विकसित भारत का पोस्टर, टूटते भारत की हकीकत?-अगर कोई कर सकता है तो हम कर सकते हैं'—लेकिन हिसाब कौन देगा?

प्रधानमंत्री के दावों, विकसित भारत के नारे, जवाबदेही के संकट, बेरोजगारी, शिक्षा, कृषि, संस्थाओं की स्वतंत्रता और लोकतंत्र में सवाल पूछने के अधिकार पर एक तीखा और विचारोत्तेजक विश्लेषण। क्या विकास के दावों की असली परीक्षा सवालों के सामने हो रही है?

विकसित भारत का पोस्टर, टूटते भारत की हकीकत?-अगर कोई कर सकता है तो हम कर सकते हैं'—लेकिन हिसाब कौन देगा?

Writer- Sudhir Taliyan

Chaudhary- Talan Khap

विकसित भारत या जवाबदेही से मुक्त भारत?

— एक नागरिक की बेचैन डायरी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में कहा कि विपक्ष भी यह मानता है कि "अगर कोई डिलीवर कर सकता है तो यही सरकार कर सकती है।" सुनने में यह वाक्य आत्मविश्वास से भरा लगता है। एक सशक्त नेता से ऐसी ही भाषा की अपेक्षा भी की जाती है। सत्ता में बैठे व्यक्ति को अपने काम पर भरोसा होना चाहिए। लेकिन लोकतंत्र में भरोसे की असली परीक्षा भाषणों से नहीं, सवालों से होती है।

लोकतंत्र का सबसे बड़ा सिद्धांत यह नहीं है कि सरकार कितनी ताकतवर है। लोकतंत्र का सबसे बड़ा सिद्धांत यह है कि सरकार से सवाल पूछे जा सकते हैं या नहीं।

अगर सरकार को अपने काम पर इतना ही भरोसा है, तो फिर एक खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं? ऐसी प्रेस कॉन्फ्रेंस जिसमें पहले से तय सवाल न हों, जिसमें पत्रकारों को असहज प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता हो, जिसमें सत्ता जवाब देने के लिए मजबूर हो। क्योंकि इतिहास गवाह है कि भाषण कभी भी जवाबदेही का विकल्प नहीं बन सकते।

आज भारत में राजनीतिक विमर्श का एक बड़ा संकट यही है कि उपलब्धियों की सूची तो लगातार सुनाई जाती है, लेकिन उन उपलब्धियों की स्वतंत्र जांच और आलोचना को अक्सर राष्ट्र-विरोध, विकास-विरोध या एजेंडा कहकर खारिज कर दिया जाता है।

विकास का अर्थ क्या केवल सड़क और सीमेंट है?

पिछले कुछ वर्षों में सड़कें बनी हैं, एक्सप्रेसवे बने हैं, एयरपोर्ट बने हैं। यह सच है। लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास केवल कंक्रीट का नाम है?

गरीब से अमीर की ओर आर्थिक पुनर्वितरण, शेयर बजार में चमक, जी.डी.पी. बढ़ी, जनता फटेहाल

एक समय था जब सड़क, रेल, शिक्षा, स्वास्थ्य और संचार को सार्वजनिक सेवा माना जाता था। आज धीरे-धीरे इन क्षेत्रों को व्यापारिक मॉडल में बदल दिया गया है। सरकार की भूमिका सेवा प्रदाता से बदलकर सुविधा प्रदाता की होती जा रही है।

नतीजा यह है कि नागरिक अब ग्राहक बनता जा रहा है।

डर तो है लेकिन व्यवस्था से टूटी हुई पीढ़ी के लिए बोलना होगा, चुप रहकर लोकतंत्र नहीं बचता

सड़क पर टोल दीजिए।

रेल में ज्यादा किराया दीजिए।

शिक्षा के लिए भारी फीस दीजिए।

स्वास्थ्य के लिए बीमा खरीदिए।

और फिर कहा जाता है कि देश विकसित हो रहा है।

विकास का वास्तविक अर्थ यह नहीं कि सुविधाएँ मौजूद हों। विकास का वास्तविक अर्थ यह है कि आम नागरिक उन सुविधाओं का उपयोग करने में सक्षम भी हो।

रेल: जनता की जीवनरेखा या प्रीमियम सेवा?

भारतीय रेल को कभी देश की जीवनरेखा कहा जाता था। वह गरीब, मजदूर, छात्र और निम्न मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी सहायक थी।

आज स्थिति यह है कि आम यात्रियों के बीच लगातार यह भावना बढ़ रही है कि रेलवे धीरे-धीरे सामान्य नागरिक से दूर होती जा रही है। वंदे भारत जैसी आधुनिक ट्रेनें निश्चित रूप से तकनीकी उपलब्धि हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या समान उत्साह से सामान्य मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों की स्थिति सुधरी?

अगर देश का एक बड़ा वर्ग आज भी भीड़भाड़, वेटिंग टिकट और सीमित सुविधाओं से जूझ रहा है, तो केवल हाई-प्रोफाइल परियोजनाएँ विकास का पूर्ण प्रमाण नहीं हो सकतीं।

किसी भी लोकतंत्र की सफलता का पैमाना यह नहीं होता कि अमीर कितनी तेज यात्रा कर सकता है। सफलता का पैमाना यह होता है कि गरीब कितनी सम्मानजनक यात्रा कर सकता है।

"विकसित भारत" : सपना या राजनीतिक नारा?

"विकसित भारत" सुनने में बहुत सुंदर लगता है।

कौन ऐसा भारतीय होगा जो विकसित भारत नहीं चाहता?

भारत की ओर बढ़ रहा है “Economic Storm”सच्चाई या राजनितिक बयानबाजी

लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब एक लक्ष्य को भावनात्मक नारे में बदल दिया जाता है।

जब बेरोजगारी, महंगाई, कृषि संकट, शिक्षा की लागत और आय असमानता जैसे प्रश्न उठते हैं, तब जवाब में अक्सर विकसित भारत का सपना दिखाया जाता है।

बेरोजगारी, असमानता और कमजोर होती सार्वजनिक व्यवस्था: कमजोर राजनीतिक सोच का परिणाम

सपने जरूरी हैं।

लेकिन सपनों की सबसे बड़ी शर्त यह है कि वे वास्तविकता से जुड़े हों।

अगर लाखों युवा नौकरी की तलाश में भटक रहे हों, अगर प्रतियोगी परीक्षाओं पर लगातार सवाल उठ रहे हों, अगर ग्रामीण आय स्थिर हो, तो केवल भविष्य की चमक दिखाकर वर्तमान की समस्याएँ समाप्त नहीं होतीं।

जवाबदेही का संकट

लोकतंत्र में मंत्री केवल उपलब्धियों के लिए नहीं होते।

वे विफलताओं के लिए भी जिम्मेदार होते हैं।

लेकिन आज ऐसा लगता है कि राजनीतिक जवाबदेही धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है।

परीक्षा प्रणाली पर सवाल उठते हैं।

पेपर लीक की घटनाएँ सामने आती हैं।

छात्र सड़कों पर उतरते हैं।

लेकिन इस्तीफे दुर्लभ हो गए हैं।

एक समय था जब रेल दुर्घटना होने पर रेल मंत्री नैतिक जिम्मेदारी लेते थे। आज नैतिक जिम्मेदारी शब्द ही राजनीतिक शब्दकोश से गायब होता दिखता है।

सरकारें सफलताओं का श्रेय लेती हैं।

लेकिन विफलताओं की जिम्मेदारी कौन लेता है?

यही प्रश्न लोकतंत्र की आत्मा है।

संस्थाएँ मजबूत हुईं या निर्भर?

लोकतंत्र केवल चुनाव से नहीं चलता।

लोकतंत्र संस्थाओं से चलता है।

चुनाव आयोग, सूचना आयोग, संसद, न्यायपालिका, विश्वविद्यालय, मीडिया—ये सभी लोकतंत्र के स्तंभ हैं।

जब किसी भी संस्था पर सवाल उठते हैं, तो सरकार का पहला कर्तव्य उन सवालों का उत्तर देना होता है।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक चिंताजनक प्रवृत्ति दिखाई दी है। संस्थाओं की निष्पक्षता पर प्रश्न उठाने वालों को अक्सर राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है।

किसी संस्था पर सवाल उठाना उस संस्था का अपमान नहीं होता।

बल्कि मजबूत संस्थाएँ वही होती हैं जो प्रश्नों का सामना कर सकें।

ध्रुवीकरण की राजनीति

भारत विविधताओं का देश है।

यहाँ भाषा अलग है।

संस्कृति अलग है।

भोजन अलग है।

विचार अलग हैं।

इसी विविधता ने भारत को महान बनाया है।

लेकिन आज राजनीतिक ध्रुवीकरण उस स्तर तक पहुँच गया है जहाँ नागरिक पहले राजनीतिक पहचान से पहचाना जाने लगा है, भारतीय बाद में।

सोशल मीडिया ने इस विभाजन को और गहरा किया है।

हर मुद्दा राष्ट्रभक्ति बनाम राष्ट्रद्रोह में बदल जाता है।

हर आलोचना देश-विरोध बन जाती है।

हर असहमति साजिश घोषित कर दी जाती है।

लोकतंत्र का अर्थ सहमति नहीं है।

लोकतंत्र का अर्थ असहमति का सम्मान है।

दल-बदल और जनादेश का प्रश्न

भारतीय राजनीति में दल-बदल कोई नई बात नहीं है।

लेकिन हाल के वर्षों में जिस पैमाने पर राजनीतिक पुनर्संरचना हुई है, उसने जनादेश की अवधारणा पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।

मतदाता किसी दल को वोट देता है।

फिर उसके प्रतिनिधि किसी दूसरे राजनीतिक खेमे में चले जाते हैं।

तकनीकी रूप से यह वैध हो सकता है।

लेकिन नैतिक रूप से क्या यह मतदाता की इच्छा का सम्मान है?

अगर जनता ने एक विचारधारा को चुना था और सत्ता में दूसरी विचारधारा पहुँच जाए, तो लोकतंत्र का नैतिक आधार कमजोर होता है।

असमानता का बढ़ता अंतर

भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है।

लेकिन दूसरा प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

विकास का लाभ किसे मिल रहा है?

जब कुछ लोगों की संपत्ति अत्यधिक गति से बढ़ती है और बड़ी आबादी अपनी आय बढ़ाने के लिए संघर्ष करती है, तब असमानता राजनीतिक और सामाजिक संकट का रूप ले सकती है।

आर्थिक विकास तभी सार्थक है जब उसका लाभ व्यापक रूप से वितरित हो।

अन्यथा विकास का आँकड़ा चमकता रहेगा और नागरिक की जिंदगी अंधेरे में रहेगी।

किसान: चुनावी भाषणों के नायक, नीतियों के नहीं

हर चुनाव में किसान सबसे बड़ा मुद्दा होता है।

हर मंच से किसान का सम्मान किया जाता है।

लेकिन सम्मान भाषणों से नहीं, आय से मापा जाता है।

ग्रोथ के लिए किसानों की कुर्बानी? विकसित भारत के नाम पर किसका खेल चल रहा है?

अगर खेती लगातार जोखिम भरा व्यवसाय बनी रहे, अगर उत्पादन लागत बढ़ती रहे और आय सीमित रहे, तो किसान का संकट केवल घोषणाओं से समाप्त नहीं होगा।

देश की खाद्य सुरक्षा जिस वर्ग के कंधों पर टिकी है, वही वर्ग सबसे अधिक अनिश्चितता में क्यों जी रहा है?

यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है।

शिक्षा: अवसर या व्यवसाय?

शिक्षा किसी भी समाज की सबसे बड़ी बराबरी करने वाली शक्ति होती है।

गरीब का बच्चा शिक्षा के माध्यम से आगे बढ़ सकता है।

लेकिन जब शिक्षा लगातार महंगी होती जाती है, तब सामाजिक गतिशीलता कमजोर पड़ती है।

आज लाखों परिवार शिक्षा के खर्च को लेकर संघर्ष कर रहे हैं।

अगर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल संपन्न वर्ग की पहुँच में रह जाए, तो आने वाली पीढ़ियों में असमानता और गहरी होगी।

तब विकसित भारत का सपना अधूरा रह जाएगा।

सूचना का अधिकार और पारदर्शिता

सूचना का अधिकार कानून कभी भारत में पारदर्शिता की सबसे बड़ी क्रांति माना गया था।

इसने नागरिक को सरकार से सवाल पूछने की शक्ति दी।

लोकतंत्र में जानकारी शक्ति होती है।

और जब जानकारी तक पहुँच कठिन होती जाती है, तो जवाबदेही भी कमजोर होती जाती है।

सरकार चाहे किसी भी दल की हो, उसे पारदर्शिता से डरना नहीं चाहिए।

क्योंकि लोकतंत्र का सबसे बड़ा मित्र सूचना है, गोपनीयता नहीं।

निष्कर्ष: सवाल देश से नहीं, सत्ता से हैं

सरकार की आलोचना करना देश की आलोचना नहीं है।

सत्ता से सवाल पूछना राष्ट्र-विरोध नहीं है।

लोकतंत्र में नागरिक का कर्तव्य केवल वोट देना नहीं है।

लोकतंत्र में नागरिक का कर्तव्य सवाल पूछना भी है।

भारत निश्चित रूप से आगे बढ़ना चाहता है।

भारत विकसित होना चाहता है।

लेकिन विकसित भारत केवल ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों और चमकदार विज्ञापनों से नहीं बनेगा।

विकसित भारत तब बनेगा जब संस्थाएँ स्वतंत्र होंगी।

जब मंत्री जवाबदेह होंगे।

जब आलोचना का सम्मान होगा।

जब शिक्षा और स्वास्थ्य अधिकार बनेंगे, व्यापार नहीं।

जब किसान सुरक्षित होगा।

जब युवा आश्वस्त होगा।

और सबसे महत्वपूर्ण, जब सरकार भाषणों से नहीं, सवालों से भी उतनी ही सहज होगी।

क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत सत्ता की आवाज़ में नहीं, नागरिक के प्रश्न में होती है।

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