“मुसलमान नहीं होने चाहिए तो हिंदू नहीं”: भागवत के बयान के बाद सबसे बड़ा सवाल—अनुषांगिक संगठनों पर कौन लगाएगा लगाम?
मोहन भागवत के “मुसलमानों के बिना भारत नहीं” वाले बयान ने नई बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि RSS के समावेशी संदेश और अनुषांगिक संगठनों की विवादित बयानबाजी के बीच आखिर इतना बड़ा अंतर क्यों है?
लेखक: चौधरी सुधीर तालीयान
न्यूयॉर्क से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का एक बयान भारत की राजनीति और सामाजिक विमर्श में फिर एक बड़ा प्रश्न छोड़ गया है। उन्होंने कहा कि यदि कोई हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रहेगा। उन्होंने मानव गरिमा, धार्मिक विविधता और “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को हिंदू चिंतन का हिस्सा बताते हुए धार्मिक बहिष्कार को अस्वीकार किया।
यह बयान सुनने में जितना स्पष्ट और सकारात्मक है, उसके बाद उठने वाला प्रश्न उतना ही कठिन है।
यदि RSS वास्तव में धार्मिक सद्भाव और सभी नागरिकों के सम्मान के पक्ष में है, तो फिर उसके व्यापक वैचारिक परिवार से जुड़े कुछ संगठनों के विवादास्पद बयानों और गतिविधियों पर प्रभावी लगाम क्यों दिखाई नहीं देती?
यही वह प्रश्न है जिसे केवल भागवत के एक बयान से समाप्त नहीं किया जा सकता।
क्योंकि राजनीति में केवल शीर्ष नेतृत्व के शब्द महत्वपूर्ण नहीं होते। उतना ही महत्वपूर्ण यह भी होता है कि जमीन पर संगठन के नाम, विचारधारा और प्रभाव से जुड़े लोग क्या कर रहे हैं।
न्यूयॉर्क का बयान स्वागत योग्य है—लेकिन पर्याप्त नहीं
भागवत का न्यूयॉर्क संदेश स्पष्ट था। उन्होंने कहा कि मानवता एक है और विविधता को स्वीकार, सम्मान और संरक्षित किया जाना चाहिए।
इस बयान का स्वागत होना चाहिए।
भारत जैसे बहुधार्मिक समाज में किसी भी प्रभावशाली संगठन के शीर्ष नेता द्वारा यह कहना कि मुसलमानों को भारत से बाहर करने की सोच हिंदुत्व नहीं है, सामाजिक तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण संदेश हो सकता है।
लेकिन भारत की जनता केवल भाषण नहीं सुनती। वह अपने आसपास की राजनीति भी देखती है।
वह देखती है कि किसी नेता के भाषण में सद्भाव की बात हो रही है, लेकिन उसी समय किसी दूसरे मंच से धार्मिक ध्रुवीकरण की भाषा क्यों निकलती है।
वह पूछती है कि यदि संगठन की मूल भावना समावेशी है, तो संगठन से वैचारिक रूप से जुड़े लोगों के विवादित बयानों पर तत्काल और सार्वजनिक कार्रवाई क्यों नहीं होती?
यहीं से भागवत के संदेश की असली परीक्षा शुरू होती है।
RSS कहता है—संबद्ध संगठन स्वतंत्र हैं
इस प्रश्न पर RSS का अपना उत्तर भी स्पष्ट है।
जनवरी 2026 में भागवत ने कहा था कि BJP, VHP और Vidya Bharti जैसे संगठन RSS द्वारा “remote controlled” नहीं होते। उनके अनुसार RSS स्वयंसेवकों में विचार और मूल्य विकसित करता है, लेकिन वे अलग-अलग संगठनों में अपनी-अपनी संवैधानिक संरचना के अनुसार स्वतंत्र रूप से निर्णय लेते हैं।
2025 में भी RSS की आधिकारिक वेबसाइट पर भागवत ने कहा था कि संघ के “subordinate organisations” नहीं हैं; संबद्ध संगठन स्वतंत्र, स्वायत्त और आत्मनिर्भर हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अलग-अलग संगठनों के बीच मतभेद होना संभव है।
यहीं RSS की संरचना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है।
विचार एक हो सकते हैं, लेकिन संगठन अलग-अलग हैं।
यह व्यवस्था RSS को एक विशाल सामाजिक नेटवर्क बनाने में मदद करती है। शिक्षा से लेकर मजदूर, किसान, छात्र, धार्मिक गतिविधियों, सेवा और राजनीति तक विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग संगठन काम करते हैं।
लेकिन इसी मॉडल की सबसे बड़ी चुनौती जवाबदेही है।
यदि संगठन स्वतंत्र हैं, तो उनके विवादास्पद कार्यों की जिम्मेदारी किसकी होगी?
और यदि वे वैचारिक रूप से एक बड़े परिवार का हिस्सा हैं, तो उस परिवार के शीर्ष नेतृत्व की नैतिक जिम्मेदारी कहां समाप्त होती है?
स्वायत्तता या जवाबदेही से दूरी?
स्वायत्तता किसी भी लोकतांत्रिक संगठन के लिए अच्छी चीज है।
लेकिन स्वायत्तता का अर्थ जवाबदेही से मुक्ति नहीं हो सकता।
मान लीजिए किसी विचारधारा से जुड़े दस संगठन अलग-अलग नामों से काम कर रहे हैं। उनमें से नौ सामाजिक सेवा कर रहे हैं और दसवां ऐसा बयान देता है जिससे समाज में तनाव पैदा होता है।
RSS कह सकता है—“वह संगठन स्वतंत्र है।”
कानूनी दृष्टि से यह बात सही हो सकती है।
लेकिन सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से जनता फिर पूछेगी:
क्या उस विचारधारा का शीर्ष नेतृत्व सार्वजनिक रूप से उस बयान की निंदा करेगा?
यदि करेगा, तो कितनी स्पष्टता से?
क्या संबंधित व्यक्ति को संगठनात्मक मंच से हटाया जाएगा?
क्या उससे दूरी बनाई जाएगी?
क्या यह कहा जाएगा कि ऐसी भाषा RSS की मूल मान्यता के विरुद्ध है?
यही वे ठोस कदम हैं जिनसे किसी संगठन की वैचारिक प्रतिबद्धता की विश्वसनीयता बनती है।
संगठन का प्रभाव जितना बड़ा, नैतिक जिम्मेदारी उतनी बड़ी
RSS आज कोई छोटा सामाजिक समूह नहीं है। विभिन्न अध्ययनों और रिपोर्टों में उसके व्यापक संगठनात्मक नेटवर्क का उल्लेख किया गया है। 2026 में The Diplomat ने एक ऐसे डेटाबेस का हवाला दिया जिसमें RSS से जुड़े 2,500 से अधिक संगठनों का मानचित्रण किया गया है।
इस नेटवर्क में राजनीतिक, धार्मिक, शैक्षिक, श्रमिक, किसान, छात्र और सामाजिक क्षेत्र के संगठन शामिल बताए जाते हैं।
ऐसे विशाल नेटवर्क में हर व्यक्ति के कथन या कार्रवाई को शीर्ष नेतृत्व से जोड़ना उचित नहीं होगा।
लेकिन इसके उलट यह कहना भी पर्याप्त नहीं है कि कोई जिम्मेदारी ही नहीं है।
प्रभाव के साथ जिम्मेदारी आती है।
यदि किसी संगठन का वैचारिक प्रभाव हजारों संस्थाओं तक पहुंचता है, तो शीर्ष नेतृत्व से अपेक्षा भी होगी कि वह स्पष्ट आचार-सीमा निर्धारित करे।
सिर्फ यह कहना कि “वे स्वतंत्र हैं” पर्याप्त नहीं होगा।
भागवत के बयान और जमीन की राजनीति के बीच दूरी
न्यूयॉर्क में भागवत ने कहा कि किसी हिंदू का मुसलमानों के निष्कासन में विश्वास करना हिंदुत्व नहीं है।
यह बात भारत में भी उतनी ही मजबूती से सुनाई जानी चाहिए।
क्योंकि भारत की असली परीक्षा विदेश में नहीं, गांव और शहर के मोहल्लों में होती है।
यदि किसी धार्मिक समुदाय के बारे में अपमानजनक भाषा इस्तेमाल की जाती है, तो क्या RSS के शीर्ष नेतृत्व की ओर से तत्काल प्रतिक्रिया आती है?
यदि किसी अल्पसंख्यक नागरिक के खिलाफ घृणा फैलाने वाला बयान दिया जाता है, तो क्या उसे उसी तीव्रता से खारिज किया जाता है जिस तीव्रता से विदेशी मंच पर समावेशिता की बात की जाती है?
यदि जवाब हां है, तो उसे सार्वजनिक और नियमित बनाना चाहिए।
यदि जवाब नहीं है, तो आलोचकों के सवाल स्वाभाविक हैं।
यह केवल RSS का नहीं, पूरे राजनीतिक तंत्र का प्रश्न है
यहां एक और महत्वपूर्ण बात समझनी होगी।
RSS और BJP के संबंध भारतीय राजनीति में लंबे समय से चर्चा का विषय रहे हैं। RSS स्वयं चुनावी राजनीतिक दल नहीं है, जबकि BJP चुनाव लड़ती है और सरकार चलाती है। भागवत ने स्वयं कहा है कि दोनों की कार्यप्रणाली अलग है और BJP स्वतंत्र रूप से निर्णय लेती है।
इसलिए हर BJP नेता के बयान की जिम्मेदारी RSS पर डालना भी सही नहीं होगा।
लेकिन राजनीतिक प्रभाव का संबंध केवल औपचारिक आदेशों से तय नहीं होता।
विचार, कार्यकर्ता, संगठनात्मक संस्कार और सामाजिक नेटवर्क भी राजनीति को प्रभावित करते हैं।
इसीलिए जनता का सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “कौन किसे आदेश देता है?”
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
सवाल इससे बड़ा होना चाहिए:
किस विचारधारा से किस प्रकार की सार्वजनिक संस्कृति पैदा हो रही है?
न्यूयॉर्क में विरोध ने दूसरा पक्ष भी सामने ला दिया
भागवत के कार्यक्रम का अमेरिका में विरोध भी हुआ। कई interfaith और civil-rights संगठनों ने कार्यक्रम पर आपत्ति जताई और कुछ हिंदू संगठनों ने भी कहा कि RSS उनका प्रतिनिधित्व नहीं करता।
अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग USCIRF ने भी RSS और उससे जुड़े कथित धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी मुद्दों को लेकर गंभीर आरोप लगाए तथा प्रतिबंधों की सिफारिश की। हालांकि ये सिफारिशें बाध्यकारी नहीं हैं और भारत सरकार ने USCIRF की आलोचना को पक्षपातपूर्ण बताया है।
https://politicsinsightindia.com/mmdr-amendment-bill-2026-farmer-land-acquisition-partnership
इस विवाद को एकतरफा देखना ठीक नहीं होगा।
RSS अपने आपको “Hindu-centric civilisational, cultural movement” बताता है और अपने सामाजिक कार्यों तथा धार्मिक सद्भाव के संदेश पर जोर देता है। दूसरी ओर आलोचक कहते हैं कि संगठन के वैचारिक प्रभाव और उससे जुड़े कुछ समूहों की राजनीति के बीच गंभीर विरोधाभास दिखाई देता है।
यही विरोधाभास अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी बहस का विषय बन गया है।
तो समाधान क्या है?
समाधान किसी संगठन पर प्रतिबंध लगाने में नहीं है।
समाधान स्पष्ट सार्वजनिक जवाबदेही में है।
यदि RSS कहता है कि मुसलमान भारत के बराबर नागरिक हैं, तो उसे इस सिद्धांत को अपने पूरे संगठनात्मक परिवार में स्पष्ट आचार-संहिता के रूप में स्थापित करना चाहिए।
धार्मिक घृणा के खिलाफ स्पष्ट नीति हो।
अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा या धमकी पर तत्काल सार्वजनिक निंदा हो।
किसी भी संबद्ध संगठन का पदाधिकारी यदि वैमनस्य फैलाने वाला बयान देता है, तो संगठनात्मक दूरी दिखाई जाए।
और सबसे महत्वपूर्ण—सद्भाव का संदेश केवल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नहीं, भारत की गलियों और राजनीतिक सभाओं में भी उतनी ही ताकत से सुनाई दे।
क्योंकि असली परीक्षा भाषण की नहीं, कार्रवाई की है
मोहन भागवत का न्यूयॉर्क बयान इतिहास में दर्ज होने लायक संदेश हो सकता है।
लेकिन इसे सार्थक बनाने के लिए भारत में इसकी संस्थागत प्रतिध्वनि दिखाई देनी चाहिए।
यदि कोई व्यक्ति मुसलमानों को भारत से बाहर करने की बात करता है और RSS प्रमुख कहते हैं कि ऐसी सोच हिंदुत्व नहीं है, तो अगला स्वाभाविक सवाल यही है:
https://politicsinsightindia.com/malda-70-infant-deaths-west-bengal-health-system-crisis
फिर ऐसी सोच रखने वालों के खिलाफ संगठनात्मक और सामाजिक कार्रवाई कब होगी?
यही प्रश्न RSS से भी है और BJP से भी।
और यही प्रश्न हर उस राजनीतिक संगठन से है जो धर्म, जाति या समुदाय के नाम पर समाज में प्रभाव रखता है।
लोकतंत्र में किसी संगठन का मूल्य केवल उसके घोषित आदर्शों से तय नहीं होता। उसकी असली पहचान इस बात से तय होती है कि वह अपने ही नाम, विचार और प्रभाव का दुरुपयोग करने वालों के साथ क्या करता है।
https://politicsinsightindia.com/vijay-shah-case-sit-prosecution-sanction-government-vs-justice
मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में कहा—मुसलमानों को भारत से बाहर करने वाला हिंदू नहीं रह सकता। अब भारत को यह देखना है कि यह संदेश केवल भाषण है या संगठनात्मक आचरण का सिद्धांत भी बनेगा।
क्योंकि वसुधैव कुटुम्बकम् की सबसे कठिन परीक्षा मंच पर नहीं, उस समय होती है जब अपने ही वैचारिक परिवार का कोई व्यक्ति दूसरे समुदाय के सम्मान को चोट पहुंचाता है।
और शायद यही वह जगह है जहां RSS को अपने सबसे कठिन प्रश्न का उत्तर देना होगा—
अनुषांगिक संगठनों पर लगाम क्यों नहीं, बल्कि स्पष्ट जवाबदेही क्यों नहीं?
क्योंकि लोकतंत्र में स्वतंत्रता जरूरी है, लेकिन स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही अनिवार्य है।
Get every story on your phone
Join our channel and never miss an update.
What's Your Reaction?