BRICS ने वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को ललकारा: IMF-World Bank में सुधार नहीं तो Global South की अपनी राह
BRICS ने IMF और World Bank में सुधार, विकासशील देशों की भागीदारी, सस्ती विकास वित्त व्यवस्था, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और Global South की आर्थिक संप्रभुता का मुद्दा उठाया है। जानिए इसका भारत, किसान और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा।
By- Chaudhary Sudhir Talyan
दुनिया की अर्थव्यवस्था बदल चुकी है, लेकिन वैश्विक वित्तीय संस्थाओं की सत्ता संरचना आज भी काफी हद तक उस दौर की याद दिलाती है जब द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हुआ था। 1944 में जिस आर्थिक व्यवस्था के आधार पर IMF और World Bank जैसी संस्थाओं का निर्माण हुआ था, उस समय एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की वर्तमान आर्थिक ताकत की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। आज स्थिति बदल चुकी है। भारत, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाएं विश्व अर्थव्यवस्था की दिशा प्रभावित करती हैं, लेकिन वैश्विक वित्तीय निर्णयों में उनका प्रतिनिधित्व अभी भी उनकी वास्तविक आर्थिक और जनसांख्यिकीय स्थिति के अनुरूप नहीं है।
इसी असंतुलन पर BRICS के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक प्रमुखों ने सीधा सवाल उठाया है। सितंबर 2026 में मुंबई में हुई बैठक में वैश्विक विकास वित्तीय संस्थाओं, विशेष रूप से IMF और World Bank, में व्यापक सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया गया। BRICS ने अधिक प्रतिनिधित्व, पारदर्शिता, जवाबदेही और विकासशील देशों की आवाज मजबूत करने की मांग की। यह केवल कूटनीतिक बयान नहीं है। इसके पीछे वैश्विक वित्तीय सत्ता के पुनर्वितरण की एक बड़ी लड़ाई छिपी है।
सवाल सिर्फ IMF का नहीं, आर्थिक सत्ता का है
IMF में मतदान शक्ति का वितरण आज भी आर्थिक इतिहास की विरासत से प्रभावित है। सितंबर 2026 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अमेरिका के पास IMF में लगभग 16.49 प्रतिशत मतदान शक्ति है, जबकि चीन के पास करीब 6.08 प्रतिशत और जापान के पास लगभग 6.14 प्रतिशत है।
यह आंकड़ा एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखता है। दुनिया की सबसे बड़ी आबादियों और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों की संस्थागत शक्ति उनकी वास्तविक वैश्विक भूमिका के अनुपात में नहीं है।
यही कारण है कि BRICS quota reform की मांग कर रहा है।
कोटा केवल सदस्यता शुल्क नहीं है। इससे किसी देश की वित्तीय हिस्सेदारी, मतदान शक्ति, IMF संसाधनों तक पहुंच और SDR आवंटन जैसे महत्वपूर्ण अधिकार प्रभावित होते हैं। इसलिए IMF quota में बदलाव वास्तव में वैश्विक आर्थिक सत्ता के वितरण में बदलाव है।
यही वह बिंदु है जहां असली संघर्ष शुरू होता है।
विकासशील देशों के सामने कर्ज का पहाड़
BRICS की मांग को केवल भू-राजनीतिक चश्मे से देखना बड़ी भूल होगी। इसके पीछे विकासशील देशों की वास्तविक आर्थिक परेशानी है।
UN Trade and Development के आकलन के अनुसार विकासशील देशों को सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए हर वर्ष लगभग 4.3 ट्रिलियन डॉलर के वित्तपोषण अंतर का सामना करना पड़ रहा है।
दूसरी तरफ कर्ज का बोझ बढ़ रहा है। ऊंची ब्याज दरों के कारण गरीब और मध्यम आय वाले देशों की सरकारी आय का बड़ा हिस्सा विकास पर खर्च होने के बजाय ऋण की सेवा में चला जाता है।
यह स्थिति किसी भी देश के लिए विनाशकारी है।
सरकार के पास पैसा है, लेकिन वह पैसा स्कूल, अस्पताल, सिंचाई, सड़क या रोजगार पर खर्च नहीं हो सकता क्योंकि पहले पुराने कर्ज का ब्याज चुकाना पड़ता है।
यह विकास का मॉडल नहीं, ऋण-निर्भरता का चक्र है।
कर्ज → ब्याज → कम सार्वजनिक निवेश → धीमी विकास दर → नया कर्ज → और अधिक ब्याज।
इस चक्र को तोड़े बिना विकासशील देशों से तेज आर्थिक विकास की उम्मीद करना आर्थिक पाखंड है।
विकास वित्त का मतलब सिर्फ बड़ी परियोजनाएं नहीं
विश्व बैंक और अन्य बहुपक्षीय विकास बैंक सड़क, बिजली, रेल और बड़े बुनियादी ढांचे के लिए वित्त उपलब्ध कराते हैं। लेकिन विकास का वास्तविक आधार इससे कहीं व्यापक है।
भारत जैसे देश में किसान के लिए सिंचाई, भंडारण, ग्रामीण सड़क, कोल्ड चेन, कृषि प्रसंस्करण, सस्ती बिजली और बाजार तक पहुंच उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कोई बड़ी औद्योगिक परियोजना।
यदि वैश्विक विकास वित्त अरबों डॉलर की परियोजनाओं को तो वित्त दे, लेकिन छोटे किसान, ग्रामीण उद्यम और स्थानीय खाद्य प्रणालियां उसके एजेंडे में पीछे रहें, तो ऐसी विकास व्यवस्था अधूरी है।
विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के लिए सस्ती दीर्घकालीन पूंजी उपलब्ध कराना विकास वित्त की प्राथमिकता होनी चाहिए।
कृषि को केवल उत्पादन का क्षेत्र मानना गलत है। कृषि खाद्य सुरक्षा, रोजगार, ग्रामीण मांग और सामाजिक स्थिरता की रीढ़ है।
BRICS का अपना रास्ता: New Development Bank
BRICS ने केवल आलोचना नहीं की है। उसने अपनी संस्था भी बनाई है—New Development Bank यानी NDB।
NDB का गठन BRICS के मूल पांच देशों ने 2015 में किया था। इसका उद्देश्य बुनियादी ढांचे और सतत विकास के लिए वित्त उपलब्ध कराना था।
2025 में NDB ने 19 परियोजनाओं के लिए लगभग 3.17 अरब डॉलर का नया वित्त अनुमोदित किया। 2025 के अंत तक बैंक के स्वीकृत पोर्टफोलियो में लगभग 115 परियोजनाएं और करीब 35.6 अरब डॉलर का वित्त शामिल था।
यह महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना भी गलत होगा।
विकासशील देशों का वार्षिक वित्तीय अंतर खरबों डॉलर में है। उसके सामने NDB अभी बहुत छोटा है।
इसलिए NDB IMF या World Bank का तत्काल विकल्प नहीं है।
लेकिन यह एक प्रयोगशाला जरूर है—ऐसी वित्तीय व्यवस्था बनाने की जिसमें विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को अधिक महत्व मिले।
असली बदलाव: स्थानीय मुद्राओं में व्यापार
BRICS के वित्तीय एजेंडे का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा स्थानीय मुद्राओं और सीमा-पार भुगतान प्रणालियों को मजबूत करने की दिशा में बढ़ना है।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे डॉलर की वैश्विक मांग और अमेरिकी वित्तीय प्रणाली का प्रभाव भी मजबूत रहता है।
यदि दो विकासशील देश अपने-अपने राष्ट्रीय मुद्रा में व्यापार का निपटान कर सकें तो विदेशी मुद्रा जोखिम और कुछ लेनदेन लागत घटाई जा सकती है।
लेकिन यहां भी वास्तविकता को समझना जरूरी है।
सिर्फ यह घोषणा कर देना कि व्यापार स्थानीय मुद्रा में होगा, पर्याप्त नहीं है। इसके लिए बैंकिंग नेटवर्क, मुद्रा तरलता, विनिमय व्यवस्था, भुगतान प्रणाली, हेजिंग साधन और विश्वसनीय निपटान तंत्र चाहिए।
इसलिए BRICS की भुगतान प्रणाली का भविष्य उसके तकनीकी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा, न कि राजनीतिक नारों पर।
BRICS मुद्रा की अफवाह और वास्तविक एजेंडा
BRICS की वित्तीय पहल को लेकर अक्सर यह प्रचार किया जाता है कि संगठन तत्काल कोई साझा मुद्रा जारी करने जा रहा है।
वास्तविक दिशा इससे अलग और अधिक व्यावहारिक है।
फिलहाल जोर राष्ट्रीय मुद्राओं के इस्तेमाल, भुगतान प्रणालियों की interoperability और सीमा-पार भुगतान को तेज, सस्ता और सुरक्षित बनाने पर है।
यही व्यावहारिक रास्ता है।
साझा मुद्रा बनाना अत्यंत जटिल कार्य है। इसके लिए साझा मौद्रिक नीति, वित्तीय संस्थान, विनिमय दर व्यवस्था और अत्यधिक गहरा आर्थिक एकीकरण चाहिए।
स्थानीय मुद्रा में व्यापार और भुगतान प्रणाली की interoperability उससे कहीं अधिक व्यावहारिक पहला कदम है।
Multilateral Guarantees: कम सार्वजनिक पूंजी से ज्यादा निजी निवेश
BRICS के वित्तीय एजेंडे में बहुपक्षीय गारंटी तंत्र भी महत्वपूर्ण है।
विकासशील देशों में अनेक परियोजनाएं इसलिए वित्त नहीं जुटा पातीं क्योंकि निवेशक जोखिम अधिक मानते हैं।
यदि कोई बहुपक्षीय संस्था आंशिक गारंटी दे, तो निजी निवेशक उसी परियोजना में पूंजी लगाने के लिए तैयार हो सकते हैं।
इस मॉडल का महत्व बहुत बड़ा है।
सरकार या विकास बैंक के पास सीमित संसाधन हैं। यदि वही संसाधन जोखिम कम करके कई गुना निजी निवेश आकर्षित कर सके, तो विकास वित्त की क्षमता बढ़ सकती है।
लेकिन इसके लिए पारदर्शिता जरूरी है। गारंटी का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि निजी कंपनियों का मुनाफा सार्वजनिक हो और नुकसान जनता के सिर डाल दिया जाए।
BRICS को पश्चिम-विरोधी क्लब बनने से बचना होगा
BRICS की सबसे बड़ी चुनौती बाहरी नहीं, आंतरिक है।
इसके सदस्य आर्थिक और राजनीतिक रूप से एक जैसे नहीं हैं। भारत, चीन, रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और नए सदस्य देशों की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या BRICS ऐसी व्यवस्था बना सकता है जिसमें कोई एक सदस्य दूसरे पर असाधारण प्रभाव न जमा सके।
यदि BRICS एक पुराने केंद्रीकृत मॉडल को हटाकर उसकी जगह नया केंद्रीकरण पैदा करता है, तो सुधार का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।
एक वास्तविक बहुध्रुवीय वित्तीय व्यवस्था का अर्थ होना चाहिए—
एक शक्ति केंद्र के बजाय अनेक शक्ति केंद्र।
IMF और World Bank को खत्म नहीं, बदलना होगा
BRICS के लिए सबसे व्यावहारिक रणनीति IMF और World Bank को समाप्त करने की मांग करना नहीं, बल्कि उनके लोकतांत्रिक और प्रतिनिधिक सुधार को आगे बढ़ाना है।
IMF में quota reform होना चाहिए।
World Bank में विकासशील देशों की आवाज मजबूत होनी चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रमुखों की नियुक्ति वास्तव में merit, transparency और खुले प्रतिस्पर्धी चयन पर आधारित होनी चाहिए।
किसी पद का अधिकार केवल इसलिए किसी क्षेत्र को नहीं मिलना चाहिए कि पुरानी राजनीतिक परंपरा ऐसी रही है।
यदि विश्व अर्थव्यवस्था बदल गई है तो संस्थागत संरचना भी बदलनी चाहिए।
सबसे गरीब देशों की आवाज नहीं दबनी चाहिए
एक और खतरा है।
यदि सुधार केवल भारत, चीन, ब्राजील या अन्य बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के हिस्से बढ़ाने तक सीमित रह गया, तो छोटे और गरीब देशों को वास्तविक लाभ नहीं मिलेगा।
अफ्रीका के सबसे गरीब देशों, छोटे द्वीपीय देशों और अत्यधिक ऋणी देशों की आवाज को भी संस्थागत सुरक्षा मिलनी चाहिए।
BRICS को यह साबित करना होगा कि उसका लक्ष्य केवल अपनी शक्ति बढ़ाना नहीं, बल्कि Global South की सामूहिक सौदेबाजी क्षमता बढ़ाना है।
किसान के लिए इसका मतलब क्या है?
यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है।
वैश्विक वित्तीय सुधार आम किसान को दूर की चीज लग सकता है। लेकिन इसका सीधा संबंध कृषि से है।
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यदि विकास बैंक सस्ती पूंजी उपलब्ध कराते हैं तो देश सिंचाई, ग्रामीण बिजली, भंडारण, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि बुनियादी ढांचे में निवेश कर सकते हैं।
यदि कर्ज की लागत कम होती है तो सरकार के पास ग्रामीण निवेश के लिए अधिक राजकोषीय जगह बचती है।
यदि अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणाली अधिक विविध होती है तो व्यापारिक झटकों से विकासशील देशों की संवेदनशीलता घट सकती है।
और यदि वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों की आवाज मजबूत होती है तो कृषि व्यापार, खाद्य सुरक्षा, जलवायु वित्त और ग्रामीण विकास के मुद्दे अधिक प्रभावी ढंग से उठाए जा सकते हैं।
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इसलिए वैश्विक वित्तीय लोकतंत्र का सवाल अंततः गांव की अर्थव्यवस्था का भी सवाल है।
असली परीक्षा अब शुरू हुई है
BRICS ने सही सवाल उठाया है, लेकिन सवाल उठाना पर्याप्त नहीं।
अब उसे परिणाम दिखाने होंगे।
क्या NDB विकासशील देशों को वास्तव में सस्ता वित्त दे सकता है?
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क्या स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बड़े पैमाने पर संभव बनाया जा सकता है?
क्या सीमा-पार भुगतान व्यवस्था डॉलर-निर्भरता को कुछ हद तक कम कर सकती है?
क्या BRICS गारंटी तंत्र निजी पूंजी को वास्तविक विकास परियोजनाओं तक पहुंचा सकता है?
क्या IMF और World Bank में प्रतिनिधित्व सुधार के लिए BRICS ठोस प्रस्ताव तैयार कर सकता है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या इस नई व्यवस्था का लाभ किसान, मजदूर, छोटे उद्यम और गरीब देश तक पहुंचेगा?
यदि जवाब हां है, तो यह केवल वित्तीय सुधार नहीं होगा। यह वैश्विक आर्थिक लोकतंत्र की दिशा में बड़ा परिवर्तन होगा।
लेकिन यदि BRICS भी केवल घोषणाओं, शिखर सम्मेलनों और राजनीतिक भाषणों तक सीमित रहा, तो इतिहास उसे एक और असंतुष्ट समूह के रूप में दर्ज करेगा।
निष्कर्ष: अब वित्तीय लोकतंत्र का समय है
दुनिया की अर्थव्यवस्था 1944 वाली दुनिया नहीं है। आर्थिक शक्ति का भूगोल बदल चुका है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका अब वैश्विक विकास के केंद्र हैं।
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फिर भी वैश्विक वित्तीय संस्थाओं की निर्णय प्रणाली में पुराने शक्ति-संतुलन की छाप मौजूद है।
BRICS ने इसी विसंगति को चुनौती दी है।
लेकिन अगला कदम और कठोर होना चाहिए—नारे नहीं, संस्थागत प्रस्ताव; बयान नहीं, वित्तीय विकल्प; राजनीतिक भाषण नहीं, सस्ती पूंजी और वास्तविक विकास।
Global South को ऐसी वित्तीय व्यवस्था चाहिए जिसमें गरीब देश लगातार कर्ज लेकर ब्याज चुकाने के लिए मजबूर न हों; किसान को महंगी पूंजी के सामने आत्मसमर्पण न करना पड़े; विकासशील देशों को अपनी आर्थिक नीतियों के लिए पर्याप्त नीति-स्वतंत्रता मिले; और वैश्विक संस्थाओं में निर्णय लेने का अधिकार वास्तविक आर्थिक दुनिया को प्रतिबिंबित करे।
BRICS की चुनौती इसलिए केवल IMF और World Bank के लिए नहीं है।
यह उस पूरी सोच के लिए चुनौती है जिसमें वैश्विक वित्तीय व्यवस्था कुछ शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाओं की सुविधा के अनुसार चलती रही है।
अब सवाल यह नहीं कि Global South को वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में जगह मिलेगी या नहीं। सवाल यह है कि उसे निर्णय लेने की बराबर शक्ति कब मिलेगी।
और यही BRICS की सबसे बड़ी राजनीतिक-आर्थिक परीक्षा है।
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