मालदा में 70 मासूम मौतें: बच्चे मरते रहे, सरकार आंकड़ों में उलझी रही!

मालदा मेडिकल कॉलेज में अगस्त में 70 नवजातों और शिशुओं की मौत ने पश्चिम बंगाल की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 60 या 70 के आंकड़े के विवाद से लेकर रेफरल सिस्टम, अस्पताल की व्यवस्थाओं और सरकारी जवाबदेही तक—पूरे मामले की पड़ताल।

मालदा में 70 मासूम मौतें: बच्चे मरते रहे, सरकार आंकड़ों में उलझी रही!

मालदा में 70 मासूम मौतें: अस्पताल की दीवारों से बाहर भी है इस त्रासदी की जिम्मेदारी

By- Ch. Sudhir Taliyan

मालदा मेडिकल कॉलेज में अगस्त के दौरान कम-से-कम 60 और अस्पताल प्रशासन के अनुसार 70 नवजातों तथा एक वर्ष से कम उम्र के शिशुओं की मौत की खबर ने पश्चिम बंगाल की स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है—क्या सरकार के लिए गरीब परिवारों के बच्चों की मौत सिर्फ एक आंकड़ा है?

एक बच्चे की मौत किसी परिवार के लिए दुनिया के खत्म हो जाने जैसा क्षण होती है। लेकिन सरकारी फाइल में वही मौत एक संख्या बन जाती है—एक admission, एक discharge summary, एक death certificate और अंततः एक सांख्यिकीय प्रविष्टि। मालदा की घटनाएं इस सरकारी मानसिकता पर सवाल उठाती हैं।

सबसे परेशान करने वाली बात सिर्फ मौतों की संख्या नहीं है। परेशान करने वाली बात यह है कि 60 और 70 के बीच आंकड़ा क्यों घूम रहा है? अगर अस्पताल का मेडिकल सुपरिंटेंडेंट 70 मौतों की पुष्टि कर रहा है और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के संज्ञान में 60 मौतों का आंकड़ा है, तो जनता को कौन बताएगा कि वास्तविक संख्या क्या है?

यह कोई मामूली प्रशासनिक अंतर नहीं है। जब बात बच्चों की जान की हो, तो हर संख्या के पीछे एक परिवार है।

सवाल सिर्फ मालदा मेडिकल कॉलेज का नहीं है

सरकार की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि बड़ी संख्या में बच्चे दूसरे अस्पतालों और निजी नर्सिंग होम से गंभीर अवस्था में रेफर होकर आए थे। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार 60 मौतों में 44 बच्चे दूसरे स्वास्थ्य संस्थानों से रेफर होकर मालदा मेडिकल कॉलेज पहुंचे थे।

यह तथ्य महत्वपूर्ण है।

लेकिन यही तथ्य सरकार को जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता। बल्कि यह जांच का दायरा और बड़ा करता है।

अगर गंभीर नवजातों को अंतिम अवस्था में जिला अस्पताल भेजा जा रहा था, तो सवाल है कि उन्हें पहले कहां और किस स्तर की चिकित्सा मिली?

क्या रेफरल समय पर हुआ?

क्या बच्चे को रेफर करने से पहले पर्याप्त ऑक्सीजन दी गई?

क्या नवजात को स्थिर किया गया?

क्या प्रशिक्षित neonatal staff उपलब्ध था?

क्या एम्बुलेंस तत्काल मिली?

क्या referring hospital में आवश्यक सुविधा थी?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या सरकार ने वर्षों से जिला और ब्लॉक स्तर की neonatal healthcare व्यवस्था को मजबूत किया है?

अगर इन सवालों का जवाब नहीं है, तो सिर्फ मालदा मेडिकल कॉलेज की ओर उंगली उठाना समस्या को छोटा करके देखने जैसा होगा।

सरकार के लिए “गंभीर हालत” कोई जवाब नहीं है

जब भी किसी सरकारी अस्पताल में मौतों की संख्या बढ़ती है, एक परिचित बचाव सामने आता है—मरीज बहुत गंभीर थे।

निश्चित रूप से गंभीर और premature बच्चे बचाना कठिन होता है। जन्मजात हृदय रोग, respiratory distress, sepsis, कम वजन और अन्य जटिलताएं नवजात मृत्यु के प्रमुख कारण हो सकते हैं।

लेकिन सरकार से सवाल यह है कि क्या हर मौत को “मरीज गंभीर था” कहकर जांच से बाहर कर दिया जाएगा?

चिकित्सा विज्ञान में मृत्यु का कारण और स्वास्थ्य व्यवस्था की जिम्मेदारी दो अलग-अलग चीजें हैं।

एक बच्चा अत्यंत गंभीर हो सकता है और फिर भी उसे समय पर उचित उपचार मिलना चाहिए। अगर उपचार उपलब्ध था, staff पर्याप्त था, equipment काम कर रहे थे और referral समय पर हुआ था, तो रिकॉर्ड यह साबित कर सकते हैं।

लेकिन अगर उपचार में देरी हुई, ICU में जगह नहीं थी, ventilator उपलब्ध नहीं था, staff कम था या referral में घंटों लग गए, तो “बच्चा गंभीर था” पूरी कहानी नहीं है।

सरकार को भावनात्मक बयान नहीं, case-wise evidence देना चाहिए।

70 का आंकड़ा छिपना नहीं चाहिए

इस पूरे प्रकरण में सबसे पहले पारदर्शिता की परीक्षा होनी चाहिए।

सरकार को सार्वजनिक करना चाहिए कि अगस्त में:

  • कुल कितने newborn और infant admissions हुए?
  • कितने बच्चे दूसरे संस्थानों से रेफर होकर आए?
  • कितने बच्चों का जन्म मालदा मेडिकल कॉलेज में हुआ?
  • कितने premature थे?
  • कितने low birth weight थे?
  • कितने cases में sepsis पाया गया?
  • कितने बच्चों को ventilator की आवश्यकता पड़ी?
  • कितनों को ventilator मिला?
  • admission से death तक औसत समय कितना था?
  • प्रत्येक मौत का certified medical cause क्या था?

जब सरकार के पास ये रिकॉर्ड हैं, तो जनता को सिर्फ बयान क्यों मिल रहे हैं?

डेटा छिपाने से संदेह बढ़ता है। डेटा सार्वजनिक करने से संदेह खत्म होता है।

निजी अस्पतालों को जिम्मेदार ठहराना आसान है

सरकारी जांच में निजी अस्पतालों और नर्सिंग होमों की भूमिका भी देखी जा रही है। यह आवश्यक है।

अगर किसी निजी संस्था ने गंभीर नवजात को देर से रेफर किया, गलत treatment दिया या आवश्यक stabilisation नहीं किया, तो उस पर कार्रवाई होनी चाहिए।

लेकिन सरकार को यह भी बताना होगा कि ऐसी संस्थाओं को नियमन कौन करता है?

उनका निरीक्षण कौन करता है?

उनमें neonatal care की न्यूनतम सुविधाओं की जांच कितनी बार हुई?

उनके पास प्रशिक्षित डॉक्टर और nurses हैं या नहीं?

अगर निजी संस्थाएं लगातार गंभीर बच्चों को सरकारी tertiary hospital भेज रही थीं, तो जिला स्वास्थ्य प्रशासन को पहले से इसकी जानकारी क्यों नहीं थी?

नियमन की जिम्मेदारी भी सरकार की है।

सरकारी अस्पताल referral dumping ground क्यों बनें?

मालदा मेडिकल कॉलेज जैसे बड़े सरकारी अस्पताल गरीब और ग्रामीण परिवारों के लिए अंतिम उम्मीद होते हैं।

जब छोटे अस्पताल कठिन मरीज देखकर उन्हें बड़े अस्पताल भेजते हैं, तो tertiary centre पर गंभीर मरीजों का दबाव बढ़ता है।

यह स्वास्थ्य व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा है।

लेकिन अगर पूरा सिस्टम इस तरह काम करे कि छोटे संस्थान जोखिम वाले मरीजों को आखिरी समय पर भेजें और सरकारी मेडिकल कॉलेज को मौत और उपचार दोनों का अंतिम बोझ उठाना पड़े, तो यह referral system नहीं, responsibility transfer system बन जाता है।

मालदा की घटना इसी खतरे की ओर संकेत करती है।

सरकार को district-wise referral audit कराना चाहिए।

किस अस्पताल ने कितने newborn रेफर किए?

कितने बचाए गए?

कितनों की मृत्यु हुई?

किस अस्पताल से असामान्य रूप से अधिक referral हुए?

कितने referral रात में हुए?

कितनों में admission से पहले लंबा transportation delay था?

इन सवालों के जवाब शायद उस तस्वीर को सामने लाएं जो केवल मेडिकल कॉलेज के mortality register से दिखाई नहीं देती।

अस्पताल में गंदगी और rodent infestation पर भी जवाब चाहिए

मीडिया रिपोर्टों में अस्पताल परिसर में rodent infestation की बात सामने आई है।

चूहों की मौजूदगी को सीधे इन बच्चों की मौत का कारण घोषित करना वैज्ञानिक रूप से गलत होगा। लेकिन यह भी उतना ही गलत होगा कि इसे मामूली housekeeping issue मान लिया जाए।

Neonatal care में infection control कोई cosmetic सुविधा नहीं है।

जहां कमजोर immunity वाले नवजातों का इलाज होता है, वहां sanitation, sterilisation, pest control, biomedical waste management और hand hygiene जीवन-मृत्यु का हिस्सा बन जाते हैं।

अगर किसी सरकारी अस्पताल में ऐसी बुनियादी व्यवस्थाओं पर सवाल उठते हैं, तो स्वास्थ्य विभाग को जवाब देना होगा कि inspection reports में क्या दर्ज था और उन कमियों को कब सुधारा गया।

सरकार को सिर्फ जांच आयोग नहीं, जवाब चाहिए

भारत में किसी त्रासदी के बाद जांच का एक परिचित मॉडल है:

घटना होती है।

आक्रोश फैलता है।

सरकार रिपोर्ट मांगती है।

कमेटी बनती है।

अधिकारी बयान देते हैं।

कुछ सप्ताह बाद मामला सुर्खियों से गायब हो जाता है।

परिवारों के पास रह जाती हैं मेडिकल फाइलें और बच्चों की तस्वीरें।

मालदा के मामले में यह नहीं होना चाहिए।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने स्वतः संज्ञान लेकर पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव से रिपोर्ट मांगी है। अब सरकार के पास सामान्य प्रशासनिक बयान देने की गुंजाइश और कम हो गई है।

रिपोर्ट में सिर्फ “बच्चे गंभीर थे” लिख देना पर्याप्त नहीं होना चाहिए।

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हर मृत्यु का medical audit होना चाहिए।

गरीब बच्चे कम महत्वपूर्ण नहीं हैं

इस घटना का सबसे कड़वा सामाजिक पहलू यही है।

अगर किसी बड़े निजी अस्पताल में कुछ दिनों में इतने नवजात मरते, तो सवाल राष्ट्रीय स्तर पर उठते। टीवी स्टूडियो सज जाते। राजनीतिक दल अस्पताल पहुंच जाते। विशेषज्ञ लगातार चर्चा करते।

सरकारी अस्पतालों में गरीब परिवारों के बच्चों की मौतें अक्सर धीरे-धीरे आंकड़ों में बदल जाती हैं।

यह व्यवस्था बदलनी होगी।

गरीब परिवार का बच्चा भी उतनी ही कीमत रखता है जितनी किसी अमीर परिवार का बच्चा।

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स्वास्थ्य का अधिकार कागज पर समान हो सकता है, लेकिन अस्पताल के बिस्तर पर असमानता दिखाई देती है।

अब सरकार को 10 सीधे सवालों का जवाब देना चाहिए

पहला: अगस्त में वास्तविक infant और neonatal deaths की संख्या क्या है—60 या 70?

दूसरा: प्रत्येक मौत का प्रमाणित medical cause क्या है?

तीसरा: 44 referral cases किन अस्पतालों और nursing homes से आए?

चौथा: referral के समय बच्चों की clinical condition क्या थी?

पांचवां: प्रत्येक बच्चे को मालदा मेडिकल कॉलेज पहुंचने में कितना समय लगा?

छठा: अगस्त में NICU/SNCU की bed occupancy कितनी थी?

सातवां: क्या doctors, nurses, ventilators, incubators और oxygen capacity पर्याप्त थी?

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आठवां: infection-control और pest-control की पिछली inspection कब हुई थी?

नौवां: क्या किसी hospital या nursing home ने unsafe या delayed referral किया?

दसवां: जांच पूरी होने के बाद क्या सरकार पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक करेगी?

इनमें से किसी सवाल का जवाब राजनीतिक बयान नहीं हो सकता। इनका जवाब रिकॉर्ड और आंकड़ों से देना होगा।

मौतों की गिनती नहीं, व्यवस्था की जांच होनी चाहिए

मालदा की त्रासदी को केवल “एक अस्पताल में मौतों का मामला” बनाकर बंद कर देना सबसे बड़ी भूल होगी।

यह जांच करनी होगी कि बच्चे अस्पताल तक कैसे पहुंचे, किस हालत में पहुंचे, रास्ते में क्या हुआ, उन्हें पहले कहां इलाज मिला और मालदा मेडिकल कॉलेज में पहुंचने के बाद उन्हें क्या उपचार मिला।

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अगर अस्पताल ने अपनी क्षमता के भीतर सर्वोत्तम इलाज किया और फिर भी गंभीर बीमारी के कारण मौत हुई, तो सरकार को यह तथ्य स्पष्ट रूप से सामने रखना चाहिए।

अगर कहीं लापरवाही हुई है, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

अगर infrastructure की कमी थी, तो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए।

अगर referral system विफल हुआ, तो उसे सुधारा जाना चाहिए।

और अगर सरकारी स्वास्थ्य तंत्र में वर्षों से चली आ रही उपेक्षा इस संकट के पीछे है, तो केवल किसी डॉक्टर या छोटे अधिकारी को बलि का बकरा बनाकर मामला बंद नहीं किया जा सकता।

आखिर में सवाल सरकार से नहीं, व्यवस्था से भी है

एक नवजात की सांस रुकती है तो सिर्फ एक शरीर नहीं रुकता—एक परिवार की उम्मीद रुकती है।

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मालदा में कितनी उम्मीदें टूटीं, इसका सही आंकड़ा अभी भी स्पष्ट नहीं है।

यही सबसे शर्मनाक बात है।

जब सरकार को यह तक स्पष्ट रूप से बताने में कठिनाई हो कि कितने बच्चे मरे, तो जनता उससे यह कैसे उम्मीद करे कि वह बताएगी कि वे क्यों मरे?

अब समय प्रेस बयान का नहीं, खुली जांच का है।

मालदा के परिवारों को सहानुभूति नहीं, सच चाहिए।

उन्हें आश्वासन नहीं, जवाब चाहिए।

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और पश्चिम बंगाल की सरकार को यह समझना होगा कि अस्पताल में मरने वाला बच्चा किसी सरकारी फाइल का नंबर नहीं है।

वह नागरिक है। वह परिवार की दुनिया है। और उसकी मौत पर सरकार की जवाबदेही उतनी ही जरूरी है जितनी किसी भी सार्वजनिक संस्था की।

अगर जांच निष्पक्ष है तो सरकार को डरने की जरूरत नहीं।

पूरे आंकड़े सार्वजनिक कीजिए। हर मौत का audit कीजिए। हर referral की जांच कीजिए। हर कमी की जिम्मेदारी तय कीजिए।

क्योंकि अस्पताल की दीवारें मौतों की आवाज को कुछ समय के लिए रोक सकती हैं—सवालों को नहीं।

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