कर्जमाफी या किसान बांटने की सियासत? शर्तों के जाल पर बड़ा सवाल
किसान कर्जमाफी की शर्तों, पात्र-अपात्र के विभाजन और बढ़ते कृषि संकट पर बड़ा सवाल। क्या कर्जमाफी किसानों को राहत दे रही है या किसान एकता को कमजोर कर रही है?
By- प्रकाश कमळताई गोपालराव पोहरे
Editor in Chief. Maharashtra
सर्वव्यापी कर्जमाफी से शर्तों के जंजाल तक का सफर!
किसान इस देश का अन्नदाता है। वह जिंदा रहेगा तो देश जिंदा रहेगा और वह खत्म हुआ तो देश की थाली का निवाला भी खत्म हो जाएगा। सत्ता की कुर्सी पर बैठे हुक्मरानों को अगर इतना सरल गणित समझ में नहीं आता, तो उन्हें एक दिन किसान के खेत में जाकर खड़ा होना चाहिए!
एक समय था, जब दिल्ली की सत्ता को किसान के संकट का अहसास था। 2008 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से प्रकाश पोहरे की मुलाकात के बाद किसान कर्जमाफी का प्रश्न केंद्र के स्तर पर अधिक गंभीरता से आगे बढ़ा। इसके बाद केंद्र सरकार ने लगभग 72 हजार करोड़ रुपये की कृषि कर्जमाफी की घोषणा की।
उस फैसले का संदेश स्पष्ट था—जब किसान संकट में हो, तब उसे कागजी दस्तावेजों, प्रशासनिक शर्तों और जटिल प्रक्रियाओं के जाल में उलझाने के बजाय संकट से बाहर निकालना सरकार की जिम्मेदारी है।
लेकिन आज तस्वीर क्या है?
कर्जमाफी चाहिए, लेकिन उसके लिए शर्तें।
कर्जमाफी चाहिए, लेकिन उसके लिए नियम।
कर्जमाफी चाहिए, लेकिन कौन पात्र और कौन अपात्र, इसकी नई श्रेणियां!
और इसलिए सवाल है—
किसान की मदद की जा रही है या किसानों को बांटा जा रहा है?
कर्जमाफी से बड़ा खतरा ‘फूट’ डालने का!
आज एक किसान को कर्जमाफी मिलती है और दूसरे को नहीं। किसी का कर्ज पुनर्गठित हुआ, इसलिए वह अलग; किसी का कर्ज निर्धारित अवधि का है, इसलिए वह अलग; किसी का कर्ज किसी निश्चित तारीख से पहले या बाद का है, इसलिए वह अलग!
कागज पर यह प्रक्रिया कितनी भी कानूनी या प्रशासनिक क्यों न दिखाई दे, लेकिन इसका किसान समाज पर क्या असर होगा, क्या सरकार ने इस पर विचार किया है?
जिसका कर्ज माफ हो गया, वह आंदोलन में क्यों उतरेगा?
जिसे कर्जमाफी नहीं मिली, वह सरकार से नाराज रहेगा।
और इन दोनों को एक मंच पर लाने वाली किसान एकता ही कमजोर होगी!
किसान आंदोलन को कमजोर करने का इससे अधिक प्रभावी तरीका और क्या हो सकता है?
राजनीति में ‘फूट डालो और राज करो’ पुरानी नीति है। पार्टियां टूटती हैं, गुट बनते हैं, मतभेद बढ़ते हैं और उसका राजनीतिक लाभ उठाया जाता है।
लेकिन आज सवाल पार्टियों का नहीं है—
सवाल किसानों की एकजुटता का है।
किसान ही बंट गया, इसलिए सत्ता को अवसर मिल गया!
यहां केवल सत्ताधारियों को दोष देना भी उचित नहीं होगा।
आज किसान अनेक संगठनों में बंट चुका है। अलग मंच, अलग झंडा, अलग नेता और कई बार अलग-अलग मांगें!
गन्ना उत्पादक, कपास उत्पादक, गेहूं, चावल, सोयाबीन, तिलहन, औषधीय फसलें, कॉफी, चाय, रबर, मसाला फसलें, केला, संतरा, मोसंबी, सेब, आम और अन्य फल उत्पादक—किसान अनेक हिस्सों में बंट गया है।
सिंचित किसान, वर्षा आधारित किसान—यह विभाजन अलग।
इतना ही नहीं, किसान जाति, धर्म, भाषा, राज्य और राजनीतिक दलों के आधार पर भी बंट गया है। छोटा किसान और बड़ा किसान—यह विभाजन भी अलग!
नतीजा क्या हुआ?
किसान अनेक हो गए; लेकिन किसानों की ताकत एक नहीं हुई।
अगर इसी कमजोरी का फायदा सत्ताधारी उठा रहे हैं, तो केवल सरकार को दोष देने से कोई फायदा नहीं। सत्ता हमेशा संगठित शक्ति के सामने झुकती है और बिखरी हुई शक्ति को अपनी सुविधा के अनुसार नियंत्रित करती है।
इसलिए किसानों को समझना होगा—
कर्जमाफी किसी राजनीतिक दल की खैरात नहीं है।
आज एक किसान का कर्ज माफ हो गया, इसलिए दूसरे किसान का सवाल खत्म नहीं हो जाता। बल्कि जिसका कर्ज माफ हुआ है, उसी किसान को उस किसान के साथ खड़ा होना चाहिए जिसका कर्ज माफ नहीं हुआ।
क्योंकि कल संकट किसके दरवाजे पर आएगा, यह कोई नहीं जानता।
कर्जमाफी का मतलब किसान सरकार से भीख नहीं मांग रहा!
जिस किसान के पसीने से अन्न पैदा होता है, जिसके उत्पादन से बाजार चलते हैं, उस किसान को संकट से बाहर निकालना सरकार की जिम्मेदारी है।
लेकिन किसान कर्जदार क्यों होता है?
प्रकृति की अनिश्चितता, बढ़ती उत्पादन लागत, बाजार भाव में उतार-चढ़ाव, आयात-निर्यात नीति में बदलाव, खाद, बीज, दवाइयों और डीजल की बढ़ती कीमतें तथा उसकी तुलना में बेहद कम बढ़े हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य—इन सबका बोझ किसान पर पड़ता है।
और इतना सब करने के बाद भी जब वह अपनी उपज बेचने बाजार जाता है, तो हाथ में आता है—अपर्याप्त भाव!
सरकार चाहती है कि उपभोक्ता को सस्ता भोजन मिले और इसके लिए वह विभिन्न तरीकों से बाजार में हस्तक्षेप करती है। लेकिन सवाल यह है—
उपभोक्ता को सस्ता भोजन देते समय उत्पादक किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिल रहा है क्या?
किसान फसल उगाता है, लेकिन कीमत तय नहीं करता।
वह उत्पादन करता है, लेकिन बाजार व्यवस्था उसके हाथ में नहीं है।
वह जोखिम उठाता है, लेकिन मुनाफे की कोई गारंटी उसे नहीं मिलती।
उत्पादन बढ़ा; लेकिन लागत का क्या?
आधुनिक खेती से उत्पादन बढ़ा, लेकिन इसके साथ बीज, खाद, कीटनाशक, मशीनरी, सिंचाई, डीजल और बिजली की लागत भी बढ़ी।
खेती चलाने के लिए पूंजी चाहिए। पूंजी नहीं होगी तो कर्ज लेना पड़ेगा। और जब फसल खराब हो जाए, बाजार भाव गिर जाए या प्राकृतिक आपदा आ जाए, तो उसी कर्ज का पहाड़ किसान के सीने पर आ खड़ा होता है।
फिर बैंक वसूली के लिए खड़ा हो जाता है।
यहां मूल सवाल है—
अगर जोखिम सबका है, तो कर्ज का बोझ केवल किसान के सिर पर ही क्यों?
बड़े कर्जदारों के लिए ‘हेयरकट’... किसान के लिए वसूली?
बड़े उद्योग समूहों के हजारों करोड़ रुपये के कर्ज संकट में आते हैं तो पुनर्गठन, समझौता, ‘हेयरकट’ और कर्ज निपटारे की विभिन्न प्रक्रियाएं शुरू हो जाती हैं।
जी समूह से संबंधित सुभाष चंद्र के मामले में बड़े कर्ज के ‘हेयरकट’ को लेकर भी चर्चा हुई है।
लेकिन इससे सवाल उठता है—
बड़े कर्जदारों के लिए कर्ज समाधान की व्यवस्था हो सकती है, तो छोटे किसान के लिए क्यों नहीं?
बड़े कर्जदार को आर्थिक पुनर्गठन का अवसर और किसान को केवल वसूली का डर—यह अंतर क्यों?
किसान आत्महत्या करता है क्योंकि वह कमजोर नहीं; व्यवस्था उसे अकेला कर देती है!
जब किसान आत्महत्या करता है, तो हम अक्सर उसे ही दोष देते हैं।
लेकिन उसे उस अंतिम सीमा तक कौन लेकर गया, यह सवाल हम पूछते हैं क्या?
फसल खराब होती है। कर्ज बढ़ता है। उपज का उचित भाव नहीं मिलता। अगले मौसम के लिए पैसा नहीं बचता। घर का खर्च रुकता नहीं और वसूली रुकती नहीं।
सबसे दर्दनाक बात यह है कि किसान कई बार व्यवस्था को दोष देने के बजाय अपने भाग्य को दोष देता है!
जिसने देश को अन्न दिया, वही अपने जीवन का निवाला खो देता है।
इससे बड़ी राष्ट्रीय त्रासदी और क्या हो सकती है?
अगर किसान एक दिन रुक गया तो?
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
किसान आंदोलन करने की ताकत खोता जा रहा है—यही असली खतरे की घंटी है।
किसान सड़क पर नहीं आया, इसलिए समस्या खत्म हो गई, ऐसा सरकार को नहीं समझना चाहिए।
हो सकता है किसान आज शांत हो; लेकिन अगर उसके घर का चूल्हा बुझ गया, तो शहर का चूल्हा भी नहीं जल पाएगा।
किसान उत्पादन रोकने लगा तो बाजार, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, परिवहन, होटल व्यवसाय और पूरी खाद्य श्रृंखला पर असर पड़ेगा।
आज जिसकी थाली में दो वक्त का भोजन आसानी से आता है, उसे याद रखना चाहिए—
उस थाली के पीछे किसान का पसीना है।
https://politicsinsightindia.com/mmdr-amendment-bill-2026-farmer-land-acquisition-partnership
किसान को बचाना केवल एक समाज घटक को बचाना नहीं है; यह देश की खाद्य सुरक्षा को बचाना है।
किसान ब्रिगेड की स्पष्ट मांग
किसान ब्रिगेड की स्पष्ट मांग है कि किसानों की कर्जमाफी को राजनीतिक रंग न दिया जाए।
पात्र-अपात्र, पुराना-नया, पुनर्गठित-अन्य जैसे विभाजनकारी मानदंडों के कारण यदि अन्याय की भावना पैदा हो रही है, तो इनका पुनर्विचार किया जाए।
बिना किसी भेदभाव के, पारदर्शी और व्यापक स्वरूप की किसान कर्जमाफी करके किसानों को इस संकट से बाहर निकाला जाए—यह किसान ब्रिगेड की स्पष्ट मांग है।
लेकिन कर्जमाफी स्थायी समाधान नहीं है।
जब तक किसान को उत्पादन लागत के आधार पर गारंटीकृत उचित मूल्य नहीं मिलता, बाजार में उचित स्थान नहीं मिलता, आयात-निर्यात नीति में स्थिरता नहीं आती और खेती की बढ़ती लागत पर नियंत्रण नहीं होता, तब तक कर्जमाफी का चक्र चलता ही रहेगा।
कर्जमाफी घाव पर लगाया गया मरहम है; किसान को उचित मूल्य मिलना ही स्थायी इलाज है।
अब सवाल किसान के भविष्य का है!
आज सवाल सिर्फ इतना है—
सरकार किसान को बचाना चाहती है या कर्जमाफी के मानदंडों के जंजाल में किसान को ही उलझाना चाहती है?
सत्ताएं आएंगी-जाएंगी।
https://politicsinsightindia.com/bharat-ka-bazaar-kiske-kabze-mein-corporate-varchasv-ghatti-pratispardha
पार्टियां आएंगी-जाएंगी।
नेता बदलेंगे।
नीतियां बदलेंगी।
लेकिन किसान ही नहीं रहेगा, तो इस देश का भविष्य कौन उगाएगा?
याद रखिए—
किसान जिंदा रहेगा तो देश जिंदा रहेगा।
किसान खड़ा रहेगा तो देश खड़ा रहेगा।
और अगर किसान ही खत्म हो गया, तो कल पैसा होते हुए भी थाली में रोटी नहीं मिलेगी!
इसलिए आज जरूरत किसानों में फूट डालने की नहीं, बल्कि सभी मतभेदों को किनारे रखकर किसानों के एकजुट होकर खड़े होने की है।
क्योंकि किसान की असली ताकत उसकी संख्या में नहीं—
उसकी एकजुटता में है!
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