कर्जमाफी नहीं, ऐसी कृषि नीति चाहिए जिससे किसान फिर कभी कर्जदार न बने! 12 सूत्रीय समाधान पत्र l
भारत के किसान को कर्ज और संकट से निकालने के लिए 12 सूत्रीय व्यापक मांग-पत्र। लाभकारी मूल्य, MSP, कम उत्पादन लागत, स्थिर आयात-निर्यात नीति, प्राकृतिक खेती, कृषि प्रसंस्करण, पानी-बिजली और स्थायी कर्ज-मुक्ति की ठोस मांगें।
By- Prakash Pohare
Chief Editor & Owner- Deshonnati, Maharashtra
देश का किसान आज गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। कृषि उत्पादन की लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि किसानों को उनकी उपज का उचित और लाभकारी मूल्य नहीं मिल पा रहा है। आयात-निर्यात नीतियों में बार-बार बदलाव, कृषि बाजार में सरकारी हस्तक्षेप, भंडारण एवं व्यापार संबंधी प्रतिबंध तथा अस्थिर कृषि नीतियों के कारण किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है।
किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत किए बिना भारत की अर्थव्यवस्था को स्थायी और समावेशी विकास की दिशा में आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। इसलिए कृषि नीति का उद्देश्य केवल सस्ती खाद्य सामग्री उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि किसान को उसकी उत्पादन लागत के ऊपर सम्मानजनक और सुनिश्चित आय उपलब्ध कराना होना चाहिए।
इसी उद्देश्य से किसानों के विभिन्न संगठनों द्वारा भारत सरकार के समक्ष निम्नलिखित मांगें प्रस्तुत की जाती हैं।
1. कृषि उपज का उचित एवं लाभकारी मूल्य सुनिश्चित किया जाए
किसान की आर्थिक सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण आधार उसकी उपज का लाभकारी मूल्य है।
प्रमुख मांगें
• कृषि उत्पादों के मूल्य कृत्रिम रूप से कम रखने वाली नीतियों और व्यवस्थाओं को समाप्त किया जाए।
• डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन की सिफारिशों के अनुरूप उत्पादन लागत के आधार पर लाभकारी मूल्य सुनिश्चित किया जाए।
• किसानों को केवल घोषित MSP पर निर्भर रखने के बजाय SSP (Strong Support Price) अथवा गन्ने की तर्ज पर FRP (Fair and Remunerative Price) जैसी अधिक प्रभावी मूल्य-व्यवस्था लागू की जाए।
• मूल्य निर्धारण में वास्तविक कृषि लागत, पारिवारिक श्रम, भूमि का मूल्य, पूंजी पर ब्याज तथा जोखिम को शामिल किया जाए।
• सरकार ऐसी व्यवस्था बनाए जिससे किसान को बाजार मूल्य गिरने की स्थिति में भी निर्धारित लाभकारी मूल्य प्राप्त हो।
2. अन्यायपूर्ण आयात से किसानों की रक्षा और निर्यात की स्वतंत्रता
कृषि आयात-निर्यात नीति में किसान के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
प्रमुख मांगें
• कृषि उत्पादों के शुल्क-मुक्त या अत्यधिक सस्ते आयात को समाप्त किया जाए।
• भारतीय किसानों को नुकसान पहुंचाने वाले आयात पर उचित और प्रभावी सीमा शुल्क लगाया जाए।
• विदेशी दबाव में ऐसी व्यापार नीति न बनाई जाए जिससे घरेलू कृषि बाजार और किसानों की आय प्रभावित हो।
• भारतीय कृषि को नुकसान पहुंचाने वाले असमान व्यापार समझौतों की समीक्षा की जाए।
• निम्न गुणवत्ता वाले खाद्य तेलों एवं कृषि उत्पादों के आयात पर प्रभावी नियंत्रण किया जाए।
• कृषि उत्पादों के निर्यात पर बार-बार प्रतिबंध लगाने की नीति समाप्त की जाए।
• किसानों को अंतरराष्ट्रीय बाजार का लाभ दिलाने के लिए दीर्घकालीन और स्थिर निर्यात नीति बनाई जाए।
3. कृषि व्यापार को स्वतंत्र और स्थिर बनाया जाए
किसान को उत्पादन की स्वतंत्रता के साथ अपनी उपज के व्यापार की भी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
प्रमुख मांगें
• कृषि उत्पादों पर लगाए जाने वाले अनावश्यक निर्यात प्रतिबंध समाप्त किए जाएं।
• अनावश्यक एवं बार-बार बदलने वाली भंडारण सीमाओं को समाप्त किया जाए।
• कृषि जिंसों की फ्यूचर्स ट्रेडिंग पर लगाए गए अनावश्यक प्रतिबंधों की समीक्षा की जाए।
• कृषि निर्यात को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक प्रोत्साहन एवं सहायता दी जाए।
• औद्योगिक घरानों, व्यापारिक हितों अथवा अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए कृषि कीमतों को कृत्रिम रूप से नियंत्रित न किया जाए।
• कृषि व्यापार नीति कम से कम 5–10 वर्ष की दीर्घकालीन स्थिरता को ध्यान में रखकर बनाई जाए।
4. कृषि उत्पादन लागत कम की जाए
किसान की आय बढ़ाने के साथ उत्पादन लागत कम करना भी आवश्यक है।
प्रमुख मांगें
• बीज, उर्वरक, कीटनाशक, बिजली, सिंचाई, डीजल तथा कृषि यंत्रों की लागत कम करने के लिए ठोस नीति बनाई जाए।
• कृषि इनपुट के बाजार में पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित की जाए।
• नकली एवं घटिया बीज, उर्वरक और कीटनाशकों पर कठोर कार्रवाई की जाए।
• कृषि इनपुट की गुणवत्ता और कीमत की नियमित जांच के लिए सक्षम संस्थागत व्यवस्था बनाई जाए।
• AIFA याने All India Farmers Associations अथवा इसी प्रकार की सक्षम संस्थाओं के माध्यम से बीज, उर्वरक, कीटनाशक और कृषि उपकरणों की गुणवत्ता एवं मूल्य की निगरानी अनिवार्य की जाए।
• कृषि नीति को पारदर्शी, वैज्ञानिक और भ्रष्टाचारमुक्त बनाया जाए।
5. टिकाऊ, जैविक एवं प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन
कृषि का भविष्य ऐसी व्यवस्था में है जिसमें मिट्टी, पानी, जैव विविधता और किसान की आय—सभी सुरक्षित रहें।
प्रमुख मांगें
• जैविक / प्राकृतिक और रासायनिक खेती करने वाले किसानों का पृथक वर्गीकरण किया जाए।
• प्राकृतिक एवं जैविक खेती की ओर संक्रमण करने वाले किसानों को, सरकार रासायनिक खाद के लिये जो सबसिडी देती है/ खर्च करती है उस वर्तमान उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था की समीक्षा कर पात्र किसानों को प्रत्यक्ष DBT के माध्यम से सहायता देने की व्यवस्था विकसित की जाए।
• प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों को संक्रमण अवधि में होने वाले संभावित उत्पादन जोखिम की भरपाई की जाए।
• मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने वाली कृषि पद्धतियों को विशेष प्रोत्साहन दिया जाए।
6. कृषि प्रसंस्करण और विपणन व्यवस्था में सुधार
किसान को केवल कच्चा माल बेचने वाला उत्पादक नहीं, बल्कि कृषि मूल्य-श्रृंखला का भागीदार बनाया जाए।
प्रमुख मांगें
• किसानों को कच्ची उपज बेचने के बजाय मूल्य-वर्धित उत्पाद बेचने के लिए स्थानीय प्रसंस्करण केंद्र स्थापित करने में सहायता दी जाए।
• ग्राम पंचायतों, किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) और किसान संगठनों को लघु कृषि-प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित करने के लिए वित्तीय एवं तकनीकी सहायता दी जाए।
• फल प्रसंस्करण और वाइन उद्योग के लिए स्पष्ट एवं किसान हितैषी नीति बनाई जाए।
• धान उत्पादक किसानों को केवल कच्चा धान बेचने के बजाय चावल के रूप में मूल्य संवर्धन करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
• ग्राम स्तर पर लघु राइस मिलों की स्थापना को प्रोत्साहन दिया जाए।
• चावल, गेहूं, दाल तथा अन्य प्रसंस्कृत कृषि उत्पादों के लिए भी FRP/SSP जैसी मूल्य-सुरक्षा व्यवस्था विकसित की जाए।
• किसानों को प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और विपणन में प्रशिक्षण दिया जाए।
7. कृषि आय को राष्ट्रीय आर्थिक विकास से जोड़ा जाए
किसान की आय और देश की आर्थिक प्रगति के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।
प्रमुख मांगें
• FRP/SSP को व्यापक राष्ट्रीय आय एवं वेतन संरचना के अनुरूप समय-समय पर संशोधित किया जाए।
• कृषि उत्पादों और औद्योगिक वस्तुओं के बीच मूल्य-संतुलन सुनिश्चित किया जाए।
• कृषि उत्पादों की कीमतों की तुलना आवश्यक वस्तुओं, सोने, श्रम और औद्योगिक वस्तुओं की कीमतों के साथ करते हुए दीर्घकालीन मूल्य सूचकांक तैयार किया जाए।
ऐतिहासिक संदर्भ : 1967
प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार 1967 के आसपास:
• सोना : 12 ग्राम — ₹102
• कपास : ₹180 प्रति क्विंटल
• गेहूं : ₹90 प्रति क्विंटल
• शिक्षक का वेतन : ₹40 प्रति माह
उस दौर की कृषि अर्थव्यवस्था में किसानों की बचत क्षमता अपेक्षाकृत अधिक थी, जिस कारण किसान बँकोसे कर्ज लेने के बजाय, Fix डिपॉझिट रखते थे. इसलिए आज की कृषि मूल्य नीति का उद्देश्य भी ऐसा आर्थिक संतुलन स्थापित करना होना चाहिए जिसमें किसान केवल जीवित रहने के लिए नहीं, बल्कि बचत और निवेश करने में भी सक्षम हो।
8. खाद्य वितरण नीति में सुधार
गरीब उपभोक्ताओं की खाद्य सुरक्षा और किसानों के बाजार हितों के बीच संतुलन आवश्यक है।
प्रमुख मांगें
• वर्तमान मुफ्त अनाज वितरण व्यवस्था के आर्थिक एवं कृषि-बाजार प्रभाव की व्यापक समीक्षा की जाए।
• मुफ्त अनाज वितरण के जगह खाद्य सहायता के लिये प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) जैसे विकल्पों पर विचार किया जाए।
• गरीब परिवारों के लिए सामुदायिक भोजन व्यवस्था, कम्युनिटी किचन अथवा लंगर जैसी व्यवस्थाओं को प्रोत्साहित किया जाए।
• अतिरिक्त कृषि उत्पादन का उपयोग खाद्य प्रसंस्करण, औद्योगिक उपयोग और उपयुक्त जैव-ईंधन उत्पादन में किया जाए।
• गन्ने के उपयोग में खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय के बीच संतुलन रखते हुए एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा दिया जाए।
9. आवश्यक वस्तु कानून में कृषि हितों के अनुरूप सुधार
कृषि उत्पादों पर अत्यधिक सरकारी नियंत्रण किसानों को बाजार में बेहतर मूल्य प्राप्त करने से रोक सकता है।
प्रमुख मांगें
• खाद्यान्न और कृषि उत्पादों पर आवश्यक वस्तु संबंधी नियंत्रणों की समीक्षा की जाए।
• स्टॉक लिमिट एवं अन्य प्रतिबंध केवल असाधारण परिस्थितियों में और स्पष्ट, पारदर्शी मानकों के आधार पर लगाए जाएं।
• आवश्यक वस्तुओं की सूची और नियंत्रण व्यवस्था में उन क्षेत्रों को भी शामिल करने पर विचार किया जाए जिनका आम जनता के जीवन-यापन पर व्यापक प्रभाव पड़ता है, जैसे:
◦ सीमेंट
◦ लोहा
◦ पेट्रोलियम उत्पाद
◦ शिक्षा
◦ स्वास्थ्य सेवाएं
◦ परिवहन एवं सार्वजनिक परिवहन
10. कृषि को उद्योग के समान आर्थिक दर्जा दिया जाए
कृषि को केवल जीविका का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण उत्पादक क्षेत्र के रूप में मान्यता दी जाए।
प्रमुख मांगें
• किसानों को उद्यमी एवं उत्पादक के रूप में मान्यता देने वाली आर्थिक व्यवस्था विकसित की जाए।
• कृषि-आधारित व्यवसायों और किसान उत्पादक संगठनों को औपचारिक आर्थिक व्यवस्था से जोड़ने के लिए सरल कर एवं पंजीकरण व्यवस्था बनाई जाए।
• पात्र किसानों एवं कृषि उद्यमों के लिए GST पंजीकरण की सुविधा उपलब्ध कराई जाए।
• बड़े एवं व्यावसायिक कृषि कारोबार को स्पष्ट, पारदर्शी और न्यायसंगत आयकर व्यवस्था के अंतर्गत लाने पर नीति-स्तर पर विचार किया जाए।
• छोटे और सीमांत किसानों पर अनावश्यक अनुपालन भार न डाला जाए।
11. खाद्य गुणवत्ता और उपभोक्ता पारदर्शिता
किसान और उपभोक्ता दोनों के हित में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और संरचना की स्पष्ट जानकारी उपलब्ध होना आवश्यक है।
प्रमुख मांगें
सभी पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर स्पष्ट और सत्यापित जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
खाद्य पदार्थों के लिए
• Organic अथवा Non-Organic
• उत्पाद की प्रमुख सामग्री
• मिश्रित अथवा गैर-मिश्रित
• प्रसंस्करण की प्रकृति
खाद्य तेलों के लिए
• Blended अथवा Non-Blended
• Blended होने की स्थिति में प्रत्येक तेल का प्रतिशत
• Refined अथवा Non-Refined
• Hot Pressed अथवा Cold Pressed
दूध के लिए
• A1 अथवा A2 संबंधी जानकारी, जहां वैज्ञानिक रूप से सत्यापित और नियामकीय मानकों के अनुरूप हो।
खाद्य गुणवत्ता संबंधी दावों को वैज्ञानिक परीक्षण, प्रमाणन और उपभोक्ता अधिकारों के अनुरूप विनियमित किया जाए।
12. भूमि, पानी और बिजली के लिए समान राष्ट्रीय नीति
भारत में कृषि विकास के लिए भूमि, सिंचाई और बिजली तीनों पर दीर्घकालीन राष्ट्रीय नीति आवश्यक है।
12.1 भूमि नीति
• भूमि सीमा कानून की वर्तमान व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की जाए।
• भूमि स्वामित्व और उपयोग संबंधी कानूनों में किसान की आर्थिक स्वतंत्रता और उत्पादकता को ध्यान में रखा जाए।
• यदि कृषि भूमि पर सीमा संबंधी व्यवस्था जारी रहती है, तो शहरी संपत्ति एवं अन्य बड़े संपत्ति स्वामित्व के संबंध में भी समानता और संतुलन पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा की जाए।
12.2 कृषि बिजली नीति
• कृषि बिजली के लिए समान राष्ट्रीय नीति बनाई जाए।
• किसानों को पर्याप्त, विश्वसनीय और सस्ती बिजली उपलब्ध कराई जाए।
• बिजली वितरण में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
12.3 राष्ट्रीय जल नीति
कृषि सिंचाई के लिए जल का कुशल और न्यायपूर्ण वितरण आवश्यक है।
पाइपलाइन आधारित सिंचाई प्रणाली की मांग
वर्तमान नहर प्रणाली में कई स्थानों पर रिसाव, वाष्पीकरण, अवैध निकासी तथा रखरखाव की समस्याओं के कारण पानी की बड़ी मात्रा खेतों तक पहुंचने से पहले ही नष्ट हो जाती है।
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इसलिए:
• बांधों से सिंचाई जल के वितरण में आधुनिक पाइपलाइन प्रणाली को प्राथमिकता दी जाए।
• वर्तमान नहर प्रणाली को चरणबद्ध तरीके से पाइपलाइन आधारित वितरण प्रणाली में परिवर्तित किया जाए।
• जहां तकनीकी एवं आर्थिक रूप से उपयुक्त हो, वहां बंद पाइपलाइन नेटवर्क विकसित किया जाए।
• अंतिम छोर के किसानों तक पर्याप्त मात्रा और दबाव के साथ पानी पहुंचाना सुनिश्चित किया जाए।
• जल वितरण में डिजिटल निगरानी और मीटरिंग व्यवस्था विकसित की जाए।
• इस नीती के कारण नहरों की मरम्मत एवं रखरखाव के नाम पर होने वाले भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण किया जायेगा।
• पाइपलाइन प्रणाली से भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता, जल हानि और वितरण संबंधी असमानता को कम करने के विकल्पों का अध्ययन किया जाए।
किसानों के लिए व्यापक आर्थिक सुरक्षा कार्यक्रम
उपरोक्त 12 मांगों के साथ किसानों की आर्थिक सुरक्षा के लिए निम्नलिखित सिद्धांतों को कृषि नीति का आधार बनाया जाए:
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उचित एवं लाभकारी कृषि मूल्य
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स्थिर और किसान हितैषी बाजार व्यवस्था
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दीर्घकालीन आयात-निर्यात नीति
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कृषि निर्यात को प्रोत्साहन
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कृषि आयात पर किसान हित के अनुरूप शुल्क
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उत्पादन लागत में कमी
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किसानों को प्रत्यक्ष DBT सहायता
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पारदर्शी और प्रभावी फसल बीमा
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प्राकृतिक एवं टिकाऊ खेती को प्रोत्साहन
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कृषि प्रसंस्करण एवं ग्रामीण उद्योगों का विस्तार
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राष्ट्रीय जल एवं बिजली नीति
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कृषि बाजार में अनावश्यक सरकारी हस्तक्षेप की समाप्ति
कर्जमाफी नहीं, स्थायी कर्ज-मुक्ति की नीति
किसान की समस्या का स्थायी समाधान केवल समय-समय पर कर्जमाफी घोषित करना नहीं है।
कर्जमाफी से तत्काल राहत मिल सकती है, लेकिन यदि किसान की उत्पादन लागत लगातार बढ़ती रहे और उसकी उपज का मूल्य लागत के अनुरूप न मिले, तो कुछ वर्षों बाद वह फिर कर्ज में फंस सकता है।
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इसलिए सरकार को:
• एक बार व्यापक और अंतिम कृषि कर्जमाफी पर विचार करना चाहिए।
• इसके साथ ऐसी मूल्य एवं आय नीति लागू करनी चाहिए जिससे किसान को भविष्य में अनावश्यक कर्ज लेने की आवश्यकता न पड़े।
• कृषि ऋण की ब्याज दरों और पुनर्भुगतान व्यवस्था को किसान की वास्तविक आय से जोड़ा जाए।
• प्राकृतिक आपदा, बाजार दुर्घटना और कीमतों में भारी गिरावट की स्थिति में स्वचालित ऋण-सुरक्षा तंत्र विकसित किया जाए।
कर्जमाफी तत्काल राहत है; लेकिन लाभकारी मूल्य, कम उत्पादन लागत और स्थिर आय किसान को स्थायी रूप से कर्ज के चक्र से बाहर निकालने का आधार है।
प्राकृतिक खेती और प्रत्यक्ष सहायता
प्राकृतिक एवं जैविक खेती की ओर बढ़ने वाले किसानों के लिए संक्रमण अवधि में आर्थिक सहायता आवश्यक है।
इसलिए:
• उर्वरक सब्सिडी और अन्य कृषि सहायता की समीक्षा की जाए।
• जहां नीति के अनुसार पात्रता हो, सहायता का बड़ा हिस्सा प्रत्यक्ष DBT के माध्यम से किसानों तक पहुंचाया जाए।
• प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों को कम से कम पांच वर्षों तक संक्रमण सहायता दी जाए।
• कृषि अनुसंधान, मिट्टी परीक्षण, जैविक इनपुट और बाजार उपलब्धता को इस कार्यक्रम से जोड़ा जाए।
• प्राकृतिक खेती को केवल प्रचार अभियान न बनाकर किसान की आय और बाजार से जोड़ने वाली संपूर्ण आर्थिक नीति बनाया जाए।
निष्कर्ष
भारतीय कृषि के सामने आज केवल उत्पादन की समस्या नहीं है; यह मूल्य, बाजार, लागत, व्यापार, जल, बिजली, प्रसंस्करण, ऋण और नीति की स्थिरता से जुड़ा व्यापक आर्थिक प्रश्न है।
किसान को बार-बार राहत देने के बजाय ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए जिसमें किसान अपनी उपज से सम्मानजनक आय अर्जित कर सके, बचत कर सके और भविष्य में कर्ज लेने के लिए मजबूर न हो।
कृषि नीति का अंतिम उद्देश्य यह होना चाहिए कि:
किसान को उसकी उपज का लाभकारी मूल्य मिले, उत्पादन लागत घटे, बाजार स्थिर हो, निर्यात के अवसर बढ़ें, आयात से उचित संरक्षण मिले, पानी और बिजली उपलब्ध हो तथा कृषि परिवार सम्मानजनक जीवन जी सके।
किसानों को हर वर्ष कर्जमाफी की मांग करने के लिए मजबूर करने के बजाय ऐसी आर्थिक व्यवस्था विकसित करना ही वास्तविक समाधान है जिसमें किसान कर्ज लेने के लिए मजबूर न हो।
किसान की समृद्धि केवल किसान का मुद्दा नहीं है—यह देश की खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, रोजगार, सामाजिक स्थिरता और राष्ट्रीय आर्थिक विकास का आधार है।
अतः सरकार से मांग है कि इन 12 प्रमुख मांगों पर व्यापक राष्ट्रीय संवाद आयोजित कर समयबद्ध कार्ययोजना तैयार की जाए और उसके क्रियान्वयन की नियमित सार्वजनिक समीक्षा सुनिश्चित की जाए।
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