लोकतंत्र का अपहरण या सत्ता का केंद्रीकरण? मोदी सरकार में नागरिक स्वतंत्रता, संवैधानिक संस्थाओं और जवाबदेही पर गंभीर सवाल

मोदी सरकार के कार्यकाल में लोकतंत्र, नागरिक स्वतंत्रता, संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता, सरकारी पारदर्शिता और जवाबदेही पर उठते गंभीर सवालों का विश्लेषण। क्या सत्ता का बढ़ता केंद्रीकरण भारतीय लोकतंत्र के लिए चुनौती बन रहा है?

लोकतंत्र का अपहरण या सत्ता का केंद्रीकरण? मोदी सरकार में नागरिक स्वतंत्रता, संवैधानिक संस्थाओं और जवाबदेही पर गंभीर सवाल

लोकतंत्र को सत्ता की कैद में डालती मोदी सरकार: जनता ने स्वशासन सौंपा था, अधिनायकवादी व्यवस्था नहीं

By- Chaudhary Sudhir Talyan

लोकतंत्र की मूल अवधारणा नागरिक को अधिकतम स्वतंत्रता, समान अधिकार और स्वशासन का अवसर उपलब्ध कराती है। लोकतंत्र में सत्ता जनता की प्रतिनिधि होती है, मालिक नहीं। सरकार का अस्तित्व नागरिकों के जीवन को सरल, सुरक्षित और सम्मानजनक बनाने के लिए होता है। लेकिन जब शासन की निर्णय प्रक्रिया में केंद्रीकरण बढ़ने लगे, सत्ता कुछ व्यक्तियों और संस्थानों तक सीमित होने लगे तथा नागरिकों की स्वतंत्रता सरकारी नियंत्रण के अधीन होने लगे, तब लोकतंत्र अपने मूल उद्देश्य से भटकने लगता है। ऐसी व्यवस्था में चुनाव तो होते हैं, सरकारें भी बनती हैं, लेकिन नागरिकों का वास्तविक लोकतांत्रिक अधिकार धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है।

2014 में भारतीय जनता पार्टी को जनता ने भारी समर्थन देकर केंद्र की सत्ता सौंपी थी। जनता की अपेक्षा थी कि देश को भ्रष्टाचार, प्रशासनिक जटिलताओं, आर्थिक असमानता और राजनीतिक अव्यवस्था से बाहर निकाला जाएगा। शासन में पारदर्शिता आएगी, सरकारी संस्थाएं मजबूत होंगी, नागरिकों का स्वशासन सम्मानित होगा और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन किया जाएगा। लेकिन पिछले वर्षों में शासन व्यवस्था के भीतर जो संस्थागत बदलाव और विवाद सामने आए हैं, उन्होंने इन अपेक्षाओं पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से NDA सत्ता में पहुंची, उसी प्रक्रिया को संचालित करने वाली संस्थाओं की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। जनता ने सरकार को संविधान के अंतर्गत शासन करने का अधिकार दिया था, संविधान से ऊपर उठकर शासन करने का अधिकार नहीं।

सत्ता का केंद्रीकरण: सरकार और लोकतंत्र के बीच बढ़ती दूरी

लोकतांत्रिक शासन की मजबूती इस बात में है कि निर्णय लेने की शक्ति केवल केंद्र सरकार में सीमित न रहे। संसद, राज्य सरकारें, स्थानीय निकाय, स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाएं और नागरिक समाज शासन व्यवस्था में अपनी स्वतंत्र भूमिका निभाएं।

लेकिन वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में प्रधानमंत्री कार्यालय और केंद्रीय कार्यपालिका के इर्द-गिर्द निर्णय लेने की शक्ति के अत्यधिक केंद्रीकरण को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आई हैं। राज्यों की नीतिगत स्वायत्तता, स्थानीय निकायों की भूमिका और संसद की निगरानी क्षमता पर भी सवाल उठे हैं।

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में दिल्ली में बैठकर प्रत्येक समस्या का समाधान निर्धारित नहीं किया जा सकता। गांव की जरूरत, किसान की समस्या, मजदूर की परिस्थिति और किसी राज्य की आर्थिक प्राथमिकताएं अलग-अलग होती हैं। इनका समाधान स्थानीय भागीदारी और विकेंद्रीकृत शासन से ही संभव है।

सरकार यदि प्रत्येक महत्वपूर्ण निर्णय को केंद्रीय नियंत्रण के अधीन रखना चाहती है, तो वह स्वशासन की भावना को कमजोर करती है। जनता को केवल योजनाओं का लाभार्थी बनाकर उसकी निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी समाप्त करना लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है।

संसद कमजोर, कार्यपालिका शक्तिशाली

संसद का दायित्व सरकार के फैसलों पर सवाल उठाना, कानूनों की जांच करना और जनता के हितों की रक्षा करना है। लेकिन संसद की भूमिका केवल विधेयकों को पारित करने तक सीमित होती दिखाई दे, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता है।

PRS Legislative Research के अनुसार 17वीं लोकसभा में केवल 16 प्रतिशत विधेयक संसदीय समितियों को भेजे गए। 18वीं लोकसभा के मानसून सत्र 2025 तक यह अनुपात 27 प्रतिशत था। इससे कानून निर्माण की विस्तृत संसदीय जांच को लेकर सवाल उठते हैं।

जब महत्वपूर्ण कानूनों पर पर्याप्त बहस नहीं होती, विशेषज्ञों की राय नहीं ली जाती और प्रभावित नागरिक समूहों की चिंताओं को पर्याप्त स्थान नहीं मिलता, तब कानून निर्माण की प्रक्रिया अपनी लोकतांत्रिक गुणवत्ता खोने लगती है। संसद सरकार की नीतियों पर मुहर लगाने वाली संस्था नहीं, बल्कि सरकार को जवाबदेह बनाने वाली सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था है।

सरकार को समझना होगा कि संसदीय बहुमत आलोचना से बचने का लाइसेंस नहीं है। विपक्ष की आवाज को बाधा समझना और संसदीय निगरानी को अनावश्यक मानना लोकतांत्रिक जवाबदेही का अपमान है।

पारदर्शिता का दावा और सूचना के अधिकार पर प्रहार

जिस सरकार ने पारदर्शिता और जवाबदेही के वादे के साथ सत्ता प्राप्त की, उसी के कार्यकाल में सूचना के अधिकार की संस्थागत स्वतंत्रता को लेकर गंभीर विवाद पैदा हुए।

2019 के RTI संशोधन ने सूचना आयुक्तों के कार्यकाल और सेवा शर्तों के निर्धारण में केंद्र सरकार की भूमिका बढ़ाई। 2023 के डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून ने RTI अधिनियम में व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित प्रावधानों को भी बदला।

सूचना का अधिकार नागरिकों का वह हथियार है जिसके माध्यम से वह सरकारी खर्च, प्रशासनिक निर्णयों और सार्वजनिक योजनाओं की वास्तविकता जान सकता है। यदि सूचना देने वाली संस्था की स्वतंत्रता कमजोर हो और जानकारी रोकने के कानूनी आधार व्यापक होते जाएं, तो पारदर्शिता का पूरा ढांचा प्रभावित होता है।

सरकार से सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है, सरकार की कृपा नहीं। जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसका पैसा कहां खर्च हुआ, सरकारी योजनाएं किसके हित में बनीं और प्रशासनिक विफलताओं के लिए कौन जिम्मेदार है।

राजनीतिक वित्तपोषण में अपारदर्शिता: इलेक्टोरल बॉन्ड का उदाहरण

इलेक्टोरल बॉन्ड योजना ने राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े किए। वर्षों तक राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे के दानदाताओं की पहचान आम जनता से गोपनीय रही।

फरवरी 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस योजना को असंवैधानिक घोषित कर दिया। न्यायालय ने राजनीतिक वित्तपोषण की जानकारी नागरिकों के सूचना के अधिकार से जुड़ी मानी।

यह फैसला केवल एक योजना की संवैधानिक वैधता का मामला नहीं था। यह उस बुनियादी सिद्धांत की पुष्टि थी कि लोकतंत्र में राजनीतिक सत्ता को आर्थिक हितों से मिलने वाले समर्थन की जानकारी जनता से छिपाई नहीं जा सकती।

जिस व्यवस्था में राजनीतिक दलों को मिलने वाले धन का स्रोत नागरिकों से छिपा रहे, वहां राजनीतिक निर्णयों की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सत्ता को यह समझना चाहिए कि लोकतंत्र में आर्थिक प्रभाव भी जवाबदेही के दायरे में आता है।

संवैधानिक संस्थाएं: स्वतंत्रता या कार्यपालिका का प्रभाव?

निर्वाचन आयोग, CAG, सूचना आयोग और जांच एजेंसियां लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। इनका अस्तित्व सरकार की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि सत्ता पर निगरानी रखने के लिए है।

2023 के निर्वाचन आयुक्त नियुक्ति कानून ने चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को हटाकर प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल किया। इससे चयन प्रक्रिया में केंद्र सरकार के प्रभाव को लेकर सवाल उठे।

इसी प्रकार ED और CBI की कार्रवाई को लेकर विपक्षी दलों ने राजनीतिक प्रतिशोध के आरोप लगाए हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और मामलेवार मूल्यांकन आवश्यक है। लेकिन किसी भी जांच एजेंसी की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठना अपने आप में संस्थागत विश्वसनीयता के लिए चिंता का विषय है।

संवैधानिक संस्थाओं का वास्तविक सम्मान उनके पदाधिकारियों की नियुक्ति से अधिक उनकी स्वतंत्र कार्यप्रणाली में दिखाई देना चाहिए। यदि संस्थाएं सत्ता की आलोचना करने के बजाय सत्ता की राजनीतिक प्राथमिकताओं के अनुरूप काम करती दिखाई दें, तो लोकतांत्रिक संतुलन कमजोर होता है।

नागरिक स्वतंत्रता पर कानूनों का बढ़ता दबाव

लोकतंत्र में नागरिकों को अभिव्यक्ति, संगठन, शांतिपूर्ण प्रदर्शन और सरकार की आलोचना करने का अधिकार है। लेकिन UAPA, डिजिटल निगरानी, इंटरनेट प्रतिबंधों और नए आपराधिक कानूनों के इस्तेमाल को लेकर नागरिक स्वतंत्रता पर गंभीर बहस सामने आई है।

Human Rights Watch ने अपनी 2025 की भारत संबंधी रिपोर्ट में नए आपराधिक कानूनों के तहत बढ़ी पुलिस शक्तियों और अभिव्यक्ति, संगठन तथा निष्पक्ष सुनवाई के अधिकारों पर संभावित प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की।

Freedom House की 2026 की रिपोर्ट में भारत को राजनीतिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं के आकलन में 62/100 अंक के साथ Partly Free श्रेणी में रखा गया। यह एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय संस्था का आकलन है, न कि भारत की संवैधानिक स्थिति का कानूनी निर्धारण। फिर भी इसकी चिंताओं को गंभीरता से जांचना आवश्यक है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर नागरिक स्वतंत्रता को अनिश्चितकाल तक सीमित नहीं किया जा सकता। सरकार की आलोचना देशद्रोह नहीं है। किसान का आंदोलन राष्ट्रविरोध नहीं है। पत्रकार का सवाल व्यवस्था के खिलाफ षड्यंत्र नहीं है। लोकतंत्र में असहमति कोई अपराध नहीं, बल्कि सत्ता को जवाबदेह रखने का आवश्यक माध्यम है।

जनता को लाभार्थी नहीं, शासन का भागीदार बनाइए

लोकतंत्र की सबसे बड़ी विफलता तब होती है जब नागरिक अपने ही देश की नीतियों के निर्माण में अप्रासंगिक बना दिया जाता है। सरकार योजनाएं बनाती है, घोषणाएं करती है और प्रचार करती है, लेकिन जिन लोगों के जीवन पर उन नीतियों का प्रभाव पड़ता है, उनकी भागीदारी कितनी है?

किसान की खेती से संबंधित कानून बनें और किसान की राय पर्याप्त महत्व न पाए। मजदूरों के श्रम से जुड़े कानून बनें और मजदूर की आवाज सीमित रहे। शिक्षा व्यवस्था में बदलाव हो और विद्यार्थियों तथा शिक्षकों की भागीदारी नगण्य हो। भूमि अधिग्रहण हो और जमीन के मालिक को ही निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखा जाए। यह शासन की ऐसी शैली है जिसमें नागरिक लोकतंत्र का सक्रिय भागीदार नहीं, सरकारी निर्णयों का निष्क्रिय प्राप्तकर्ता बन जाता है।

जनता को केवल चुनाव के समय याद करना और पांच वर्षों तक उसे नीतिगत निर्णयों से दूर रखना लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का अधूरा अर्थ है।

लोकतंत्र को बचाने की जिम्मेदारी सरकार की भी है

https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra

NDA सरकार को यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और बहुमत प्राप्त करने का नाम नहीं है। लोकतंत्र की असली परीक्षा सत्ता में बैठे लोगों के व्यवहार से होती है। मजबूत सरकार वह नहीं होती जो हर सवाल को दबा दे, बल्कि वह होती है जो सबसे कठिन सवालों का भी जवाब दे सके।

https://politicsinsightindia.com/sambhal-nsa-case-supreme-court-shock-to-up-government

सरकार को संसदीय निगरानी मजबूत करनी चाहिए, सूचना आयोगों को स्वतंत्र बनाना चाहिए, निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता सुनिश्चित करनी चाहिए, जांच एजेंसियों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रखना चाहिए और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए।

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भारत की जनता ने भाजपा को शासन सौंपा था, नागरिक स्वतंत्रता का नियंत्रण नहीं। उसने विकास की अपेक्षा की थी, लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोरी की नहीं। उसने सुशासन मांगा था, ऐसी व्यवस्था नहीं जिसमें सरकार से सवाल पूछना ही जोखिमपूर्ण अनुभव बनने लगे।

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लोकतंत्र में सत्ता जनता से निकलती है, इसलिए सत्ता का प्रत्येक निर्णय जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।

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सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था ने NDA को सत्ता तक पहुंचाया, उसी व्यवस्था के संस्थागत आधारों को लेकर आज गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सरकार को याद रखना चाहिए कि चुनावी बहुमत अस्थायी होता है, लेकिन संविधान स्थायी लोकतांत्रिक मर्यादाओं का आधार है।

https://politicsinsightindia.com/amit-shah-opposition-intimidation-democracy-political-strategy

जनता सरकार चुनती है, सरकार जनता की स्वतंत्रता नहीं चुन सकती। लोकतंत्र में नागरिक सर्वोपरि है, सत्ता नहीं।

https://politicsinsightindia.com/raj-thackeray-modi-adani-documentary-police-pressure-freedom-of-speech

References / Sources

लेख के लिए प्रमुख कानूनी, संवैधानिक और शोध संबंधी संदर्भ:

  1. भारतीय संविधान — अनुच्छेद 14, 19, 21, 32, 148 और 324।

  2. Right to Information Amendment Act, 2019 — सूचना आयोगों की स्वतंत्रता और सेवा शर्तें।

  3. Digital Personal Data Protection Act, 2023 — निजता और सूचना के अधिकार के बीच संतुलन। (Press Information Bureau)

  4. Supreme Court – Electoral Bonds Judgment, 15 February 2024 — राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता और नागरिकों के सूचना के अधिकार पर ऐतिहासिक फैसला। (Indian Kanoon)

  5. Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023 — निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया।

  6. PRS Legislative Research — संसद की कार्यप्रणाली और संसदीय समितियों की भूमिका। (PRS Legislative Research)

  7. Freedom House – Freedom in the World 2026: India — नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक अधिकारों का मूल्यांकन।

  8. Human Rights Watch – World Report 2025: India — मानवाधिकार और नागरिक स्वतंत्रता।

  9. National Crime Records Bureau (NCRB) — UAPA और आपराधिक मामलों के आंकड़े।

  10. Comptroller and Auditor General of India (CAG) — सरकारी खर्च और वित्तीय जवाबदेही।

  11. Supreme Court – Anoop Baranwal v. Union of India (2023) — निर्वाचन आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया।

  12. Supreme Court – Justice K.S. Puttaswamy v. Union of India (2017) — निजता का मौलिक अधिकार।

महत्वपूर्ण ऑनलाइन स्रोत

संपादकीय सावधानी: DPDP Act और RTI संशोधन को लेकर फरवरी 2026 में सर्वोच्च न्यायालय में संवैधानिक चुनौती स्वीकार की गई थी। इसे अंतिम न्यायिक फैसला नहीं, लंबित कानूनी विवाद के रूप में समझे। (indianexpress.com)

यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों एवं उपलब्ध सार्वजनिक दस्तावेजों, कानूनी प्रावधानों और स्वतंत्र शोध रिपोर्टों पर आधारित संपादकीय विश्लेषण है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति या संस्था की छवि धूमिल करना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही, नागरिक स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों पर सार्वजनिक विमर्श को प्रोत्साहित करना है।

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