सरकारी कंपनियां बिना स्थायी मुखिया: लापरवाही या निजीकरण की जमीन तैयार करने की रणनीति?
CPSEs में नियमित CMD पदों की कमी और 70% Independent Director vacancies ने सरकारी कंपनियों की governance पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
By- Ch. Sudhir Taliyan
जब सरकार अपनी ही कंपनियों को नेतृत्व नहीं दे सकती, तो जनता पूछेगी—क्या उन्हें कमजोर किया जा रहा है?
सरकारी कंपनियां किसी सरकार की निजी संपत्ति नहीं होतीं। वे जनता की पूंजी, जनता के संसाधनों और दशकों की सार्वजनिक मेहनत से खड़ी हुई संस्थाएं होती हैं। इनके पास जमीन है, कारखाने हैं, खदानें हैं, तेल-गैस के संसाधन हैं, बंदरगाह हैं, दूरसंचार नेटवर्क हैं, रेलवे से जुड़ा विशाल ढांचा है और हजारों करोड़ रुपये की परिसंपत्तियां हैं।
लेकिन आज इन्हीं सार्वजनिक उपक्रमों के सामने एक ऐसा संकट खड़ा है, जिसे सामान्य प्रशासनिक देरी कहकर टाला नहीं जा सकता।
फरवरी 2026 तक 53 केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रम—CPSEs—नियमित Chairman & Managing Director के बिना चल रहे थे।
यानी देश की 53 महत्वपूर्ण सरकारी कंपनियों के शीर्ष पर स्थायी नेतृत्व नहीं था। वे “Additional Charge” व्यवस्था पर चल रही थीं। इनमें BPCL, BSNL, MTNL और MMTC जैसे रणनीतिक महत्व वाले उपक्रम भी शामिल थे।
और यह सिर्फ CMD की कुर्सियों का मामला नहीं है।
758 स्वीकृत Independent Director पदों में से 533 खाली थे।
लगभग 70 प्रतिशत।
यह आंकड़ा किसी सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था का संकेत नहीं देता। यह उस governance structure की तस्वीर है जिसमें सार्वजनिक धन से चलने वाली कंपनियों की निगरानी करने वाले महत्वपूर्ण पद ही खाली पड़े हैं।
संसदीय वित्त समिति ने इसे “systemic governance deficit” और नेतृत्व रिक्तियों, वित्तीय बाधाओं तथा राज्य की क्षमता में कमी का व्यापक संकट बताया है।
अब सवाल यह नहीं है कि कुछ नियुक्तियां देर से क्यों हुईं।
सवाल यह है—
इतनी बड़ी संख्या में नियुक्तियां लंबित रहने दी ही क्यों गईं?
क्या सरकार को पता नहीं था कि CMD कब रिटायर होगा?
यही सबसे असहज प्रश्न है।
किसी सरकारी कंपनी का CMD अचानक अगले दिन सेवानिवृत्त नहीं होता। कार्यकाल पहले से ज्ञात होता है। उत्तराधिकारी की प्रक्रिया पहले से शुरू की जा सकती है।
फिर ऐसी स्थिति क्यों बनती है कि एक व्यक्ति के कार्यकाल समाप्त होने के बाद महीनों तक कोई स्थायी नियुक्ति नहीं होती?
क्या सरकार के पास succession planning नहीं है?
क्या मंत्रालयों को अपने CPSEs के शीर्ष पदों की आगामी vacancies का कैलेंडर नहीं पता?
क्या PESB, संबंधित मंत्रालय और नियुक्ति प्रक्रिया के बीच कोई समयबद्ध व्यवस्था नहीं हो सकती?
अगर जवाब “नहीं” है, तो यह प्रशासनिक अक्षमता है।
और अगर जवाब “हां” है, तो फिर सवाल और गंभीर है—
जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
यहीं से “लापरवाही” और “नीतिगत उदासीनता” के बीच की सीमा धुंधली होने लगती है।
Additional Charge: अस्थायी उपाय या स्थायी संस्कृति?
Additional Charge का उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट है—नियमित नियुक्ति होने तक काम बाधित न हो।
यह एक emergency arrangement हो सकता है।
लेकिन emergency अगर महीनों तक चलती रहे तो वह emergency नहीं रहती।
वह व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है।
सरकारी नियम भी अतिरिक्त प्रभार को लेकर अलग-अलग चरणों में vigilance clearance की व्यवस्था करते हैं। यानी सरकार खुद स्वीकार करती है कि लंबे समय तक ऐसी व्यवस्था चलाना सामान्य स्थिति नहीं है।
फिर भी कई CPSEs में यही मॉडल दिखाई देता है।
एक अधिकारी अपनी मूल जिम्मेदारी संभाल रहा है और साथ में दूसरी कंपनी का शीर्ष पद भी।
ऐसी स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है—
क्या वह अधिकारी उस दूसरी कंपनी के भविष्य के बड़े फैसलों के लिए उतनी ही स्वतंत्रता और जिम्मेदारी से निर्णय ले पाएगा?
जुलाई 2026 में सरकार के उच्च स्तर पर हुई समीक्षा में यह चिंता सामने आई कि लंबे समय से खाली पड़े शीर्ष पदों के कारण रणनीतिक फैसलों में देरी हो रही है। एक सरकारी अधिकारी के हवाले से बताया गया कि एक प्रमुख CPSE की महत्वपूर्ण परियोजना तीन महीने तक इसलिए अटकी रही क्योंकि पद खाली था और अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे अधिकारी approval देने को लेकर हिचक रहे थे।
यह छोटी बात नहीं है।
जब नेतृत्व का अभाव करोड़ों या हजारों करोड़ की परियोजनाओं को रोकने लगे, तो उसकी कीमत अंततः जनता चुकाती है।
क्या यह सिर्फ लापरवाही है?
यहीं से असली बहस शुरू होती है।
मान लीजिए किसी सरकारी कंपनी को स्थायी नेतृत्व नहीं मिलता।
बोर्ड में महत्वपूर्ण पद खाली रहते हैं।
निर्णय धीमे होते हैं।
परियोजनाएं अटकती हैं।
निवेश टलता है।
कंपनी की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कमजोर होती है।
फिर कुछ वर्षों बाद सरकार कहती है—
“यह कंपनी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही।”
और उसके बाद अगला तर्क आता है—
“निजी क्षेत्र इसे बेहतर चला सकता है।”
क्या इसे बिना प्रमाण के सरकारी नीति कहना उचित होगा?
नहीं।
लेकिन क्या लोकतंत्र में इस संभावना की जांच की मांग करना गलत है?
बिल्कुल नहीं।
यही वह सवाल है जिसे सरकार टाल नहीं सकती।
पहले कमजोर करो, फिर बेचने का तर्क दो?
निजीकरण पर बहस अपनी जगह है।
सरकार किसी सार्वजनिक उपक्रम में अपनी हिस्सेदारी घटाना चाहती है या नहीं—यह आर्थिक नीति का प्रश्न है।
लेकिन सार्वजनिक हित का सिद्धांत बहुत सीधा है:
सरकारी कंपनी को बेचने से पहले उसे जानबूझकर या लापरवाही से कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।
यदि किसी कंपनी की governance structure ही अधूरी हो, तो उसकी performance का निष्पक्ष मूल्यांकन कैसे होगा?
अगर CEO/CMD स्थायी नहीं है, board में vacancies हैं और निर्णय लेने की प्रक्रिया बाधित है, तो कंपनी के खराब प्रदर्शन का पूरा दोष कर्मचारियों या संस्था पर डालना कितना उचित है?
एक अस्पताल में डॉक्टरों की भारी कमी पैदा करके यदि अस्पताल के खराब परिणाम दिखाए जाएं, तो क्या निष्कर्ष निकलेगा?
कि अस्पताल खराब है?
या यह कि अस्पताल को पर्याप्त संसाधन और नेतृत्व नहीं दिया गया?
सरकारी कंपनियों के साथ भी यही सवाल लागू होता है।
Independent Directors की 70% vacancy: असली खतरा यहां है
CMD की vacancy सुर्खियां बन सकती है।
लेकिन 533 Independent Director vacancies उससे भी गहरी समस्या है।
Independent Director बोर्ड के भीतर निगरानी और governance का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।
जब 758 में से 533 पद खाली हों, तो यह पूछना स्वाभाविक है—
कौन management पर सवाल पूछ रहा है?
कौन बड़े investment decisions की समीक्षा कर रहा है?
कौन corporate governance की स्वतंत्र निगरानी कर रहा है?
कौन shareholders के व्यापक हितों को देख रहा है?
और जब shareholder स्वयं सरकार हो, तो उस सरकारी shareholder की ओर से जनता के हितों की निगरानी कौन कर रहा है?
यही कारण है कि संसदीय समिति ने केवल नियुक्तियां करने की बात नहीं की, बल्कि इसे व्यापक governance crisis माना।
सरकार को जुलाई 2026 में फिर आदेश क्यों देना पड़ा?
यह प्रश्न सरकार के लिए असहज है।
जुलाई 2026 में प्रशासनिक मंत्रालयों को CPSEs के शीर्ष प्रबंधन पदों की रिक्तियां तीन महीने के भीतर भरने के निर्देश दिए गए। सरकार ने succession planning को भी आगे बढ़ाने की जरूरत बताई और कहा कि संभावित उम्मीदवारों की तलाश कम-से-कम छह महीने पहले शुरू की जानी चाहिए।
यानी सरकार को अब यह समझ आया है कि vacancy आने के बाद प्रक्रिया शुरू करना पर्याप्त नहीं है।
लेकिन यही बात पहले क्यों नहीं लागू थी?
क्यों एक ऐसी प्रणाली नहीं बनाई गई जिसमें CMD के retirement से छह महीने पहले successor selection स्वतः शुरू हो जाए?
यदि सरकार के पास हजारों करोड़ रुपये के सार्वजनिक उपक्रमों को संभालने की जिम्मेदारी है, तो इतनी बुनियादी succession planning भी समय पर नहीं हो सकती?
अगर नहीं हो सकती, तो यह शासन की क्षमता पर सवाल है।
और अगर हो सकती है, फिर भी नहीं की गई—
तो यह प्राथमिकता का सवाल है।
अगस्त 2026 भी सवालों से खाली नहीं
सरकार के जुलाई के निर्देश के बावजूद नियुक्ति प्रक्रिया हर जगह तत्काल पूरी नहीं हुई।
उदाहरण के लिए, IRCTC का CMD पद 20 जुलाई 2026 को खाली हुआ। PESB ने 6 अगस्त को इस पद के लिए विज्ञापन निकाला और आवेदन की अंतिम तारीख 27 अगस्त रखी।
दूसरी ओर National Textile Corporation (NTC) में 4 अगस्त 2026 को PESB किसी उम्मीदवार की सिफारिश नहीं कर सका और मंत्रालय को Search-cum-Selection Committee अथवा अन्य उपयुक्त प्रक्रिया से नियुक्ति आगे बढ़ाने की सलाह दी गई।
इन उदाहरणों का अर्थ यह नहीं कि हर vacancy सरकार की गलती है।
लेकिन वे यह जरूर बताते हैं कि समस्या केवल एक पुरानी फरवरी की सूची नहीं है।
नई vacancies पैदा हो रही हैं और कुछ पुरानी नियुक्तियां अभी भी प्रक्रिया में हैं।
इसलिए सरकार को एक live, public और company-wise vacancy register जारी करना चाहिए।
जनता को पता होना चाहिए: कौन चला रहा है उसकी कंपनी?
आज एक आम नागरिक के लिए यह जानना आसान नहीं है कि किसी CPSE का CMD कौन है, वह regular है या additional charge पर है, vacancy कब से है और नियुक्ति किस चरण में है।
यह स्थिति बदलनी चाहिए।
सरकार को प्रत्येक CPSE के लिए सार्वजनिक dashboard बनाना चाहिए:
कंपनी का नाम।
CMD/MD का नाम।
Regular या Additional Charge।
Vacancy की तारीख।
PESB प्रक्रिया की तारीख।
Interview की स्थिति।
ACC approval की स्थिति।
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
Independent Director vacancies।
Functional Director vacancies।
और सबसे महत्वपूर्ण—
पद भरने की संभावित समयसीमा।
जब कंपनी जनता की है तो उसकी leadership information भी जनता के लिए खुली होनी चाहिए।
सवाल सिर्फ “कौन CEO बनेगा?” का नहीं है
इस पूरे प्रकरण की सबसे बड़ी भूल यही होगी कि बहस को केवल नियुक्तियों तक सीमित कर दिया जाए।
मुद्दा व्यक्ति नहीं है।
https://politicsinsightindia.com/mmdr-amendment-bill-2026-farmer-land-acquisition-partnership
मुद्दा व्यवस्था है।
अगर आज 53 कंपनियां बिना नियमित CMD के हैं, तो कल 30 होंगी या 70—यह अकेला आंकड़ा समस्या का समाधान नहीं करता।
सरकार को यह बताना होगा कि vacancy management की पूरी प्रणाली क्यों विफल हुई।
क्या मंत्रालयों के पास succession calendar था?
क्या retirement dates के आधार पर recruitment स्वतः शुरू होता था?
क्या PESB को पर्याप्त उम्मीदवार उपलब्ध कराए गए?
क्या प्रशासनिक मंत्रालयों ने प्रस्ताव समय पर भेजे?
क्या approvals में अनावश्यक देरी हुई?
क्या political और bureaucratic discretion ने प्रक्रिया को धीमा किया?
और क्या additional charge व्यवस्था ने समस्या को हल करने के बजाय उसे छिपा दिया?
इन सवालों के जवाब चाहिए।
https://politicsinsightindia.com/sarakari-jawabdehi-ke-liye-bhookh-hadtal-jaroori-kyon-odisha
सार्वजनिक क्षेत्र को कमजोर करना राष्ट्रहित नहीं
भारत जैसे देश में सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका को केवल लाभ-हानि के आंकड़े से नहीं देखा जा सकता।
तेल सुरक्षा, ऊर्जा, दूरसंचार, रक्षा उत्पादन, रेलवे, जहाज निर्माण, खनन और रणनीतिक infrastructure में सरकारी कंपनियां राष्ट्रीय क्षमता का हिस्सा हैं।
निजी कंपनियां महत्वपूर्ण हैं।
लेकिन निजी क्षेत्र का विकास और सार्वजनिक क्षेत्र का क्षरण—दोनों एक ही बात नहीं हैं।
सरकार का काम निजी क्षेत्र को बढ़ावा देना हो सकता है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि सार्वजनिक संस्थानों को मजबूत करने की जिम्मेदारी छोड़ दी जाए।
प्रतिस्पर्धा चाहिए, लेकिन सार्वजनिक संस्थानों की कीमत पर नहीं।
सरकार से पांच सीधे सवाल
इस पूरे मामले में सरकार को पांच सवालों का सार्वजनिक जवाब देना चाहिए:
1. 53 CPSEs में नियमित CMD पद फरवरी 2026 तक खाली क्यों थे?
2. 533 Independent Director पदों पर नियुक्तियां समय पर क्यों नहीं हुईं?
3. कितने CPSEs आज भी Additional Charge व्यवस्था पर चल रहे हैं?
4. कितनी महत्वपूर्ण परियोजनाएं leadership vacancies के कारण विलंबित हुईं?
5. क्या किसी ऐसी CPSE में विनिवेश या strategic sale प्रस्तावित है, जिसकी governance vacancies लंबे समय से बनी हुई हैं?
पांचवें सवाल का जवाब विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
क्योंकि यदि कोई कंपनी निजी हाथों में देने का प्रस्ताव है, तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसकी बिक्री से पहले उसे पर्याप्त स्थायी नेतृत्व और मजबूत governance दिया गया था या नहीं।
निष्कर्ष: सरकार को संदेह दूर करना होगा
सरकार के पास इस विवाद से बाहर निकलने का सबसे सरल रास्ता है—पारदर्शिता।
यदि 53 vacancies केवल प्रशासनिक देरी थीं, तो सरकार पूरी timeline सामने रखे।
यदि नियुक्तियां प्रक्रिया में हैं, तो प्रत्येक कंपनी की स्थिति बताए।
यदि अतिरिक्त प्रभार केवल अस्थायी व्यवस्था है, तो उसकी समाप्ति की तारीख सार्वजनिक करे।
यदि किसी कंपनी के निजीकरण या strategic sale पर विचार हो रहा है, तो governance स्थिति भी सार्वजनिक करे।
और यदि कोई निजी हित इसमें शामिल नहीं है, तो उससे भी बेहतर—सरकार को खुले तौर पर सभी तथ्य सामने रखने चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछने वाले को देशविरोधी, निजी क्षेत्र विरोधी या विकास विरोधी कह देना आसान है।
लेकिन सवालों का जवाब देना शासन है।
आज देश के सामने मूल प्रश्न यही है:
क्या सरकार अपनी सार्वजनिक कंपनियों को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है?
या फिर सार्वजनिक संस्थानों को धीरे-धीरे प्रशासनिक उपेक्षा, नेतृत्वहीनता और कमजोर governance के हवाले छोड़कर ऐसा वातावरण बनाया जा रहा है जिसमें भविष्य में निजीकरण को “एकमात्र विकल्प” बताया जा सके?
इसका फैसला आरोपों से नहीं, सरकार की पारदर्शिता और कार्रवाई से होगा।
लेकिन एक बात स्पष्ट है—
जनता की संपत्ति को नेतृत्वहीन छोड़ना केवल प्रशासनिक भूल नहीं है।
यह सार्वजनिक जवाबदेही का प्रश्न है।
और यदि कोई सरकार वर्षों से खड़ी की गई सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा नहीं कर सकती, तो जनता को उससे सिर्फ एक सवाल पूछने का अधिकार नहीं—कर्तव्य है:
“जिस कंपनी को आपने जनता के पैसे से बनाया है, उसे आपने मजबूत किया या कमजोर होने दिया—और क्यों?”
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