पुलिस की वर्दी संविधान की है या सत्ता की?

दिल्ली के जंतर-मंतर और किसान घाट की घटनाओं की पृष्ठभूमि में यह संपादकीय पुलिस, संविधान और लोकतंत्र के संबंधों पर सवाल उठाता है। लेख नागरिक अधिकारों, शांतिपूर्ण विरोध, संवैधानिक दायित्व और वर्दीधारी संस्थाओं की जवाबदेही पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करता है।

पुलिस की वर्दी संविधान की है या सत्ता की?

लेखक- प्रकाश पोहरे 

प्रधान संपादक- देशोन्नति 

वरिष्ठ किसान नेता एवं कृषि विशेषज्ञ 

20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के विरोध में तथा अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक को जिस अमानवीय तरीके से पुलिस उठाकर ले गई, और बेरोज़गारी तथा अपने अंधकारमय भविष्य का जवाब मांगने के लिए देशभर से एकत्र हुए हजारों विद्यार्थियों एवं छोटी-छोटी छात्राओं पर जिस प्रकार निर्ममता से लाठीचार्ज किया गया, आँसू गैस के गोले छोड़े गए, उसने भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास पर एक गहरा कलंक अंकित कर दिया।

"लोकतंत्र में लाठी की आवाज़ कभी संवाद का स्थान नहीं ले सकती। जब विद्यार्थियों के हाथों में संविधान से अधिक पुलिस के हाथों की लाठी दिखाई देने लगे, तब सवाल केवल सरकार का नहीं रह जाता, बल्कि लोकतंत्र के स्वास्थ्य का बन जाता है।"

अगले ही दिन, 21 जुलाई को दिल्ली के राजघाट के समीप स्थित किसान घाट पर हजारों किसान और युवा भारत-अमेरिका समझौते के उस मसौदे पर सरकार से कम-से-कम चर्चा करने अथवा उसे रद्द करने की मांग को लेकर एकत्र होने वाले थे, जिसके कारण भारत के लगभग 60 प्रतिशत किसानों के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका व्यक्त की जा रही थी।

इसके लिए एक दिन पहले विधिवत सूचना देने की प्रक्रिया पूरी की गई थी और पुलिस ने अनुमति भी दे दी थी। इसके बावजूद आंदोलन का चेहरा बने गुरुनाम सिंह चढ़ूनी को एक दिन पहले ही उनके गाँव से गिरफ्तार कर लिया गया।

पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान से किसान नेता सरवन सिंह पंधेर के नेतृत्व में दिल्ली आ रही सैकड़ों बसों को राजधानी की चारों सीमाओं पर रोक दिया गया। दिल्ली आने वाली अनेक रेलगाड़ियों का मार्ग बदल दिया गया या उन्हें सात-आठ घंटे तक विलंबित किया गया।

अगले दिन राजधानी में किसान घाट को पुलिस छावनी में बदल दिया गया। किसान घाट पहुँचे हजारों आंदोलनकारियों तथा किसान नेताओं वी. एम. सिंह, कक्काजी, सतनाम सिंह फूल और भट्टी सहित अनेक लोगों को हिरासत में लेकर राजीव गांधी स्टेडियम में रखा गया।

इन घटनाओं के बाद स्वाभाविक प्रश्न उठता है—

क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(b) और 19(1)(c) द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार है, या फिर सरकार की इच्छा पर निर्भर कोई कृपा?

आज चाहे जंतर-मंतर हो, किसान घाट हो या देश का कोई भी कोना—लोकतंत्र की आवाज़ बैरिकेड लगाकर नहीं रोकी जा सकती। लाठियों, आँसू गैस के गोलों या वॉटर कैनन से जनभावनाओं को दबाया नहीं जा सकता। और यदि उन्हें दबाने का प्रयास किया भी जाए, तो वे पहले से अधिक बुलंद होकर सामने आती हैं।

इतिहास इसका साक्षी है।

जलियांवाला बाग में गोली चलाने का आदेश देने वाला जनरल डायर अकेला अंग्रेज़ था। बंदूकें भारतीय सैनिकों के हाथों में थीं। इतिहास ने डायर को हत्यारा घोषित किया, लेकिन साथ ही एक ऐसा प्रश्न छोड़ गया जिसका उत्तर आज तक नहीं मिला—अन्यायपूर्ण आदेश को मानने से इंकार करने का साहस कौन दिखाएगा?

"यदि उस दिन किसी भारतीय सैनिक ने अन्यायपूर्ण आदेश मानने से इनकार कर दिया होता और अपनी बंदूक का रुख जनरल डायर की ओर मोड़ दिया होता, तो शायद हजारों निर्दोष लोगों की जान बच जाती और इतिहास की दिशा ही बदल जाती। अन्यायपूर्ण आदेश का विरोध करना भी देशभक्ति का ही एक रूप है।"

आज भी वही प्रश्न वर्दीधारियों के सामने खड़ा है—

  • क्या आप आदेश के रक्षक हैं या न्याय के?
  • क्या आप सरकार के प्रहरी हैं या संविधान के?

देश की पुलिस, अर्धसैनिक बलों और सेना में भर्ती होने वाले प्रत्येक युवा को जीवनभर यह बात याद रखनी चाहिए कि आप किसी सरकार के नौकर नहीं, बल्कि भारत के संविधान के रक्षक हैं।

आपका वेतन कोई मंत्री, विधायक, सांसद या प्रधानमंत्री अपनी जेब से नहीं देता। वह इस देश के किसान, मजदूर, व्यापारी, शिक्षक, कर्मचारी और कर चुकाने वाले प्रत्येक नागरिक के पसीने की कमाई से आता है। इसलिए आपकी निष्ठा किसी राजनीतिक दल के प्रति नहीं, बल्कि भारत के संविधान और भारत की जनता के प्रति होनी चाहिए।

लेकिन आज प्रश्न उठता है—

क्या इस वर्दी पर भारत का तिरंगा है या सत्ताधारियों का झंडा?

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद नूर्नबर्ग न्यायालय ने एक ऐतिहासिक सिद्धांत स्थापित किया था—

"मैं तो केवल आदेश का पालन कर रहा था" अन्याय का बचाव नहीं हो सकता। प्रत्येक अधिकारी अपने कार्यों के लिए स्वयं उत्तरदायी होता है। वर्दी किसी व्यक्ति का विवेक नहीं छीन लेती।

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प्रत्येक पुलिस अधिकारी, प्रत्येक सैनिक और प्रत्येक प्रशासनिक अधिकारी किसी व्यक्ति, दल या सरकार की नहीं, बल्कि भारतीय संविधान की शपथ लेता है। शपथ किसी नेता की नहीं होती, किसी राजनीतिक दल की नहीं होती; वह संविधान के प्रति होती है।

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि सबसे उत्तम संविधान भी उसे लागू करने वाले लोगों के आचरण पर निर्भर करता है। संविधान कितना ही महान क्यों न हो, यदि उसकी रक्षा करने वाले अपना विवेक खो दें, तो लोकतंत्र कमज़ोर पड़ जाता है।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने 1975 में पुलिस और सैनिकों से आह्वान किया था कि यदि उन्हें कोई असंवैधानिक अथवा अवैध आदेश मिले, तो वे अपने विवेक का प्रयोग करें। उनके इस वक्तव्य पर उस समय बड़ा राजनीतिक विवाद हुआ था, किंतु उस आह्वान का मूल आधार संविधान और नैतिक उत्तरदायित्व ही था।

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सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने इस संघर्ष को "दूसरी आज़ादी की लड़ाई" कहा है। संभव है कि हर व्यक्ति इस मत से सहमत न हो, लेकिन नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों, शांतिपूर्ण आंदोलन के अधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना पुलिस, अर्धसैनिक बलों, प्रशासनिक अधिकारियों और सैनिकों का सर्वोच्च कर्तव्य है।

याद रखिए...

सरकारें बदलती हैं।
मंत्री बदलते हैं।
प्रधानमंत्री बदलते हैं।
सत्ता बदलती है।

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लेकिन भारतीय संविधान नहीं बदलता और इतिहास भी नहीं बदलता।

आज आपके हाथ में लाठी है, कल आपके हाथ में कोई सरकारी फाइल होगी और परसों जब आप सेवानिवृत्त होकर एक सामान्य नागरिक बनेंगे, तब समाज आपकी आज की भूमिका को याद रखेगा। यदि आपने अन्याय का साथ दिया होगा, तो एक दिन आपको स्वयं अपनी नज़रों में शर्मिंदा होना पड़ेगा।

आज देश को ऐसे अधिकारी नहीं चाहिए जो आँख बंद करके आदेशों का पालन करें; देश को ऐसे अधिकारी चाहिए जो अपने विवेक से निर्णय लें।

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देश को सत्ता के सैनिक नहीं, बल्कि संविधान के प्रहरी चाहिए।

क्योंकि—

"वर्दी की असली शान सत्ता के सामने झुकने में नहीं, बल्कि अन्याय के सामने सीना तानकर खड़े होने में है।"

और याद रखिए—

इतिहास न आपकी डिग्रियाँ गिनता है, न आपका पद, न आपकी रैंक।

इतिहास केवल आपकी भूमिका को याद रखता है।

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जलियांवाला बाग, आपातकाल, नूर्नबर्ग और लोकतंत्र के हर संघर्ष का एक ही संदेश है—

"वर्दी मनुष्य को अधिकार देती है, लेकिन उसका विवेक नहीं छीनती।"

आदेश का पालन करना कर्तव्य है, लेकिन संविधान और मानवता के प्रति निष्ठावान रहना उससे भी बड़ा कर्तव्य है।

अंत में केवल एक बात—

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इतिहास आपके कंधों पर लगे सितारों की गिनती नहीं करता।

वह उन सितारों के नीचे धड़कते हुए विवेक का मूल्यांकन करता है।


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