“ज्ञानेश कुमार के शोर में कौन से सवाल दब गए? क्या जनता को असली मुद्दों से भटकाने का खेल चल रहा है?
ECI विवाद के बीच बड़ा सवाल—क्या ज्ञानेश कुमार के मुद्दे के शोर में शिक्षा, महंगाई, आर्थिक संकट, किसान और खाद्य सुरक्षा जैसे असली जनमुद्दे जानबूझकर पीछे धकेले जा रहे हैं? यह संपादकीय लोकतंत्र, निष्पक्ष जांच और राजनीतिक विमर्श की दिशा पर गंभीर सवाल उठाता है।
जनता के मुद्दे गायब, राजनीति का खेल जारी:
By- Chaudhary Sudhir Talyan
भारत का लोकतंत्र केवल चुनाव कराने की व्यवस्था नहीं है। लोकतंत्र की असली ताकत जनता के उस विश्वास में होती है कि संवैधानिक संस्थाएं सत्ता से ऊपर खड़ी होकर निष्पक्षता से काम करेंगी। जब किसी संवैधानिक संस्था या उसके शीर्ष पदाधिकारी पर गंभीर आरोप लगते हैं, तब सवाल केवल उस व्यक्ति का नहीं रहता; सवाल संस्था की विश्वसनीयता और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का बन जाता है।
आज निर्वाचन व्यवस्था को लेकर उठ रहे विवाद इसी कारण सामान्य राजनीतिक बहस मानकर टाले नहीं जा सकते। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के संबंध में विपक्ष, नागरिक समूहों और अन्य आलोचकों द्वारा लगाए जा रहे आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण निष्पक्ष जांच और उपलब्ध प्रमाणों से ही होना चाहिए। आरोप अपने आप में अपराध सिद्ध नहीं करते। लेकिन गंभीर आरोपों को केवल राजनीतिक बयान बताकर खारिज कर देना भी लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का रास्ता नहीं है।
यहीं से सरकार की भूमिका पर सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है।
यदि किसी संवैधानिक पदाधिकारी पर चुनावी निष्पक्षता प्रभावित करने, अधिकारों के दुरुपयोग अथवा किसी राजनीतिक पक्ष को अनुचित लाभ पहुंचाने जैसे गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं, तो सरकार का दायित्व किसी व्यक्ति का बचाव करना नहीं, बल्कि ऐसी प्रक्रिया सुनिश्चित करना होना चाहिए जिससे सत्य सामने आए। निष्पक्ष जांच से यदि आरोप गलत साबित होते हैं तो संस्था की प्रतिष्ठा और मजबूत होगी। यदि आरोप सही निकलते हैं तो कार्रवाई लोकतंत्र की रक्षा होगी। दोनों स्थितियों में देश का नुकसान नहीं, बल्कि लोकतंत्र का लाभ होगा।
इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि सरकार किसके पक्ष में है। प्रश्न यह होना चाहिए कि सरकार सत्य के पक्ष में क्यों नहीं खड़ी होती?
संस्थाओं पर भरोसा बचाना सरकार की जिम्मेदारी है
लोकतंत्र में संस्थागत विश्वास एक बार टूट जाए तो उसे कानून की किसी धारा से तुरंत वापस नहीं लाया जा सकता। चुनाव आयोग के संबंध में पैदा होने वाला अविश्वास इसलिए अधिक संवेदनशील है क्योंकि निर्वाचन प्रक्रिया ही सत्ता परिवर्तन का संवैधानिक माध्यम है।
यदि नागरिकों को यह लगने लगे कि उनका वोट सुरक्षित नहीं है, चुनावी प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं है या सत्ता के प्रभाव से संस्थाएं प्रभावित हो सकती हैं, तो लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण आधार कमजोर होता है।
इसीलिए सरकार को किसी भी विवाद में तत्काल राजनीतिक रक्षक की भूमिका अपनाने से बचना चाहिए। सरकार को कहना चाहिए—आरोप गंभीर हैं, प्रमाण सामने रखे जाएं, स्वतंत्र जांच हो और जो दोषी हो उसके विरुद्ध कार्रवाई हो।
इतना कहना लोकतंत्र के लिए पर्याप्त और सरकार के लिए सम्मानजनक होगा।
लेकिन जब गंभीर आरोपों के बीच सरकार और उसकी राजनीतिक मशीनरी लगातार संस्था की सफाई देने में अधिक सक्रिय दिखाई देती है, तब संदेह पैदा होना स्वाभाविक है। संदेह को प्रमाण नहीं कहा जा सकता, लेकिन लोकतंत्र में संदेह का समाधान दमन से नहीं, पारदर्शिता से किया जाता है।
आंदोलन नहीं, जांच चाहिए
देश को आज किसी अंतहीन टकराव की आवश्यकता नहीं है। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच संघर्ष लोकतांत्रिक समस्या का समाधान नहीं है। सड़कों पर बढ़ता तनाव किसी चुनावी संस्था की विश्वसनीयता वापस नहीं ला सकता।
देश को आंदोलन से अधिक निष्पक्ष जांच चाहिए।
जो आरोप लगाए जा रहे हैं, उनकी तथ्यात्मक जांच हो। संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं। निर्णय प्रक्रिया की समीक्षा हो। जहां कानून अनुमति देता है वहां न्यायिक अथवा स्वतंत्र संस्थागत परीक्षण कराया जाए। यदि कोई अधिकारी दोषी नहीं है तो उसे जांच से डरने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। और यदि कोई गंभीर अनियमितता हुई है तो पद की ऊंचाई दोषमुक्ति का कवच नहीं बन सकती।
यही संवैधानिक शासन का सामान्य सिद्धांत है।
सरकार को यह समझना होगा कि पुलिस की ताकत से राजनीतिक असंतोष दबाया जा सकता है, लेकिन उससे जनता का विश्वास पैदा नहीं किया जा सकता।
सबसे खतरनाक बात: जनता के असली सवाल पीछे छूट रहे हैं
लेकिन इस पूरे विवाद का दूसरा पहलू और भी चिंताजनक है।
भारत में जनता के सामने बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की आय, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, रुपये की कमजोरी, सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता और आर्थिक असमानता जैसे प्रश्न खड़े हैं। इन प्रश्नों पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए।
इसके बजाय राजनीतिक विमर्श बार-बार ऐसे संघर्षों में बदल जाता है जिनमें जनता कुछ दिनों तक अत्यधिक उत्तेजित रहती है और फिर अचानक अगला मुद्दा सामने आ जाता है।
क्या यह महज संयोग है?
इस प्रश्न का उत्तर बिना प्रमाण के नहीं दिया जा सकता। लेकिन लोकतंत्र में यह पूछना नागरिक का अधिकार है कि राजनीतिक बहस की दिशा कौन तय कर रहा है और किन मुद्दों को लगातार राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में रखा जा रहा है।
कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर नागरिक और जनसंगठनों की ओर से गंभीर सवाल उठे। सरकारी विद्यालय केवल इमारतें नहीं हैं। वे उस गरीब परिवार की सबसे बड़ी उम्मीद हैं जिसके पास निजी शिक्षा खरीदने की आर्थिक क्षमता नहीं है।
गरीब आदमी के लिए सरकारी स्कूल केवल शिक्षा का संस्थान नहीं—सामाजिक गतिशीलता का दरवाजा है।
जब सरकारी शिक्षा कमजोर होती है तो सबसे पहले गरीब का भविष्य कमजोर होता है। अमीर परिवार निजी विद्यालय खरीद सकता है; गरीब परिवार के पास विकल्प सीमित होते हैं। इसलिए सरकारी शिक्षा का पतन केवल शिक्षा विभाग की विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय पर सीधा प्रहार है।
ऐसे प्रश्न राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में होने चाहिए।
लेकिन यदि चुनावी विवाद के शोर में सरकारी स्कूल, शिक्षक, विद्यार्थियों, बुनियादी सुविधाओं और शिक्षा की गुणवत्ता की चर्चा गायब हो जाती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या जनता को उन मुद्दों से दूर ले जाया जा रहा है जिनका असर उसके घर तक पहुंचता है?
महंगाई और आर्थिक संकट पर मौन क्यों?
महंगाई का सवाल इससे भी बड़ा है।
रसोई का बजट किसी टेलीविजन स्टूडियो में नहीं बनता। वह किसान, मजदूर, कर्मचारी और छोटे व्यापारी के घर में बनता है। पेट्रोल-डीजल, खाद्य पदार्थ, किराया, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें परिवार की वास्तविक आर्थिक स्थिति तय करती हैं।
इसी तरह आर्थिक संकट को केवल शेयर बाजार या सरकारी आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। रुपये की विनिमय दर, रोजगार, ग्रामीण मांग, किसानों की लागत, छोटे कारोबार की स्थिति और वास्तविक आय—ये सब आर्थिक स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण संकेतक हैं।
फिर भी राजनीतिक बहस में इन प्रश्नों को उतनी जगह नहीं मिलती जितनी मिलनी चाहिए।
यहीं लोकतंत्र का नागरिक सबसे अधिक असहाय महसूस करता है।
राजनीतिक दल मुद्दे चुनते हैं। मीडिया उन्हें विस्तार देता है। सोशल मीडिया उन्हें उत्तेजना में बदल देता है और जनता उस बहस में उतर जाती है। अंततः नागरिक कई बार उन विषयों पर लड़ता हुआ दिखाई देता है जिनका उसके जीवन की वास्तविक समस्याओं से सीमित संबंध होता है।
यदि राजनीति जनता को उसके मूल प्रश्नों से भटका देती है, तो जनता अनजाने में उसी व्यवस्था की राजनीतिक 'फील्डिंग' करने लगती है जिसके प्रदर्शन का मूल्यांकन उसे करना था।
यह लोकतंत्र की विडंबना है।
अब खाद्यान्न संकट की राजनीति?
इसी संदर्भ में खाद्यान्न संकट से जुड़े संभावित विमर्श को भी गंभीरता से देखना होगा।
भारत जैसे विशाल देश में खाद्य सुरक्षा राष्ट्रीय संप्रभुता का प्रश्न है। खाद्यान्न उत्पादन, किसानों की आय, भंडारण, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, आयात-निर्यात नीति और कृषि व्यापार—इन सबको राजनीतिक सुविधा के बजाय दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित से देखा जाना चाहिए।
यदि कभी खाद्यान्न संकट का वास्तविक खतरा सामने आता है तो सरकार को प्रमाण, उत्पादन आंकड़े, भंडार की स्थिति, मौसम, खपत और अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियां सामने रखनी चाहिए।
लेकिन यदि 'संकट' की भाषा का इस्तेमाल कृषि नीति बदलने, किसानों पर दोष डालने अथवा किसी विदेशी व्यापार समझौते के लिए जनमत तैयार करने के राजनीतिक औजार के रूप में किया जाता है, तो यह अत्यंत गंभीर विषय होगा।
भारत को दुनिया के साथ व्यापार करना चाहिए, लेकिन व्यापारिक संबंध और खाद्य संप्रभुता एक-दूसरे के विरोधी नहीं बनने चाहिए। किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते में किसान, उपभोक्ता और देश की दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
किसान को पहले समस्या बनाना और बाद में उसके उत्पाद को विदेशी बाजार से नियंत्रित करना—यह नीति आत्मनिर्भरता नहीं हो सकती।
जनता को मोहरा नहीं, निर्णायक बनना होगा
सबसे बड़ा खतरा किसी एक व्यक्ति, किसी एक संस्था या किसी एक राजनीतिक दल से नहीं है।
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सबसे बड़ा खतरा यह है कि जनता अपने वास्तविक प्रश्न भूल जाए।
यदि चुनाव आयोग पर आरोप हैं—जांच हो।
यदि आरोप निराधार हैं—साफ तौर पर प्रमाणित हो।
यदि अधिकारी दोषी है—कार्रवाई हो।
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लेकिन इसी के साथ सरकारी स्कूलों पर भी सवाल पूछे जाएं। महंगाई पर भी सवाल हो। बेरोजगारी पर भी सवाल हो। किसानों की आय और कर्ज पर भी सवाल हो। आर्थिक नीतियों पर भी सवाल हो। खाद्य सुरक्षा और व्यापार समझौतों पर भी सवाल हो।
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लोकतंत्र में जनता को एक मुद्दे पर इतना व्यस्त नहीं किया जाना चाहिए कि बाकी सभी प्रश्न अदृश्य हो जाएं।
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और जनता को भी यह समझना होगा कि राजनीति द्वारा दिया गया हर मुद्दा उसका अपना मुद्दा नहीं होता।
कभी-कभी सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार कोई कानून, पुलिस या प्रचार नहीं होता—जनता का ध्यान भटकाना होता है।
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इसलिए आज देश को किसी चेहरे की राजनीतिक बलि से अधिक सत्य की आवश्यकता है। यदि निर्वाचन विवाद का समाधान केवल किसी अधिकारी को हटाने या बचाने तक सीमित कर दिया गया, तो मूल प्रश्न फिर अनुत्तरित रह जाएगा।
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लोकतंत्र व्यक्ति बदलने से नहीं बचता।
लोकतंत्र प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाने से बचता है।
और जनता को भी यह तय करना होगा कि वह राजनीति की बनाई हुई पटकथा पढ़ेगी या अपने जीवन की वास्तविक समस्याओं का हिसाब मांगेगी।
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क्योंकि अंततः लोकतंत्र में सबसे शक्तिशाली पद प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मुख्य निर्वाचन आयुक्त का नहीं है।
सबसे शक्तिशाली पद नागरिक का है।
और नागरिक यदि अपने असली सवाल भूल गया, तो राजनीति जीत जाएगी—चाहे चुनाव में कौन जीते, इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
Disclaimer :
यह लेख लेखक के स्वतंत्र विचार और संपादकीय विश्लेषण पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार किसी राजनीतिक दल, व्यक्ति, संस्था या सरकारी संगठन का आधिकारिक पक्ष नहीं हैं। लेख में उठाए गए प्रश्न, आशंकाएं और राजनीतिक विश्लेषण सार्वजनिक विमर्श, उपलब्ध सूचनाओं और लेखक के दृष्टिकोण पर आधारित हैं। किसी व्यक्ति या संस्था के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने का उद्देश्य नहीं है। आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण सक्षम एवं निष्पक्ष जांच अथवा न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही किया जा सकता है।
इस लेख का उद्देश्य किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना, किसी संस्था के प्रति घृणा उत्पन्न करना या किसी राजनीतिक दल के पक्ष अथवा विपक्ष में प्रचार करना नहीं है। इसका उद्देश्य लोकतांत्रिक जवाबदेही, संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता और जनहित से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों पर स्वस्थ सार्वजनिक बहस को प्रोत्साहित करना है।
पाठकों से अपेक्षा है कि वे लेख में प्रस्तुत विचारों को अंतिम सत्य मानने के बजाय उपलब्ध तथ्यों, आधिकारिक दस्तावेजों और विश्वसनीय स्रोतों के आधार पर अपना स्वतंत्र निष्कर्ष निकालें।
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