एफिल टॉवर पर नारी का अपमान? हिन्दू धर्म को बदनाम करने से पहले पढ़िए भारत की महान स्त्रियों का इतिहास
एफिल टॉवर महिला कर्मचारियों विवाद के बहाने जानिए हिन्दू धर्म में स्त्री के सम्मान, समानता और शक्ति की परंपरा तथा भारत की महान स्त्रियों का गौरवशाली इतिहास।
एफिल टॉवर से भारत की महान स्त्रियों तक: नारी को अदृश्य करने की मानसिकता पर करारा सवाल
By- Ch. Sudhir Talyan
धर्म की आड़ में स्त्री को पीछे करना हिन्दू धर्म की परंपरा नहीं, बल्कि उस संकीर्ण मानसिकता का प्रदर्शन है जो स्त्री की शक्ति से असहज होती है
एफिल टॉवर जैसे विश्व प्रसिद्ध सार्वजनिक स्थल का कर्मचारियों के विरोध के कारण बंद होना सामान्य घटना नहीं है। यह केवल पेरिस के एक पर्यटन स्थल पर हुआ विवाद नहीं, बल्कि उस गहरे प्रश्न को सामने लाने वाली घटना है जिसके सामने आज भी दुनिया के अनेक समाज खड़े हैं—क्या किसी धार्मिक अथवा सांस्कृतिक आग्रह के नाम पर किसी महिला को उसके कार्यस्थल पर केवल इसलिए पीछे किया जा सकता है क्योंकि वह महिला है?
रिपोर्टों के अनुसार, पेरिस के एफिल टॉवर की एक निजी धार्मिक यात्रा के दौरान महिला कर्मचारियों को प्रतिनिधिमंडल के सामने आने से बचाने की व्यवस्था की गई। इस व्यवस्था पर कर्मचारियों ने आपत्ति जताई और बाद में विरोध किया। एफिल टॉवर का संचालन करने वाली संस्था ने भी माना कि ऐसी मांग को स्वीकार करना उचित नहीं था।
यहीं से असली बहस शुरू होती है।
लेकिन इस बहस में एक बात बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए—किसी एक धार्मिक संगठन से जुड़ी घटना को पूरे हिन्दू धर्म का चरित्र बताना उतना ही गलत है जितना किसी धार्मिक आग्रह के नाम पर स्त्री की गरिमा से समझौता करना।
हिन्दू धर्म में स्त्री अदृश्य नहीं—शक्ति है
भारत की सभ्यता को समझने के लिए केवल वर्तमान की किसी एक घटना को देखना पर्याप्त नहीं है। भारतीय परंपरा की जड़ें कहीं अधिक गहरी हैं।
हिन्दू चिंतन में स्त्री को केवल परिवार की भूमिका तक सीमित नहीं किया गया। स्त्री को शक्ति कहा गया, प्रकृति कहा गया, ज्ञान की अधिष्ठात्री कहा गया, समृद्धि का प्रतीक माना गया।
सरस्वती ज्ञान का प्रतीक हैं।
लक्ष्मी समृद्धि का प्रतीक हैं।
दुर्गा शक्ति का प्रतीक हैं।
काली अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध की प्रचंड अभिव्यक्ति हैं।
अर्थात भारतीय धार्मिक कल्पना में शक्ति का सर्वोच्च प्रतीक ही स्त्री है।
यह केवल पूजा की बात नहीं है। भारतीय बौद्धिक परंपरा में गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियों का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने दार्शनिक विमर्श में पुरुष विद्वानों के साथ संवाद किया। यह उस सभ्यता की तस्वीर है जिसमें स्त्री को विचार, प्रश्न और ज्ञान के अधिकार से वंचित करने का कोई सार्वभौमिक सिद्धांत नहीं था।
इसलिए यदि आज कोई व्यक्ति हिन्दू धर्म के नाम पर स्त्री को सार्वजनिक भूमिका से हटाने को धार्मिक आदर्श बताने का प्रयास करता है, तो उससे पहला सवाल यही होना चाहिए—
आप किस हिन्दू परंपरा की बात कर रहे हैं?
उस परंपरा की जिसमें स्त्री शक्ति है?
या उस संकीर्ण सामाजिक मानसिकता की जिसमें स्त्री को नियंत्रित करना पुरुष का अधिकार समझ लिया गया?
दोनों को एक मानना इतिहास और धर्म—दोनों के साथ अन्याय है।
स्त्री को सम्मान देने का अर्थ उसे केवल देवी कहना नहीं
यहां सबसे महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है।
किसी महिला को देवी कह देना और उसके समान नागरिक अधिकारों को स्वीकार करना दो अलग बातें हैं।
यदि समाज स्त्री की पूजा तो करे लेकिन उसे निर्णय लेने से रोके, उसकी शिक्षा सीमित करे, उसके काम को कमतर समझे, उसके स्वतंत्र अस्तित्व पर प्रश्न उठाए या उसके शरीर और आवाज पर नियंत्रण स्थापित करे, तो वह सम्मान नहीं है।
सम्मान का पहला प्रमाण समान अधिकार है।
स्त्री को मनुष्य के रूप में सम्मान देना होगा।
उसे काम करने का अधिकार होगा।
उसे निर्णय लेने का अधिकार होगा।
उसे अपनी प्रतिभा का उपयोग करने का अधिकार होगा।
उसे सार्वजनिक जीवन में बराबर स्थान मिलेगा।
और यदि वह किसी संस्था में कर्मचारी है, तो उसकी पेशेवर भूमिका को किसी दूसरे व्यक्ति की धार्मिक पसंद के कारण समाप्त नहीं किया जा सकता।
यही आधुनिक लोकतांत्रिक समाज की बुनियादी कसौटी है।
भारत की महान स्त्रियां इस बहस का उत्तर हैं
भारत का इतिहास स्वयं इस बात का प्रमाण है कि स्त्री को केवल पर्दे के पीछे रखने की धारणा भारतीय समाज की पूरी तस्वीर नहीं है।
सावित्रीबाई फुले ने उस समय लड़कियों की शिक्षा का बीड़ा उठाया जब समाज का बड़ा हिस्सा महिला शिक्षा का विरोध करता था।
रानी लक्ष्मीबाई ने युद्धभूमि में नेतृत्व किया और औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती दी।
बेगम हजरत महल ने 1857 के संघर्ष में अपनी राजनीतिक और सैन्य क्षमता का परिचय दिया।
सरोजिनी नायडू ने स्वतंत्रता आंदोलन में नेतृत्व किया और भारतीय राजनीति में महिलाओं की प्रभावशाली उपस्थिति स्थापित की।
अरुणा आसफ अली ने भारत छोड़ो आंदोलन में निर्भीक भूमिका निभाई।
कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने आजाद हिंद फौज में महिलाओं के सैन्य नेतृत्व की मिसाल कायम की।
और स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माण में हंसा मेहता जैसी महिलाओं ने समानता और नागरिक अधिकारों की बहस को मजबूत किया।
इन महिलाओं ने समाज से यह नहीं कहा कि हमें केवल सम्मान की भाषा में याद करो।
उन्होंने कहा—
हमें बराबरी दो।
यही अंतर भारतीय स्त्री विमर्श की वास्तविक शक्ति है।
अगर स्त्री को पीछे करना धर्म है, तो फिर इतिहास की इन स्त्रियों का क्या?
कल्पना कीजिए—यदि किसी ने रानी लक्ष्मीबाई से कहा होता कि पुरुषों के सामने मत आओ, युद्धभूमि में तुम्हारी उपस्थिति उचित नहीं है, तो क्या भारत का इतिहास वैसा ही रहता?
यदि सावित्रीबाई फुले से कहा गया होता कि लड़कियों को पढ़ाना सामाजिक मर्यादा के विरुद्ध है, तो क्या भारत का शिक्षा आंदोलन उसी गति से आगे बढ़ता?
यदि सरोजिनी नायडू से कहा गया होता कि राजनीति पुरुषों का क्षेत्र है, तो क्या स्वतंत्रता आंदोलन की तस्वीर वही होती?
यदि हंसा मेहता से कहा गया होता कि संविधान और नागरिक अधिकारों की बहस में महिलाओं की आवाज आवश्यक नहीं है, तो क्या भारत का लोकतांत्रिक विमर्श उतना ही व्यापक होता?
उत्तर स्पष्ट है।
भारत की महान स्त्रियों ने समाज की सीमाओं को स्वीकार नहीं किया; उन्होंने सीमाओं को चुनौती दी।
इसलिए स्त्री को अदृश्य करना भारतीय सभ्यता की शक्ति नहीं हो सकती।
धर्म का सम्मान और स्त्री की स्वतंत्रता—दोनों साथ चल सकते हैं
यह भी उतना ही जरूरी है कि धार्मिक स्वतंत्रता को संदेह की नजर से न देखा जाए।
हर व्यक्ति को अपनी आस्था रखने, धार्मिक अनुष्ठान करने और अपनी परंपराओं का पालन करने का अधिकार है। लेकिन धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं हो सकता कि दूसरे व्यक्ति की गरिमा समाप्त हो जाए।
मेरी आस्था मेरी स्वतंत्रता है; लेकिन आपकी गरिमा की कीमत पर मेरी स्वतंत्रता नहीं हो सकती।
यही सभ्य समाज का सिद्धांत है।
यदि किसी धार्मिक समूह को किसी विशेष प्रकार की व्यवस्था चाहिए, तो उसे अपने निजी धार्मिक परिसर में व्यवस्थित करना उसका अधिकार हो सकता है। लेकिन जब कोई गतिविधि सार्वजनिक संस्थान में होती है, वहां काम करने वाले प्रत्येक कर्मचारी की गरिमा और समानता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
धर्म को सम्मान चाहिए।
लेकिन स्त्री को भी सम्मान चाहिए।
और दोनों के बीच संघर्ष पैदा करना आवश्यक नहीं है।
असली लड़ाई धर्म बनाम धर्म नहीं—समानता बनाम भेदभाव है
इस घटना को हिन्दू बनाम फ्रांस, हिन्दू बनाम पश्चिम या धर्म बनाम आधुनिकता के चश्मे से देखना आसान है।
लेकिन वह सबसे कमजोर विश्लेषण होगा।
असल प्रश्न है—
क्या किसी कर्मचारी के साथ उसके लिंग के आधार पर अलग व्यवहार किया जाना चाहिए?
यदि उत्तर 'नहीं' है, तो यही सिद्धांत हर जगह लागू होना चाहिए।
चाहे मांग किसी हिन्दू समूह की हो, मुस्लिम समूह की हो, ईसाई समूह की हो, यहूदी समूह की हो या किसी अन्य धार्मिक समुदाय की।
समानता का सिद्धांत तभी सार्थक है जब वह सार्वभौमिक हो।
यदि हम अपने धर्म के नाम पर होने वाले भेदभाव को सही और दूसरे धर्म के नाम पर होने वाले भेदभाव को गलत मानते हैं, तो हम समानता के पक्षधर नहीं हैं।
हम केवल अपनी सुविधा के पक्षधर हैं।
हिन्दू समाज को आत्ममंथन से डरना नहीं चाहिए
इस घटना पर हिन्दू समाज की प्रतिक्रिया रक्षात्मक होने के बजाय आत्मविश्वासी होनी चाहिए।
हमें यह साबित करने के लिए किसी दूसरे धर्म को कटघरे में खड़ा करने की जरूरत नहीं कि हिन्दू धर्म में स्त्री का सम्मान है।
हमारी अपनी परंपरा में इसके पर्याप्त उदाहरण हैं।
गार्गी से लेकर मैत्रेयी तक, दुर्गा से लेकर काली तक, रानी लक्ष्मीबाई से लेकर सावित्रीबाई फुले तक—भारतीय इतिहास स्त्री की शक्ति के असंख्य अध्यायों से भरा है।
यदि कहीं कोई व्यक्ति धर्म की भाषा का इस्तेमाल करके स्त्री को छोटा करता है, तो हिन्दू समाज को उस व्यवहार का बचाव करने के बजाय यह पूछना चाहिए कि क्या वह वास्तव में हमारी सभ्यता के मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है?
धर्म की प्रतिष्ठा अंधे समर्थन से नहीं बढ़ती।
धर्म की प्रतिष्ठा सत्य, न्याय और गरिमा के पक्ष में खड़े होने से बढ़ती है।
स्त्री को छिपाने से सम्मान नहीं बढ़ता
किसी महिला को पर्दे के पीछे कर देना उसके सम्मान की रक्षा नहीं करता।
किसी महिला को कार्यस्थल से हटाना उसकी गरिमा नहीं बढ़ाता।
किसी महिला की उपस्थिति को किसी पुरुष की धार्मिक सुविधा के लिए नियंत्रित करना समानता नहीं है।
और किसी घटना पर प्रश्न उठाने वालों को धर्म-विरोधी कह देना उत्तर नहीं है।
उत्तर यह है कि हम अपने आचरण को अपने घोषित मूल्यों की कसौटी पर परखें।
यदि हम कहते हैं कि स्त्री शक्ति है, तो उसे शक्ति की तरह जीने का अधिकार भी देना होगा।
यदि हम कहते हैं कि स्त्री सम्मान की अधिकारी है, तो उसका सम्मान उसके निर्णयों और अधिकारों में भी दिखाई देना चाहिए।
यदि हम कहते हैं कि हिन्दू धर्म महान है, तो उस महानता का प्रमाण स्त्री की स्वतंत्रता और गरिमा के प्रति हमारा व्यवहार भी होना चाहिए।
एफिल टॉवर का विवाद एक आईना है
एफिल टॉवर दुनिया के सामने खड़ा एक स्थापत्य प्रतीक है। लेकिन इस विवाद ने उसके सामने एक सामाजिक आईना भी खड़ा कर दिया है।
उस आईने में केवल फ्रांस दिखाई नहीं देता।
भारत भी दिखाई देता है।
हमारे धार्मिक संगठन दिखाई देते हैं।
हमारा सामाजिक व्यवहार दिखाई देता है।
हमारी आधुनिकता दिखाई देती है।
और सबसे बढ़कर—स्त्री के प्रति हमारी वास्तविक सोच दिखाई देती है।
इसलिए इस घटना से नाराज होना पर्याप्त नहीं है।
हमें यह तय करना होगा कि हम किस भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहते हैं।
उस भारत का जहां स्त्री को केवल देवी बनाकर ऊंचे आसन पर बैठाया जाता है, लेकिन उसके बराबर बैठने का अधिकार नहीं दिया जाता?
या उस भारत का जहां स्त्री को देवी कहने के साथ-साथ मनुष्य के रूप में पूर्ण सम्मान, स्वतंत्रता और समान अधिकार भी दिए जाते हैं?
भारत की महान स्त्रियों का उत्तर बिल्कुल स्पष्ट है।
स्त्री को अदृश्य मत बनाइए।
उसे शिक्षा दीजिए।
उसे अवसर दीजिए।
उसे निर्णय लेने दीजिए।
उसे नेतृत्व करने दीजिए।
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
और सबसे महत्वपूर्ण—
उसे उसके अधिकारों के साथ एक स्वतंत्र मनुष्य के रूप में स्वीकार कीजिए।
यही भारतीय सभ्यता की वास्तविक शक्ति है।
यही आधुनिक लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी है।
और यही उस किसी भी धार्मिक व्याख्या का सबसे मजबूत उत्तर है जो स्त्री की गरिमा को पुरुष की सुविधा से छोटा समझने की भूल करती है।
https://politicsinsightindia.com/chennai-metro-girlfriend-fd-interest-ad-women-respect-controversy
धर्म मनुष्य को ऊंचा उठाने के लिए है—किसी मनुष्य को दूसरे से नीचा दिखाने के लिए नहीं।
और हिन्दू धर्म की महान परंपरा में स्त्री को छिपाने की नहीं, शक्ति के रूप में स्वीकार करने की परंपरा अधिक गहरी और अधिक गौरवशाली है।
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