सोयाबीन तेल, सॉल्वेंट एक्स्ट्रैक्शन, आयात लॉबी और बढ़ती बीमारियों के अर्थशास्त्र की पड़ताल

सोयाबीन तेल, सॉल्वेंट एक्स्ट्रैक्शन, हेक्सेन, आयात लॉबी और रिफाइंड तेल के बढ़ते इस्तेमाल की पड़ताल। जानिए घाणी उद्योग के पतन, किसानों की तिलहन अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य संबंधी सवालों का पूरा सच।

सोयाबीन तेल, सॉल्वेंट एक्स्ट्रैक्शन, आयात लॉबी और बढ़ती बीमारियों के अर्थशास्त्र की पड़ताल

भारत में पिछले पचास वर्षों में एक क्रांति हुई। वह हरित क्रांति नहीं थी। वह औद्योगिक क्रांति भी नहीं थी। वह थी हमारे रसोईघर की क्रांति।

कभी हर गांव में तेल की घाणियां हुआ करती थीं। बैलों की ताकत पर या लकड़ी की घाणी से निकला तिल, मूंगफली, सरसों, करडई, अलसी और नारियल का तेल हर घर में इस्तेमाल होता था। तेल का रंग अलग, खुशबू अलग, स्वाद अलग और हर क्षेत्र की अपनी खाद्य संस्कृति थी।

आज परिस्थिति पूरी तरह बदल गई है। देश की लाखों घाणियां बंद हो गईं। उनकी जगह विशाल सॉल्वेंट एक्स्ट्रैक्शन कारखाने खड़े हो गए। बाजार में "रिफाइंड", "डबल रिफाइंड", "ट्रिपल रिफाइंड", "हार्ट फ्रेंडली", "लाइट", "कोलेस्ट्रॉल फ्री" जैसे आकर्षक शब्दों की विज्ञापनों के माध्यम से बारिश होने लगी।

और भारतीय उपभोक्ता ने एक बात मान ली—

जितना ज्यादा रिफाइंड, उतना ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक—यह भ्रम किसने पैदा किया?

घाणियां क्यों बंद हुईं? सॉल्वेंट प्लांट क्यों खड़े हुए?

1970 के बाद भारत में बड़े पैमाने पर तिलहन प्रसंस्करण उद्योग बढ़ा। उसी दौर में सॉल्वेंट एक्स्ट्रैक्शन उद्योग को भी प्रोत्साहन मिला।

क्योंकि सोयाबीन, चावल की भूसी और कुछ अन्य तिलहनों से दबाव द्वारा पूरा तेल नहीं निकलता था। हेक्सेन जैसे पेट्रोलियम-आधारित सॉल्वेंट का इस्तेमाल करके बचा हुआ तेल भी निकालना उद्योग के लिए अधिक मुनाफे वाला साबित हुआ।

लेकिन उपभोक्ता के स्वास्थ्य की दृष्टि से यह कितना उचित है?

यह सवाल बहुत कम पूछा गया।

रिफाइंड तेल तैयार कैसे होता है?

आम आदमी समझता है कि कारखाने से तेल निकला और बोतल में भर दिया गया। लेकिन वास्तव में प्रक्रिया इससे कहीं अधिक जटिल है।

सोयाबीन के फ्लेक्स तैयार किए जाते हैं। उन पर हेक्सेन डाला जाता है। तेल को उसमें घोला जाता है। फिर गर्मी, भाप और वैक्यूम प्रक्रिया के माध्यम से सॉल्वेंट को अलग किया जाता है।

इसके बाद डिगमिंग, न्यूट्रलाइजेशन, ब्लीचिंग, डिओडोराइजेशन जैसी अनेक प्रक्रियाएं की जाती हैं।

इन प्रक्रियाओं के बाद तेल रंगहीन और गंधहीन हो जाता है, लेकिन क्या वह मानव स्वास्थ्य के लिए वास्तव में उतना ही उपयुक्त रहता है?

क्योंकि इन प्रक्रियाओं में प्राकृतिक विटामिन, कुछ एंटीऑक्सीडेंट और जैव सक्रिय घटकों की मात्रा कम हो सकती है। साथ ही, स्वास्थ्य के लिए संभावित रूप से हानिकारक कुछ रासायनिक अवशेषों को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।

इसीलिए दुनिया भर में कम प्रसंस्कृत यानी घाणी अथवा कोल्ड-प्रेस तेलों के प्रति फिर से रुचि बढ़ रही है।

"हार्ट फ्रेंडली" विज्ञापनों का सच

भारत के खाद्य तेल उद्योग ने पिछले कई दशकों में एक प्रभावी प्रचार किया—

"रिफाइंड मतलब शुद्ध।"

लेकिन शुद्ध होने का अर्थ यह नहीं है कि वह प्राकृतिक और स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम भी हो।

उद्योग का पक्ष है कि कुछ रिफाइंड तेलों में ट्रांस फैट की मात्रा अत्यंत कम रखी जा सकती है। लेकिन दूसरी ओर, अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन और तेलों के बढ़ते इस्तेमाल तथा भारत में बढ़ते मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापे और कैंसर के मामलों के बीच संबंधों की गंभीरता से जांच हो रही है।

भारत आज बीमार क्यों हो रहा है?

भारत को मधुमेह की राजधानी कहा जाता है।

हृदय रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

फैटी लिवर अब शराब न पीने वाले लोगों में भी दिखाई देता है।

मोटापा बढ़ रहा है।

लेकिन क्या इसके लिए केवल तेल जिम्मेदार है?

अत्यधिक चीनी, अत्यधिक नमक, शारीरिक श्रम की कमी, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड भोजन और अत्यधिक प्रसंस्कृत तेल—इन सभी के संयुक्त प्रभाव की हम पर्याप्त गंभीरता से जांच कर रहे हैं?

या फिर हम फार्मा कंपनियों और कॉर्पोरेट अस्पतालों के जाल में फंसते जा रहे हैं?

आयातित तेलों का अर्थशास्त्र

भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्य तेल आयातक देशों में से एक है। पाम तेल, सोयाबीन तेल और सूरजमुखी तेल पर देश काफी हद तक निर्भर है।

इसके कारण देश से हर साल भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा बाहर जाती है।

यह सस्ता आयातित तेल हमारे स्थानीय तेलों में होने वाली मिलावट और बाजार की कीमतों को प्रभावित करता है। नतीजा यह होता है कि हमारे किसान को तिलहन का उचित भाव नहीं मिलता।

इसलिए किसान तिलहन की बुवाई कम कर देता है।

उत्पादन कम होता है।

और सरकार कहती है—तेलबीजों का उत्पादन कम है, इसलिए हमें आयात करना पड़ता है।

यह तो वही सवाल है—पहले अंडा आया या मुर्गी?

भाव नहीं मिलता, इसलिए किसान तिलहन की बुवाई नहीं करता।

और सरकार कहती है कि तेलबीजों का उत्पादन कम है, इसलिए हम आयात कर रहे हैं।

अगर भारत ऐसे स्वास्थ्य के लिए संभावित रूप से हानिकारक सस्ते आयात पर निर्भरता कम करे, तो घरेलू तेलों की कीमतों को उचित स्तर मिल सकता है।

तेलबीजों को उचित भाव मिलेगा तो किसान उनकी बुवाई बढ़ाएगा।

उत्पादन बढ़ेगा।

फिर आयात पर निर्भरता कम होगी।

लेकिन फार्मा लॉबी और रिफाइनरी उद्योग के हाथों का खिलौना बन चुकी कमीशनखोर सरकार को यह कौन बताए?

लोगों के लिए खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि ही महंगाई है। भले ही बाकी किसी भी वस्तु की कीमत कितनी भी बढ़ जाए, उसके बारे में जनता उतनी शिकायत नहीं करती।

इसलिए सरकार भी वोटों पर नजर रखते हुए कृत्रिम रूप से खाद्य महंगाई को नियंत्रित रखने का प्रयास करती है।

अगर भारत फिर से मूंगफली, तिल, सरसों, करडई, अलसी और नारियल के स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा दे, तो इसका लाभ किसान, उपभोक्ता, ग्रामीण उद्योग, विदेशी मुद्रा बचत और सबसे महत्वपूर्ण—मानव स्वास्थ्य—सभी को हो सकता है।

यह केवल स्वास्थ्य की नहीं, आर्थिक स्वतंत्रता की भी लड़ाई है!

उपभोक्ता से जानकारी क्यों छिपाई जाती है?

हर बोतल पर बड़े अक्षरों में—

"सॉल्वेंट एक्स्ट्रैक्टेड एंड रिफाइंड"

लिखना अनिवार्य क्यों नहीं होना चाहिए?

https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra

हेक्सेन का इस्तेमाल हुआ या नहीं?

अवशेष कितना है?

जांच किस प्रयोगशाला में हुई?

उपभोक्ता को यह जानकारी किसी कोड नंबर के बजाय स्पष्ट शब्दों में उपलब्ध क्यों नहीं होनी चाहिए?

लोकतंत्र में जानकारी अधिकार है, उपकार नहीं!

स्वास्थ्य मंत्रालय, आयुष मंत्रालय और FSSAI की यह जिम्मेदारी है।

कानून हैं।

https://politicsinsightindia.com/mmdr-amendment-bill-2026-farmer-land-acquisition-partnership

मानक हैं।

सीमाएं निर्धारित हैं।

लेकिन उनका पालन और प्रभावी क्रियान्वयन कितना हो रहा है?

राज्यवार जांच रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जातीं?

उपभोक्ता संगठनों को स्वतंत्र रूप से नमूने जांचने की सरल व्यवस्था क्यों नहीं दी जाती?

"ब्लेंडेड एडिबल ऑयल"—नाम बदलने से वास्तविकता बदल जाती है क्या?

एक समय खाद्य तेल में दूसरे तेल की मिलावट को मिलावट माना जाता था।

आज उसी को आकर्षक नाम दिया गया है—

"ब्लेंडेड एडिबल ऑयल"!

नाम बदलने से वास्तविकता बदल जाती है क्या?

https://politicsinsightindia.com/judiciary-dirty-secret-women-judges-sexual-harassment-adultery-law-accountability

उपभोक्ता को यह स्पष्ट रूप से क्यों नहीं बताया जाता कि कौन-सा तेल कितनी मात्रा में मिलाया गया है?

प्रत्येक तेल का प्रतिशत बड़े और स्पष्ट अक्षरों में लिखना अनिवार्य क्यों नहीं होना चाहिए?

अब समय है "प्राकृतिक तेल क्रांति" का!

इसके लिए सरकार को—

• प्रत्येक जिले में पारंपरिक घाणियों को आर्थिक सहायता देनी चाहिए।
• कोल्ड-प्रेस तेलों के लिए स्वतंत्र और स्पष्ट गुणवत्ता मानक बनाने चाहिए।
• किसानों को स्थानीय तिलहन उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
• स्कूलों में पोषण शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए।

https://politicsinsightindia.com/ews-mein-gareeb-kaun-upsc-104-chayan-ne-khole-aarakshan-vyavastha-ke-sawal
• और सबसे महत्वपूर्ण—उपभोक्ता को सच बताने का साहस दिखाना चाहिए।

अगर कोई तेल वास्तव में सर्वोत्तम और पूरी तरह सुरक्षित है, तो उसकी उत्पादन प्रक्रिया की जानकारी स्पष्ट नाम से देने के बजाय कोड नंबरों के पीछे छिपाने की जरूरत क्यों है?

और उपभोक्ताओं को भी केवल सस्ता होने के कारण ऐसा तेल खरीदना चाहिए क्या?

और उसके साथ इतने सारे संभावित स्वास्थ्य जोखिमों को न्योता देना चाहिए क्या?

इस पर विचार करना जरूरी है।

अगर रिफाइंड तेल पूरी तरह सुरक्षित है, तो उसकी प्रत्येक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने में क्या दिक्कत है?

और यदि उपभोक्ता को पूरी जानकारी ही नहीं दी जाती, तो उसकी पसंद वास्तव में स्वतंत्र कैसे मानी जाएगी?

https://politicsinsightindia.com/delhi-son-murder-mental-health-system-failure-government-responsibility

भारतीयों की थाली में जो आता है, उसका पूरा सच भारतीयों को पता चलना ही चाहिए!

मधुमेह, रक्तचाप, कैंसर और अन्य बीमारियां क्यों बढ़ रही हैं?

इस पर सार्वजनिक बहस क्यों नहीं होती?

क्योंकि स्वास्थ्य और शिक्षा कोई धंधे की वस्तु नहीं हैं। वे एक मजबूत राष्ट्र के निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक आधार हैं।

सरकार तत्काल जवाब दे!

  1. भारत में सॉल्वेंट एक्स्ट्रैक्टेड तेल के हर वर्ष कितने नमूनों की जांच होती है?
  2. हेक्सेन अवशेषों से संबंधित जांच रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?
  3. "ब्लेंडेड ऑयल" में प्रत्येक तेल का प्रतिशत बड़े अक्षरों में छापना अनिवार्य क्यों नहीं है?
  4. पारंपरिक घाणी उद्योग के लिए स्वतंत्र राष्ट्रीय नीति क्यों नहीं बनाई गई?
  5. पिछले 30 वर्षों में घाणी उद्योग कितना कम हुआ और सॉल्वेंट एक्स्ट्रैक्शन उद्योग कितना बढ़ा?
  6. किसानों को तिलहन का उचित मूल्य दिए बिना दुर्लभ विदेशी मुद्रा खर्च करके विदेशों से स्वास्थ्य के लिए संभावित रूप से हानिकारक सस्ता तेल क्यों आयात किया जा रहा है?

दूध के मामले में जिस तरह तुकाराम मुंडे ने ध्यान दिया, क्या वे खाद्य तेल के मामले में भी उसी तरह ध्यान देंगे?


प्रकाश कमलताई गोपालराव पोहरे

9822593921

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