जिस सत्ता की नीतियों ने किसान को कर्जदार बनाया, अब उसी के विधायक किसान के अंतिम संस्कार का बहिष्कार करने की बात कर रहे हैं! इतना अहंकार

किसान आत्महत्या पर शिवसेना विधायक संजय गायकवाड़ के विवादित बयान ने सत्ता के अहंकार और कृषि नीतियों की विफलता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जिस व्यवस्था ने किसानों को कर्ज, आर्थिक संकट और असुरक्षा में धकेला, उसी के जनप्रतिनिधि अब किसान के अंतिम संस्कार के बहिष्कार की बात कर रहे हैं। जानिए किसान आत्महत्या के आंकड़े, कृषि संकट और सरकार की जवाबदेही का पूरा विश्लेषण।

जिस सत्ता की नीतियों ने किसान को कर्जदार बनाया, अब उसी के विधायक किसान के अंतिम संस्कार का बहिष्कार करने की बात कर रहे हैं! इतना अहंकार

सत्ता का अहंकार या किसान का अपमान? 

By- Chaudhary Sudhir Talyan

सत्ता में जाते ही इतना घमंड कहां से आ जाता है कि जनप्रतिनिधि उस किसान के सामाजिक बहिष्कार की बात करने लगते हैं, जिसकी मेहनत से देश का पेट भरता है? जिस कृषि व्यवस्था की नीतिगत विफलताओं ने लाखों परिवारों को आर्थिक असुरक्षा, कर्ज और अनिश्चितता के बीच खड़ा कर दिया, उसी व्यवस्था के प्रतिनिधि अब आत्महत्या करने वाले किसानों के अंतिम संस्कार का बहिष्कार करने की सलाह दे रहे हैं। यह केवल एक विधायक का विवादित बयान नहीं, बल्कि सत्ता के भीतर जवाबदेही और संवेदनशीलता के संकट पर गंभीर सवाल है।

महाराष्ट्र के बुलढाणा से शिवसेना विधायक संजय गायकवाड़ का बयान भारतीय राजनीति में जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी को लेकर एक असहज सवाल खड़ा करता है। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि आत्महत्या करने वाले किसानों के अंतिम संस्कार में लोगों को शामिल नहीं होना चाहिए। यहां तक कि उन्होंने ऐसी अमानवीय स्थिति का उल्लेख किया जिसमें मृतक के शरीर को जानवरों के खाने के लिए छोड़ दिया जाए, ताकि दूसरे लोग आत्महत्या करने से डरें।

आखिर सत्ता के भीतर इतना दुस्साहस कहां से आता है? एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि को यह अधिकार किसने दिया कि वह पहले से आर्थिक, सामाजिक और मानसिक संकट झेल रहे किसान के परिवार को मृत्यु के बाद भी अपमानित करने की सलाह दे?

किसान आत्महत्या कोई तमाशा नहीं है। यह किसी परिवार के भीतर घटित हुई ऐसी त्रासदी है, जिसके पीछे कर्ज, फसल की बर्बादी, बाजार की अनिश्चितता, आर्थिक असुरक्षा और अनेक सामाजिक परिस्थितियां हो सकती हैं। ऐसे समय में एक विधायक से अपेक्षा होती है कि वह पीड़ित परिवार के साथ खड़ा हो, सरकार से जवाब मांगे और समाधान प्रस्तुत करे। लेकिन यहां समाधान के नाम पर सामाजिक बहिष्कार की बात सामने आई।

यह कैसी राजनीति है, जिसमें किसान की मौत के बाद भी उसकी गरिमा सुरक्षित नहीं रह जाती?

सत्ता की कुर्सी पर बैठते ही किसान से जवाब मांगने लगे जनप्रतिनिधि!

विधायक का तर्क था कि किसानों को आत्महत्या करने के बजाय अपनी समस्याएं सरकार, विधायक या सांसद के सामने रखनी चाहिए। यह बात सुनने में अच्छी लग सकती है, लेकिन असली सवाल यह है कि किसान अपनी समस्याएं लेकर आखिर किसके पास जाए?

क्या किसान सरकार के दरवाजे पर नहीं जाता? क्या वह अपनी फसल का उचित मूल्य मांगते हुए मंडियों में संघर्ष नहीं करता? क्या वह कर्ज से राहत, सिंचाई, बिजली, खाद, बीज और फसल बीमा के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाता?

किसान की समस्या यह नहीं है कि उसके पास जनप्रतिनिधियों के नाम और पते नहीं हैं। समस्या यह है कि उसकी आर्थिक स्थिति और सरकारी सहायता के बीच एक ऐसा अंतर मौजूद है, जिसे केवल भाषणों से समाप्त नहीं किया जा सकता।

जब किसान अपनी फसल उत्पादन लागत से कम कीमत पर बेचने को मजबूर होता है, जब प्राकृतिक आपदा उसकी पूरी पूंजी नष्ट कर देती है, जब फसल बीमा का भुगतान समय पर नहीं मिलता और जब कर्ज चुकाने की क्षमता समाप्त होने लगती है, तब उसे केवल विधायक को पत्र लिखने की सलाह देना वास्तविक समाधान नहीं है।

जनप्रतिनिधि का काम किसान को उपदेश देना नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियों को रोकना है जिनमें किसान अपनी जिंदगी को असहनीय संकट में घिरा हुआ महसूस करे।

54 महीनों में 13,128 किसान आत्महत्याएं: क्या सत्ता इस आंकड़े से जवाब मांगेगी?

महाराष्ट्र सरकार के राहत एवं पुनर्वास विभाग से RTI के माध्यम से प्राप्त आंकड़ों पर आधारित हिंदुस्तान टाइम्स की 27 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2022 से जून 2026 के बीच महाराष्ट्र में 13,128 किसानों ने आत्महत्या की।

यह 54 महीनों में प्रतिदिन आठ से अधिक मौतों का औसत है।

इन आंकड़ों में एक और गंभीर तथ्य सामने आया।

  • 8,145 परिवार सरकारी सहायता के पात्र पाए गए।
  • 4,042 परिवारों को सहायता के लिए अयोग्य घोषित किया गया।
  • 941 मामले जांच के अधीन थे।
  • पात्र 8,145 परिवारों में से 7,850 को सहायता मिली थी।
  • 295 पात्र परिवार भुगतान की प्रतीक्षा कर रहे थे।

सरकारी सहायता की निर्धारित राशि ₹1 लाख बताई गई है।

अब सवाल यह है कि जिन परिवारों ने अपना कमाने वाला सदस्य खो दिया, उनके सामने खड़ी आर्थिक चुनौतियों का समाधान क्या केवल एक लाख रुपये है?

और जिन 4,042 परिवारों को सहायता के लिए अयोग्य घोषित किया गया, उनकी परिस्थितियों की स्वतंत्र समीक्षा कौन करेगा?

इन आंकड़ों को देखकर सरकार से जवाब मांगना आवश्यक है। आखिर इतनी बड़ी संख्या में किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? क्या यह केवल व्यक्तिगत परिस्थितियों का परिणाम है या कृषि अर्थव्यवस्था में मौजूद गंभीर समस्याओं का भी संकेत है?

स्रोत: हिंदुस्तान टाइम्स, 27 अक्टूबर 2026, RTI आधारित रिपोर्ट।

जिस कृषि व्यवस्था ने किसान को कर्जदार बनाया, उसकी जवाबदेही कौन लेगा?

कृषि अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि किसान उत्पादन करता है, जोखिम उठाता है, पूंजी लगाता है और प्राकृतिक आपदाओं का सामना करता है, लेकिन अपनी उपज की कीमत निर्धारित करने की प्रक्रिया पर उसका नियंत्रण सीमित रहता है।

डीजल, खाद, बीज, कीटनाशक, मजदूरी और मशीनरी की लागत बढ़ती है। दूसरी ओर, बाजार में फसल की कीमत गिरने पर किसान के पास अपनी उपज को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के पर्याप्त साधन नहीं होते।

न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करना और किसानों को वास्तव में उस मूल्य पर खरीद की गारंटी देना दो अलग-अलग बातें हैं।

देश में MSP की घोषणा होती है, लेकिन सभी फसलों और सभी किसानों की पूरी उपज की सरकारी खरीद नहीं होती। परिणामस्वरूप अनेक किसानों को घोषित समर्थन मूल्य से कम कीमत पर भी अपनी उपज बेचनी पड़ सकती है।

स्वामीनाथन आयोग ने कृषि लागत C2 पर 50 प्रतिशत लाभ जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करने की सिफारिश की थी। लेकिन इस सिद्धांत के अनुरूप व्यापक कानूनी और प्रभावी मूल्य सुरक्षा का प्रश्न आज भी कृषि नीति की प्रमुख बहसों में शामिल है।

कर्ज का दबाव, बाजार की अनिश्चितता और उत्पादन लागत का संकट एक-दूसरे से जुड़कर किसान की आर्थिक स्थिति को कमजोर कर सकते हैं।

ऐसी व्यवस्था में किसान की आत्महत्या पर उसके परिवार को दोषी ठहराना या सामाजिक बहिष्कार की सलाह देना समस्या के वास्तविक स्वरूप से मुंह मोड़ना है।

सरकार को यह बताना चाहिए कि किसान को उसकी मेहनत का लाभकारी मूल्य दिलाने, कर्ज के संकट को कम करने और फसल नुकसान की भरपाई करने के लिए कितनी प्रभावी व्यवस्था बनाई गई है।

सत्ता का अहंकार जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकता

लोकतंत्र में विधायक कोई सामंत नहीं होता। उसे जनता ने शासन करने के लिए नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेह रहने के लिए चुना है।

विधायक का पद उसे विशेषाधिकार दे सकता है, लेकिन किसी नागरिक की गरिमा को ठेस पहुंचाने का अधिकार नहीं।

सत्ता में बैठे लोगों को यह समझना होगा कि किसान उनके राजनीतिक भाषणों का विषय मात्र नहीं है। किसान देश की खाद्य व्यवस्था, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और करोड़ों परिवारों की आजीविका का आधार है।

जब किसान आंदोलन करता है तो उसे समझाने के बजाय उसकी मांगों पर विचार होना चाहिए। जब वह कर्ज से परेशान होता है तो उसे नैतिकता का पाठ पढ़ाने के बजाय आर्थिक सुरक्षा मिलनी चाहिए। जब उसकी फसल बर्बाद होती है तो उसे राहत और मुआवजा मिलना चाहिए।

और जब किसी किसान की आत्महत्या हो जाती है, तब उसके परिवार को सामाजिक बहिष्कार नहीं, बल्कि संवेदना, सम्मान और आर्थिक संरक्षण चाहिए।

किसान की मृत्यु को दूसरों के लिए डर का उदाहरण बनाने की सोच आत्महत्या की रोकथाम के आधुनिक सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण से भी मेल नहीं खाती। अपमान और कलंक से प्रभावित परिवारों की स्थिति और कठिन हो सकती है।

माफी से आगे बढ़कर राजनीतिक जवाबदेही तय होनी चाहिए

विवाद बढ़ने के बाद संजय गायकवाड़ ने 30 अक्टूबर को अपने बयान पर खेद जताया। उन्होंने दावा किया कि उनके शब्दों को गलत संदर्भ में प्रस्तुत किया गया और उनका उद्देश्य किसानों की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था। उन्होंने माफी भी मांगी।

लेकिन यहां प्रश्न केवल माफी का नहीं है।

सार्वजनिक जीवन में शब्दों की जिम्मेदारी होती है। विशेषकर तब, जब कोई व्यक्ति लाखों नागरिकों का प्रतिनिधित्व कर रहा हो और विषय किसान आत्महत्या जैसा संवेदनशील हो।

शिवसेना नेतृत्व की नाराजगी और विधायक के संभावित निलंबन पर विचार किए जाने की खबरें भी सामने आईं। लेकिन राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी केवल विवाद पैदा होने के बाद नुकसान नियंत्रित करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए।

उन्हें अपने जनप्रतिनिधियों के व्यवहार, सार्वजनिक वक्तव्यों और किसानों के प्रति जवाबदेही के स्पष्ट मानक स्थापित करने चाहिए।

स्रोत: द स्टेट्समैन, 30 अक्टूबर 2026; हिंदुस्तान टाइम्स, 31 अक्टूबर 2026।

किसान को डराने की नहीं, कृषि व्यवस्था बदलने की जरूरत है

यदि सरकार वास्तव में किसान आत्महत्या रोकना चाहती है तो उसे कुछ बुनियादी प्रश्नों का जवाब देना होगा।

  1. किसानों को C2+50% के आधार पर लाभकारी मूल्य की प्रभावी गारंटी कब मिलेगी?
  2. कृषि ऋण के संकट से स्थायी राहत के लिए राष्ट्रीय नीति कब बनेगी?
  3. फसल बीमा में नुकसान के आकलन और भुगतान की देरी कब समाप्त होगी?
  4. किसान आत्महत्या प्रभावित परिवारों को एकमुश्त मुआवजे के अतिरिक्त दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा कब मिलेगी?
  5. कृषि मजदूरों के लिए सामाजिक सुरक्षा और आय संरक्षण की व्यवस्था कब लागू होगी?
  6. खेती की बढ़ती लागत और किसानों की वास्तविक आमदनी के बीच अंतर कम करने के लिए सरकार क्या करेगी?
  7. कृषि नीतियों की विफलताओं का स्वतंत्र मूल्यांकन कौन करेगा?

इन सवालों का जवाब किसी विधायक की प्रेस कॉन्फ्रेंस से नहीं, बल्कि ठोस नीतियों, बजट, कानूनी सुरक्षा और परिणामों से मिलना चाहिए।

अंतिम सवाल: किसान सत्ता के लिए है या सत्ता किसान के लिए?

लोकतंत्र में सत्ता जनता की सेवा करने का दायित्व है, जनता पर अहसान जताने का अधिकार नहीं।

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जिस किसान की मेहनत से अनाज पैदा होता है, उसी किसान को आर्थिक संकट में अकेला छोड़ देना और उसकी मृत्यु के बाद उसके अंतिम संस्कार का बहिष्कार करने की बात करना राजनीतिक जवाबदेही की बुनियादी भावना के विपरीत है।

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सत्ता में बैठे लोगों को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि चुनाव जीत लेने के बाद जनता के प्रति उनकी जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है। विधायक की कुर्सी स्थायी नहीं होती, लेकिन सार्वजनिक पद पर रहते हुए दिए गए बयानों और लिए गए फैसलों की जवाबदेही लोकतंत्र में हमेशा बनी रहती है।

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किसान को आत्महत्या से रोकने के लिए उसके अंतिम संस्कार का बहिष्कार करने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता उस आर्थिक और नीतिगत संकट को समाप्त करने की है, जिसमें किसान अपनी आजीविका, जमीन, पूंजी और भविष्य को असुरक्षित महसूस करता है।

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जिस सत्ता की नीतियों पर किसान की आर्थिक बदहाली को लेकर सवाल उठ रहे हों, उसके प्रतिनिधियों को किसान से जवाब मांगने के बजाय पहले अपनी नीतियों का हिसाब देना चाहिए। किसान का बहिष्कार करने की बात करने वालों को समझना होगा कि लोकतंत्र में असली जवाबदेही किसान की नहीं, सत्ता की होती है।

https://politicsinsightindia.com/wealth-concentration-economic-inequality-economic-war-india

किसान की मौत पर अपमान नहीं, व्यवस्था से जवाब मांगा जाना चाहिए। किसान को उपदेश नहीं, आर्थिक न्याय चाहिए। और सत्ता को अहंकार नहीं, जवाबदेही सीखनी होगी।

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