8 साल से ‘खेलो इंडिया’ का सपना, अब PM का कबूलनामा—भारत आधे ओलंपिक खेलों में उतरता ही नहीं!
08 साल से ‘खेलो इंडिया’ के दावों के बावजूद भारत आधे ओलंपिक खेलों में हिस्सा नहीं लेता। PM मोदी के बयान से खेल नीति, बजट और जवाबदेही पर बड़े सवाल।
By- Ch. Sudhir Taliyan
करोड़ों के बजट, हजारों सेंटर और बड़े-बड़े दावों के बावजूद सवाल वही—भारत की खेल नीति आखिर पहुंची कहां?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 अगस्त 2026 को Khelo India Dialogue में एक ऐसी बात कही, जिसे सुनकर देश के खेल प्रेमियों को खुश होने से पहले सरकार से एक असहज सवाल पूछना चाहिए।
प्रधानमंत्री ने कहा कि ओलंपिक में जितने अलग-अलग खेल होते हैं, भारत की टीमें उनमें से लगभग आधे खेलों में हिस्सा ही नहीं लेतीं। उन्होंने इसे भारत की एक बड़ी कमजोरी बताते हुए कहा कि दुनिया के दूसरे देश उन खेलों में पदक जीतते हैं, जिनमें भारत भाग तक नहीं लेता। (pib.gov.in)
सवाल यह है कि अगर यह स्थिति इतनी गंभीर है तो पिछले 10-12 वर्षों से सरकार आखिर कर क्या रही थी?
क्योंकि इन वर्षों में देश ने एक के बाद एक नारे सुने—
खेलो इंडिया।
फिट इंडिया।
न्यू इंडिया।
ओलंपिक मिशन।
खेल प्रतिभा खोज।
2036 ओलंपिक की तैयारी।
बजट बढ़े। योजनाएं बनीं। खेल केंद्रों की घोषणाएं हुईं। हजारों करोड़ रुपये खर्च करने के दावे हुए।
और अब 2026 में देश को बताया जा रहा है कि हम ओलंपिक के आधे खेलों में उतरते ही नहीं हैं!
तो फिर सवाल सीधा है—
बारह साल की सरकार और आठ साल का Khelo India आखिर किस समस्या का समाधान कर रहा था?
Khelo India कोई नई कहानी नहीं है
यहां एक तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है।
Khelo India का मौजूदा ढांचा अचानक 2026 में पैदा नहीं हुआ। सरकार के अनुसार इसे 2017 में एक व्यापक राष्ट्रीय खेल कार्यक्रम के रूप में व्यवस्थित किया गया था। इसमें पहले की तीन योजनाओं—Rajiv Gandhi Khel Abhiyan, Urban Sports Infrastructure Scheme और National Sports Talent Search Scheme—को मिलाया गया था। (pib.gov.in)
2018 में सरकार ने साफ कहा था कि Khelo India का उद्देश्य दोहरा है—
Mass participation और sporting excellence.
अर्थात देश में ज्यादा से ज्यादा बच्चे खेलें और उनमें से प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को पहचानकर विश्वस्तरीय खिलाड़ी बनाया जाए। (pib.gov.in)
सरकार की उस समय की योजना केवल खेल प्रतियोगिता आयोजित करने की नहीं थी।
लंबी अवधि के खिलाड़ी विकास कार्यक्रम, अकादमियां, प्रशिक्षण, बुनियादी ढांचा और प्रतिभा पहचान—सब इसकी योजना का हिस्सा थे। (pib.gov.in)
तो 2026 में जब प्रधानमंत्री कहते हैं कि भारत करीब आधे ओलंपिक खेलों में भाग ही नहीं लेता, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—
इतने वर्षों की Khelo India नीति का आउटपुट आखिर क्या रहा?
2014 से 2026: सपनों का विस्तार, सवालों का भी विस्तार
सरकार को खेल नीति पर सवाल पूछना किसी उपलब्धि को नकारना नहीं है।
भारत ने पिछले वर्षों में कुछ खेलों में शानदार प्रदर्शन किया है। नीरज चोपड़ा जैसे खिलाड़ी देश के लिए प्रेरणा बने। शूटिंग, बैडमिंटन, कुश्ती, मुक्केबाजी, हॉकी और एथलेटिक्स में भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है।
लेकिन एक-दो खिलाड़ियों की असाधारण प्रतिभा को पूरे खेल तंत्र की सफलता मान लेना भी सही नहीं होगा।
एक खेल महाशक्ति का मतलब केवल कुछ स्टार खिलाड़ियों का पैदा होना नहीं है।
इसका मतलब है—
सैकड़ों विश्वस्तरीय खिलाड़ी, हजारों राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी और लाखों बच्चों के लिए मजबूत खेल ढांचा।
और सबसे महत्वपूर्ण—
ओलंपिक के अधिक से अधिक खेलों में लगातार भागीदारी।
यही वह कसौटी है जिस पर Khelo India को परखा जाना चाहिए।
2024 में 32 खेल थे, भारत 16 में उतरा
प्रधानमंत्री का बयान हवा में नहीं है।
पेरिस 2024 ओलंपिक में 32 खेल शामिल थे और भारत ने उनमें से 16 खेलों में भाग लिया। यानी खेलों की संख्या के आधार पर लगभग आधे। (business-standard.com)
यही वह आंकड़ा है जिसने प्रधानमंत्री की टिप्पणी को गंभीर बना दिया।
लेकिन असली समस्या संख्या से भी बड़ी है।
ओलंपिक में हर खेल के भीतर अनेक इवेंट होते हैं।
इसका मतलब यह हुआ कि भारत केवल कुछ खेलों में नहीं, बल्कि पदक जीतने के हजारों संभावित रास्तों में से बड़ी संख्या से बाहर रहता है।
दूसरे देश उन अवसरों को पदकों में बदलते हैं।
भारत दर्शक बना रहता है।
लेकिन यह समस्या आज की नहीं है
प्रधानमंत्री ने खुद कहा कि यह स्थिति दशकों से चली आ रही है। (pib.gov.in)
यही वाक्य सरकार के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल पैदा करता है।
अगर समस्या दशकों पुरानी है तो 2014 के बाद खेल नीति में बदलाव का दावा किस स्तर पर सफल हुआ?
अगर Khelo India का लक्ष्य प्रतिभा पहचानना था, तो नई ओलंपिक disciplines में भारत की व्यापक उपस्थिति क्यों नहीं बनी?
अगर जिला स्तर पर खेल प्रतिभा तलाशने का लक्ष्य था, तो देश के हर जिले में विश्वस्तरीय प्रशिक्षण और प्रतियोगिता का वातावरण क्यों नहीं बन पाया?
और अगर सरकार 2036 ओलंपिक की मेजबानी का सपना देख रही है, तो 2026 तक भी हमें यह बताना पड़ रहा है कि भारत आधे खेलों में उतरता ही नहीं, तो पिछले दशक की उपलब्धियों का स्वतंत्र मूल्यांकन कब होगा?
Khelo India पर पैसा लगा, लेकिन क्या सिस्टम बदला?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार जुलाई 2026 तक 349 नए खेल बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट मंजूर किए गए, जिन पर ₹3,176 करोड़ का निवेश बताया गया है।
इसके अलावा 1,067 Khelo India Centres, 267 समर्थित अकादमियां और 2,745 Khelo India Athletes को सहायता दिए जाने की जानकारी सरकार ने दी है। (pib.gov.in)
ये आंकड़े सुनने में प्रभावशाली हैं।
लेकिन खेल नीति का मूल्यांकन इमारतों और सेंटरों की संख्या से नहीं, परिणामों से होना चाहिए।
कितने खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर हासिल किया?
कितने नए खेलों में भारत ने क्वालीफाई किया?
कितने जिलों से ओलंपिक स्तर के खिलाड़ी निकले?
कितने खिलाड़ियों को 8-10 वर्षों तक निरंतर प्रशिक्षण मिला?
कितने खिलाड़ियों को चोट, पोषण, खेल विज्ञान और मानसिक प्रशिक्षण की सुविधा मिली?
इन सवालों के जवाब ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
सरकार फिर कह रही है—अब मिशन मोड में काम करेंगे
विडंबना देखिए।
Khelo India को पहले ही मिशन की तरह प्रस्तुत किया गया था।
अब 2026 में सरकार ने Khelo India Mission के जरिए अगले दशक के लिए फिर एक नया विस्तार प्रस्तुत किया है।
2026-27 के लिए Khelo India को ₹924.35 करोड़ आवंटित किए गए हैं। सरकार के अनुसार 2026-27 से 2030-31 के बीच Khelo India और National Sports Federations के लिए संयुक्त रूप से ₹36,441 करोड़ का परिव्यय रखा गया है। (pib.gov.in)
पैसा निश्चित रूप से जरूरी है।
लेकिन यहां सबसे बड़ा प्रश्न है—
क्या समस्या पैसे की थी या व्यवस्था की?
अगर समस्या पैसे की थी, तो अब तक पैसा क्यों पर्याप्त नहीं था?
और अगर समस्या व्यवस्था की थी, तो केवल बजट बढ़ाने से व्यवस्था कैसे बदलेगी?
भारत के पास समुद्र है, पहाड़ हैं—फिर खिलाड़ी कहां हैं?
प्रधानमंत्री ने स्वयं सर्फिंग और स्पोर्ट क्लाइम्बिंग जैसे खेलों का उदाहरण दिया।
भारत के पास विशाल समुद्री तट है।
भारत के पास हिमालय है।
भारत के पास नदियां, झीलें, पहाड़ और विविध भौगोलिक परिस्थितियां हैं।
फिर भी भारत कई ऐसे खेलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगभग अदृश्य है।
Khelo India का सबसे बड़ा परीक्षण यही होना चाहिए था कि वह भारत की भौगोलिक विविधता को खेल प्रतिभा में बदल पाए।
लेकिन यदि समुद्र वाले जिले में सर्फिंग का ढांचा नहीं, पहाड़ी जिले में क्लाइम्बिंग का प्रशिक्षण नहीं और जलाशयों वाले क्षेत्रों में रोइंग-कैनोइंग का मजबूत नेटवर्क नहीं, तो फिर हम किस प्रकार की खेल क्रांति की बात कर रहे हैं?
बच्चों को अब 5 से 15 साल की उम्र में खोजेंगे—लेकिन इतने साल पहले क्या हुआ?
प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त 2026 को 5 से 15 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए देशव्यापी प्रतिभा खोज की बात रखी थी। इसका उद्देश्य बच्चों की क्षमताओं को वैज्ञानिक तरीके से पहचानकर उन्हें उपयुक्त खेलों की ओर ले जाना है। (business-standard.com)
विचार अच्छा है।
बहुत अच्छा है।
लेकिन फिर एक असहज सवाल भी है—
क्या भारत में पिछले दशक में प्रतिभा खोज नहीं हुई?
2017-18 में Khelo India के घोषित उद्देश्यों में ही प्रतिभा पहचान और उसे उत्कृष्टता की ओर ले जाना शामिल था। (pib.gov.in)
तो 2026 में फिर से शुरुआत करने के बजाय सरकार को यह बताना चाहिए कि पिछले चरण की प्रतिभा खोज से:
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कितने बच्चे मिले?
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कितने खिलाड़ी बने?
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कितने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचे?
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कितने ओलंपिक तक गए?
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कितने बीच में व्यवस्था से बाहर हो गए?
जनता को आंकड़े चाहिए, घोषणाएं नहीं।
खेल मंत्रालय से अब एक ‘परफॉर्मेंस ऑडिट’ मांगना चाहिए
अगर सरकार वास्तव में 2036 का लक्ष्य लेकर चल रही है तो उसे 2014-2026 की खेल नीति का स्वतंत्र सार्वजनिक मूल्यांकन कराना चाहिए।
एक सफेद पत्र जारी होना चाहिए—
उसमें बताया जाए:
1. Khelo India पर कुल कितना पैसा खर्च हुआ?
2. कितने खेल केंद्र बने और उनमें से कितने वास्तव में सक्रिय हैं?
3. कितने खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे?
4. कितने खिलाड़ी सरकारी सहायता से बाहर हो गए?
5. किन खेलों में भारत की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग सुधरी?
6. किन खेलों में कोई प्रगति नहीं हुई?
7. कितनी परियोजनाएं समय पर पूरी हुईं?
8. कितनी परियोजनाएं अभी अधूरी हैं?
9. राज्य सरकारों और केंद्र के बीच जिम्मेदारी क्या रही?
10. अगले चार ओलंपिक के लिए खेल-वार लक्ष्य क्या हैं?
यह पारदर्शिता होगी।
और यही किसी भी लोकतांत्रिक सरकार से अपेक्षित है।
भारत को ‘मेडल टैली’ नहीं, ‘स्पोर्ट्स टैली’ बढ़ानी होगी
भारत की खेल नीति की सबसे बड़ी गलती यह रही है कि हमने खेलों को अक्सर पदक की नजर से देखा।
लेकिन असली सवाल होना चाहिए—
कितने भारतीय बच्चे खेल रहे हैं?
कितने खेलों में भारत अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उतर रहा है?
कितने खिलाड़ियों को वैज्ञानिक प्रशिक्षण मिल रहा है?
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
कितने जिलों में विशेषज्ञ कोच हैं?
कितने खेलों में भारत के पास जूनियर से सीनियर तक पूरी pipeline है?
जब इन सवालों का उत्तर मजबूत होगा, पदक अपने आप बढ़ेंगे।
2036 का सपना अच्छा है, लेकिन 2026 का हिसाब भी चाहिए
भारत 2036 ओलंपिक की मेजबानी की महत्वाकांक्षा रखता है।
यह सपना गलत नहीं है।
बल्कि एक बड़े देश के लिए यह महत्वाकांक्षी लक्ष्य होना चाहिए।
लेकिन दुनिया को केवल शानदार स्टेडियम दिखाना पर्याप्त नहीं होगा।
https://politicsinsightindia.com/mmdr-amendment-bill-2026-farmer-land-acquisition-partnership
भारत को यह भी दिखाना होगा कि—
हम खिलाड़ी पैदा कर सकते हैं।
हम खिलाड़ियों को वर्षों तक तैयार कर सकते हैं।
हम नए खेलों में प्रवेश कर सकते हैं।
हम चयन प्रक्रिया को पारदर्शी रख सकते हैं।
हम प्रतिभा को गांव से ओलंपिक तक पहुंचा सकते हैं।
और सबसे महत्वपूर्ण—
हम ओलंपिक के आधे खेलों से बाहर बैठने वाला देश नहीं रहना चाहते।
अब नारा नहीं, जवाब चाहिए
Khelo India का सपना देश ने स्वीकार किया।
बच्चों ने स्वीकार किया।
खिलाड़ियों ने स्वीकार किया।
माता-पिता ने स्वीकार किया।
लेकिन अब सरकार को भी एक चीज स्वीकार करनी होगी—
सिर्फ योजना का नाम बदलने से खेल व्यवस्था नहीं बदलती।
Khelo India से Khelo India Mission तक का सफर तभी सार्थक होगा जब उसके साथ जवाबदेही का मिशन भी आए।
देश यह नहीं पूछ रहा कि सरकार ने कितने नारे दिए।
देश यह पूछ रहा है—
कितने खिलाड़ी तैयार किए?
देश यह नहीं पूछ रहा कि कितने सेंटर घोषित हुए।
देश पूछ रहा है—
कितने सेंटरों में रोज प्रशिक्षण होता है?
देश यह नहीं पूछ रहा कि बजट कितना बढ़ा।
देश पूछ रहा है—
उस पैसे से कितने सपने सच हुए?
और अब जबकि प्रधानमंत्री खुद स्वीकार कर रहे हैं कि भारत ओलंपिक के लगभग आधे खेलों में भाग ही नहीं लेता, तो यह सरकार के लिए आत्मसंतोष का नहीं, आत्ममंथन का क्षण होना चाहिए। (pib.gov.in)
बारह साल तक यदि देश को खेल महाशक्ति बनने का सपना दिखाया गया है, तो अब जनता को उस सपने का हिसाब भी चाहिए।
https://politicsinsightindia.com/education-cess-ka-hisab-government-schools-badhaal
क्योंकि भारत को केवल यह नहीं सुनना कि—
“हम आधे खेलों में हिस्सा नहीं लेते।”
अब देश यह सुनना चाहता है—
“हमने पिछले बारह वर्षों में क्या किया, क्या नहीं किया, क्यों नहीं किया और अगले दस वर्षों में इसे कैसे बदलेंगे।”
यही असली Khelo India होगा।
और अगर सरकार इसका जवाब आंकड़ों, पारदर्शिता और परिणामों के साथ देती है, तो देश उसके साथ खड़ा होगा।
लेकिन अगर जवाब फिर एक नया नारा, नई योजना और नई घोषणा ही हुआ—
तो सवाल वही रहेगा: आखिर खेलो इंडिया का खेल कब खत्म होगा और असली खेल कब शुरू होगा?
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