NTA की नाकामी पर सरकार की जिद: सवाल तीन विषयों का नहीं, छात्रों के भविष्य और व्यवस्था की विश्वसनीयता का है
NTA की बार-बार सामने आती परीक्षा संबंधी खामियों, प्रश्नपत्रों की त्रुटियों, री-एग्जाम और छात्रों की परेशानियों के बीच यह संपादकीय सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठाता है और नई, पारदर्शी व विश्वसनीय राष्ट्रीय परीक्षा व्यवस्था की मांग करता है।
कटघरे में व्यवस्था
By- Ch. Sudhir Taliyan
English, Commerce और Sociology के प्रश्नपत्रों में त्रुटियां, सवालों की पुनरावृत्ति और अनुवाद की खामियों के बाद री-एग्जाम — असली सवाल यह नहीं कि तीन विषयों की परीक्षा दोबारा होगी या नहीं, असली सवाल यह है कि जिस व्यवस्था पर देश के करोड़ों युवाओं का भविष्य टिका है, उसकी जवाबदेही आखिर तय कब होगी?
कभी-कभी किसी व्यवस्था की असफलता किसी बड़े घोटाले की तरह सामने नहीं आती। वह एक छोटे-से प्रश्न में छिपी होती है। एक गलत नाम में। एक गलत अनुवाद में। एक दोहराए गए सवाल में। एक ऐसी गलती में, जिसे कोई सामान्य शिक्षक परीक्षा शुरू होने से पहले लाल पेन से काट देता।
लेकिन जब वही गलती उस संस्था की परीक्षा में हो, जिसे देश की सबसे महत्वपूर्ण प्रतियोगी परीक्षाओं को विश्वसनीय, पारदर्शी और मानकीकृत बनाने के लिए बनाया गया हो, तब वह महज “टाइपिंग मिस्टेक” नहीं रह जाती। वह संस्थागत अक्षमता का प्रमाण बन जाती है।
UGC-NET के English, Commerce और Sociology प्रश्नपत्रों को लेकर सामने आई शिकायतों और जांच के बाद इन तीन विषयों की परीक्षा दोबारा कराने का फैसला इसी बड़े संकट का ताजा अध्याय है। रिपोर्टों के अनुसार, प्रश्नपत्रों में प्रश्नों की पुनरावृत्ति, तथ्यात्मक/भाषाई त्रुटियां और अनुवाद संबंधी समस्याएं सामने आईं। कुछ रिपोर्टों में English paper के लगभग 60 प्रतिशत प्रश्नों के पुराने प्रश्नपत्र से अत्यधिक समान होने की बात कही गई है, जबकि अन्य रिपोर्टों में 150 में से 67 प्रश्नों के हूबहू दोहराव का उल्लेख है। Sociology paper में Ritzer, Parsons, Ghurye और अन्य विद्वानों के नामों की गलत वर्तनी जैसी त्रुटियों की भी उम्मीदवारों ने शिकायत की।
अब परीक्षा फिर होगी।
लेकिन क्या सिर्फ री-एग्जाम होने से समस्या समाप्त हो जाएगी?
नहीं। बिल्कुल नहीं।
क्योंकि प्रश्न तीन विषयों का नहीं है। प्रश्न NTA की संस्थागत विश्वसनीयता का है।
और उससे भी बड़ा प्रश्न उस राजनीतिक सत्ता का है जिसने इस व्यवस्था को बनाया, उसका विस्तार किया, उसे देश की परीक्षा-व्यवस्था की रीढ़ बनाया और बार-बार की विफलताओं के बावजूद उससे चिपके रहने का रास्ता चुना।
सरकार का काम संस्था को बचाना नहीं, व्यवस्था को बचाना है
यहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार से सबसे असुविधाजनक सवाल पूछा जाना चाहिए।
सरकार किसी संस्था की संरक्षक होती है या जनता के हित की?
यदि कोई संस्था बार-बार विफल हो रही है तो सरकार का दायित्व उसे हर कीमत पर बचाना नहीं है। सरकार का दायित्व यह देखना है कि वह संस्था अपने मूल उद्देश्य को पूरा कर पा रही है या नहीं।
NTA की स्थापना 2017 में केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद हुई और 2018 में इसे Societies Registration Act, 1860 के तहत एक Society के रूप में पंजीकृत किया गया। सरकार के अपने दस्तावेज में इसे “autonomous and self-sustained premier testing organization” के रूप में स्थापित करने की बात कही गई थी। उसका घोषित उद्देश्य तकनीक और वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के माध्यम से उच्च विश्वसनीयता, पारदर्शिता और मानकीकरण सुनिश्चित करना था।
यानी NTA कोई सामान्य दफ्तर नहीं था।
उसे एक ऐसी संस्था के रूप में प्रस्तुत किया गया था जो परीक्षा-व्यवस्था की पुरानी कमियों को पीछे छोड़कर एक नई, आधुनिक, तकनीक-आधारित और भरोसेमंद व्यवस्था बनाएगी।
आज सवाल यह है कि क्या वह वादा पूरा हुआ?
अगर नहीं हुआ, तो सरकार को यह पूछना चाहिए कि क्यों नहीं हुआ।
लेकिन यदि सरकार का उत्तर केवल यह है कि “हम NTA में सुधार कर रहे हैं”, तो अगला सवाल होगा—
कितनी बार सुधार करेंगे?
एक परीक्षा के बाद?
दूसरी परीक्षा के बाद?
तीसरी गलती के बाद?
हर साल?
हर संकट के बाद?
या तब तक जब तक छात्रों का भरोसा पूरी तरह खत्म न हो जाए?
यह केवल तीन प्रश्नपत्रों की गलती नहीं है
किसी प्रश्नपत्र में एक गलती होना संभव है। कोई विशेषज्ञ भी गलती कर सकता है। किसी अनुवादक से भूल हो सकती है।
लेकिन जब एक ही परीक्षा में प्रश्न दोहराए जाएं, अनुवाद में गंभीर समस्याएं हों, विषय-विशेषज्ञों और विद्वानों के नाम गलत लिखे जाएं और फिर पूरी परीक्षा को दोबारा आयोजित करना पड़े, तो इसे “मानवीय भूल” कहकर आगे बढ़ जाना ईमानदार जवाब नहीं होगा।
क्योंकि परीक्षा व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण चीज प्रश्नपत्र नहीं—विश्वास होता है।
एक छात्र जब परीक्षा केंद्र में बैठता है तो वह मानकर चलता है कि सामने रखे गए प्रश्नपत्र में जो कुछ है, वह निष्पक्ष है।
वह मानता है कि जिस प्रश्न का उत्तर उसे नहीं आता, वह इसलिए नहीं आता क्योंकि उसने पढ़ाई नहीं की।
वह यह मानकर नहीं बैठता कि शायद प्रश्न बनाने वाले ने गलती की है।
वह यह नहीं सोचता कि शायद सामने का विकल्प गलत है।
वह यह भी नहीं सोचता कि जिस विद्वान का नाम प्रश्न में लिखा है, उसका नाम ही गलत हो सकता है।
लेकिन यदि यह सब परीक्षा में हो रहा है तो दोष छात्र का नहीं, व्यवस्था का है।
और जब व्यवस्था की गलती से छात्र का भविष्य प्रभावित होता है, तो उसकी कीमत भी व्यवस्था को ही चुकानी चाहिए।
सबसे आसान शिकार हमेशा छात्र क्यों होता है?
भारत में प्रतियोगी परीक्षा केवल परीक्षा नहीं है।
यह एक परिवार की आर्थिक उम्मीद होती है।
यह किसी छोटे शहर के कमरे में पढ़ रहे युवक की वर्षों की मेहनत होती है।
यह किसी किसान की बेटी का सपना होता है।
यह किसी निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार का वह विश्वास होता है कि “मेहनत करोगे तो आगे बढ़ सकते हो।”
एक UGC-NET उम्मीदवार के लिए परीक्षा की तैयारी कई महीनों, कभी-कभी वर्षों का निवेश है।
उसने किताबें खरीदीं।
कोचिंग ली।
नौकरी छोड़ी या नौकरी के साथ तैयारी की।
दूसरे शहर गया।
परीक्षा केंद्र तक पहुंचने के लिए पैसा खर्च किया।
मानसिक तनाव सहा।
और फिर उसे बताया गया—
“परीक्षा में कुछ गड़बड़ी हो गई है, दोबारा परीक्षा दीजिए।”
कितना आसान है यह वाक्य उस अधिकारी के लिए जिसने उसे जारी किया।
लेकिन उस छात्र के लिए?
उसका किराया कौन देगा?
उसकी यात्रा का खर्च कौन देगा?
उसके तैयारी के अतिरिक्त महीनों का मूल्य कौन देगा?
उसके मानसिक तनाव की भरपाई कौन करेगा?
उसकी नौकरी या दूसरे अवसरों में हुए नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा?
और सबसे महत्वपूर्ण—
उसका खोया हुआ भरोसा कौन लौटाएगा?
NTA का संकट आज का नहीं है
इस संकट को केवल 2026 की तीन विषयों वाली घटना बनाकर देखना सुविधाजनक होगा।
लेकिन इतिहास कुछ और कहता है।
2024 में UGC-NET परीक्षा रद्द की गई थी क्योंकि सरकार ने कहा था कि परीक्षा की integrity प्रभावित हो सकती है। उसी वर्ष NEET-UG और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर भी देशव्यापी विवाद और छात्र आंदोलनों ने परीक्षा-व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए।
UGC-NET की answer key को लेकर भी बार-बार विवाद हुए हैं। 2024 में History paper की answer key में बड़ी संख्या में कथित गलत उत्तरों को लेकर उम्मीदवारों ने शिकायतें की थीं। 2025 के December session के History paper में कथित प्रश्नों और अनुवाद संबंधी त्रुटियों पर Delhi High Court ने expert committee गठित करने का निर्देश दिया।
तो क्या हर बार यही होगा?
पहले गलती।
फिर छात्र शिकायत करेंगे।
फिर आंदोलन होगा।
फिर जांच समिति बनेगी।
फिर कुछ अधिकारियों या विशेषज्ञों को हटाया जाएगा।
फिर “सिस्टम को मजबूत” करने की घोषणा होगी।
और फिर अगली परीक्षा में नई गलती सामने आएगी?
यह सुधार नहीं है। यह संकट प्रबंधन है।
सरकार ने NTA बनाया था—इसलिए उसे बचाना जरूरी नहीं
यहीं से सवाल सीधे BJP सरकार के राजनीतिक चरित्र तक पहुंचता है।
NTA 2017 के बाद बनाई गई व्यवस्था है। सरकार ने इसे अपने प्रशासनिक मॉडल की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में स्थापित किया। इसलिए आज जब NTA पर सवाल उठते हैं तो राजनीतिक असुविधा स्वाभाविक है।
लेकिन लोकतंत्र में सरकार की प्रतिष्ठा किसी संस्था को बचाने से नहीं बचती।
सरकार की प्रतिष्ठा यह स्वीकार करने से बचती है कि—
“हमने व्यवस्था बनाई थी। उसमें समस्या आई। हमने समस्या को स्वीकार किया। हमने जिम्मेदारी तय की। और आवश्यकता पड़ी तो व्यवस्था ही बदल दी।”
यह कमजोरी नहीं है।
यह शासन है।
लेकिन यदि सरकार का रवैया यह हो कि संस्था चाहे जितनी बार विफल हो, उसके मूल ढांचे को छुआ नहीं जाएगा, तो यह प्रशासनिक जिद बन जाती है।
और प्रशासनिक जिद का सबसे बड़ा नुकसान उस नागरिक को होता है जिसके नाम पर शासन किया जाता है।
NTA को बचाना और छात्रों के भविष्य को बचाना—इन दोनों में यदि कभी चुनाव करना पड़े, तो सरकार को बिना किसी हिचकिचाहट के छात्रों के भविष्य के पक्ष में खड़ा होना चाहिए।
“स्वायत्त” संस्था, लेकिन जवाबदेही किसकी?
यहां NTA की संरचना का एक और महत्वपूर्ण पहलू है।
सरकारी दस्तावेज इसे autonomous, self-sustained organization बताते हैं और इसकी स्थापना Society Registration Act के तहत हुई।
यह मॉडल अपने आप में गलत नहीं है।
लेकिन संवेदनशील राष्ट्रीय परीक्षाओं के मामले में असली प्रश्न autonomy का नहीं, accountability architecture का है।
यदि संस्था स्वायत्त है तो उसकी जवाबदेही किसके प्रति है?
यदि परीक्षा में गंभीर त्रुटि होती है तो अंतिम जिम्मेदारी किसकी है?
यदि लाखों छात्रों का समय और पैसा बर्बाद होता है तो compensation mechanism क्या है?
यदि प्रश्नपत्र तैयार करने में गंभीर लापरवाही होती है तो जिम्मेदार विशेषज्ञों और अधिकारियों के विरुद्ध क्या कार्रवाई होती है?
यदि किसी परीक्षा की निष्पक्षता पर संदेह पैदा होता है तो स्वतंत्र जांच कौन करेगा?
और यदि संस्था लगातार अपने घोषित standards पर खरी नहीं उतरती तो उसके अस्तित्व की समीक्षा कौन करेगा?
इन सवालों के स्पष्ट जवाब लोकतंत्र में अनिवार्य हैं।
अब “एक और समिति” पर्याप्त नहीं होगी
सरकार ने NTA में सुधार के लिए कई कदमों की खबर दी है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार प्रश्नपत्र निर्माण और verification की प्रक्रिया में बदलाव, विशेषज्ञों की टीम में फेरबदल और बहु-स्तरीय जांच जैसे उपाय किए जा रहे हैं।
ये कदम स्वागत योग्य हो सकते हैं।
लेकिन एक बात स्पष्ट होनी चाहिए—
प्रशासनिक प्रक्रिया बदलना और संस्थागत डिजाइन बदलना दो अलग बातें हैं।
अगर किसी मशीन का एक पुर्जा बार-बार टूट रहा हो तो हर बार नया पुर्जा लगाने के बजाय कभी-कभी यह भी देखना पड़ता है कि मशीन ही गलत डिजाइन की तो नहीं।
NTA के मामले में भी यही प्रश्न है।
https://politicsinsightindia.com/new/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
क्या भारत को एक ऐसी नई राष्ट्रीय परीक्षा संस्था की जरूरत है जो संसद द्वारा स्पष्ट वैधानिक ढांचे के तहत स्थापित हो?
क्या उसके संचालन में स्वतंत्र परीक्षा विशेषज्ञों, विश्वविद्यालयों, न्यायिक/प्रशासनिक निगरानी और तकनीकी विशेषज्ञता का संतुलन होना चाहिए?
क्या प्रश्नपत्र निर्माण को कई स्वतंत्र स्तरों पर blind review से गुजरना चाहिए?
क्या multilingual papers के लिए subject experts के साथ professional language validation अनिवार्य होना चाहिए?
क्या question bank और previous papers की automated similarity checking अनिवार्य होनी चाहिए?
क्या परीक्षा में त्रुटि होने पर उम्मीदवारों के लिए automatic relief और compensation framework होना चाहिए?
क्या संस्था की वार्षिक performance audit सार्वजनिक होनी चाहिए?
https://politicsinsightindia.com/new/lal-kile-se-bade-sapne-zameen-par-jankalyan-ki-khamoshi
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या लगातार गंभीर विफलता की स्थिति में संस्था को पुनर्गठित या समाप्त कर नई संस्था बनाने का वैधानिक रास्ता होना चाहिए?
इन सवालों से डरने की जरूरत नहीं है।
बिहार की तस्वीर इस संकट को और भयावह बनाती है
परीक्षा-व्यवस्था की विफलता का असर केवल वेबसाइटों, answer keys और प्रेस विज्ञप्तियों में नहीं दिखाई देता।
कभी-कभी उसका असर सड़क पर दिखाई देता है।
2026 में बिहार में परीक्षा संबंधी अनियमितताओं को लेकर हुए छात्र आंदोलनों के दौरान Siwan में एक पुलिसकर्मी द्वारा AK-47 से फायरिंग का वीडियो सामने आया। पुलिसकर्मी को निलंबित किया गया। पुलिस अधिकारियों ने बाद में फायरिंग की परिस्थितियों की अलग-अलग व्याख्याएं दीं और रिपोर्टों में पिस्तौल से फायरिंग का भी उल्लेख आया।
यह घटना अपने आप में अत्यंत गंभीर है।
लेकिन इसे NTA की हर गलती से सीधे जोड़कर यह कहना कि हर हिंसक घटना NTA की वजह से हुई, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। बिहार की घटनाओं के अपने राजनीतिक और प्रशासनिक संदर्भ थे।
फिर भी एक बात से इनकार नहीं किया जा सकता—
जब परीक्षा-व्यवस्था पर लगातार अविश्वास पैदा होता है, तो उसका सामाजिक तापमान बढ़ता है।
और जब युवा यह महसूस करने लगते हैं कि पढ़ाई, मेहनत और परीक्षा के बाद भी उन्हें न्यायपूर्ण अवसर नहीं मिलेगा, तब लोकतंत्र के लिए इससे अधिक खतरनाक संकेत कोई नहीं हो सकता।
छात्र को प्रश्नपत्र चाहिए, पुलिस की बंदूक नहीं।
उसे answer key चाहिए, मुकदमा नहीं।
उसे पारदर्शिता चाहिए, राजनीतिक भाषण नहीं।
उसे अवसर चाहिए, दहशत नहीं।
छात्रों को दुश्मन की तरह देखना बंद कीजिए
यह भी एक चिंताजनक राजनीतिक प्रवृत्ति है कि जब युवा प्रश्न पूछते हैं तो उन्हें “राजनीतिक”, “उपद्रवी”, “गुमराह” या किसी अन्य अपमानजनक श्रेणी में रख देना आसान समझा जाता है।
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लेकिन छात्र लोकतंत्र के ग्राहक नहीं, नागरिक हैं।
वे सरकार से नौकरी की भीख नहीं मांग रहे।
वे अपने हिस्से की निष्पक्ष परीक्षा मांग रहे हैं।
वे कोई विशेष कृपा नहीं मांग रहे।
वे केवल यह चाहते हैं कि जिस परीक्षा में उन्हें भविष्य तय करने के लिए बैठाया गया है, वह परीक्षा स्वयं निष्पक्ष हो।
यदि सरकार अपनी गलती स्वीकार करने के बजाय छात्रों को ही कटघरे में खड़ा करती है, तो समस्या केवल परीक्षा व्यवस्था की नहीं रहती।
वह लोकतांत्रिक संवेदनशीलता की समस्या बन जाती है।
BJP के लिए भी यह आत्ममंथन का समय है
भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से मजबूत प्रशासन, सुशासन, तकनीकी दक्षता और निर्णायक नेतृत्व की राजनीति करती रही है।
लेकिन निर्णायक नेतृत्व का अर्थ यह नहीं कि निर्णय गलत हो जाए तो उसे वापस लेना कमजोरी मान लिया जाए।
सच्चा मजबूत नेतृत्व वह है जो कह सके—
“यह व्यवस्था हमारी बनाई हुई थी, लेकिन यदि यह जनता के हित में काम नहीं कर रही तो हम इसे बदलेंगे।”
किसी संस्था का अस्तित्व किसी सरकार की प्रतिष्ठा से बड़ा नहीं हो सकता।
किसी राजनीतिक परियोजना की निरंतरता किसी छात्र के भविष्य से बड़ी नहीं हो सकती।
और किसी सरकार का अहंकार देश की परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता से बड़ा नहीं हो सकता।
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यदि NTA को सुधारना संभव है—सुधारिए।
यदि उसका पुनर्गठन जरूरी है—पुनर्गठित कीजिए।
यदि उसका कानूनी ढांचा अपर्याप्त है—नया कानून बनाइए।
और यदि निष्पक्ष समीक्षा यह कहती है कि एक नई संस्था चाहिए—तो नई संस्था बनाइए।
लेकिन केवल इसलिए NTA को मत बचाइए कि इसे इसी सरकार ने बनाया था।
यह राष्ट्रहित नहीं होगा।
यह राजनीतिक आत्मरक्षा होगी।
भारत को नई परीक्षा संस्कृति चाहिए
आज भारत को केवल एक नई testing agency की जरूरत नहीं है।
उसे नई testing philosophy की जरूरत है।
ऐसी व्यवस्था जिसमें—
https://politicsinsightindia.com/new/mmdr-amendment-bill-2026-farmer-land-acquisition-partnership
-
प्रश्नपत्र की चार या पांच स्वतंत्र स्तरों पर जांच हो;
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पुराने प्रश्नपत्रों से automated similarity audit हो;
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सभी भाषाओं में professional translation validation हो;
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विषय-विशेषज्ञों की जवाबदेही दर्ज हो;
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परीक्षा के बाद objections की समीक्षा पारदर्शी हो;
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answer key पर स्वतंत्र expert audit संभव हो;
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उम्मीदवारों के लिए समयबद्ध grievance redressal हो;
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गंभीर त्रुटि पर automatic compensation mechanism हो;
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संस्था की वार्षिक स्वतंत्र performance audit सार्वजनिक हो;
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और सबसे महत्वपूर्ण, परीक्षा संस्था के शीर्ष प्रबंधन की जवाबदेही स्पष्ट हो।
- https://politicsinsightindia.com/new/chandrapur-ashram-shalaon-mein-sarkari-laparwahi-aur-jawabdehi
यह केवल तकनीकी सुधार नहीं है।
यह लोकतांत्रिक सुधार है।
क्योंकि प्रतियोगी परीक्षा आज भारत में सामाजिक गतिशीलता की सबसे महत्वपूर्ण सीढ़ियों में से एक है।
गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों का बच्चा अक्सर पूंजी के बल पर नहीं, परीक्षा के बल पर आगे बढ़ सकता है।
यदि परीक्षा ही अविश्वसनीय हो गई तो अवसर की समानता का पूरा विचार खोखला हो जाएगा।
री-एग्जाम समाधान नहीं, चेतावनी है
English, Commerce और Sociology का री-एग्जाम कराया जाना आवश्यक हो सकता है। इससे प्रभावित उम्मीदवारों को कम से कम एक निष्पक्ष अवसर मिलेगा। NTA ने इस निर्णय के माध्यम से यह स्वीकार किया है कि समस्या इतनी गंभीर थी कि सामान्य परिणाम प्रक्रिया से आगे बढ़ना उचित नहीं था।
https://politicsinsightindia.com/new/upi-bill-2026-merchant-consumer-government-mdr-analysis
लेकिन सरकार को यह समझना होगा कि री-एग्जाम मरम्मत है, इलाज नहीं।
मरम्मत के बाद वही पुरानी मशीन फिर चला देना और अगली खराबी का इंतजार करना नीति नहीं हो सकती।
अब समय है कि सरकार एक स्वतंत्र, सार्वजनिक और समयबद्ध राष्ट्रीय परीक्षा-व्यवस्था समीक्षा आयोग बनाए।
वह आयोग केवल यह न बताए कि English paper में क्या गलती हुई।
वह यह बताए कि पिछले वर्षों में NTA की परीक्षा प्रणाली में कितनी शिकायतें आईं, कितनी परीक्षाएं प्रभावित हुईं, कितने प्रश्न विवादित हुए, कितनी answer keys बदली गईं, कितने छात्रों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ी, कितने मामलों में न्यायालयों को हस्तक्षेप करना पड़ा और इन सबकी आर्थिक तथा सामाजिक लागत कितनी रही।
फिर देश के सामने फैसला रखा जाए।
क्या NTA इस जिम्मेदारी के योग्य है?
यदि उत्तर हां है, तो उसे कठोरतम जवाबदेही के साथ पुनर्गठित किया जाए।
यदि उत्तर नहीं है, तो नई संस्था बनाई जाए।
इतना सरल।
अंततः सवाल NTA का नहीं, राज्य की विश्वसनीयता का है
किसी लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी पूंजी उसके पास हथियार, बहुमत या प्रचार तंत्र नहीं होता।
उसकी सबसे बड़ी पूंजी होती है—विश्वास।
एक छात्र जब परीक्षा केंद्र में बैठता है, तो वह राज्य पर विश्वास करता है।
वह मानता है कि व्यवस्था उसके खिलाफ नहीं होगी।
वह मानता है कि प्रश्नपत्र निष्पक्ष होगा।
वह मानता है कि उत्तर सही जांचे जाएंगे।
वह मानता है कि शिकायत करने पर कोई सुनेगा।
वह मानता है कि यदि सरकार ने कोई संस्था बनाई है तो वह संस्था उसके भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं करेगी।
यह विश्वास टूटना किसी भी प्रश्नपत्र की गलती से बड़ा संकट है।
आज English, Commerce और Sociology हैं।
कल कोई और विषय होगा।
और यदि हर बार सरकार का उत्तर यही रहा कि “हमने सुधार कर दिया है”, तो एक दिन छात्र पूछेगा—
“सुधार किसका हुआ—संस्था का या केवल प्रेस विज्ञप्ति का?”
भारत सरकार के सामने अब चुनाव बहुत साफ है।
एक तरफ अपनी बनाई हुई संस्था को बचाने की राजनीतिक जिद है।
दूसरी तरफ छात्रों के भविष्य, परीक्षा की विश्वसनीयता और सार्वजनिक संस्थाओं की जवाबदेही है।
लोकतंत्र में सही विकल्प स्पष्ट होना चाहिए।
सरकार का धर्म किसी संस्था को बचाना नहीं, नागरिक के अधिकार को बचाना है।
NTA बनी थी छात्रों की परीक्षा को विश्वसनीय बनाने के लिए।
यदि वही संस्था बार-बार छात्रों को परीक्षा, पुनर्परीक्षा, विवाद, आंदोलन और अनिश्चितता के चक्र में धकेल रही है, तो सवाल पूछना अब विरोध नहीं—लोकतांत्रिक कर्तव्य है।
और BJP सरकार को यह सवाल राजनीतिक हमला समझने के बजाय आत्ममंथन का अवसर समझना चाहिए।
क्योंकि अंततः इतिहास यह नहीं पूछेगा कि NTA को कितनी बार बचाया गया।
इतिहास यह पूछेगा—
जब लाखों युवा निष्पक्ष अवसर मांग रहे थे, तब सरकार ने संस्था की प्रतिष्ठा बचाई थी या युवाओं का भविष्य?
यही इस पूरे विवाद का असली प्रश्न है।
और इसका उत्तर केवल री-एग्जाम से नहीं मिलेगा।
उत्तर एक ऐसी परीक्षा व्यवस्था बनाकर देना होगा जिस पर अगली पीढ़ी बिना डरे भरोसा कर सके।
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