MMDR Amendment Bill 2026:विश्लेषण एवं किसान की जमीन का अधिग्रहण नहीं, 100 साल की साझेदारी क्यों और कैसे?
MMDR Amendment Bill 2026 पर किसान-केंद्रित विश्लेषण: खनन परियोजनाओं में जमीन अधिग्रहण के बजाय मुआवजे और 100 साल की साझेदारी का मॉडल क्यों जरूरी है?
By- Ch. Sudhir Taliyan
भूमिका
भारत के गांवों में जमीन सिर्फ जमीन नहीं होती। वह किसान की आजीविका है, परिवार की सुरक्षा है, आने वाली पीढ़ियों की उम्मीद है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी पूंजी है। इसलिए जब किसी कृषि भूमि के नीचे कोई महत्वपूर्ण खनिज मिलने की खबर आती है, तो सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि उस खनिज को कितनी जल्दी निकाला जा सकता है। असली सवाल यह होना चाहिए कि उस जमीन के मालिक किसान का भविष्य क्या होगा?
खनिज देश की संपत्ति हैं और भारत को अपने critical तथा strategic minerals की जरूरत भी है। ऊर्जा सुरक्षा, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स, निर्माण और आधुनिक उद्योगों के लिए घरेलू खनिज संसाधनों का विकास जरूरी है। लेकिन विकास की इस दौड़ में किसान को उसकी जमीन से अलग करके केवल एक बार का मुआवजा देना क्या न्यायसंगत मॉडल है?
Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 ने इसी व्यापक बहस को फिर सामने ला दिया है। संसद ने अगस्त 2026 में विधेयक पारित कर दिया है और 15 अगस्त 2026 तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह राष्ट्रपति की मंजूरी की प्रतीक्षा में है। विधेयक का एक प्रमुख उद्देश्य mineral rights और mineral-bearing lands पर राज्यों द्वारा लगाए जाने वाले कर, cess और अन्य levies को केंद्र द्वारा निर्धारित शर्तों के अधीन करना है। सरकार का तर्क है कि इससे mining taxation में एकरूपता, निवेश की निश्चितता और खनन क्षेत्र की आर्थिक व्यवहार्यता बढ़ेगी।
लेकिन किसान के नजरिए से सवाल अलग है।
खनिज निकलेगा तो किसान को क्या मिलेगा?
जमीन जाएगी तो उसकी आने वाली पीढ़ियों का क्या होगा?
और क्या किसान को केवल जमीन की कीमत देकर खनिज संपदा से हमेशा के लिए अलग कर देना ही विकास का रास्ता है?
इसका जवाब “अधिग्रहण” के बजाय दीर्घकालिक साझेदारी में खोजा जाना चाहिए।
MMDR Amendment Bill 2026 का मूल विवाद क्या है?
1957 का MMDR Act भारत में खनिजों के विकास, संरक्षण, अन्वेषण और खनन अधिकारों के नियमन का प्रमुख कानून है। 2026 में प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य mining sector को अधिक predictable regulatory और fiscal framework देना है। सरकार का कहना है कि अलग-अलग राज्यों द्वारा अलग-अलग tax, cess और levies लगाने से mining projects की लागत बढ़ सकती है और निवेश प्रभावित हो सकता है।
विधेयक के तहत mineral rights तथा mineral-bearing lands पर राज्यों की नई taxation powers को केंद्र द्वारा निर्धारित conditions और restrictions से जोड़ा जा रहा है। इससे केंद्र और राज्यों के बीच fiscal federalism का प्रश्न भी खड़ा हुआ है।
यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 2024 के Mineral Area Development Authority v. Steel Authority of India फैसले में राज्यों की mineral rights पर taxation power को लेकर महत्वपूर्ण व्याख्या की थी। फैसले में राज्यों की संवैधानिक taxing authority और mineral development के बीच संबंध पर विस्तार से विचार किया गया था।
यानी 2026 का संशोधन केवल mining companies की लागत का मामला नहीं है। यह केंद्र-राज्य संबंध, सार्वजनिक राजस्व और प्राकृतिक संसाधनों के आर्थिक वितरण से भी जुड़ा प्रश्न है।
किसान के लिए सबसे बड़ा सवाल: जमीन का क्या होगा?
MMDR कानून को सीधे land acquisition law समझना सही नहीं होगा। केवल इस विधेयक के पारित होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किसी किसान की निजी जमीन अपने आप mining company को मिल जाएगी।
लेकिन वास्तविक समस्या इससे ज्यादा जटिल है।
यदि किसी क्षेत्र में खनिज की खोज होती है, तो उसके आसपास mining lease, roads, railway siding, processing plants, dumping sites, power infrastructure, pipelines और अन्य परियोजनाओं की जरूरत पैदा हो सकती है।
इसका अर्थ है कि किसान की जमीन पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दबाव बढ़ सकता है।
और यहीं हमारी वर्तमान सोच की सबसे बड़ी कमी दिखाई देती है।
हम किसान की जमीन को अक्सर एक एकमुश्त संपत्ति मान लेते हैं, जबकि किसान के लिए जमीन एक चलती हुई पीढ़ीगत आय है।
आज पांच एकड़ जमीन बेचकर किसान को 50 लाख या एक करोड़ रुपये मिल जाएं, लेकिन उसके बाद खेती से होने वाली नियमित आय बंद हो जाए तो वह पैसा कितने वर्षों तक परिवार चला पाएगा?
यह सवाल केवल compensation की राशि से हल नहीं होता।
एक बार का मुआवजा किसान का भविष्य नहीं खरीद सकता
मान लीजिए किसी किसान की जमीन खनन परियोजना के लिए ली जाती है।
उसे बाजार मूल्य के अनुसार compensation मिल जाता है।
कुछ समय के लिए उसके पास बड़ी रकम आ जाती है।
लेकिन इसके बाद?
खेती की जमीन समाप्त।
स्थायी कृषि आय समाप्त।
गांव की सामाजिक स्थिति बदल गई।
आने वाली पीढ़ियों के पास पुश्तैनी जमीन नहीं रही।
यदि खनिज परियोजना 50 या 70 साल चलती है, तो किसान के परिवार को उस खनिज से मिलने वाली विशाल आर्थिक आय में उसका हिस्सा कहां है?
यहीं से एक नए मॉडल की आवश्यकता सामने आती है।
किसान की जमीन का अधिग्रहण नहीं—किसान के साथ दीर्घकालिक साझेदारी।
100 साल की किसान-परियोजना साझेदारी: एक वैकल्पिक मॉडल
किसान की जमीन को पूरी तरह अधिग्रहित करने के बजाय सरकार और mining company को ऐसा मॉडल बनाना चाहिए जिसमें किसान landowner-partner बने।
मेरी दृष्टि में इसकी न्यूनतम अवधि 100 वर्ष होनी चाहिए।
यह सुनने में लंबी अवधि लग सकती है, लेकिन mining projects भी सामान्यतः कुछ वर्षों के छोटे कारोबार नहीं होते। कई खनन क्षेत्रों में infrastructure, exploration और extraction का आर्थिक जीवन कई दशकों तक चलता है।
इसलिए किसान को भी उसी लंबी अवधि के आर्थिक ढांचे में शामिल किया जाना चाहिए।
मॉडल कुछ इस प्रकार हो सकता है:
किसान जमीन का मालिक बना रहे।
परियोजना को जमीन का 100 वर्ष तक का registered lease/partnership right दिया जाए।
किसान को शुरुआत में:
-
उचित और स्वतंत्र मूल्यांकन के आधार पर land compensation,
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rehabilitation support,
-
तत्काल आर्थिक सहायता,
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परिवार के लिए livelihood package
दिया जाए।
इसके साथ किसान को हर वर्ष:
lease rent + project revenue share + mineral-linked benefit + inflation-linked payment
मिले।
इस प्रकार किसान केवल जमीन बेचने वाला व्यक्ति नहीं रहेगा।
वह परियोजना का दीर्घकालिक भागीदार बनेगा।
100 साल की साझेदारी क्यों जरूरी?
क्योंकि खनिज एक बार निकलेगा, लेकिन उसका आर्थिक मूल्य वर्षों तक पैदा हो सकता है।
यदि किसान की जमीन के नीचे करोड़ों- अरबों रुपये का mineral deposit है, तो जमीन के मालिक को केवल जमीन की surface value देकर पूरे resource chain से बाहर करना न्यायसंगत नहीं लगता।
उदाहरण के लिए, यदि किसी क्षेत्र में किसान की जमीन के नीचे ऐसा mineral है जिससे दशकों तक mining होती है, तो किसान को भी project economics में भागीदारी मिलनी चाहिए।
यह भागीदारी केवल symbolic नहीं होनी चाहिए।
उसका कानूनी, वित्तीय और उत्तराधिकार योग्य अधिकार होना चाहिए।
यानी किसान के बाद उसके बच्चे और आगे की पीढ़ियां भी उस partnership benefit की हकदार हों।
किसान को केवल royalty नहीं, project partnership क्यों?
एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि किसान को royalty share क्यों दिया जाए?
इसका उत्तर सरल है।
खनन परियोजना में तीन प्रमुख चीजें होती हैं:
प्राकृतिक संसाधन + भूमि + पूंजी।
Mining company पूंजी और तकनीक लाती है।
सरकार regulatory framework और mineral rights की व्यवस्था करती है।
लेकिन जिस भूमि पर project खड़ा होता है, वह किसी किसान की हो सकती है।
तो किसान को केवल “compensation recipient” क्यों माना जाए?
उसे land contributor माना जा सकता है।
यही सोच ग्रामीण भारत में संपत्ति के वितरण को बदल सकती है।
प्रस्तावित किसान Partnership Model कैसा हो?
एक व्यावहारिक मॉडल में पांच स्तर होने चाहिए।
1. भूमि स्वामित्व की सुरक्षा
किसान का title समाप्त न हो।
उसकी जमीन का ownership right सुरक्षित रहे।
Project को lease/partnership right मिले, ownership नहीं।
2. प्रारंभिक पूर्ण मुआवजा
किसान को केवल circle rate नहीं बल्कि स्वतंत्र market assessment, भविष्य के land-use potential और project impact को ध्यान में रखते हुए compensation मिले।
3. वार्षिक भूमि-लीज भुगतान
100 वर्षों तक inflation-linked annual lease rent हो।
यह भुगतान परिवार की स्थायी आय का आधार बन सकता है।
4. Project revenue share
Mining project से होने वाली net distributable revenue/profit में किसानों के लिए legally defined हिस्सा होना चाहिए।
यह हिस्सा project की viability को ध्यान में रखते हुए तय किया जा सकता है, लेकिन इतना अवश्य हो कि किसान को वास्तविक economic participation मिले।
5. पीढ़ीगत अधिकार
किसान की मृत्यु के बाद partnership benefit उसके कानूनी उत्तराधिकारियों को मिलता रहे।
यानी जमीन केवल आज के किसान की नहीं, आने वाली पीढ़ियों की भी आर्थिक सुरक्षा बने।
इससे सरकार और mining company को भी फायदा होगा
यह मॉडल केवल किसान के लिए लाभकारी नहीं होगा।
Mining company को भी इससे सामाजिक स्वीकार्यता मिल सकती है।
आज land acquisition के कारण कई projects में सबसे बड़ी समस्या जमीन नहीं, बल्कि trust deficit होता है।
यदि किसान कहे—
“मेरी जमीन जा रही है और बदले में मुझे एक बार पैसा मिलेगा।”
तो स्वाभाविक रूप से असुरक्षा पैदा होती है।
लेकिन यदि वही किसान कहे—
“मेरी जमीन परियोजना में लगी है और मैं अगले 100 वर्षों तक इस परियोजना का भागीदार हूं।”
तो संबंध बदल जाता है।
विरोध की जगह partnership आ सकती है।
MMDR Bill की सबसे बड़ी कमी: किसान को केंद्र में न रखना
2026 के संशोधन का विमर्श मुख्यतः mining investment, tax certainty, mineral production और regulatory efficiency पर केंद्रित है।
Industry ने भी विधेयक का स्वागत करते हुए इसे अधिक predictable और investment-friendly framework बताया है।
सरकार का economic argument भी समझ में आता है—यदि अलग-अलग राज्यों में mining taxation बहुत असंगत हो तो investment और production प्रभावित हो सकते हैं। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार केंद्र ने भी market fragmentation और अलग-अलग state levies को कम करने को अपने प्रमुख तर्कों में रखा है।
लेकिन किसान welfare के दृष्टिकोण से प्रश्न यह है:
क्या mining sector की investment certainty के साथ landowner certainty भी उतनी ही मजबूत की गई है?
यहीं विधेयक की सबसे बड़ी कमी दिखाई देती है।
राज्य के राजस्व का सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं
खनिज संपदा वाले राज्यों का तर्क है कि mineral-rich regions को अपनी प्राकृतिक संपदा से पर्याप्त राजस्व मिलना चाहिए।
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अगस्त 2026 में केंद्र से विधेयक पर पुनर्विचार की मांग करते हुए कहा कि राज्य का Mineral Bearing Land Cess लगभग ₹7,110 करोड़ सालाना संभावित राजस्व देता है।
ओडिशा में भी इस मुद्दे पर राजनीतिक विरोध सामने आया है और पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने राज्य के mineral revenues तथा federal rights की रक्षा के लिए विशेष विधानसभा सत्र की मांग की है।
इस विवाद का सीधा असर किसान पर भले न दिखाई दे, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से पड़ सकता है।
खनिज क्षेत्र से मिलने वाला सार्वजनिक राजस्व अगर घटता है, तो mining-affected districts में roads, drinking water, health, education और rehabilitation जैसी सार्वजनिक जरूरतों के लिए fiscal space प्रभावित हो सकता है।
पुराने बकायों को लेकर भी सवाल
विधेयक का एक विवादास्पद पहलू पुराने unpaid या unrecovered state levies से जुड़ा है।
विधेयक का उद्देश्य कुछ पुराने बकायों को invalid करना है, जबकि पहले से paid amounts को अलग तरीके से treat किया गया है। इस व्यवस्था को लेकर समानता और fairness के प्रश्न उठे हैं।
यह केवल सरकार और mining company के बीच का हिसाब नहीं है।
सार्वजनिक revenue अंततः जनता की संपत्ति है।
यदि किसी mineral-rich राज्य के पास mining-related revenue आता है तो वह पैसा theoretically सार्वजनिक infrastructure और welfare में लगाया जा सकता है।
इसलिए किसी पुराने revenue claim को समाप्त करने का सवाल public finance और public accountability से भी जुड़ा है।
Mineral-bearing land की परिभाषा क्यों महत्वपूर्ण है?
2026 के Bill में “mineral-bearing lands” को regulatory framework में अधिक स्पष्ट महत्व मिलना बेहद महत्वपूर्ण है।
इसका मतलब यह है कि भविष्य में जमीन और उसके नीचे मौजूद mineral resource के बीच कानूनी और आर्थिक संबंध पर ज्यादा ध्यान देना होगा।
लेकिन किसान के हित में एक सवाल अनिवार्य है:
यदि जमीन को mineral-bearing घोषित किया जाता है तो क्या उस जमीन के मालिक को इसकी जानकारी, संभावित resource value और project potential की पूरी जानकारी दी जाएगी?
किसान को ऐसी स्थिति में information disadvantage में नहीं रखा जाना चाहिए।
क्योंकि जानकारी ही आज की अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ी शक्ति है।
किसान की जमीन की कीमत केवल आज की कृषि आय से क्यों तय नहीं होनी चाहिए?
खनन परियोजना वाली जमीन की valuation में कम-से-कम चार चीजें शामिल होनी चाहिए:
पहला—वर्तमान market value।
दूसरा—कृषि से मिलने वाली भविष्य की आय।
तीसरा—भूमि के strategic/project potential का मूल्य।
चौथा—खनिज परियोजना से उत्पन्न economic value में landowner का हिस्सा।
यदि केवल पहले factor को compensation का आधार बनाया गया तो किसान को असमान सौदे में धकेला जा सकता है।
पर्यावरणीय नुकसान का मुआवजा कौन देगा?
खनन परियोजना से केवल जमीन नहीं बदलती।
पानी, हवा, मिट्टी, सड़क, पशुपालन, खेती और स्थानीय ecology भी प्रभावित हो सकती है।
इसलिए compensation केवल जमीन मालिक को दिया जाना पर्याप्त नहीं है।
एक Community Environmental Compensation Fund होना चाहिए।
इसमें mining company का अनिवार्य योगदान हो और इसका उपयोग:
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groundwater restoration,
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village ponds,
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agricultural soil restoration,
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health screening,
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livestock support,
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rural roads,
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drinking water,
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environmental monitoring
पर किया जाए।
ग्राम सभा और किसान समिति को अधिकार
खनन परियोजना के लिए स्थानीय लोगों की भागीदारी केवल औपचारिक जनसुनवाई तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
जहां कानूनन Gram Sabha या अन्य स्थानीय संस्थाओं की भूमिका लागू होती है, वहां उनकी भागीदारी वास्तविक होनी चाहिए।
इसके अतिरिक्त प्रत्येक बड़े mining project में Landowner Partnership Council बनाया जा सकता है।
इसमें शामिल हों:
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landowners,
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marginal farmers,
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agricultural labourers,
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women representatives,
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local elected representatives,
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project company,
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district administration.
यह परिषद compensation, employment, environmental compliance और annual community investment की समीक्षा करे।
रोजगार का वादा नहीं, रोजगार की गारंटी
अक्सर mining project आते समय स्थानीय लोगों को रोजगार का आश्वासन दिया जाता है।
लेकिन आधुनिक mining highly mechanised होती जा रही है।
इसलिए “project आएगा तो jobs आएंगी” कहना पर्याप्त नहीं है।
कानून में project-affected families के लिए:
skill training + minimum employment quota + contractor employment protection + local enterprise development
का framework होना चाहिए।
https://politicsinsightindia.com/new/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
किसान की जमीन लेने के बाद उसके बेटे को बाहर जाकर नौकरी खोजने के लिए मजबूर करना development नहीं कहलाया जा सकता।
Mining project खत्म होने के बाद किसान का क्या?
यह सवाल सबसे कम पूछा जाता है।
खनिज समाप्त हो जाएगा।
कंपनी project बंद कर सकती है।
लेकिन गांव वहीं रहेगा।
इसलिए 100 साल की partnership में mine closure liability स्पष्ट होनी चाहिए।
Project बंद होने पर:
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land restoration,
-
soil reclamation,
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water body restoration,
-
plantation,
-
pollution remediation
की जिम्मेदारी mining company की हो।
और यदि landowner की जमीन वापस usable form में मिल सकती है, तो उसका restoration legally enforceable होना चाहिए।
क्या 100 साल की साझेदारी व्यावहारिक है?
हाँ, लेकिन इसके लिए मजबूत कानून और contract architecture जरूरी होगा।
यह केवल भावनात्मक प्रस्ताव नहीं होना चाहिए।
साझेदारी agreement में स्पष्ट होना चाहिए:
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100 वर्ष की अवधि;
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annual rent;
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inflation index;
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revenue/profit sharing formula;
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mineral price disclosure;
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independent audit;
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inheritance rights;
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transfer restrictions;
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environmental compensation;
- https://politicsinsightindia.com/new/ncdc-amendment-bill-2026-cooperative-farmers-rural-economy-accountability
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mine closure obligations;
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dispute resolution;
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termination conditions;
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farmer consent mechanism।
सारी payments banking system के माध्यम से हों और project की mineral production तथा revenue figures publicly auditable हों।
किसान को कंपनी के हिसाब-किताब का अधिकार भी मिले
यदि किसान revenue sharing partner है तो उसे केवल पैसा लेने का अधिकार नहीं, बल्कि information का अधिकार भी होना चाहिए।
कितना mineral निकला?
कितनी कीमत पर बेचा गया?
कितना export हुआ?
कितना royalty दिया गया?
https://politicsinsightindia.com/new/upi-bill-2026-merchant-consumer-government-mdr-analysis
कितना auction premium दिया गया?
कंपनी का declared revenue कितना है?
इन सभी आंकड़ों की independent audit व्यवस्था होनी चाहिए।
वरना revenue-sharing clause कागज पर अच्छा और जमीन पर कमजोर साबित हो सकता है।
असली सुधार यही होगा: “Land Acquisition” से “Land Partnership” की ओर
भारत को mineral development चाहिए।
लेकिन भारत को ऐसा mineral development चाहिए जिसमें किसान केवल project का बाधक न समझा जाए।
किसान को project का stakeholder बनाया जाए।
खनिज निकालने वाली कंपनी को investor माना जाए।
सरकार को regulator और public trustee माना जाए।
और भूमि मालिक किसान को long-term land partner माना जाए।
यही संतुलित मॉडल हो सकता है।
MMDR Amendment Bill 2026 पर किसान हित में पांच बड़े सुधार
यदि सरकार वास्तव में “Ease of Doing Business” के साथ “Ease of Living” भी चाहती है, तो पांच सुधार जरूरी हैं:
1. Private agricultural land के लिए compulsory acquisition को अंतिम विकल्प बनाया जाए
पहले lease, consent-based partnership और negotiated long-term land use का विकल्प हो।
2. न्यूनतम 100 वर्ष की land partnership व्यवस्था
किसान ownership बनाए रखे और project को दीर्घकालिक उपयोग अधिकार मिले।
3. Compensation + Annual Rent + Revenue Share
किसान को एक बार का मुआवजा देकर संबंध समाप्त न किया जाए।
4. पीढ़ीगत अधिकार
किसान के legal heirs को partnership benefits जारी रहें।
5. Public और Community Resources की सुरक्षा
तालाब, चरागाह, groundwater, common land और agricultural ecosystem का स्वतंत्र valuation और protection हो।
निष्कर्ष: भारत की खनिज संपदा का मालिक कौन?
यह प्रश्न जितना कानूनी है, उतना ही नैतिक भी।
खनिज देश के विकास के लिए जरूरी हैं। Mining sector में निवेश, technology और production बढ़ाना भी जरूरी है। Critical minerals के क्षेत्र में भारत को तेजी से आगे बढ़ना होगा।
लेकिन विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि गांव की जमीन चली जाए और किसान को केवल एक cheque देकर कहा जाए कि अब आपका काम खत्म।
किसान की जमीन कोई disposable asset नहीं है।
यदि किसी परियोजना को उस जमीन की आवश्यकता है तो किसान को परियोजना में भागीदार बनाया जाना चाहिए।
जमीन का अधिग्रहण नहीं—दीर्घकालिक साझेदारी।
एकमुश्त मुआवजा नहीं—मुआवजे के साथ नियमित आय।
केवल रोजगार का वादा नहीं—कानूनी रोजगार और आर्थिक भागीदारी।
केवल आज का किसान नहीं—आने वाली पीढ़ियों का अधिकार।
100 वर्ष की partnership का विचार इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण नीति विकल्प हो सकता है।
भारत को ऐसी mining policy चाहिए जिसमें खनिज भी निकले, उद्योग भी बढ़े, देश की strategic जरूरतें भी पूरी हों और किसान की जमीन भी उसकी आर्थिक स्वतंत्रता का आधार बनी रहे।
आखिर विकास की सबसे बड़ी परीक्षा यह नहीं है कि जमीन से कितना खनिज निकला।
विकास की असली परीक्षा यह है कि उस खनिज से गांव के किसान के जीवन में कितना स्थायी सुधार आया।
और यदि किसी किसान की जमीन भारत की औद्योगिक प्रगति में योगदान दे रही है, तो उस किसान को केवल मुआवजे का पात्र नहीं, भारत की खनिज अर्थव्यवस्था का दीर्घकालिक साझेदार बनाया जाना चाहिए।
यही प्राकृतिक संसाधनों के न्यायपूर्ण उपयोग की दिशा में एक अधिक किसान-केंद्रित रास्ता हो सकता है।
Editorial note: इस लेख में 100 वर्ष की साझेदारी का मॉडल एक नीतिगत सुझाव है; यह MMDR Amendment Bill 2026 में मौजूद प्रावधान के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। विधेयक के वर्तमान विवादों और उसके आर्थिक उद्देश्यों को उपलब्ध 2026 रिपोर्टिंग तथा न्यायिक रिकॉर्ड के आधार पर अलग रखा गया है।
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