2 अक्टूबर का जंतर-मंतर और Form 6 विवाद: अब ECI से मांगा जा रहा है वोट का पूरा हिसाब, जिनका वोट छूटा, उनकी जिम्मेदारी किसकी?

Form 6 में बदलाव के बाद SIR और मतदाता सूची पर उठे सवालों के बीच जानिए—जिन लोगों का वोट छूटा, उनकी जवाबदेही किसकी होगी? ECI, CEC और 2 अक्टूबर के जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़े पूरे विवाद का तथ्यात्मक विश्लेषण।

2 अक्टूबर का जंतर-मंतर और Form 6 विवाद: अब ECI से मांगा जा रहा है वोट का पूरा हिसाब, जिनका वोट छूटा, उनकी जिम्मेदारी किसकी?

संपादकीय | 1 अक्टूबर 2026

By- Chaudhary Sudhir Talyan

भारतीय लोकतंत्र में मतदाता सूची कोई साधारण सरकारी रजिस्टर नहीं है। यह उस नागरिक का लोकतांत्रिक प्रवेश-पत्र है, जिसके आधार पर वह मतदान केंद्र तक पहुंचता है और अपनी राजनीतिक पसंद दर्ज करता है। इसलिए मतदाता सूची की प्रक्रिया में किया गया कोई भी ऐसा बदलाव, जिससे पात्र नागरिक का नाम जुड़ने, बने रहने या मतदान करने का अवसर प्रभावित हो सकता है, केवल प्रशासनिक विषय नहीं रह जाता।

यही कारण है कि Form 6 और Special Intensive Revision (SIR) को लेकर उठे सवालों को महज राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप कहकर समाप्त नहीं किया जा सकता।

30 सितंबर 2026 को निर्वाचन आयोग ने उन राज्यों में ऑनलाइन Form 6 से अतिरिक्त SIR declaration हटा दिया, जहां SIR पूरा हो चुका है। आयोग की ओर से कहा गया कि गैर-SIR अवधि में Registration of Electors Rules, 1960 के अनुसार निर्धारित statutory Form 6 इस्तेमाल किया जाएगा। जिन राज्यों में SIR जारी है, वहां अतिरिक्त declaration अभी दिखाई दे रहा है। (The Indian Express)

यहीं से सबसे असहज प्रश्न पैदा होता है—

यदि अब वही statutory Form 6 पर्याप्त है, तो पहले अतिरिक्त declaration की आवश्यकता क्यों पैदा हुई थी?

और उससे भी बड़ा प्रश्न—

उस अतिरिक्त प्रक्रिया के कारण यदि किसी पात्र नागरिक का नाम जुड़ने में देरी हुई, आवेदन प्रभावित हुआ या वह मतदान के अधिकार से वंचित रह गया, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?


बदलाव हुआ है—लेकिन विवाद खत्म नहीं हुआ

निर्वाचन आयोग का पक्ष है कि मूल Form 6 में परिवर्तन नहीं किया गया था, बल्कि SIR के दौरान उसके साथ एक अतिरिक्त declaration जोड़ा गया था। आयोग ने यह भी कहा कि SIR के संदर्भ में यह अतिरिक्त declaration उसके 24 जून 2025 के निर्देशों के अनुरूप था। (India Today)

लेकिन विवाद का दूसरा पक्ष भी रिकॉर्ड पर है।

रिपोर्टों के अनुसार, निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस अतिरिक्त requirement को लेकर आपत्तियां उठाई थीं। Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, आपत्ति इस बात पर थी कि Form 6 से जुड़ी ऐसी आवश्यकता को लागू करने के लिए संबंधित वैधानिक प्रक्रिया और अधिकार का प्रश्न पैदा होता है। (The Indian Express)

इस विवाद के बीच आयोग ने 26 सितंबर को ECINET की कानूनी और तकनीकी compliance की समीक्षा के लिए समिति गठित करने की घोषणा की। Reuters ने भी रिपोर्ट किया कि यह समीक्षा voter-roll software में किए गए बदलावों से संबंधित आंतरिक चिंताओं के बाद शुरू हुई। (Reuters)

फिर 30 सितंबर को SIR पूरा कर चुके राज्यों में अतिरिक्त declaration हटा दिया गया।

यही घटनाक्रम जवाबदेही का प्रश्न पैदा करता है।

किसी व्यवस्था को हटाना अपने आप में इस बात का न्यायिक प्रमाण नहीं है कि वह व्यवस्था अवैध थी। लेकिन जब किसी व्यवस्था पर भीतर से आपत्ति उठे, उसके कानूनी आधार पर बहस हो, उसकी समीक्षा के लिए समिति बने और फिर उसे कुछ राज्यों में वापस हटा दिया जाए, तो नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि वास्तव में हुआ क्या था।


सबसे बड़ा सवाल Form 6 नहीं, छूटे हुए मतदाता हैं

राजनीतिक बहस में Form 6 एक तकनीकी मुद्दा बन गया है। लेकिन नागरिक के लिए इसका अर्थ बहुत सीधा है।

नाम जुड़ा या नहीं जुड़ा?

अगर नहीं जुड़ा—

क्यों नहीं जुड़ा?

और यदि नाम नहीं जुड़ा—

क्या उस नागरिक को चुनाव में वोट देने का अवसर मिला?

यहीं लोकतांत्रिक नुकसान का प्रश्न खड़ा होता है।

किसी नागरिक को बाद में मतदाता सूची में जोड़ देना एक सुधार हो सकता है। लेकिन यदि वह किसी चुनाव में मतदान नहीं कर पाया, तो बाद में उसका नाम जोड़ देना उस बीते हुए मतदान अवसर को वापस नहीं ला सकता।

यानी दो अलग-अलग प्रश्न हैं:

मतदाता सूची में नाम की बहाली।

और

खोए हुए मतदान-अधिकार का उपचार।

इन दोनों को एक समझना गंभीर भूल होगी।

निर्वाचन आयोग की अपनी नागरिक सेवा व्यवस्था में Form 6 नए मतदाता के पंजीकरण के लिए निर्धारित है और आयोग की वेबसाइट इसे Registration of Electors Rules, 1960 से जोड़ती है। (Voter Services)

इसलिए अब आयोग को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि “नया Form 6 उपलब्ध है।”

उसे यह भी बताना चाहिए—

पुरानी प्रक्रिया से कितने आवेदन प्रभावित हुए?

कितने आवेदन लंबित रहे?

कितने अस्वीकृत हुए?

कितने आवेदकों ने दोबारा आवेदन किया?

कितनों का नाम बाद में जुड़ा?

और कितने नागरिक उस अवधि में चुनाव होने के कारण मतदान नहीं कर पाए?

जब तक ये आंकड़े सामने नहीं आते, बहस अधूरी रहेगी।


अगर यह बदलाव पहले हो गया होता तो?

यही सबसे कठिन और सबसे जरूरी प्रश्न है।

कल्पना कीजिए कि अतिरिक्त SIR declaration शुरुआत से ही नहीं होता।

या फिर जिसे अब SIR समाप्त राज्यों में हटा दिया गया है, उसे पहले ही हटा दिया गया होता।

तो क्या कुछ राज्यों में अधिक पात्र नागरिक समय पर मतदाता सूची में शामिल हो सकते थे?

यह संभावना सिद्ध नहीं हुई है।

लेकिन इसे जांचे बिना खारिज भी नहीं किया जा सकता।

और यहीं निर्वाचन आयोग की जवाबदेही शुरू होती है।

यदि चुनाव आयोग के पास आवेदन-स्तर का data है, तो वह एक स्वतंत्र counterfactual analysis करा सकता है।

उदाहरण के लिए:

  • कितने लोगों ने Form 6 भरा?

  • कितनों ने अतिरिक्त declaration के चरण पर आवेदन पूरा किया?

  • कितने आवेदन उस चरण के बाद अटके?

  • कितने applicants बाद में electoral roll में शामिल हुए?

  • जिनका नाम नहीं जुड़ा, वे किस constituency में थे?

  • क्या उनका exclusion margin of victory से कम था?

  • क्या किसी constituency में eligible voters की exclusion और चुनाव परिणाम के बीच कोई statistically relevant relationship दिखाई देता है?

यहां सावधानी अत्यंत जरूरी है।

किसी मतदाता के छूट जाने और किसी चुनाव परिणाम के बदल जाने के बीच सीधा संबंध मान लेना वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं होगा।

किसी चुनाव का परिणाम केवल मतदाता संख्या से निर्धारित नहीं होता। मतदान प्रतिशत, उम्मीदवारों का समर्थन, turnout patterns, constituency-level distribution और अन्य अनेक कारक परिणाम को प्रभावित करते हैं।

लेकिन यदि पर्याप्त संख्या में पात्र मतदाता किसी प्रक्रिया के कारण मतदान नहीं कर सके, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि उस exclusion का संभावित electoral effect क्या हो सकता था।

इसलिए आयोग को यह प्रश्न टालने के बजाय data के साथ जवाब देना चाहिए।


क्या ECI बताएगा कि चुनाव परिणामों पर कोई संभावित प्रभाव पड़ा या नहीं?

यह सवाल विशेष रूप से उन राज्यों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है जहां चुनाव पहले ही हो चुके हैं या जहां मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर revision हुआ।

सार्वजनिक बहस को “चुनाव चोरी हुआ” और “कुछ हुआ ही नहीं” के दो अतियों में फंसाने के बजाय तीसरा रास्ता अपनाया जा सकता है:

Data audit.

हर विधानसभा क्षेत्र के लिए यह सार्वजनिक किया जा सकता है:

कुल eligible applications
कुल approved applications
कुल rejected/pending applications
SIR-related objections
appeals
restored names
final additions
final deletions
और election-day electorate

इसके बाद चुनाव परिणामों के साथ इन आंकड़ों का स्वतंत्र statistical analysis किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 के बिहार SIR फैसले में भी इस व्यापक संवैधानिक चिंता को रेखांकित किया था कि चुनावी सूची में eligible citizens का exclusion नहीं होना चाहिए, जबकि electoral roll की integrity भी बनी रहनी चाहिए। (Scientific Research Council)

इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि SIR वैध था या नहीं।

सवाल यह भी है कि वैध प्रक्रिया को लागू करते समय क्या किसी पात्र नागरिक का अधिकार अनजाने में प्रभावित हुआ?

और यदि हुआ, तो उसकी सीमा क्या थी?


बिहार का फैसला इस बहस का अंत नहीं है

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार SIR की वैधानिकता और निर्वाचन आयोग की शक्ति पर विस्तार से विचार किया। कोर्ट ने यह माना कि आयोग electoral rolls की integrity के लिए intensive revision कर सकता है, लेकिन प्रक्रिया constitutional safeguards के अधीन है। (Scientific Research Council)

इसका अर्थ यह नहीं है कि SIR के दौरान लिया गया हर प्रशासनिक निर्णय स्वतः सही घोषित हो गया।

एक व्यापक प्रक्रिया की न्यायिक वैधता और किसी व्यक्ति के मामले में हुई प्रशासनिक गलती अलग-अलग विषय हैं।

इसलिए यदि कोई नागरिक यह कहता है—

“मेरा नाम गलत तरीके से नहीं जुड़ा और मैं मतदान नहीं कर पाया”

तो उसका मामला केवल इस आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता कि “SIR अदालत में वैध ठहराया गया था।”

उसके मामले की वास्तविक प्रक्रिया देखनी होगी।


2 अक्टूबर का जंतर-मंतर: विरोध से बड़ा मुद्दा है नागरिक का सवाल

2 अक्टूबर 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन का आह्वान किया गया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार नागरिक संगठनों और अन्य समूहों ने SIR, मतदाता सूची और निर्वाचन आयोग की जवाबदेही से जुड़े मुद्दों को लेकर प्रदर्शन की घोषणा की है। (The Times of India)

हालांकि 30 सितंबर तक दिल्ली पुलिस की अनुमति लंबित होने की रिपोर्ट थी। इसलिए इसे प्रस्तावित/आहूत प्रदर्शन कहना तथ्यात्मक रूप से अधिक सटीक है। (Hindustan Times)

लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध नागरिक अधिकार का हिस्सा है।

लेकिन इस विरोध की सबसे प्रभावी मांग किसी व्यक्ति के विरुद्ध नारा नहीं, बल्कि रिकॉर्ड और जवाब हो सकती है।

जंतर-मंतर पर असली सवाल यह होना चाहिए:

“जिन लोगों का वोट छूटा, उनका हिसाब कौन देगा?”

और इसके साथ:

कितने नागरिक प्रभावित हुए?

कितने आवेदन Form 6 की अतिरिक्त प्रक्रिया से गुजरे?

कितनों को कठिनाई हुई?

कितनों के नाम चुनाव से पहले नहीं जुड़ सके?

कितनों ने शिकायत की?

कितनों की शिकायत स्वीकार हुई?

कितनों को न्याय नहीं मिला?

यही वे प्रश्न हैं जिनका उत्तर किसी राजनीतिक दल की प्रेस कॉन्फ्रेंस से नहीं, बल्कि निर्वाचन आयोग के verified data से मिलना चाहिए।


CEC से सवाल व्यक्तिगत नहीं, संस्थागत होना चाहिए

बहस को “CEC को हटाओ” बनाम “CEC पर आरोप गलत हैं” तक सीमित कर देना आसान है।

लेकिन उससे नागरिक को क्या मिलेगा?

एक बेहतर सवाल है:

निर्णय की जिम्मेदारी किस स्तर पर तय हुई थी?

यदि Form 6 के साथ अतिरिक्त declaration जोड़ना उचित था, तो उसका पूरा legal basis सार्वजनिक किया जाए।

यदि यह केवल SIR के दौरान आवश्यक था, तो non-SIR states में उसे अब हटाने का कारण स्पष्ट किया जाए।

यदि प्रक्रिया सही थी, तो आंतरिक आपत्तियों का जवाब सार्वजनिक किया जाए।

यदि software implementation में कमी थी, तो जिम्मेदार अधिकारी और corrective action बताया जाए।

यदि कोई गलती नहीं हुई, तो आयोग independent audit से इसे प्रमाणित करे।

विश्वास बयान से नहीं, audit trail से बनता है।


जिनका वोट चला गया, उन्हें सिर्फ “फिर आवेदन करें” कहना पर्याप्त नहीं

यह इस विवाद का सबसे कठोर मानवीय प्रश्न है।

एक नागरिक ने अपनी उम्र पूरी की। वह मतदाता बनने के योग्य था। उसने आवेदन किया। प्रक्रिया में कहीं समस्या आई। नाम समय पर नहीं जुड़ा। चुनाव आया और वह वोट नहीं डाल सका।

चुनाव समाप्त हो गया।

कुछ महीने बाद उसका नाम सूची में आ गया।

क्या समस्या खत्म हो गई?

प्रशासनिक दृष्टि से शायद।

लेकिन नागरिक के दृष्टिकोण से नहीं।

उसने एक वास्तविक संवैधानिक-लोकतांत्रिक अवसर खोया।

इसलिए आयोग को भविष्य के लिए एक Voter Rights Loss Protocol पर विचार करना चाहिए—जिसमें wrongful exclusion की पहचान, expedited restoration, responsible officer की जांच और election-period exclusion का independent assessment शामिल हो।

यह किसी व्यक्ति को चुनाव परिणाम बदलने का अधिकार देने का प्रश्न नहीं है।

यह उस नागरिक के साथ हुए प्रशासनिक नुकसान को स्वीकार करने और उसकी पुनरावृत्ति रोकने का प्रश्न है।


अब ECI के सामने पांच सीधे सवाल

पहला सवाल:
जब Form 6 से संबंधित अतिरिक्त declaration अब SIR समाप्त राज्यों में हटा दिया गया है, तो उसकी आवश्यकता और legal basis की पूरी chronology सार्वजनिक क्यों न की जाए? (The Indian Express)

दूसरा सवाल:
जिन नागरिकों के आवेदन उस व्यवस्था के दौरान प्रभावित हुए, उनकी संख्या कितनी है?

तीसरा सवाल:
जिन्हें समय पर मतदाता सूची में शामिल नहीं किया गया और जिन्होंने चुनाव में मतदान नहीं किया, उनके लिए क्या remedial mechanism है?

चौथा सवाल:
क्या ECI constituency-wise anonymised data जारी करके यह बताएगा कि excluded/late-enrolled voters की संख्या चुनावी margins और turnout के संदर्भ में क्या थी?

पांचवां सवाल:
क्या ECINET और Form 6 के पूरे decision-making तथा software-change trail का स्वतंत्र audit सार्वजनिक किया जाएगा?

इन पांच प्रश्नों के उत्तर किसी राजनीतिक पक्ष की जीत या हार तय नहीं करते।

लेकिन वे मतदाता का विश्वास जरूर मजबूत कर सकते हैं।


निष्कर्ष: Form 6 बदल गया, अब जवाबदेही की बारी है

Form 6 में अतिरिक्त SIR declaration का हटना अपने आप में यह सिद्ध नहीं करता कि पहले की पूरी प्रक्रिया अवैध थी। सुप्रीम कोर्ट का 2026 का बिहार SIR निर्णय भी इस व्यापक प्रक्रिया की वैधानिकता पर महत्वपूर्ण मार्गदर्शन देता है। (Scientific Research Council)

https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra

लेकिन दूसरी तरफ यह कहना भी पर्याप्त नहीं कि बदलाव कर दिया गया, इसलिए विवाद समाप्त।

https://politicsinsightindia.com/eci-vivad-48-ghante-gyanesh-kumar-istifa-sir-voter-list-14-aapattiyan

विवाद अब Form 6 से आगे निकल चुका है।

https://politicsinsightindia.com/mehangai-ka-dosh-kisan-par-kyon

अब सवाल है—

उस प्रक्रिया से कौन प्रभावित हुआ?

https://politicsinsightindia.com/exam-paper-to-nuclear-data-leak-india

किसका नाम समय पर नहीं जुड़ा?

किसने मतदान का अवसर खोया?

https://politicsinsightindia.com/sambhal-nsa-case-supreme-court-shock-to-up-government

किसकी जिम्मेदारी थी?

और यदि किसी प्रक्रिया ने अनजाने में भी मतदाता को लोकतांत्रिक अधिकार से दूर किया, तो उस गलती की जवाबदेही कैसे तय होगी?

https://politicsinsightindia.com/krishi-mein-nivesh-badha-kisan-ki-aay-kahan-badhi

सबसे गंभीर प्रश्न वह hypothetical है जिसे अब data से जांचा जा सकता है:

यदि यह अतिरिक्त प्रावधान शुरू से नहीं होता, अथवा इसे पहले ही हटा दिया जाता, तो क्या कुछ पात्र नागरिक समय पर मतदाता सूची में शामिल हो सकते थे? और यदि हाँ, तो क्या इसका किसी चुनाव के मतदान व्यवहार पर संभावित प्रभाव पड़ सकता था?

https://politicsinsightindia.com/barricade-ke-peeche-satta-janata-ke-sawal

इसका उत्तर राजनीतिक भाषण नहीं दे सकता।

इसके लिए निर्वाचन आयोग को आंकड़े देने होंगे।

https://politicsinsightindia.com/foodgrain-centric-agriculture-to-value-added-agriculture-farmer-value-chain-india

और यदि आयोग के पास ये आंकड़े हैं, तो उन्हें सार्वजनिक करने में संकोच नहीं होना चाहिए।

क्योंकि लोकतंत्र में चुनाव जीतने वाले उम्मीदवार की जीत का सम्मान जरूरी है—लेकिन उससे पहले मतदान करने वाले और मतदान से वंचित रह गए नागरिक, दोनों के अधिकार का सम्मान जरूरी है।

https://politicsinsightindia.com/mp-moong-scam-13-35-lakh-msp-kisan-karz-atmahatya-sarkari-bhrashtachar

2 अक्टूबर का प्रस्तावित विरोध इसी बड़े प्रश्न को सामने रखने का अवसर है:

https://politicsinsightindia.com/ganna-1-quintal-1366-value-farmer-365-frp-70-percent-share

CEC के खिलाफ नारा लगाने से ज्यादा जरूरी है—मतदाता के अधिकार का पूरा हिसाब मांगना।

और उस हिसाब की पहली पंक्ति होनी चाहिए—

https://politicsinsightindia.com/kisan-atmahatya-10546-mauten-karz-mehangai-badhati-lagat-krishi-niti-ki-vifalta

“कितने नागरिक वोट देने के योग्य थे, कितने वोट दे सके, और कितने प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण वोट नहीं दे पाए?”

जब तक इसका स्पष्ट, सत्यापन योग्य और constituency-level जवाब सामने नहीं आता, Form 6 का बदलाव विवाद का अंत नहीं, बल्कि जवाबदेही की शुरुआत है।

https://politicsinsightindia.com/kisan-garib-kyon-hai-khet-mein-mehnat-bazaar-mein-majboori-sarkari-nitiyon-ka-kadwa-sach

Sources

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