जनता महंगाई-नौकरी पर परेशान, TV पर कौन किससे भिड़ा? आखिर किसके लिए चल रहा है यह मीडिया?
जनता महंगाई, बेरोजगारी, किसान संकट और शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे असली सवाल पूछ रही है, लेकिन TV मीडिया का एजेंडा अक्सर TRP, विवाद और राजनीतिक बयानबाजी के इर्द-गिर्द क्यों घूमता है? जानिए भारतीय मीडिया, TRP और जनहित के बीच बढ़ती खाई का कड़वा सच।
भारत की राजनीति में ‘जनता का मुद्दा’ और ‘टीवी का मुद्दा’ अलग क्यों हो गए?
By- Chaudhary Sudhir Talyan
भारत में लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट यह नहीं है कि देश में मुद्दों की कमी है। संकट यह है कि मुद्दे बहुत हैं, लेकिन कैमरे की दिशा अलग है।
किसान की लागत बढ़ती है, युवा नौकरी के लिए भटकता है, परिवार महंगाई से बजट काटता है, सरकारी अस्पताल में डॉक्टर नहीं मिलता, स्कूल में शिक्षक नहीं है, छोटे कारोबारी पर कर्ज का दबाव बढ़ता है—लेकिन राष्ट्रीय टेलीविजन की बहस का बड़ा हिस्सा अक्सर इस सवाल पर खर्च हो जाता है कि किस नेता ने क्या कहा, किस प्रवक्ता ने किसे जवाब दिया और किस बयान से नया विवाद पैदा हुआ।
यह संयोग नहीं है। यह उस मीडिया व्यवस्था का परिणाम है जिसमें जनहित और दर्शक-ध्यान एक ही चीज मान लिए गए हैं।
और यहीं से पत्रकारिता का सबसे कठोर प्रश्न पैदा होता है:
क्या समाचार चैनल जनता को सूचना दे रहे हैं, या जनता के ध्यान का कारोबार कर रहे हैं?
यह सवाल किसी एक चैनल, पत्रकार या राजनीतिक दल के विरुद्ध आरोप नहीं है। यह पूरे मीडिया-व्यवसाय की संरचना पर सवाल है।
जनता बेरोजगारी पूछती है, टीवी बयान खोजता है
2024 के लोकसभा चुनाव से पहले Lokniti-CSDS के सर्वेक्षण में बेरोजगारी और महंगाई मतदाताओं की प्रमुख चिंताओं में थीं। लगभग 10,000 उत्तरदाताओं वाले सर्वेक्षण में बेरोजगारी को 27% और महंगाई को 23% लोगों ने प्रमुख चिंता बताया। 62% ने कहा कि पिछले पांच वर्षों में नौकरी पाना कठिन हुआ है। (Reuters)
अब इस तथ्य को टीवी के prime time से मिलाकर देखिए।
जनता पूछती है:
नौकरी कहां है?
मीडिया पूछता है:
आज किसने किसको क्या कहा?
जनता पूछती है:
महंगाई क्यों बढ़ रही है?
टीवी पूछता है:
इस बयान पर विपक्ष की प्रतिक्रिया क्या है?
जनता पूछती है:
किसान को फसल का उचित मूल्य क्यों नहीं मिल रहा?
टीवी पूछता है:
किसान आंदोलन पर किस नेता ने क्या टिप्पणी की?
यह अंतर मामूली नहीं है। यह लोकतांत्रिक विमर्श की दिशा बदल देता है।
पत्रकारिता जब सवाल छोड़कर तमाशे के पीछे दौड़ने लगे
एक गंभीर पत्रकार का पहला सवाल होना चाहिए:
“इस निर्णय का नागरिक पर क्या प्रभाव पड़ेगा?”
लेकिन टीवी पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा अक्सर दूसरे सवाल में अटक जाता है:
“इस पर कौन नाराज है?”
फिर तीसरा सवाल:
“कौन किसे जवाब देगा?”
और अंत में:
“आज की सबसे बड़ी बहस क्या होगी?”
इस पूरी प्रक्रिया में मूल नीति गायब हो जाती है।
किसी कृषि नीति पर चर्चा होनी चाहिए तो लागत, उत्पादन, कीमत, आयात, निर्यात, सिंचाई और किसान की वास्तविक आय पर चर्चा हो।
लेकिन यदि बहस का प्रारूप है—
एक प्रवक्ता बनाम दूसरा प्रवक्ता,
तो नीति पीछे चली जाती है और राजनीतिक प्रदर्शन आगे आ जाता है।
यही वह क्षण है जब पत्रकारिता सूचना से मनोरंजन की ओर फिसलती है।
टीआरपी ने खबर की परिभाषा बदल दी
समाचार चैनल कोई सार्वजनिक पुस्तकालय नहीं हैं। वे व्यावसायिक संस्थान हैं।
उनकी अर्थव्यवस्था में दर्शक संख्या और advertising महत्वपूर्ण हैं। भारत की 2026 TV Ratings Policy स्वयं television ratings को broadcasting ecosystem की बुनियादी आर्थिक इकाई के रूप में देखती है और programming तथा advertising से उनके संबंध को स्वीकार करती है। सरकार ने 2026 में ratings व्यवस्था में transparency, audits और accountability के लिए नए प्रावधान भी किए हैं। (Press Information Bureau)
इससे एक असुविधाजनक सच्चाई सामने आती है:
जो चीज ज्यादा देर तक दर्शक को रोकती है, उसका व्यावसायिक मूल्य अधिक हो सकता है।
और गुस्सा दर्शक को रोकता है।
डर दर्शक को रोकता है।
विवाद दर्शक को रोकता है।
पहचान की राजनीति दर्शक को रोकती है।
टकराव दर्शक को रोकता है।
लेकिन कृषि लागत का 40 मिनट का विश्लेषण?
शायद उतना नहीं।
शिक्षा बजट का डेटा?
शायद नहीं।
ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था का जमीनी सर्वे?
और भी कम।
इसलिए समस्या सिर्फ यह नहीं है कि कुछ पत्रकार खराब पत्रकारिता करते हैं। समस्या यह है कि बाजार की संरचना कई बार खराब पत्रकारिता को आर्थिक रूप से पुरस्कृत करती है।
किसान तब खबर बनता है जब वह सड़क पर उतरता है
भारत का किसान देश की खाद्य अर्थव्यवस्था का केंद्रीय पात्र है। लेकिन उसकी रोजमर्रा की आर्थिक जिंदगी टीवी के लिए अक्सर पर्याप्त “दृश्य” नहीं बनती।
एक किसान सुबह खेत में जाता है।
फसल बोता है।
कर्ज लेता है।
डीजल खरीदता है।
बिजली का इंतजाम करता है।
मजदूरी देता है।
मंडी तक माल पहुंचाता है।
कीमत गिरने पर नुकसान उठाता है।
यह एक राष्ट्रीय आर्थिक कहानी है।
लेकिन इसमें कैमरे के लिए न कोई चीख है, न स्टूडियो confrontation।
फिर किसान सड़क पर ट्रैक्टर लेकर आता है।
बैरिकेड दिखाई देता है।
पुलिस दिखाई देती है।
भीड़ दिखाई देती है।
नारे दिखाई देते हैं।
और अचानक किसान “बड़ी खबर” बन जाता है।
यानी किसान की आर्थिक समस्या से अधिक उसकी राजनीतिक दृश्यता महत्वपूर्ण हो जाती है।
यही मीडिया की गंभीर विफलता है।
भारत में मीडिया संकट केवल TRP का संकट नहीं है
Reuters Institute की 2026 India रिपोर्ट के अनुसार, उसके मुख्यतः अंग्रेज़ी-भाषी online news users वाले survey में 44% respondents ने TV को news source के रूप में इस्तेमाल किया और लगभग 58% ने YouTube का इस्तेमाल किया। उसी survey में India में overall news trust 39% था। रिपोर्ट स्वयं चेतावनी देती है कि इसका sample nationally representative नहीं है। (reutersinstitute.politics.ox.ac.uk)
ये आंकड़े एक बड़े परिवर्तन की ओर संकेत करते हैं।
दर्शक अब केवल टीवी पर निर्भर नहीं है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि समस्या खत्म हो गई।
मीडिया का पुराना gatekeeper कमजोर हुआ है; नए gatekeepers पैदा हो गए हैं।
पहले editor तय करता था कि खबर क्या है।
अब algorithm भी तय करता है कि कौन-सी खबर दिखाई जाएगी।
पहले newsroom headline बनाता था।
अब viral clip headline बन सकता है।
पहले पत्रकार agenda बनाते थे।
अब influencer, platform और newsroom एक-दूसरे का agenda प्रभावित करते हैं।
सोशल मीडिया ने टीवी को खत्म नहीं किया, उसे और उग्र बना दिया
आज एक टीवी बहस समाप्त नहीं होती।
वह टूटकर निकलती है:
-
YouTube clip में,
-
Instagram Reel में,
-
X post में,
-
WhatsApp forward में,
-
Facebook video में।
एक घंटे की बहस कई दर्जन छोटे वीडियो बन सकती है।
फिर वही clips वापस टीवी पर लौटते हैं:
“सोशल मीडिया पर मचा बवाल।”
यह एक खतरनाक चक्र है।
पहले टीवी मुद्दा बनाता है।
फिर सोशल मीडिया उसे फैलाता है।
फिर सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया टीवी की नई खबर बनती है।
फिर वही प्रतिक्रिया अगले दिन की बहस बन जाती है।
और इस चक्र में वास्तविक नीति कहीं पीछे छूट जाती है।
Reuters Institute की 2026 वैश्विक रिपोर्ट बताती है कि पहली बार social media और video networks news access का सबसे व्यापक माध्यम बने हैं। (reutersinstitute.politics.ox.ac.uk)
अर्थात अब पत्रकारिता की लड़ाई सिर्फ newsroom में नहीं है।
यह attention economy में हो रही है।
सबसे खतरनाक बीमारी: “बयान पत्रकारिता”
बयान पत्रकारिता में नीति की जगह बयान ले लेता है।
नेता ने कहा।
दूसरे नेता ने जवाब दिया।
तीसरे ने पलटवार किया।
चौथे ने ट्वीट किया।
पांचवें ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की।
छठे ने कहा कि बयान वापस लिया जाए।
फिर टीवी debate।
फिर social media trend।
फिर अगले दिन नया बयान।
और अंततः नागरिक के हाथ क्या आया?
शून्य।
उसे यह पता चल गया कि कौन किससे नाराज है।
लेकिन यह पता नहीं चला कि:
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बजट कितना है?
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नीति की लागत कितनी है?
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लाभार्थी कितने हैं?
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योजना का परिणाम क्या है?
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पिछले वादे का क्या हुआ?
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सरकार का दावा कितना सत्य है?
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विपक्ष का दावा किस तथ्य पर आधारित है?
यह पत्रकारिता नहीं, राजनीतिक संवाद का amplified version है।
स्टूडियो में लोकतंत्र का नकली युद्ध
आजकल टीवी debate का दृश्य अक्सर कुछ ऐसा होता है:
एक anchor।
दो राजनीतिक प्रवक्ता।
एक तथाकथित विशेषज्ञ।
कुछ मिनट बाद आवाजें ऊंची।
फिर एक-दूसरे पर आरोप।
फिर anchor बीच में।
फिर स्क्रीन पर “EXCLUSIVE”।
फिर विज्ञापन।
फिर वही विवाद।
दर्शक को लगता है कि देश में लोकतंत्र पर गंभीर बहस हो रही है।
वास्तव में कई बार वह केवल राजनीतिक प्रदर्शन देख रहा होता है।
लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है।
लेकिन असहमति और शोर एक ही चीज नहीं हैं।
ऊंची आवाज तर्क का प्रमाण नहीं है।
गुस्सा तथ्य का विकल्प नहीं है।
बहस की गर्मी नीति की गुणवत्ता नहीं बताती।
और सबसे महत्वपूर्ण—
स्टूडियो में जीतने वाला तर्क जमीन पर सफल नीति का प्रमाण नहीं है।
मीडिया जनता को उपभोक्ता समझता है या नागरिक?
यही सबसे बड़ा प्रश्न है।
नागरिक से पत्रकारिता का रिश्ता होना चाहिए:
“आपको जानने का अधिकार है।”
लेकिन बाजार-चालित मीडिया में रिश्ता बदल सकता है:
“आपको देखते रहना चाहिए।”
दोनों वाक्यों के बीच पूरा लोकतांत्रिक अंतर छिपा है।
पहले में नागरिक केंद्र में है।
दूसरे में attention केंद्र में है।
यदि नागरिक केंद्र में है तो मीडिया को पूछना होगा:
सरकारी अस्पताल में डॉक्टर कितने हैं?
कितने युवा रोजगार की तलाश में हैं?
किसान की वास्तविक आय कितनी है?
स्कूल में शिक्षक कितने हैं?
महंगाई का परिवार के बजट पर क्या प्रभाव है?
सार्वजनिक धन कहां खर्च हो रहा है?
संसद में कौन-से कानून पर क्या बहस हुई?
लेकिन attention केंद्र में है तो सवाल बदल जाते हैं:
आज किसका बयान वायरल है?
कौन नाराज है?
कौन किस पर भारी पड़ा?
कौन-सा hashtag trend कर रहा है?
यह फर्क मामूली नहीं।
यही जनहित और मनोरंजन-आधारित राजनीतिक पत्रकारिता के बीच की सीमा है।
मीडिया की सबसे बड़ी जिम्मेदारी: सत्ता से सवाल
मीडिया लोकतंत्र में विपक्ष नहीं है।
लेकिन मीडिया का एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक कार्य सत्ता से सवाल पूछना है।
और यह काम किसी एक सरकार के लिए नहीं, हर सरकार के लिए होना चाहिए।
सत्ता बदलती है।
सरकारें बदलती हैं।
पार्टियां बदलती हैं।
लेकिन नागरिक का अधिकार नहीं बदलता।
इसलिए पत्रकारिता का सवाल होना चाहिए:
“आपने क्या कहा?” से आगे बढ़कर
“आपने क्या किया?”
और फिर:
“उसका परिणाम क्या निकला?”
और अंततः:
“इस परिणाम से किसे लाभ हुआ और किसे नुकसान?”
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
यही accountability journalism है।
मीडिया को फिर से जनता के पास लौटना होगा
अगर भारतीय पत्रकारिता को अपनी विश्वसनीयता वापस हासिल करनी है, तो उसे स्टूडियो से बाहर निकलना होगा।
गांव जाना होगा।
मंडी जाना होगा।
https://politicsinsightindia.com/mehangai-ka-dosh-kisan-par-kyon
सरकारी स्कूल जाना होगा।
जिला अस्पताल जाना होगा।
औद्योगिक क्षेत्र में जाना होगा।
रोजगार कार्यालय जाना होगा।
न्यायालयों के बाहर जाना होगा।
बाढ़ग्रस्त गांवों में जाना होगा।
सूखे खेतों में जाना होगा।
और वहां नागरिक से पूछना होगा:
https://politicsinsightindia.com/manrega-ka-paisa-kahan-atka-majdoor-payment-ki-jameeni-haqiqat
“आपकी सबसे बड़ी समस्या क्या है?”
फिर उस उत्तर को आंकड़ों से जांचना होगा।
सरकारी दस्तावेजों से मिलाना होगा।
विपक्ष के दावे से तुलना करनी होगी।
विशेषज्ञों से विश्लेषण कराना होगा।
और फिर जनता को तथ्य देना होगा।
यही पत्रकारिता है।
खबर की नई कसौटी होनी चाहिए
हर newsroom में एक सरल प्रश्न होना चाहिए:
“अगर इस खबर को नहीं दिखाया गया तो नागरिक क्या नहीं जान पाएगा?”
यदि उत्तर है—
“एक नेता ने दूसरे नेता को जवाब दिया”—
तो यह शायद खबर है, लेकिन जरूरी नहीं कि राष्ट्रीय महत्व की सबसे बड़ी खबर हो।
यदि उत्तर है—
“लाखों लोगों को प्रभावित करने वाली नीति का वास्तविक असर सामने नहीं आएगा”—
तो उसे प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
पत्रकारिता का मूल्य शोर की मात्रा से नहीं, सार्वजनिक महत्व से तय होना चाहिए।
निष्कर्ष: कैमरा जहां जाता है, सत्ता वहीं देखने लगती है
मीडिया केवल समाज को नहीं दिखाता।
मीडिया यह भी प्रभावित करता है कि सत्ता समाज में क्या दिखाई देती है।
जिस समस्या को लगातार कैमरा मिलता है, वह राजनीतिक रूप से दिखाई देने लगती है।
जिस समस्या को कैमरा नहीं मिलता, वह धीरे-धीरे सार्वजनिक चेतना से बाहर हो सकती है।
यही कारण है कि मीडिया की जिम्मेदारी सामान्य व्यवसाय से कहीं बड़ी है।
भारत की जनता को और अधिक शोर नहीं चाहिए।
उसे सूचना चाहिए।
उसे और अधिक राजनीतिक नाटक नहीं चाहिए।
उसे जवाब चाहिए।
उसे नेताओं के बीच अंतहीन आरोप-प्रत्यारोप नहीं चाहिए।
उसे नीतियों का परिणाम चाहिए।
https://politicsinsightindia.com/mehangai-ka-dosh-kisan-par-kyon
उसे हर रात किसी नए विवाद का तमाशा नहीं चाहिए।
उसे यह जानना है कि उसके बच्चे की शिक्षा, उसके घर की आय, उसकी नौकरी, उसकी फसल, उसका इलाज और उसका भविष्य किस दिशा में जा रहा है।
Reuters Institute के 2026 आंकड़ों में भारत के survey respondents के बीच news trust 39% दर्ज हुआ और लगभग आधे respondents ने कहा कि वे कभी-कभी या अक्सर news से बचते हैं। यह एक गंभीर चेतावनी है—हालांकि survey की सीमाओं को ध्यान में रखना आवश्यक है। (reutersinstitute.politics.ox.ac.uk)
मीडिया को इस अविश्वास का जवाब और अधिक शोर से नहीं, बेहतर पत्रकारिता से देना होगा।
क्योंकि लोकतंत्र में जनता केवल दर्शक नहीं है।
वह मालिक है।
और मीडिया का काम मालिक को उत्तेजित करके स्क्रीन पर रोकना नहीं, बल्कि उसे इतना तथ्य देना है कि वह सत्ता से सही सवाल पूछ सके।
आज भारत के मीडिया के सामने सबसे कठोर प्रश्न यही है:
क्या वह जनता को देख रहा है—या केवल उस कैमरे को देख रहा है जिसमें जनता दिखाई देती है?
यदि उत्तर दूसरा है, तो समस्या केवल मीडिया की विश्वसनीयता की नहीं है।
समस्या लोकतंत्र की प्राथमिकताओं की है।
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