किसान सरसों उगाए, भारत विदेश से तेल मंगाए! आत्मनिर्भर भारत के दावे पर बड़ा सवाल
खाद्य तेल, दाल, काजू, सेब और मसालों के बढ़ते आयात के बीच सवाल—क्या भारत आत्मनिर्भर बन रहा है या उसकी रसोई आयातनिर्भर होती जा रही है? तिलहन किसानों, आयात नीति और ‘Grown in India’ की पूरी पड़ताल।
कच्चे खाद्य तेल पर आयात शुल्क 20 प्रतिशत से घटाकर सीधे 10 प्रतिशत करने का फैसला हुआ और उसी क्षण भारत के लाखों तिलहन उत्पादक किसानों के भविष्य के बाजार भाव की एक अदृश्य अधिकतम सीमा तय हो गई।
सरकार कहेगी कि इससे खाद्य तेल सस्ता होगा। उद्योग कहेगा कि रिफाइनरियां चलेंगी। ग्राहक कहेगा कि अच्छा हुआ।
लेकिन किसान क्या कहता है?
यह सवाल कौन पूछेगा?
भारत कृषि प्रधान देश है, यह बात हम गर्व से कहते हैं। लेकिन हमारे रसोईघर में पहुंचने वाले खाद्य तेल से लेकर दाल, काजू, सेब और मसालों तक अनेक वस्तुओं के लिए हम विदेशों की ओर देख रहे हैं।
फिर आत्मनिर्भर भारत आखिर है कहां?
खेत में या बंदरगाह पर?
किराना दुकान पर जाइए तो ‘Fortune’ का पैकेट दिखाई देता है। पतंजलि का तेल दिखाई देता है। पैकेट पर भारतीय नाम दिखाई देता है। ग्राहक को लगता है कि वह भारतीय कंपनी का, भारतीय किसान का तेल खरीद रहा है।
लेकिन जरा पैकेट के पार देखिए तो सवाल खड़ा होता है—तेल भारत में रिफाइन हुआ है या भारत में पैदा हुआ है?
‘Refined in India’ और ‘Grown in India’ के बीच का फर्क कौन बताएगा?
किस कंपनी ने किस बंदरगाह से कितना कच्चा तेल आयात किया? वह किस देश से आया? भारतीय बाजार में उसकी कीमत कैसे तय होती है? और इसका असर महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, गुजरात तथा अन्य तिलहन उत्पादक राज्यों के सरसों, सोयाबीन, सूरजमुखी और मूंगफली उत्पादक किसानों पर कितना पड़ता है?
ये सवाल पूछना उद्योग विरोधी होना नहीं है।
ये सवाल पूछना किसान के पक्ष में खड़ा होना है!
तिलहन में कभी आत्मनिर्भर था भारत
1986 में भारत ने तिलहन प्रौद्योगिकी मिशन शुरू किया था। 1992-93 तक भारत अपनी जरूरत का लगभग 97 प्रतिशत खाद्य तेल देश में ही पैदा करता था।
यानी देश कर सकता था। किसान पैदा करता था, क्योंकि व्यवस्था उसका साथ दे रही थी।
फिर उदारीकरण आया। सस्ता पाम तेल भारत में आने लगा। आयात का दरवाजा खुलता गया और धीरे-धीरे स्थिति ऐसी हो गई कि आज भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्य तेल आयातकों में शामिल है।
लगभग 25-26 मिलियन टन के वार्षिक उपभोग में से 16-17 मिलियन टन तेल हमें आयात करना पड़ता है। यानी हमारे रसोईघर में इस्तेमाल होने वाला आधे से अधिक तेल विदेशों से आता है!
यह आत्मनिर्भरता है या आयातनिर्भरता?
खाद्य तेल के आयात में पाम तेल की बड़ी हिस्सेदारी है। उसके बाद सोयाबीन तेल आता है। इसका सीधा असर भारतीय तिलहन उत्पादक किसान पर पड़ता है।
अखाद्य तेल के सेवन से लोग किस तरह बीमार हो रहे हैं, इस विषय पर हम पहले ही एक अलग प्रहार में चर्चा कर चुके हैं।
विश्व बाजार में पाम तेल सस्ता हुआ तो भारतीय सरसों के भाव दबाव में आ जाते हैं। डॉलर मजबूत हुआ या रुपया कमजोर हुआ तो आयात महंगा हो जाता है। मलेशिया में उत्पादन बदला तो भारत में तेल का पूरा गणित बदल जाता है।
लेकिन किसान?
उसके पास न मलेशिया का मौसम बदलने की ताकत है, न डॉलर को नियंत्रित करने की और न बंदरगाह पर होने वाले आयात को रोकने की।
उसके पास सिर्फ जमीन है।
और उसी जमीन पर पैदा की गई उपज बेचते समय उसे ही बाजार भाव की मार सहनी पड़ती है!
खाद्य तेल का कारोबार अब केवल खेती का विषय नहीं रह गया है। यह बंदरगाह, आयात, रिफाइनिंग, लॉजिस्टिक्स और बड़े ब्रांडों का विषय बन गया है।
Fortune जैसा ब्रांड भारतीय बाजार में बेहद लोकप्रिय है। लेकिन ब्रांड भारतीय दिखाई देता है, इसलिए उसमें इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल भी भारतीय किसान का ही होगा, यह जरूरी नहीं।
इसलिए सवाल केवल कंपनी के मालिकाना हक तक सीमित नहीं है।
सवाल पूरी आपूर्ति श्रृंखला का है।
और इस पूरी श्रृंखला में किसान आखिर कहां है?
सस्ता आयात... लेकिन इसकी कीमत कौन चुकाता है?
सस्ता आयात यानी ग्राहक को फायदा—सरकार का यह दावा कुछ हद तक सही है। महंगाई को नियंत्रित रखना सरकार की जिम्मेदारी है।
लेकिन यदि सस्ते आयात की कीमत लगातार भारतीय किसान को ही चुकानी पड़े और किसान को अपनी उपज का उचित मूल्य ही न मिले, तो वह अगले साल तिलहन क्यों बोएगा?
उत्पादकता बढ़ाने के लिए निवेश क्यों करेगा?
जोखिम क्यों उठाएगा?
और अंततः देश फिर आयात पर निर्भर नहीं हो जाएगा?
आज सस्ता तेल मिल जाएगा।
लेकिन कल खाद्य सुरक्षा की कीमत चुकानी पड़ी तो?
भारत में दालों की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर है। देश में उत्पादन बढ़ने के बावजूद आयात के दरवाजे बंद नहीं होते। पीला मटर और उड़द के लिए शुल्क-मुक्त आयात की अवधि बढ़ाई जाती है।
फिर किसान क्या करे?
सरकार कहती है—दालें उगाओ।
बाजार कहता है—रुको, विदेश से सस्ती दाल आ रही है!
यही तो नीति का कमाल है।
एक हाथ किसान से उत्पादन बढ़ाने को कहता है और दूसरा हाथ आयात का दरवाजा खोल देता है।
भाव गिरते हैं... किसान टूटता है!
मसालों में भी विरोधाभास
भारत दुनिया को मिर्च, जीरा और हल्दी निर्यात करता है, इस पर हमें गर्व है। लेकिन काली मिर्च का आयात भी निर्यात से अधिक है।
लौंग? आयात निर्यात से कई गुना अधिक।
हींग? भारत में लगभग पूरी तरह आयातित।
यानी कभी मसालों का राजा रहा देश अब अपने रसोईघर के अनेक मसालों के लिए विदेशों की ओर देख रहा है!
भारत को दुनिया को मसाले देने चाहिए और अपने ही रसोईघर के लिए विदेशों से मसाले मंगाने पड़ें—यह कैसी आत्मनिर्भरता?
काजू भारत में प्रोसेस, लेकिन कच्चा माल विदेश से!
भारत काजू प्रसंस्करण के क्षेत्र में दुनिया में अग्रणी रहा है। लेकिन कच्चा काजू गिनी-बिसाऊ, आइवरी कोस्ट, बेनिन और घाना जैसे देशों से आता है।
यानी—
प्रोसेसिंग भारत में।
रोजगार भारत में।
ब्रांड भारत में।
बाजार भारत में।
लेकिन कच्चा माल? विदेश से!
फिर महाराष्ट्र, गोवा, केरल और ओडिशा के किसान काजू का उत्पादन बढ़ाएं भी तो क्यों?
कश्मीर का सेब और आयात का दरवाजा
कश्मीर और हिमाचल के सेब भारत की पहचान हैं।
लेकिन आयात बढ़ रहा है।
2010 में लगभग 1.23 लाख टन सेब आयात हुआ था। 2024 तक यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 5.20 लाख टन हो गया।
हम कश्मीर के किसान से कहते हैं—सेब उगाइए।
हिमाचल के बागवान से कहते हैं—उत्पादन बढ़ाइए।
और उसी समय आयात का दरवाजा खुला रखते हैं।
फिर देशी किसान के बगीचे में खिलने वाले सेब का भविष्य कौन तय करता है?
भारतीय पैकेट और भारतीय उत्पादन में अंतर
कच्चे खाद्य तेल पर आयात शुल्क कम किया गया।
उसका असर भी तुरंत दिखाई दिया।
कच्चे खाद्य तेल का आयात तेजी से बढ़ा। लेकिन एक सवाल अब भी अनुत्तरित है—
तेल किस देश के किसान ने पैदा किया है?
यह जानकारी पैकेट पर स्पष्ट रूप से क्यों नहीं होनी चाहिए?
‘Packed in India’ का अर्थ ग्राहक यह क्यों समझे कि वह भारतीय किसान की उपज खरीद रहा है?
भारतीय पैकेट और भारतीय उत्पादन में अंतर है।
और यह अंतर ग्राहक को समझना ही चाहिए।
महंगाई बनाम किसान की आय
सरकार कहती है कि सस्ता आयात होने से गरीब उपभोक्ता को फायदा होता है। सरकार यह भी कहती है कि खाद्य महंगाई को नियंत्रित रखने के लिए आयात एक आवश्यक ‘सेफ्टी वाल्व’ है।
मान लिया।
लेकिन फिर एक सवाल बचता है—
सरकार को महंगाई नियंत्रित रखनी है, लेकिन क्या यह काम किसान की बलि देकर ही करना जरूरी है?
उपभोक्ता और किसान—दोनों के हितों के बीच सरकार को संतुलन बनाना है या सिर्फ उपभोक्ता और उद्योग का हिसाब देखना है?
भारत की तिलहन उत्पादकता अभी भी कई प्रमुख उत्पादक देशों की तुलना में कम है। इसलिए आयात करना ही समाधान है?
या फिर—
उत्पादकता बढ़ाने के लिए किसान को बेहतर भाव, सिंचाई, तकनीक, अनुसंधान, प्रभावी समर्थन मूल्य व्यवस्था, भंडारण और प्रसंस्करण उद्योग गांव के नजदीक लाना चाहिए?
इस पर किसान और देशहित को सामने रखकर गंभीरता से विचार करना ही होगा।
लेकिन यदि सरकार हर साल महंगाई की समस्या हल करने के लिए आयात का दरवाजा खोलती रहेगी, तो देश कभी आत्मनिर्भर कैसे बनेगा?
सवाल सिर्फ तेल का नहीं है!
यह बात सिर्फ खाद्य तेल तक सीमित नहीं है।
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
दालें, काजू, सेब, मसाले, चीनी और ऐसी कितनी ही कृषि वस्तुओं का आयात—यह केवल कृषि प्रधान भारत की अर्थव्यवस्था का प्रश्न नहीं है। यह किसान के अस्तित्व का प्रश्न है।
आज भारत की बड़ी आबादी और बड़ी मात्रा में श्रमशक्ति खेती पर निर्भर है।
https://politicsinsightindia.com/mehangai-ka-dosh-kisan-par-kyon
और सबसे महत्वपूर्ण सवाल तो यह है—
हम जो खाते हैं, वह अपने ही किसान से उचित मूल्य देकर पैदा करवाकर क्यों नहीं खरीद सकते?
हर साल—
तिलहन मिशन,
दलहन मिशन,
मिलेट मिशन...
योजनाओं के नाम बदलते हैं, लेकिन किसान के खेत में सवाल वही रहता है!
उत्पादन लागत बढ़ रही है।
बाजार भाव की कोई गारंटी नहीं।
आयात कभी भी दरवाजा खटखटा सकता है।
फिर योजनाओं का क्या?
https://politicsinsightindia.com/india-62-mmt-cbg-potential-government-failure-farmer-waste-energy
बजट कहां जाता है?
सफलता का मापदंड कौन तय करता है?
कागज पर आत्मनिर्भरता और बाजार में आयातनिर्भरता—यह विरोधाभास आखिर कितने वर्षों तक चलेगा?
हर सरकार से सवाल!
अंत में सवाल केवल मोदी सरकार से नहीं, हर सरकार से है।
कांग्रेस हो, भाजपा हो या कोई भी सरकार।
https://politicsinsightindia.com/gaon-ke-loktantra-par-ias-rajnitik-gathjod-ka-kabza
किसान की उपज को उचित मूल्य देने के बजाय आयात करके महंगाई कम करना आसान रास्ता है।
क्योंकि आयात एक आदेश से किया जा सकता है।
लेकिन किसान की उत्पादकता बढ़ाने में वर्षों लगते हैं।
सिंचाई व्यवस्था खड़ी करने में वर्षों लगते हैं।
अनुसंधान में वर्षों लगते हैं।
बाजार व्यवस्था खड़ी करने में वर्षों लगते हैं।
दुर्भाग्य से आजादी के 75 साल बाद भी हम ऐसी मजबूत बाजार व्यवस्था खड़ी नहीं कर पाए। उलटे, जो व्यवस्था थी, उसे भी हमने धीरे-धीरे खत्म कर दिया।
सरकारें आसान रास्ता चुनती हैं—
आयात करो...
महंगाई कम करो...
और समझो कि सवाल खत्म!
लेकिन सवाल खत्म नहीं होता।
https://politicsinsightindia.com/ganna-1-quintal-1366-value-farmer-365-frp-70-percent-share
वह किसान के खेत में जाकर फिर खड़ा हो जाता है।
‘Refined in India’ से अधिक महत्वपूर्ण है ‘Grown in India’!
भारत को आत्मनिर्भर बनाना है तो केवल पैकेट भारतीय होना पर्याप्त नहीं है।
बीज भारतीय होना चाहिए।
उत्पादन भारतीय होना चाहिए।
और बाजार भारतीय किसान के पक्ष में होना चाहिए।
‘Refined in India’ से अधिक महत्वपूर्ण है—
‘Grown in India’!
देश के खेत में खड़ा किसान ही आत्मनिर्भर भारत की असली नींव है।
अब सवाल सिर्फ इतना है—
हम आत्मनिर्भर भारत बनाएंगे या आयातनिर्भर रसोईघर?
— प्रकाश कमलताई गोपाळराव पोहरे
9822593921
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