स्कूल तबेले में, समाज सियासत में: क्या राजनीति ने हमारी संवेदनाएं दूषित कर दी हैं?
राजनीतिक ध्रुवीकरण के दौर में सरकारी स्कूलों की बदहाली पर सवाल उठाने के बजाय समाज आपस में क्यों लड़ रहा है? जयपुर की घटना के बहाने यह लेख अंधसमर्थन, शिक्षा व्यवस्था, स्कूलों के विलय और जनहित से दूर होती राजनीति की गंभीर पड़ताल करता है।
क्या राजनीति समाज को दूषित कर रही है?
जब स्कूल की बदहाली पर सवाल उठाने वालों से ही समाज लड़ने लगे, तब हार किसकी होती है—सरकार की, राजनीति की या जनता की?
लेखक: चौ. सुधीर तालियान
किसी गांव की सुबह में बच्चों की आवाजें बहुत दूर तक जाती हैं। कोई बच्चा पहाड़ा दोहरा रहा होता है, कोई अपनी कॉपी में टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में अपना नाम लिख रहा होता है और कोई शिक्षक की डांट से बचने के लिए किताब के पीछे छिपा होता है। यही दृश्य किसी भी लोकतंत्र के भविष्य की सबसे सुंदर तस्वीर हो सकता है।
लेकिन कल्पना कीजिए कि वही बच्चे किसी दिन स्कूल की इमारत में नहीं, बल्कि तबेला जैसे अस्थायी स्थान में बैठकर पढ़ने को मजबूर हों।
तब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि स्कूल की हालत पर सवाल कौन उठा रहा है।
सवाल यह होना चाहिए—स्कूल की यह हालत हुई क्यों?
और उससे भी बड़ा सवाल—बच्चों की इस समस्या को लेकर समाज एकजुट क्यों नहीं है?
जयपुर के रामपुरा-कंवरपुरा गांव में सरकारी स्कूल के निरीक्षण को लेकर CJP की टीम और स्थानीय लोगों के बीच हुआ विवाद इसी बड़े सवाल को हमारे सामने खड़ा करता है। CJP के आशुतोष रांका और उनकी टीम का दावा है कि वे सरकारी स्कूलों की खराब स्थिति देखने और उसे सुधारने की मांग को लेकर वहां पहुंचे थे। दूसरी ओर स्थानीय लोगों ने उनके प्रवेश का विरोध किया। इसके बाद तनाव बढ़ा और CJP ने BJP से जुड़े लोगों पर हमले का आरोप लगाया। BJP ने इन आरोपों को खारिज किया और CJP पर राजनीतिक उद्देश्य से गांव में आने का आरोप लगाया।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात आरोपों में से किसी एक को सही साबित करना नहीं है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस सरकारी स्कूल की स्थिति पर चर्चा होनी चाहिए थी, वह चर्चा राजनीतिक टकराव में बदल गई।
यही हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है।
स्कूल पर सवाल था, समाज राजनीति में उलझ गया
CJP ने राजस्थान में “School Thik Karo” अभियान शुरू करने की घोषणा की थी। संगठन का कहना था कि उसे राजस्थान के कई जिलों से जर्जर और खराब हालत वाले सरकारी स्कूलों की शिकायतें मिली हैं और वह इन स्कूलों की स्थिति सामने लाकर प्रशासन से कार्रवाई की मांग करेगा। अभियान में जयपुर के अलावा अजमेर, जोधपुर, उदयपुर, धौलपुर, भरतपुर, कोटा, बाड़मेर और हनुमानगढ़ जैसे जिलों का भी उल्लेख किया गया था।
यह किसी भी लोकतांत्रिक समाज में अपने आप में असामान्य बात नहीं है।
सरकार के काम पर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है।
सामाजिक संगठनों का अधिकार है।
पत्रकारों का अधिकार है।
और सबसे बढ़कर जनता का अधिकार है।
यदि कोई सरकारी अस्पताल खराब है तो वहां सवाल उठना चाहिए।
यदि सड़क टूटी है तो सवाल उठना चाहिए।
यदि राशन नहीं मिल रहा तो सवाल उठना चाहिए।
और यदि बच्चे सुरक्षित भवन में पढ़ नहीं पा रहे हैं तो सवाल उठना ही चाहिए।
लेकिन हमारे समाज में एक विचित्र स्थिति पैदा हो रही है।
सवाल सरकार से होना चाहिए था, लेकिन लड़ाई आपस में होने लगी।
किसने सवाल उठाया?
वह किस पार्टी से जुड़ा है?
उसके पीछे कौन है?
वह किस विचारधारा का समर्थक है?
उसने पहले किसके खिलाफ बोला था?
उसकी राजनीतिक पहचान क्या है?
इन सवालों ने असली सवाल को पीछे धकेल दिया।
बच्चे कहां पढ़ेंगे—यह सवाल गायब हो गया।
राजनीतिक समर्थक होना लोकतंत्र में अपराध नहीं, लेकिन अंधसमर्थन खतरनाक है
किसी राजनीतिक पार्टी का समर्थक होना लोकतांत्रिक अधिकार है।
आप BJP समर्थक हो सकते हैं।
आप कांग्रेस समर्थक हो सकते हैं।
आप किसी क्षेत्रीय पार्टी के समर्थक हो सकते हैं।
आप किसी विचारधारा के समर्थक हो सकते हैं।
इसमें कोई बुराई नहीं है।
लेकिन समर्थक होने का अर्थ यह कतई नहीं कि आपकी पार्टी की सरकार की हर गलती आपको सही दिखाई दे।
राजनीतिक निष्ठा और विवेक दो अलग चीजें हैं।
यदि कोई व्यक्ति अपनी पार्टी से प्रेम करता है, तो वह यह भी कह सकता है—
“मेरी पार्टी अच्छी है, लेकिन इस मामले में सरकार गलत है।”
यह लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की ताकत है।
बल्कि असली राजनीतिक परिपक्वता तब है जब समर्थक अपनी सरकार से भी सवाल पूछ सके।
अगर सड़क खराब है तो वह कहे—सड़क ठीक करो।
अगर स्कूल जर्जर है तो वह कहे—स्कूल ठीक करो।
अगर अस्पताल में डॉक्टर नहीं है तो वह कहे—डॉक्टर नियुक्त करो।
अगर भ्रष्टाचार हुआ है तो वह कहे—जांच करो।
इससे पार्टी कमजोर नहीं होती।
पार्टी मजबूत होती है।
क्योंकि जनता को तब लगता है कि उसके समर्थक पार्टी के नहीं, बल्कि समाज के भी हैं।
चुप रहना अलग बात है, सवाल उठाने वाले का विरोध करना अलग
किसी समर्थक को यदि लगता है कि उसकी सरकार अच्छा काम कर रही है, तो वह चुप रह सकता है।
वह अपनी सरकार के पक्ष में तर्क दे सकता है।
वह उपलब्धियां गिना सकता है।
लेकिन यदि कोई दूसरा व्यक्ति सरकार की कमी उजागर करता है तो उससे लड़ना किस बात का प्रमाण है?
क्या सरकार इतनी कमजोर है कि एक सवाल से गिर जाएगी?
क्या किसी स्कूल की तस्वीर सामने आने से सरकार की प्रतिष्ठा खत्म हो जाएगी?
क्या किसी सरकारी कमी पर सवाल उठाना देशद्रोह है?
नहीं।
लोकतंत्र में सरकार आलोचना से नहीं, आलोचना को दबाने से कमजोर होती है।
एक स्वस्थ लोकतंत्र में सत्ता पक्ष कहता है—
“आपने समस्या बताई है, आइए देखते हैं समस्या कितनी वास्तविक है।”
एक अस्वस्थ राजनीतिक संस्कृति कहती है—
“तुमने हमारी सरकार के खिलाफ क्यों बोला?”
इन दोनों वाक्यों के बीच ही लोकतांत्रिक समाज और राजनीतिक भीड़ के बीच का अंतर छिपा है।
जयपुर की घटना का सबसे बड़ा सबक
जयपुर में CJP की टीम के साथ जो हुआ, उसके बारे में अलग-अलग पक्षों के अलग-अलग दावे हैं। CJP ने BJP से जुड़े लोगों पर हमले का आरोप लगाया है। स्थानीय ग्रामीणों ने आरोपों को नकारा है। BJP नेताओं ने भी CJP के आरोपों को खारिज करते हुए उसके राजनीतिक संबंधों पर सवाल उठाए हैं।
इसलिए जिम्मेदार पत्रकारिता यह नहीं कह सकती कि आरोप ही अंतिम सत्य है।
लेकिन एक बात निर्विवाद रूप से सामने आती है—
एक सरकारी स्कूल की समस्या राजनीतिक संघर्ष का कारण बन गई।
और यही चिंता का विषय है।
अगर किसी राजनीतिक संगठन की मंशा गलत थी, तो उसके खिलाफ कानूनी प्रक्रिया होनी चाहिए।
अगर स्कूल निरीक्षण के लिए अनुमति जरूरी थी, तो प्रशासन को कानून के अनुसार कार्रवाई करनी चाहिए।
अगर किसी ने हमला किया, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
अगर किसी ने सरकारी स्कूल की बदहाली उजागर की, तो प्रशासन को स्कूल की स्थिति का जवाब देना चाहिए।
लेकिन किसी भी स्थिति में बच्चों का स्कूल राजनीतिक अखाड़ा नहीं बनना चाहिए।
सरकारी स्कूलों की वास्तविक तस्वीर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
यहां एक और जरूरी तथ्य है।
भारत में 2024-25 में कुल लगभग 14.71 लाख स्कूल थे, जिनमें लगभग 10.13 लाख सरकारी स्कूल थे। सरकारी स्कूल देश के लगभग आधे विद्यार्थियों को शिक्षा देते हैं। शिक्षा मंत्रालय के UDISE+ 2024-25 आंकड़ों के अनुसार सरकारी स्कूलों में लगभग 12.16 करोड़ विद्यार्थी पढ़ रहे थे।
अर्थात सरकारी शिक्षा व्यवस्था कोई छोटी व्यवस्था नहीं है।
यह करोड़ों गरीब, ग्रामीण और निम्न-मध्यम आय वाले परिवारों के बच्चों का भविष्य है।
राजस्थान में ही 2024-25 में 70,155 सरकारी स्कूल दर्ज किए गए थे।
इसलिए किसी सरकारी स्कूल की खराब इमारत को देखकर यह कहना कि “इसमें राजनीति क्यों कर रहे हो?” पर्याप्त उत्तर नहीं है।
पहला सवाल होना चाहिए—
“बच्चे इस हालत में क्यों पढ़ रहे हैं?”
लगभग 94,000 सरकारी स्कूलों की कमी।
NITI Aayog से संबंधित हालिया विश्लेषण में 2014-15 से 2024-25 के बीच सरकारी स्कूलों की संख्या लगभग 11.07 लाख से घटकर 10.13 लाख होने की बात सामने आई है—अर्थात लगभग 94,000 सरकारी स्कूलों की कमी।
2025-26 में UDISE+ के अनुसार देश में स्कूलों की कुल संख्या लगभग 14.71 लाख से घटकर 14.67 लाख हुई और करीब 4,791 स्कूलों की कमी दर्ज की गई।
यह आंकड़ा बताता है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था के सामने चुनौती केवल भवन की नहीं है।
यह पहुंच, नामांकन, शिक्षक, बुनियादी ढांचे और स्कूलों के स्थान की भी चुनौती है।
स्कूल बंद करना हमेशा समाधान नहीं होता
कई बार सरकारें कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को मर्ज या rationalise करने की नीति अपनाती हैं।
कागज पर यह आर्थिक रूप से उचित दिखाई दे सकता है।
एक स्कूल में 10 बच्चे हैं।
दूसरे स्कूल में 100 बच्चे हैं।
सरकार कहती है कि दोनों को मिलाकर संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जाए।
लेकिन गांव के बच्चे के लिए सवाल अलग है।
वह स्कूल कितनी दूर चला गया?
छोटी कक्षा का बच्चा वहां कैसे जाएगा?
क्या रास्ता सुरक्षित है?
क्या बच्चियों के लिए परिवहन की व्यवस्था है?
क्या बारिश के मौसम में रास्ता खुला रहेगा?
क्या गरीब परिवार रोज बच्चे को इतनी दूर भेज पाएगा?
अगर स्कूल दूर हो गया और बच्चा स्कूल छोड़ दे, तो सरकारी फाइल में यह “rationalisation” हो सकता है, लेकिन बच्चे के जीवन में यह शिक्षा से दूरी है।
इसीलिए स्कूलों का merger केवल संख्या घटाने या भवन बचाने का प्रशासनिक फैसला नहीं होना चाहिए।
यह बच्चों की पहुंच के आधार पर होना चाहिए।
सरकारी शिक्षा व्यवस्था केवल गरीबों की शिक्षा नहीं है
हमने सरकारी स्कूल को धीरे-धीरे “गरीबों का स्कूल” समझना शुरू कर दिया है।
यही सबसे खतरनाक सामाजिक परिवर्तन है।
जब समाज का प्रभावशाली वर्ग सरकारी स्कूल से अलग हो जाता है, तो सरकारी स्कूल की गुणवत्ता के लिए उसका दबाव भी कम हो जाता है।
जिस स्कूल में प्रभावशाली परिवार का बच्चा पढ़ता है, वहां सड़क भी जल्दी बनती है, शिक्षक की उपस्थिति भी सुनिश्चित होती है और भवन की मरम्मत भी प्राथमिकता बनती है।
लेकिन जिस स्कूल में केवल गरीब किसान, मजदूर, दलित, पिछड़े और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे पढ़ते हैं, वहां उनकी आवाज कमजोर पड़ जाती है।
सरकारी स्कूल कमजोर नहीं है—हमने उसकी राजनीतिक और सामाजिक प्राथमिकता कमजोर कर दी है।
तबेला स्कूल नहीं होना चाहिए—यह किसी भी सरकार की पहली जिम्मेदारी है
जयपुर विवाद में जिस स्कूल को लेकर “तबेला” जैसी स्थिति का उल्लेख सामने आया, वह यदि वास्तविक है तो यह किसी पार्टी की हार या जीत का सवाल नहीं है।
यह प्रशासनिक विफलता का सवाल है।
एक बच्चे को स्कूल में बैठने के लिए सुरक्षित छत चाहिए।
साफ पानी चाहिए।
शौचालय चाहिए।
हवादार कक्षा चाहिए।
बिजली चाहिए।
कुर्सी-मेज चाहिए।
शिक्षक चाहिए।
किताब चाहिए।
और सबसे जरूरी—सम्मानजनक वातावरण चाहिए।
यदि किसी बच्चे को ऐसी जगह पढ़ना पड़े जिसे देखकर समाज स्वयं शर्मिंदा हो, तो हमें राजनीतिक नारे नहीं लगाने चाहिए।
हमें सवाल पूछना चाहिए—
जिम्मेदार कौन है?
पैसा कहां गया?
निर्माण कब होना था?
टेंडर किसे मिला?
काम क्यों नहीं हुआ?
अधिकारी ने निरीक्षण किया या नहीं?
स्थानीय जनप्रतिनिधि ने सवाल क्यों नहीं उठाया?
शिक्षा विभाग ने क्या किया?
और सबसे महत्वपूर्ण—
बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?
सरकार किसी भी पार्टी की हो—बच्चे पार्टी के नहीं होते
यह बात हमें हमेशा याद रखनी होगी।
आज BJP की सरकार है।
कल कांग्रेस की हो सकती है।
किसी राज्य में क्षेत्रीय पार्टी की सरकार हो सकती है।
केंद्र में एक पार्टी हो सकती है, राज्य में दूसरी।
लेकिन सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा किसी पार्टी का नहीं होता।
वह भारत का नागरिक है।
उसका भविष्य किसी चुनावी घोषणा-पत्र का उपभोक्ता नहीं, बल्कि राष्ट्र की वास्तविक पूंजी है।
इसलिए स्कूल की समस्या पर सवाल उठाने वाले से यह पूछना कि—
“तुम किस पार्टी के हो?”
असल सवाल से भागना है।
पूछना चाहिए—
“तुमने जो समस्या बताई है, क्या वह सही है?”
यदि सही है तो सुधार करो।
यदि गलत है तो तथ्य सामने रखो।
यही लोकतंत्र है।
राजनीति जब विचार से पहचान बन जाती है
राजनीति का मूल उद्देश्य समाज के लिए बेहतर रास्ते तलाशना था।
लेकिन धीरे-धीरे राजनीति ने हमारे सामाजिक संबंधों में भी जगह बना ली है।
पहले गांव में लोग कहते थे—
“फलां व्यक्ति अच्छा आदमी है।”
अब कहा जाता है—
“वह BJP वाला है।”
“वह कांग्रेस वाला है।”
“वह उस पार्टी का आदमी है।”
मानो राजनीतिक पहचान ने व्यक्ति की पूरी सामाजिक पहचान को निगल लिया हो।
और जब राजनीति व्यक्ति की पहचान बन जाती है, तब दूसरे राजनीतिक विचार वाले व्यक्ति से असहमति धीरे-धीरे व्यक्तिगत दुश्मनी में बदल सकती है।
यहीं से समाज टूटता है।
आज समर्थक सरकार की आलोचना से डरता है
कई समर्थकों के मन में एक डर पैदा हो गया है—
अगर मैंने अपनी सरकार की आलोचना की तो विपक्ष खुश होगा।
लेकिन यह सोच गलत है।
अगर आपकी पार्टी सत्ता में है और आप उसकी गलती बताते हैं, तो आप विपक्ष की मदद नहीं कर रहे।
आप अपनी सरकार को सुधारने में मदद कर रहे हैं।
सरकार को केवल विरोधियों से नहीं, अपने समर्थकों से भी ईमानदार फीडबैक चाहिए।
और यदि कोई दूसरा व्यक्ति आपकी सरकार की गलती बता रहा है, तो उसका राजनीतिक परिचय देखने से पहले उसकी बात देखिए।
हो सकता है वह आपकी पार्टी का समर्थक न हो।
लेकिन क्या उसकी बात गलत होने का प्रमाण सिर्फ इतना है कि वह दूसरी विचारधारा का है?
यदि सड़क गड्ढे में है तो गड्ढा BJP का या कांग्रेस का नहीं होता।
यदि स्कूल की छत टूटी है तो वह किसी विचारधारा की छत नहीं होती।
यदि बच्चा शिक्षक के बिना बैठा है तो उसका भविष्य किसी पार्टी का चुनावी एजेंडा नहीं है।
अगर समाज राजनीतिक वर्गों में बंट गया तो भविष्य भयावह होगा
कल्पना कीजिए एक ऐसा समाज जहां हर व्यक्ति को पहले यह बताना पड़े कि वह किस पार्टी का समर्थक है और उसके बाद उसकी बात सुनी जाए।
जहां स्कूल सुधारने की मांग भी राजनीतिक हो।
अस्पताल सुधारने की मांग भी राजनीतिक हो।
बेरोजगारी पर सवाल भी राजनीतिक हो।
किसानों की समस्या भी राजनीतिक हो।
महंगाई पर सवाल भी राजनीतिक हो।
तो फिर समाज कहां बचेगा?
तब नागरिक नहीं रहेंगे।
राजनीतिक वर्ग रह जाएंगे।
एक वर्ग BJP का।
दूसरा कांग्रेस का।
तीसरा किसी क्षेत्रीय पार्टी का।
और इन वर्गों के बीच वास्तविक मुद्दे गायब हो जाएंगे।
यह लोकतंत्र नहीं होगा।
यह राजनीतिक ध्रुवीकरण की ऐसी अवस्था होगी जिसमें नागरिक अपने हित से ज्यादा अपनी पार्टी की रक्षा करेगा।
और यहीं लोकतंत्र का सबसे बड़ा नुकसान होगा।
राजनीतिक पार्टी आपका परिवार नहीं है
यह बात कठोर है, लेकिन समाज को समझनी होगी।
राजनीतिक पार्टी चुनाव जीतती है।
सरकार बनाती है।
नीतियां बनाती है।
लेकिन राजनीतिक पार्टी आपके घर की मालिक नहीं है।
वह आपकी जमीन, आपकी शिक्षा, आपके रोजगार और आपके भविष्य की मालिक नहीं है।
जनता राजनीतिक दलों को सत्ता देती है, सत्ता राजनीतिक दलों की निजी संपत्ति नहीं है।
इसलिए किसी पार्टी का समर्थक होने का अर्थ यह नहीं कि उसके हर निर्णय का समर्थन करना ही देशभक्ति है।
कभी-कभी सरकार से कहना—
“यह गलत है, इसे ठीक करो”
ही सबसे बड़ी देशभक्ति हो सकती है।
विपक्ष का काम केवल विरोध नहीं, सरकार की कमियां दिखाना भी है
अगर CJP या कोई अन्य राजनीतिक संगठन सरकारी स्कूलों की बदहाली का मुद्दा उठाता है, तो सरकार को इसे राजनीतिक हमला मानने से पहले यह देखना चाहिए कि शिकायत कितनी सही है।
और अगर शिकायत गलत है तो सरकार के पास उससे बेहतर जवाब है—
तथ्य।
सरकार कह सकती है:
“इस स्कूल की स्थिति यह है।”
“इतना बजट स्वीकृत है।”
“इतने दिन में काम पूरा होगा।”
“यह भवन अस्थायी रूप से उपयोग हो रहा है।”
“यहां बच्चों की सुरक्षा के लिए यह व्यवस्था की गई है।”
बस।
राजनीतिक विवाद खत्म।
लेकिन यदि जवाब देने के बजाय आरोपों का जवाब आरोपों से दिया जाए तो जनता का ध्यान मूल मुद्दे से हट जाता है।
और विपक्ष को भी जिम्मेदारी समझनी होगी
यह भी उतना ही जरूरी है कि राजनीतिक दल स्कूल की समस्या को केवल प्रचार का साधन न बनाएं।
स्कूल निरीक्षण हो तो तथ्य के साथ हो।
बच्चों की निजता का सम्मान हो।
स्कूल प्रशासन की वैधानिक प्रक्रिया का पालन हो।
फोटो और वीडियो का इस्तेमाल जिम्मेदारी से हो।
और समस्या मिलने पर समाधान की दिशा में दबाव बनाया जाए।
राजनीति का उद्देश्य केवल वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल होना नहीं होना चाहिए।
राजनीति का अंतिम परिणाम बच्चे की बेहतर कक्षा होनी चाहिए।
अगर अभियान के बाद स्कूल ठीक हो गया, तो वह सबसे बड़ी राजनीतिक सफलता है।
सरकार द्वारा बाहरी लोगों के प्रवेश पर नियम भी संतुलित होने चाहिए
राजस्थान शिक्षा विभाग द्वारा सरकारी स्कूल परिसरों में बाहरी लोगों के प्रवेश, फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी और रिकॉर्डिंग के लिए अनुमति की व्यवस्था को लेकर भी विवाद हुआ है। यह निर्देश CJP के “School Thik Karo” अभियान की घोषणा के आसपास सामने आया, जिसके कारण विपक्ष और आलोचकों ने पारदर्शिता पर सवाल उठाए।
सरकार का तर्क बच्चों की सुरक्षा और स्कूल प्रशासन से जुड़ा है।
यह चिंता जायज है।
लेकिन पारदर्शिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
समाधान क्या है?
न तो खुला राजनीतिक प्रवेश, न पूरी तरह बंद दरवाजा।
बल्कि स्पष्ट नियम।
पत्रकार आएं—प्रक्रिया के तहत।
सामाजिक संगठन आएं—अनुमति और पहचान के साथ।
अभिभावक आएं—उचित व्यवस्था के साथ।
जनप्रतिनिधि आएं—आधिकारिक सूचना के साथ।
निरीक्षण हो—रिकॉर्ड में दर्ज हो।
और बच्चों की निजता तथा सुरक्षा भी सुरक्षित रहे।
यही संतुलित रास्ता है।
समाज को फिर से “हम” बनना होगा
आज आवश्यकता है कि हम पूछें—
हम किसके लिए राजनीति कर रहे हैं?
सरकार के लिए?
पार्टी के लिए?
नेता के लिए?
या अपने बच्चों के लिए?
अगर राजनीति का उद्देश्य हमारे बच्चों को बेहतर स्कूल देना है, तो किसी भी पार्टी का नेता यह मांग उठाए—उसका स्वागत होना चाहिए।
अगर कोई नागरिक सरकारी अस्पताल की बदहाली दिखाए—उसका स्वागत होना चाहिए।
अगर कोई पत्रकार भ्रष्टाचार उजागर करे—उसकी बात सुनी जानी चाहिए।
अगर कोई किसान अपनी समस्या उठाए—उसे राजनीतिक चश्मे से नहीं, नागरिक के अधिकार से देखना चाहिए।
विचारों से लड़िए, लोगों से नहीं।
तर्क से जवाब दीजिए, हिंसा से नहीं।
तथ्यों से असहमति जताइए, धमकी से नहीं।
यही लोकतंत्र की न्यूनतम शर्त है।
जयपुर की घटना हमें किस दिशा में ले जा रही है?
अगर जयपुर की घटना केवल एक विवाद बनकर समाप्त हो जाती है तो शायद कुछ दिनों बाद लोग उसे भूल जाएंगे।
लेकिन यदि इससे हम कोई सबक नहीं लेते, तो ऐसी घटनाएं बढ़ सकती हैं।
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
आज स्कूल।
कल अस्पताल।
परसों किसान।
फिर बेरोजगार युवा।
और धीरे-धीरे हर सार्वजनिक समस्या राजनीतिक समर्थकों की लड़ाई बन सकती है।
तब वास्तविक समस्या पीछे छूट जाएगी।
इसलिए इस घटना को केवल CJP और BJP के बीच विवाद की तरह देखना गलती होगी।
इसे भारतीय लोकतंत्र के सामाजिक स्वास्थ्य का आईना मानकर देखना चाहिए।
https://politicsinsightindia.com/jai-jai-modi-har-har-modi-leader-as-god-democracy-in-danger
बच्चों के भविष्य से बड़ा कोई राजनीतिक हित नहीं
किसी भी सरकार का सबसे बड़ा मूल्यांकन यह नहीं होना चाहिए कि उसने कितने भाषण दिए।
यह भी नहीं कि उसने कितने राजनीतिक विरोधियों को जवाब दिया।
सबसे बड़ा सवाल यह होना चाहिए—
उसके स्कूल कैसे हैं?
क्या बच्चा सुरक्षित भवन में पढ़ रहा है?
क्या शिक्षक उपलब्ध हैं?
क्या शौचालय साफ है?
क्या पीने का पानी है?
क्या बच्ची सुरक्षित है?
क्या गांव के बच्चे को स्कूल तक पहुंचने के लिए कई किलोमीटर नहीं चलना पड़ रहा?
क्या सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा निजी स्कूल के बच्चे से खुद को कमतर नहीं समझता?
अगर इन सवालों के जवाब सकारात्मक हैं तो सरकार सफल है।
यदि नहीं हैं, तो चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो—उसे आलोचना सुननी होगी।
अंतिम सवाल: हम किस तरह का समाज चाहते हैं?
हम ऐसा समाज चाहते हैं जहां कोई सरकारी स्कूल खराब मिले तो पूरा गांव कहे—
“इसे ठीक करो।”
https://politicsinsightindia.com/satta-ka-super-kendra-maharashtra-se-delhi-tak-loktantra-ki-takat
या ऐसा समाज जहां गांव दो हिस्सों में बंट जाए—
“तुम किस पार्टी के हो?”
हम ऐसा समाज चाहते हैं जहां सरकार का समर्थक कहे—
“मैं अपनी सरकार का समर्थक हूं, लेकिन बच्चों की समस्या पहले है।”
या ऐसा समाज जहां समर्थक अपनी आंखें बंद कर ले और दूसरे की आवाज बंद करने लगे?
हम ऐसा लोकतंत्र चाहते हैं जहां विपक्ष सरकार की गलती दिखाए और सरकार कहे—
“धन्यवाद, हम इसे जांचेंगे।”
या ऐसा लोकतंत्र जहां हर सवाल को राजनीतिक साजिश बता दिया जाए?
चुनाव आते-जाते रहेंगे।
सरकारें बदलती रहेंगी।
मुख्यमंत्री बदलेंगे।
मंत्री बदलेंगे।
पार्टियां सत्ता में आएंगी और जाएंगी।
लेकिन हमारे बच्चों का बचपन वापस नहीं आएगा।
जिस बच्चे ने जर्जर स्कूल में पांच वर्ष पढ़ाई कर दी, उसके वे पांच वर्ष कोई सरकार वापस नहीं कर सकती।
https://politicsinsightindia.com/lal-kile-se-bade-sapne-zameen-par-jankalyan-ki-khamoshi
जिस बच्ची ने स्कूल दूर होने के कारण पढ़ाई छोड़ दी, उसे कोई राजनीतिक भाषण फिर से कक्षा में नहीं ला सकता।
जिस गरीब परिवार ने मजबूरी में बच्चे को स्कूल से निकालकर मजदूरी पर भेज दिया, उसे कोई चुनावी नारा शिक्षा नहीं दे सकता।
इसलिए जयपुर की घटना का सबसे बड़ा प्रश्न BJP बनाम CJP नहीं है।
सबसे बड़ा प्रश्न है—
क्या हम अपनी राजनीतिक निष्ठा से ऊपर अपने बच्चों के भविष्य को रख सकते हैं?
अगर उत्तर हाँ है, तो लोकतंत्र अभी सुरक्षित है।
लेकिन यदि हमने यह तय कर लिया कि “मेरी पार्टी गलत हो ही नहीं सकती”, और किसी दूसरे व्यक्ति को सरकार की कमी उठाने पर दुश्मन मानने लगे, तो खतरा बहुत बड़ा है।
क्योंकि उस दिन हम नागरिक नहीं रहेंगे।
हम केवल राजनीतिक खेमों के सदस्य बन जाएंगे।
और जिस दिन समाज राजनीतिक खेमों में बंट गया, उस दिन सरकारें तो चलती रहेंगी—लेकिन समाज कमजोर हो जाएगा।
इसलिए जरूरत किसी पार्टी को हराने की नहीं है।
जरूरत है अंधसमर्थन को हराने की।
जरूरत है राजनीतिक नफरत को हराने की।
जरूरत है सवाल पूछने की संस्कृति बचाने की।
और सबसे बढ़कर—
जरूरत है कि हमारे बच्चों का स्कूल किसी राजनीतिक झंडे का नहीं, उनके भविष्य का घर बने।
क्योंकि स्कूल की टूटी छत पर लगा कोई राजनीतिक झंडा उस छत को सुरक्षित नहीं कर सकता।
उसे केवल जवाबदेह शासन, जागरूक समाज और निर्भीक नागरिक ही ठीक कर सकते हैं।
सरकार किसी की भी हो—स्कूल जनता का है, बच्चा देश का है और सवाल पूछना लोकतंत्र का अधिकार है।
Tags
- राजनीति
- सरकारी स्कूल
- शिक्षा व्यवस्था
- राजस्थान
- जयपुर
- CJP
- आशुतोष रांका
- BJP
- राजनीतिक ध्रुवीकरण
- अंधसमर्थन
- स्कूल विवाद
- सरकारी स्कूलों की बदहाली
- स्कूल मर्जर
- शिक्षा सुधार
- जनहित
- लोकतंत्र
- सरकार की जवाबदेही
- सामाजिक विभाजन
- राजनीतिक संस्कृति
- बच्चों का भविष्य
- ग्रामीण शिक्षा
- शिक्षा और राजनीति
- राजनीतिक असहमति
- सामाजिक सद्भाव
- भारत की शिक्षा व्यवस्था
- School Thik Karo
- Rajasthan Education
- Jaipur School Controversy
- Government Schools
- Political Polarisation
- Education Crisis
- Sudhir Taliyan
- Politics Insight India
- pii
Get every story on your phone
Join our channel and never miss an update.
What's Your Reaction?