“जनता मालिक है या सरकारी व्यवस्था?” दिव्या मित्तल के सवाल ने राजनीति और प्रशासन दोनों को घेरा

दिव्या मित्तल के राजनीति में प्रवेश और व्यवस्था पर उठाए सवालों के बहाने समझिए कि प्रशासन में जवाबदेही, जनता की भूमिका और राजनीति में व्यवस्था सुधार क्यों जरूरी है।

“जनता मालिक है या सरकारी व्यवस्था?” दिव्या मित्तल के सवाल ने राजनीति और प्रशासन दोनों को घेरा

 जब व्यवस्था का हिस्सा ही व्यवस्था पर सवाल उठाए, तो राजनीति का असली काम क्या है?

By- Chaudhary Sudhir Talyan

राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता बदलना नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को बदलना होना चाहिए जिसमें नागरिक अपने ही अधिकारों के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हो।

पूर्व IAS अधिकारी दिव्या मित्तल का राजनीति में आने का ऐलान केवल किसी एक अधिकारी के राजनीतिक सफर की शुरुआत भर नहीं है। इसके भीतर भारतीय प्रशासन और राजनीति के उस पुराने संबंध पर एक बड़ा सवाल छिपा है, जिसे लोकतंत्र ने अभी तक पूरी तरह सुलझाया नहीं है।

मित्तल स्वयं उस प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा रही हैं। उन्होंने सरकार के भीतर रहकर काम किया है, सरकारी योजनाओं को जमीन पर उतरते देखा है, अधिकारियों और नागरिकों के बीच की दूरी को महसूस किया है और प्रशासनिक निर्णयों की ताकत तथा उसकी सीमाओं—दोनों को करीब से देखा है। इसलिए जब उसी व्यवस्था के भीतर काम कर चुकी कोई अधिकारी सार्वजनिक रूप से व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती है, तो उन सवालों को केवल राजनीतिक भाषण मानकर खारिज कर देना पर्याप्त नहीं है।

उनके आरोप और सवाल गंभीर हैं। लेकिन उससे भी अधिक गंभीर वह संरचनात्मक समस्या है जिसकी ओर वे संकेत करते हैं।

सवाल किसी एक अधिकारी का नहीं है।

सवाल यह है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में वास्तविक मालिक कौन है—जनता या वह प्रशासनिक ढांचा जिसे जनता की सेवा के लिए बनाया गया है?

प्रशासन आदेशों का गुलाम नहीं, जनता का सेवक होना चाहिए

भारत का संविधान सत्ता को जनता से प्राप्त वैधता देता है। सरकारें आती-जाती हैं, अधिकारी बदलते हैं, नीतियां बदलती हैं, लेकिन नागरिक की संप्रभुता का सिद्धांत बना रहता है।

फिर प्रशासनिक व्यवहार में अक्सर ऐसा क्यों दिखाई देता है कि नागरिक को अपने ही काम के लिए कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं?

किसी गरीब को जमीन का अधिकार पाने में वर्षों क्यों लगते हैं?

किसी गांव में विद्यालय की आवश्यकता सामने आने के बाद प्रक्रिया वर्षों तक क्यों खिंचती है?

युवा परीक्षा देता है, परिणाम की प्रतीक्षा करता है, विवाद होता है, परीक्षा रद्द होती है और उसका जीवन वर्षों पीछे चला जाता है—इसकी संस्थागत जिम्मेदारी कौन तय करेगा?

किसान सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए दस्तावेजों की भूलभुलैया में क्यों फंसता है?

इन सवालों का उत्तर केवल यह नहीं हो सकता कि “नियम यही है।”

नियम नागरिक की सुविधा के लिए हैं। प्रशासन नागरिक के लिए है। सरकारी कार्यालय नागरिक की सेवा के लिए हैं।

लोकतंत्र में फाइल महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन नागरिक उससे अधिक महत्वपूर्ण है।

यही वह बिंदु है जहां प्रशासनिक संस्कृति की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है।

ऊपर से आदेश और नीचे से जनता—यह दूरी खत्म करनी होगी

भारत में प्रशासनिक व्यवस्था का एक बड़ा संकट यह है कि निर्णय अक्सर ऊपर से नीचे की ओर आते हैं। आदेश जारी होते हैं, निर्देश आते हैं, लक्ष्य तय होते हैं और फिर उन्हें लागू करने की जिम्मेदारी निचले स्तर के अधिकारियों पर डाल दी जाती है।

लेकिन जनता की वास्तविक समस्या अक्सर ऊपर तक पहुंचती ही नहीं।

कागज पर गांव एक “इकाई” हो सकता है, लेकिन जमीन पर गांव के भीतर रहने वाला प्रत्येक परिवार अलग समस्या से जूझता है।

यही कारण है कि केवल शासनादेशों से सुशासन पैदा नहीं होता।

सुशासन तब पैदा होता है जब अधिकारी नागरिक की समस्या को प्रशासनिक बोझ नहीं, सार्वजनिक जिम्मेदारी मानता है।

दिव्या मित्तल के सार्वजनिक बयानों का महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि वे प्रशासन और जनता के बीच इस दूरी पर प्रश्न उठाते हैं।

उनका तर्क यदि लोकतांत्रिक कसौटी पर रखा जाए तो इसका मूल संदेश स्पष्ट है—व्यवस्था का केंद्र कार्यालय नहीं, नागरिक होना चाहिए।

यह बात केवल राजनीति के लिए नहीं, प्रशासन के लिए भी चुनौती है।

लेकिन यहां एक असुविधाजनक सवाल भी है

दिव्या मित्तल स्वयं वर्षों तक IAS अधिकारी रही हैं।

इसलिए उनके सवालों के साथ एक दूसरा सवाल भी खड़ा होता है—

यदि व्यवस्था इतनी गंभीर समस्याओं से घिरी थी, तो व्यवस्था के भीतर रहते हुए उसे बदलने की कोशिश कितनी सफल हुई?

यह सवाल व्यक्तिगत आलोचना नहीं है। यह लोकतांत्रिक जवाबदेही का प्रश्न है।

हर अधिकारी व्यवस्था का हिस्सा होता है। हर मंत्री राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा होता है। हर विधायक विधायी व्यवस्था का हिस्सा होता है। और अंततः हर नागरिक लोकतंत्र का हिस्सा है।

इसलिए व्यवस्था की कमियों पर सवाल उठाने का अधिकार सभी को है, लेकिन सत्ता और प्रशासन के हर स्तर पर जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है।

राजनीति में आने वाला व्यक्ति यदि प्रशासन को बदलने की बात करता है, तो उससे यह पूछना स्वाभाविक है कि वह कौन-से संस्थागत बदलाव करेगा?

सिर्फ भाषण नहीं।

सिर्फ आरोप नहीं।

सिर्फ नाराजगी नहीं।

बल्कि—कौन-सा नियम बदलेगा, कौन-सी प्रक्रिया खत्म होगी, किस अधिकारी की जवाबदेही तय होगी, कितने दिनों में नागरिक का काम होगा और अधिकारी के निर्णय के खिलाफ नागरिक को कितनी स्वतंत्र अपील मिलेगी?

यही वास्तविक राजनीति की परीक्षा होगी।

राजनीति का पहला काम व्यवस्था सुधारना होना चाहिए

भारतीय राजनीति ने विकास, रोजगार, जाति, धर्म, राष्ट्रवाद, कल्याणकारी योजनाओं और आर्थिक विकास जैसे अनेक मुद्दों पर बहस की है।

लेकिन इन सबके नीचे एक बुनियादी प्रश्न है—

क्या नागरिक को राज्य से अपना अधिकार पाने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा या राज्य स्वयं नागरिक के अधिकार को सुनिश्चित करेगा?

यदि किसी गरीब व्यक्ति को सरकारी लाभ पाने के लिए किसी प्रभावशाली व्यक्ति की सिफारिश चाहिए, तो व्यवस्था कमजोर है।

यदि किसी किसान को मुआवजा पाने के लिए महीनों कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, तो व्यवस्था कमजोर है।

यदि किसी विद्यार्थी का भविष्य परीक्षा व्यवस्था की अनिश्चितता में फंस जाता है, तो व्यवस्था कमजोर है।

यदि किसी महिला को न्याय के लिए बार-बार अपनी बात साबित करनी पड़ती है, तो व्यवस्था कमजोर है।

और यदि नागरिक को लगता है कि उसकी आवाज सत्ता के दरवाजे तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देती है, तो लोकतंत्र की संस्थागत विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़ा होता है।

इसलिए राजनीति का पहला लक्ष्य केवल सरकार बनाना नहीं होना चाहिए।

पहला लक्ष्य ऐसी व्यवस्था बनाना होना चाहिए जिसमें नागरिक को अपने अधिकार के लिए सत्ता के सामने गिड़गिड़ाना न पड़े।

जनता को “मालिक” मानने का अर्थ क्या है?

जनता को मालिक कहना केवल भाषण की भाषा नहीं होनी चाहिए।

इसका प्रशासनिक अर्थ होना चाहिए।

मालिक वह है जिसके लिए संस्था अस्तित्व में है।

यदि सड़क जनता के लिए है तो सड़क निर्माण की गुणवत्ता जनता के प्रति जवाबदेह होनी चाहिए।

यदि अस्पताल जनता के लिए है तो स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता का मूल्यांकन केवल सरकारी रिपोर्ट से नहीं, मरीज के अनुभव से भी होना चाहिए।

यदि स्कूल जनता के लिए है तो स्कूल भवन का उद्घाटन सफलता का अंतिम प्रमाण नहीं हो सकता। बच्चों की शिक्षा, शिक्षक की उपलब्धता और सीखने के परिणाम अधिक महत्वपूर्ण होंगे।

यदि किसान के लिए कृषि योजना बनाई गई है तो योजना की सफलता का माप यह नहीं होना चाहिए कि कितनी फाइलें निपटाई गईं। असली प्रश्न होना चाहिए—कितने किसानों की आय, जोखिम और उत्पादन क्षमता पर वास्तविक असर पड़ा?

यही प्रशासनिक सोच का परिवर्तन है।

राजनीति समाज को बना भी सकती है, बिगाड़ भी सकती है

राजनीति को केवल चुनाव तक सीमित करके देखना लोकतंत्र को छोटा कर देना है।

राजनीति कानून बनाती है।

राजनीति बजट की दिशा तय करती है।

राजनीति शिक्षा और स्वास्थ्य की प्राथमिकताएं निर्धारित करती है।

राजनीति कृषि नीति बदलती है।

राजनीति रोजगार की संरचना प्रभावित करती है।

राजनीति प्रशासनिक संस्थाओं के चरित्र को प्रभावित करती है।

और राजनीति यह तय करती है कि राज्य नागरिक को अधिकार देगा या नागरिक को अधिकार मांगने के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ेगा।

इसीलिए राजनीति का प्रभाव चुनाव परिणाम समाप्त होने के साथ समाप्त नहीं होता।

एक खराब नीति वर्षों तक समाज को प्रभावित कर सकती है और एक अच्छी संस्थागत व्यवस्था पीढ़ियों तक नागरिकों का जीवन बदल सकती है।

इसलिए राजनीति में आने वालों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी चुनाव जीतना नहीं, बल्कि सत्ता के उपयोग की दिशा तय करना है।

असली सुधार नारे से नहीं, संस्थागत बदलाव से होगा

व्यवस्था सुधारने की बात करना आसान है।

व्यवस्था सुधारना कठिन है।

यदि कोई राजनीतिक आंदोलन वास्तव में प्रशासन बदलना चाहता है तो उसे कुछ कठोर प्रश्नों का सामना करना होगा।

क्या सरकारी सेवाओं के लिए निश्चित समय सीमा होगी?

क्या अधिकारी के निर्णय का लिखित कारण देना अनिवार्य होगा?

क्या नागरिक को डिजिटल और भौतिक दोनों माध्यमों से शिकायत दर्ज करने का अधिकार होगा?

क्या शिकायत के निस्तारण की स्वतंत्र निगरानी होगी?

क्या गलत रिपोर्ट देने वाले अधिकारी की जवाबदेही तय होगी?

क्या सरकारी योजनाओं की सामाजिक ऑडिट व्यवस्था मजबूत होगी?

क्या स्थानीय संस्थाओं को पर्याप्त वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार मिलेंगे?

क्या नागरिक को सरकारी डेटा तक आसान पहुंच मिलेगी?

क्या राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रशासनिक विवेक के बीच स्पष्ट सीमा निर्धारित होगी?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या सरकार अपने ही प्रशासन की असफलता को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने की संस्कृति विकसित करेगी?

जब तक इन प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते, “व्यवस्था परिवर्तन” केवल राजनीतिक शब्दावली बनकर रह जाएगा।

दिव्या मित्तल के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती

दिव्या मित्तल के लिए राजनीति में प्रवेश के बाद सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि उनके सार्वजनिक सवालों को ठोस राजनीतिक कार्यक्रम में बदला जाए।

IAS अधिकारी के रूप में प्रशासनिक अनुभव एक पृष्ठभूमि दे सकता है, लेकिन राजनीति की परीक्षा अलग है।

राजनीति में केवल प्रशासनिक अनुभव पर्याप्त नहीं होता।

यहां समाज के विभिन्न वर्गों के हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।

किसान की समस्या अलग है, मजदूर की अलग।

व्यापारी की प्राथमिकता अलग है, बेरोजगार युवा की अलग।

महिला की सुरक्षा और अवसर का प्रश्न अलग है, ग्रामीण बुनियादी ढांचे का प्रश्न अलग।

राजनीति को इन सभी प्रश्नों को एक सार्वजनिक नीति में बदलना पड़ता है।

यहीं से किसी भी राजनीतिक पहल की वास्तविक विश्वसनीयता निर्धारित होगी।

अब बहस व्यक्ति पर नहीं, व्यवस्था पर होनी चाहिए

दिव्या मित्तल के राजनीतिक प्रवेश को केवल “एक IAS अधिकारी राजनीति में आई” जैसी खबर बनाकर समाप्त कर देना इस पूरे विमर्श को छोटा कर देगा।

असल सवाल यह है कि उन्होंने जिन प्रशासनिक समस्याओं की ओर संकेत किया है, क्या देश उस पर गंभीर बहस करेगा?

क्या राजनीतिक दल प्रशासनिक जवाबदेही को चुनावी एजेंडे का केंद्रीय विषय बनाएंगे?

क्या नागरिक सेवाओं की समयबद्धता चुनावी घोषणा-पत्रों में आएगी?

क्या अधिकारियों की जवाबदेही पर सार्वजनिक बहस होगी?

क्या सरकारें यह स्वीकार करेंगी कि विकास का वास्तविक पैमाना सरकारी विज्ञापन नहीं, नागरिक का अनुभव है?

यदि यह बहस शुरू होती है तो एक पूर्व IAS अधिकारी का राजनीति में प्रवेश व्यक्तिगत घटना से आगे बढ़कर लोकतांत्रिक प्रशासन पर राष्ट्रीय बहस का विषय बन सकता है।

और यही इस पूरे प्रसंग का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है।

निष्कर्ष: सत्ता का केंद्र कुर्सी नहीं, नागरिक होना चाहिए

भारत में लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसका नागरिक है।

https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra

सरकार नागरिक के लिए है।

प्रशासन नागरिक के लिए है।

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राजनीति नागरिक के लिए है।

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यदि व्यवस्था में नागरिक को अपनी ही सरकार के सामने छोटा महसूस होना पड़े, तो सुधार की आवश्यकता केवल किसी एक विभाग में नहीं, शासन की सोच में है।

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दिव्या मित्तल के आरोप और सवाल इसलिए गंभीर हैं क्योंकि वे उस व्यवस्था के भीतर से आए हैं जिसका वह स्वयं हिस्सा रही हैं। लेकिन इन सवालों की असली कसौटी आरोप नहीं होंगे—समाधान होंगे।

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राजनीति को यदि वास्तव में व्यवस्था परिवर्तन का माध्यम बनना है तो उसे सत्ता प्राप्ति की राजनीति से आगे जाना होगा।

उसे नागरिक को केंद्र में रखना होगा।

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प्रशासन को आदेशों की मशीन नहीं, सार्वजनिक सेवा की संस्था बनाना होगा।

अधिकारी को यह समझना होगा कि उसकी कुर्सी अधिकार का प्रतीक नहीं, जिम्मेदारी का दायित्व है।

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और राजनीतिक नेतृत्व को यह स्वीकार करना होगा कि लोकतंत्र में जनता चुनाव के दिन ही मालिक नहीं होती।

जनता हर दिन मालिक है।

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सरकार और प्रशासन उसके प्रतिनिधि तथा सेवक हैं।

जिस दिन यह भावना सरकारी दफ्तर की कार्यसंस्कृति में उतर जाएगी, उस दिन “व्यवस्था परिवर्तन” नारा नहीं रहेगा।

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वह लोकतंत्र के रोजमर्रा के व्यवहार का हिस्सा बन जाएगा।

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और शायद राजनीति का वास्तविक अर्थ भी यही है—सत्ता पर कब्जा नहीं, सत्ता को नागरिक के प्रति जवाबदेह बनाना।

https://politicsinsightindia.com/kisan-atmahatya-10546-mauten-karz-mehangai-badhati-lagat-krishi-niti-ki-vifalta

Sources

  • Indian Express — दिव्या मित्तल के राजनीति में प्रवेश, स्वतंत्र राजनीतिक मंच और प्रशासनिक अनुभव से जुड़े उनके सवालों पर रिपोर्ट। Indian Express — Divya Mittal political entry
  • The Statesman — स्कूल, भूमि आवंटन, ग्रामीण बुनियादी ढांचे और प्रशासनिक जवाबदेही पर उनके बयान का विस्तृत विवरण। The Statesman — Divya Mittal statement
  • Moneycontrol — उनके 13 वर्ष के IAS करियर, इस्तीफे और राजनीति में आने के कारणों की पृष्ठभूमि। Moneycontrol — Who is Divya Mittal?
  • India Today — स्वतंत्र राजनीति और जनता की आवाज बनने के उनके घोषित उद्देश्य पर रिपोर्ट। India Today — Divya Mittal political entry
  • Aaj Tak — उनके इस्तीफे के बाद लगाए गए राजनीतिक आरोपों पर दिव्या मित्तल की प्रतिक्रिया। Aaj Tak — Divya Mittal response
  • India Today Education — शिक्षा, पेपर लीक और युवाओं के रोजगार से जुड़े उनके राजनीतिक मुद्दों पर रिपोर्ट। India Today — Education, paper leaks and jobs
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