षा चिंताओं की अनदेखी कर रहा है।


अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंकों की राय

दुनिया के कई रणनीतिक संस्थान मानते हैं कि दक्षिण एशिया की स्थिरता वैश्विक महत्व का विषय है।

अनेक अध्ययनों में यह निष्कर्ष सामने आया है कि भारत-पाकिस्तान तनाव केवल द्विपक्षीय मुद्दा नहीं बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा से जुड़ा विषय है।

कई पश्चिमी विश्लेषकों का मानना है कि:

  1. आतंकवाद के खिलाफ शून्य सहिष्णुता आवश्यक है।

  2. दक्षिण एशिया में स्थिरता वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।

  3. भारत को एक प्रमुख वैश्विक शक्ति के रूप में स्वीकार किया जा चुका है।

  4. पाकिस्तान के भीतर भी आतंकवाद की समस्या मौजूद है।

  5. क्षेत्रीय सहयोग और सुरक्षा संवाद आवश्यक हैं।

हालांकि भारतीय रणनीतिक समुदाय का एक बड़ा वर्ग मानता है कि आतंकवाद और उसके संरक्षकों के बीच स्पष्ट अंतर किया जाना चाहिए।


भारत की बदलती रणनीति

पिछले एक दशक में भारत ने आतंकवाद के विरुद्ध अपनी रणनीति में कई बदलाव किए हैं।

इनमें शामिल हैं:

  • सीमा सुरक्षा का सुदृढ़ीकरण

  • तकनीकी निगरानी

  • अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक दबाव

  • वित्तीय नेटवर्कों पर निगरानी

  • आतंकवाद विरोधी वैश्विक सहयोग

भारत लगातार यह संदेश देता रहा है कि आतंकवाद को "अच्छा" और "बुरा" कहकर विभाजित नहीं किया जा सकता।

यदि किसी देश को आतंकवाद का शिकार माना जाता है, तो वही सिद्धांत भारत पर भी लागू होना चाहिए।


भारत के सामने भविष्य की चुनौती

भारत आज विश्व की सबसे तेजी से उभरती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है।

इसके साथ ही वह एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक शक्ति भी बन चुका है।

यूरोप और अमेरिका दोनों भारत के साथ गहरे आर्थिक संबंध चाहते हैं। यह तथ्य व्यापारिक आंकड़ों और FTA वार्ताओं से स्पष्ट है। (Trade and Economic Security)

लेकिन भारत के लिए केवल आर्थिक सहयोग पर्याप्त नहीं है।

भारत अपेक्षा करता है कि उसके साझेदार:

  • आतंकवाद पर स्पष्ट और समान मानदंड अपनाएं।

  • सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे को गंभीरता से लें।

  • सुरक्षा चिंताओं को व्यापारिक हितों से कम महत्व न दें।

  • भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करें।


निष्कर्ष

भारत और पश्चिमी देशों के संबंध आज पहले से कहीं अधिक मजबूत हैं। व्यापार, तकनीक, रक्षा और वैश्विक राजनीति में दोनों पक्षों की साझेदारी बढ़ रही है।

फिर भी आतंकवाद का प्रश्न भारत के लिए केवल कूटनीतिक बहस नहीं बल्कि राष्ट्रीय अनुभव का विषय है। हजारों भारतीय परिवारों ने इसकी कीमत चुकाई है।

इसीलिए जब यूरोप या अमेरिका पाकिस्तान से जुड़े मुद्दों पर संतुलित भाषा का प्रयोग करते हैं या जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील विषयों पर बयान देते हैं, तो भारत में कई लोग इसे दोहरे मानदंड के रूप में देखते हैं।

वास्तविक चुनौती यह है कि वैश्विक शक्तियां आतंकवाद के मुद्दे पर एक समान और सिद्धांत आधारित दृष्टिकोण अपनाएं। यदि आतंकवाद मानवता के खिलाफ अपराध है, तो उसके प्रति प्रतिक्रिया भी समान होनी चाहिए—चाहे पीड़ित देश कोई भी हो।

भारत आज केवल एक विशाल बाजार नहीं है। वह विश्व राजनीति, वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसलिए भारत के साथ संबंध केवल व्यापारिक अवसरों तक सीमित नहीं होने चाहिए, बल्कि परस्पर सम्मान, सुरक्षा सहयोग और समान संवेदनशीलता पर आधारित होने चाहिए।

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