सोनिया गांधी की किताब पर पेंग्विन का ‘कैंची विवाद’! मोदी, RSS और चीन वाले हिस्सों पर क्यों मांगी गई कटौती?
सोनिया गांधी की संस्मरण पुस्तक पर पेंग्विन से विवाद क्यों हुआ? मोदी, RSS और चीन से जुड़े कथित संवेदनशील अंशों पर संपादकीय आपत्तियों, कांग्रेस के आरोपों और पेंग्विन के पक्ष की पूरी पड़ताल।
सोनिया गांधी की किताब पर पेंग्विन विवाद: मोदी, RSS और चीन के अध्यायों पर क्यों उठा संपादकीय सवाल?
नई दिल्ली | 29 अगस्त 2026
By- Ch. Sudhir Taliyan
सोनिया गांधी की बहुप्रतीक्षित संस्मरण पुस्तक Belonging: A Journey of Love अभी बाजार में आई भी नहीं है, लेकिन इसके भारतीय प्रकाशन को लेकर विवाद ने पुस्तक को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। विवाद की शुरुआत उन रिपोर्टों से हुई जिनमें कहा गया कि Penguin Random House India (PRHI) ने पांडुलिपि के कुछ हिस्सों में बदलाव और कटौती की मांग की थी। इनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारत-चीन संबंधों तथा कथित चीनी घुसपैठ से जुड़े हिस्से बताए गए हैं।
सोनिया गांधी ने कथित तौर पर इन बदलावों को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद भारत में पुस्तक के प्रकाशन को लेकर Penguin की भूमिका समाप्त हो गई और HarperCollins के भारतीय संस्करण प्रकाशित करने के लिए बातचीत के करीब पहुंचने की खबरें सामने आईं। हालांकि, Penguin Random House India ने इस पूरे घटनाक्रम की एक अलग तस्वीर पेश की है। कंपनी ने कहा है कि वह भारत में इस पुस्तक की प्रकाशक नहीं है और यह कहना सही नहीं है कि उसने केवल इसलिए पुस्तक प्रकाशित करने से इनकार किया क्योंकि सोनिया गांधी ने संपादकीय बदलाव स्वीकार नहीं किए।
यहीं से असली सवाल पैदा होता है—क्या यह सामान्य संपादकीय प्रक्रिया थी या राजनीतिक रूप से संवेदनशील सामग्री को लेकर असहमति?
पुस्तक से पहले शुरू हुआ विवाद
Belonging: A Journey of Love को अमेरिकी प्रकाशक Alfred A. Knopf, जो Penguin Random House का हिस्सा है, ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित करने की घोषणा की है। पुस्तक की वैश्विक रिलीज 10 नवंबर 2026 के लिए निर्धारित है और Knopf ने इसके पहले संस्करण की 1 लाख प्रतियों की छपाई की योजना बताई है।
पुस्तक सोनिया गांधी के जीवन की लंबी यात्रा पर आधारित है—युद्धोत्तर इटली में उनका बचपन, भारत आगमन, राजीव गांधी से विवाह, इंदिरा गांधी के परिवार का हिस्सा बनना, राजीव गांधी की हत्या के बाद सार्वजनिक जीवन में प्रवेश और 2004 में प्रधानमंत्री पद स्वीकार न करने का फैसला। पुस्तक को उनके जीवन और छह दशकों में भारत में हुए सामाजिक-राजनीतिक बदलावों के व्यक्तिगत अनुभव के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
लेकिन भारत में इसके प्रकाशन की कहानी अब स्वयं एक राजनीतिक घटना बन गई है।
विवादित हिस्से कौन से हैं?
Hindustan Times की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, Penguin Random House India और सोनिया गांधी के बीच चर्चा में तीन प्रमुख विषयों से संबंधित सामग्री को लेकर आपत्तियां सामने आईं—नरेंद्र मोदी, RSS और चीन के साथ भारत के संबंध तथा कथित चीनी घुसपैठ। रिपोर्ट में कहा गया है कि पुस्तक में मोदी के साथ सोनिया गांधी की मुलाकातों और उनके बारे में उनके आकलन का विस्तृत उल्लेख है।
रिपोर्ट के मुताबिक, सोनिया गांधी ने मोदी की तुलना उनके पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों से भी की है। उनके एक सहयोगी ने यह भी दावा किया कि पुस्तक में 2004 के गुजरात के एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मोदी द्वारा सोनिया गांधी के लिए इस्तेमाल की गई कथित "Jersey cow" टिप्पणी का उल्लेख है। हालांकि, पुस्तक अभी प्रकाशित नहीं हुई है, इसलिए इन अंशों का मूल पाठ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
RSS से संबंधित सामग्री की प्रकृति भी अभी पूरी तरह सामने नहीं आई है। उपलब्ध रिपोर्टों में इतना कहा गया है कि पांडुलिपि में RSS की भूमिका और उससे जुड़े राजनीतिक संदर्भ मौजूद थे और इन्हें लेकर संपादकीय चर्चा हुई।
चीन से संबंधित हिस्सों में भारत-चीन संबंधों और भारतीय क्षेत्र में कथित चीनी घुसपैठ का मुद्दा बताया गया है। यह विषय इसलिए भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील है क्योंकि सीमा विवाद और चीन की गतिविधियों को लेकर पिछले वर्षों में सरकार तथा विपक्ष के बीच तीखी बहस होती रही है।
क्या Penguin ने वास्तव में "कटौती" मांगी थी?
यही इस पूरे मामले का सबसे विवादित और अभी तक पूरी तरह सार्वजनिक न हुआ हिस्सा है।
The Indian Express ने सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट किया कि Penguin Random House India द्वारा पांडुलिपि के एक हिस्से में कुछ "editorial changes and deletions" की मांग की गई थी, जिन्हें सोनिया गांधी ने स्वीकार नहीं किया। इसके बाद Penguin भारतीय प्रकाशन से बाहर हो गया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि HarperCollins सहित अन्य प्रकाशक भारत में पुस्तक के अधिकार हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन Penguin ने इस व्याख्या को स्वीकार नहीं किया।
28 अगस्त को जारी अपने बयान में Penguin Random House India ने कहा कि वह भारत में Belonging का प्रकाशक नहीं है और यह कहना कि उसने लेखक द्वारा संपादकीय बदलाव अस्वीकार किए जाने के कारण पुस्तक प्रकाशित नहीं करने का निर्णय लिया, परिस्थितियों को सही तरीके से प्रस्तुत नहीं करता।
कंपनी ने यह भी कहा कि किसी भी पांडुलिपि की तथ्य-जांच करना और लेखक को पुस्तक के हित में संपादकीय सुझाव देना प्रकाशक की सामान्य जिम्मेदारी है। साथ ही Penguin ने कहा कि संबंधित चर्चाओं के दौरान वह पुस्तक प्रकाशित करने के लिए "willing and keen" था। कंपनी ने लेखक के साथ हुई गोपनीय बातचीत पर आगे टिप्पणी करने से इनकार किया।
इसलिए उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह कहना अधिक उचित होगा कि संपादकीय मतभेद की खबरें मौजूद हैं, लेकिन Penguin द्वारा राजनीतिक सेंसरशिप लागू किए जाने का स्वतंत्र और प्रत्यक्ष प्रमाण अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है।
कांग्रेस का आरोप: क्या सरकार का दबाव था?
कांग्रेस ने मामले को केवल प्रकाशन संबंधी विवाद नहीं माना है।
पूर्व राजस्थान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने The Indian Express से कहा कि विवादित सामग्री मुख्य रूप से मोदी, RSS और चीन से संबंधित थी और उन्होंने इसे सरकार के हस्तक्षेप से जोड़कर देखा। उनका तर्क था कि सोनिया गांधी अपने जीवन और राजनीतिक अनुभव लिख रही हैं और उन अनुभवों को हटाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए चिंता का विषय है।
कांग्रेस के अन्य नेताओं ने भी Penguin के स्पष्टीकरण पर सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि यदि पुस्तक का वैश्विक संस्करण Penguin Random House के ही Alfred A. Knopf द्वारा प्रकाशित किया जा रहा है, तो भारत में उन्हीं राजनीतिक संदर्भों को लेकर इतनी गंभीर संपादकीय चिंता क्यों हुई।
यह राजनीतिक तर्क है, लेकिन इसे अभी प्रमाणित तथ्य नहीं कहा जा सकता। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी में ऐसा कोई दस्तावेज या प्रत्यक्ष प्रमाण सामने नहीं आया है जिससे यह स्थापित हो कि केंद्र सरकार ने Penguin पर पुस्तक से किसी सामग्री को हटाने का दबाव डाला था।
"Fact-checking" बनाम सेंसरशिप
इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद यही है।
एक प्रकाशक को किसी पुस्तक की तथ्य-जांच करने का अधिकार होता है। खासकर तब, जब संस्मरण में जीवित राजनीतिक नेताओं, सरकारी नीतियों, अंतरराष्ट्रीय संबंधों, सैन्य घटनाओं या किसी व्यक्ति के बारे में विवादित दावे हों।
लेकिन तथ्य-जांच और सामग्री हटाने के बीच एक स्पष्ट अंतर है।
यदि प्रकाशक लेखक से पूछता है कि किसी घटना का स्रोत क्या है, तारीख क्या है या किसी कथन की पुष्टि कैसे की जा सकती है, तो यह सामान्य संपादकीय प्रक्रिया है।
इसके विपरीत, यदि किसी राजनीतिक टिप्पणी को केवल इसलिए हटाने को कहा जाता है क्योंकि वह किसी प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्ति के लिए असुविधाजनक है, तो मामला अलग हो जाता है।
वर्तमान विवाद में यही मूल प्रश्न अनुत्तरित है—Penguin ने किन विशिष्ट वाक्यों या अनुच्छेदों पर आपत्ति की और किस आधार पर?
जब तक वह जानकारी सामने नहीं आती, दोनों पक्षों के दावों का स्वतंत्र मूल्यांकन कठिन रहेगा।
एक ही वैश्विक समूह, लेकिन भारत में अलग स्थिति
मामले का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि पुस्तक का अंतरराष्ट्रीय प्रकाशक Alfred A. Knopf है, जो Penguin Random House का हिस्सा है, जबकि भारत में Penguin Random House India अब इस पुस्तक का प्रकाशक नहीं है।
यही बात कांग्रेस नेताओं के सवालों का आधार बनी है।
हालांकि, किसी वैश्विक प्रकाशन समूह की अलग-अलग क्षेत्रीय इकाइयों के बीच प्रकाशन अधिकार, अनुबंध, संपादकीय निर्णय और कानूनी जिम्मेदारियां अलग हो सकती हैं। इसलिए केवल इस आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि भारत में राजनीतिक दबाव था।
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दूसरी ओर, यदि भारतीय संस्करण वही मूल सामग्री प्रकाशित करता है जिस पर Penguin India ने कथित रूप से आपत्ति की थी, तो विवाद को समझने के लिए यह महत्वपूर्ण संकेत जरूर होगा।
HarperCollins की संभावित भूमिका
Penguin India के भारतीय प्रकाशन से बाहर होने के बाद HarperCollins के पुस्तक के भारतीय प्रकाशन और वितरण अधिकार हासिल करने के करीब होने की खबरें सामने आई हैं। The Indian Express और अन्य रिपोर्टों ने इस संभावना का उल्लेख किया है, हालांकि HarperCollins की ओर से इस संबंध में कोई विस्तृत आधिकारिक घोषणा उपलब्ध नहीं है।
यदि HarperCollins पुस्तक का भारतीय संस्करण प्रकाशित करता है, तो सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि वह संस्करण किस रूप में सामने आता है।
क्या मोदी, RSS और चीन से संबंधित वही सामग्री उसमें मौजूद होगी?
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यदि हां, तो यह स्पष्ट हो सकेगा कि विवाद वास्तव में संपादकीय निर्णय की सीमा तक था। यदि सामग्री में व्यापक बदलाव दिखाई देते हैं, तो पाठकों के लिए यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि वे बदलाव किस प्रकाशक या किस संपादकीय प्रक्रिया के तहत हुए।
पुस्तक का महत्व केवल सोनिया गांधी तक सीमित नहीं
Belonging को केवल एक राजनीतिक नेता की आत्मकथा के रूप में देखना इसके महत्व को सीमित करना होगा।
सोनिया गांधी ने भारतीय राजनीति में कई दशकों तक केंद्रीय भूमिका निभाई। वह कांग्रेस अध्यक्ष रहीं, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष रहीं और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अध्यक्ष भी रहीं। 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री पद के लिए उनका नाम सबसे प्रमुख था, लेकिन उन्होंने पद स्वीकार नहीं किया।
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इसलिए उनके संस्मरण में यदि समकालीन प्रधानमंत्रियों, विपक्ष, कांग्रेस की रणनीति, भारत-चीन संबंधों और RSS जैसे राजनीतिक संगठनों पर व्यक्तिगत आकलन हैं, तो वह सामग्री राजनीतिक इतिहास के शोधकर्ताओं के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
खासकर इसलिए कि संस्मरण का महत्व केवल इसमें नहीं होता कि लेखक क्या देखता है, बल्कि इसमें भी होता है कि वह वर्षों बाद उन घटनाओं को कैसे याद करता और समझता है।
अभी निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी क्यों होगा?
इस मामले में तीन बातें अलग-अलग रखनी जरूरी हैं।
पहली, Penguin Random House India भारत में Belonging का प्रकाशक नहीं है। यह कंपनी स्वयं स्पष्ट कर चुकी है।
दूसरी, पुस्तक की पांडुलिपि में मोदी, RSS और चीन से संबंधित हिस्सों पर संपादकीय चर्चा होने की खबरें कई रिपोर्टों में सामने आई हैं। लेकिन इन हिस्सों का पूरा मूल पाठ सार्वजनिक नहीं है।
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तीसरी, सरकारी दबाव का आरोप अभी राजनीतिक आरोप है, स्थापित तथ्य नहीं। इसके समर्थन में सार्वजनिक रूप से कोई निर्णायक दस्तावेज सामने नहीं आया है।
इसलिए इस विवाद को सीधे "सेंसरशिप साबित हो गई" कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन इसे केवल सामान्य प्रकाशन प्रक्रिया बताकर समाप्त कर देना भी पर्याप्त नहीं है, क्योंकि दोनों पक्षों के बयानों के बीच वास्तविक अंतर मौजूद है।
असली जवाब किताब आने पर मिलेगा
सोनिया गांधी की Belonging: A Journey of Love 10 नवंबर 2026 को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित होने वाली है।
अब सबसे महत्वपूर्ण इंतजार पुस्तक के प्रकाशन का है।
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यदि भारतीय संस्करण में मोदी, RSS और चीन से संबंधित वे हिस्से प्रकाशित होते हैं जिन पर कथित तौर पर आपत्ति हुई थी, तो यह साबित करेगा कि लेखक अपनी मूल सामग्री के साथ पुस्तक प्रकाशित कराने में सफल रहीं।
अगर वे हिस्से बदल जाते हैं, तो अगला सवाल होगा कि बदलाव किसने किए और क्यों।
और यदि अंतरराष्ट्रीय और भारतीय संस्करणों में महत्वपूर्ण अंतर सामने आते हैं, तो यह विवाद केवल सोनिया गांधी और Penguin के बीच संपादकीय मतभेद नहीं रहेगा। तब यह भारत में राजनीतिक संस्मरणों, प्रकाशन स्वतंत्रता और संपादकीय स्वायत्तता पर एक बड़ी बहस का विषय बन सकता है।
फिलहाल सबसे तथ्यपरक निष्कर्ष यही है कि सोनिया गांधी की पुस्तक के भारतीय प्रकाशन को लेकर संपादकीय मतभेद सामने आए हैं, मोदी-RSS-चीन से जुड़े अंश विवाद के केंद्र में बताए जा रहे हैं, Penguin ने सरकारी हस्तक्षेप की बात स्वीकार नहीं की है, और पुस्तक के वास्तविक पाठ के सार्वजनिक होने से पहले सेंसरशिप का अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
लेकिन एक बात तय है—Belonging के प्रकाशित होने से पहले ही उसने भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण सवाल सामने रख दिया है:
किसी राजनीतिक नेता की अपनी कहानी में तथ्य कहां खत्म होते हैं और प्रकाशक की संपादकीय सीमा कहां से शुरू होती है?
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