“12 साल, वही भाषण और वही बहाने: क्या मोदी सरकार ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ में फंस गई है?”

मोदी सरकार के 12 साल में किसान कर्ज, बेरोजगारी, शिक्षा, महंगाई, बढ़ते सरकारी कर्ज और जवाबदेही पर तीखे सवाल। क्या देश policy paralysis की ओर बढ़ रहा है?

“12 साल, वही भाषण और वही बहाने: क्या मोदी सरकार ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ में फंस गई है?”

भाषणों की चमक, जवाबदेही का अभाव और जनता की बढ़ती बेचैनी

By- Chaudhary Sudhir Talyan 

बारह साल किसी सरकार के लिए कम समय नहीं होते। बारह साल में सरकारें अपने शुरुआती वादों से आगे निकलकर अपने काम का ठोस हिसाब देती हैं। बारह साल में यह साफ हो जाना चाहिए कि देश किस दिशा में जा रहा है, अर्थव्यवस्था किसके लिए बढ़ रही है, किसान की आय किस स्तर पर पहुंची, विद्यार्थी के हाथ में रोजगार है या डिग्री, मध्यम वर्ग की जेब में राहत है या महंगाई, और सबसे महत्वपूर्ण—सत्ता अपने नागरिकों के सवालों का जवाब दे रही है या उनसे बच रही है।

लेकिन आज भारत के सामने एक असहज प्रश्न खड़ा है: क्या सरकार निर्णय लेने में असमर्थ हो रही है, या वह कठिन सवालों से बचने की राजनीतिक कला में अधिक सक्षम हो गई है?

इसे चिकित्सकीय अर्थ में “paralysis” कहना गलत होगा। यहां सवाल political paralysis और policy paralysis का है—ऐसी स्थिति जिसमें सत्ता चलती हुई दिखाई देती है, घोषणाएं होती रहती हैं, उद्घाटन होते रहते हैं, भाषण होते रहते हैं, लेकिन नागरिक के मूल संकट पर निर्णायक परिवर्तन दिखाई नहीं देता।

यही भारत की वर्तमान राजनीतिक बेचैनी का सबसे बड़ा प्रश्न है।

भाषण वही, सवाल नए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक भाषणों में एक स्थायी राजनीतिक संरचना दिखाई देती है—पुरानी सरकारों की विफलताओं का उल्लेख, राष्ट्रीय उपलब्धियों का प्रस्तुतीकरण, वैश्विक मंच पर भारत की शक्ति का वर्णन और भविष्य के बड़े लक्ष्य।

प्रधानमंत्री ने 2025 के NDTV World Summit में स्वयं 2014 से पहले के “policy paralysis” को याद करते हुए कहा था कि भारत उस दौर से बाहर निकल चुका है। उसी भाषण में महंगाई, विकास दर और भारत के वैश्विक आर्थिक स्थान को उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया गया।

लेकिन लोकतंत्र में समस्या यह है कि पुरानी सरकारों की गलतियां हमेशा के लिए वर्तमान सरकार का बचाव-कवच नहीं बन सकतीं।

2014 में जनता ने केवल सरकार बदलने के लिए वोट नहीं दिया था। उसने जवाबदेही की नई उम्मीद के लिए वोट दिया था।

बारह वर्ष बाद भी यदि हर असफलता की राजनीतिक व्याख्या “पहले ऐसा होता था” से शुरू होती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—फिर वर्तमान सरकार की अपनी जवाबदेही कहां है?

देश को यह जानना है कि 2014 के बाद क्या हुआ, न कि 2014 से पहले क्या हुआ था।

इतिहास महत्वपूर्ण है, लेकिन इतिहास को स्थायी बहाने में बदल देना शासन नहीं है।

किसान: नारा बहुत, निर्णायक सुरक्षा कम

भारत का किसान इस राजनीतिक कथा का सबसे बड़ा परीक्षण है।

कृषि क्षेत्र में कर्ज की समस्या कोई काल्पनिक राजनीतिक मुद्दा नहीं है। NSS की Situation Assessment Survey में 2018-19 के लिए 50.2% कृषि परिवारों के indebted होने और औसत बकाया ऋण ₹74,121 दर्ज किया गया था।

NABARD के 2021-22 NAFIS सर्वेक्षण में ग्रामीण परिवारों में outstanding debt की हिस्सेदारी 2016-17 के 47.4% से बढ़कर 52% दर्ज हुई। इसी सर्वेक्षण में कृषि परिवारों की औसत भूमि-जोते का आकार लगभग 1.08 हेक्टेयर से घटकर 0.74 हेक्टेयर होने की बात सामने आई।

यानी किसान के सामने जमीन छोटी हो रही है, लागत का दबाव बना हुआ है और ऋण की जरूरत खत्म नहीं हुई।

सरकार योजनाएं गिना सकती है। विपक्ष आंदोलन गिना सकता है। लेकिन किसान को अंततः तीन सवालों का उत्तर चाहिए:

फसल का लाभकारी मूल्य कौन देगा?
कर्ज का जोखिम कौन उठाएगा?
और प्राकृतिक, बाजार तथा नीतिगत जोखिम में किसान अकेला क्यों रहेगा?

जब किसान सड़क पर आता है तो लोकतंत्र को उसकी आवाज सुननी चाहिए। उसे barricade से रोक देना समस्या का समाधान नहीं है।

विद्यार्थी: डिग्री और रोजगार के बीच खाई

भारत का युवा भी इसी असंतोष का दूसरा चेहरा है।

PLFS 2023-24 के अनुसार 15–29 वर्ष आयु वर्ग के लिए usual status पर बेरोजगारी दर 10.2% थी। शिक्षित 15 वर्ष और उससे अधिक आयु वालों में यह दर 7.1% थी। शहरी युवा महिलाओं के लिए बेरोजगारी दर 20.1% दर्ज हुई।

ये आंकड़े यह नहीं कहते कि भारत में रोजगार नहीं बने। लेकिन वे यह जरूर बताते हैं कि युवा आबादी, शिक्षा और रोजगार के बीच संक्रमण अभी भी गंभीर चुनौती है।

देश में करोड़ों विद्यार्थी शिक्षा व्यवस्था में हैं। UDISE+ 2024-25 में लगभग 24.69 करोड़ विद्यार्थियों के school enrolment की रिपोर्ट है।

ऐसे देश में शिक्षा केवल “नई शिक्षा नीति” की घोषणा नहीं हो सकती।

शिक्षा का अर्थ है—अच्छे शिक्षक, प्रयोगशालाएं, शोध, सस्ती उच्च शिक्षा, रोजगार योग्य कौशल, निष्पक्ष परीक्षाएं और ऐसी अर्थव्यवस्था जो शिक्षित युवा को सम्मानजनक काम दे।

यदि विद्यार्थी वर्षों तक परीक्षा की तैयारी करता रहे और नौकरी की तलाश में उम्र पार कर दे, तो सत्ता के मंच से विकास की चमक उसे कितनी देर तक संतुष्ट करेगी?

अर्थव्यवस्था बढ़ती है, लेकिन सवाल भी बढ़ता है

सरकार की उपलब्धियों में GDP growth, infrastructure investment और भारत के दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में आने की चर्चा प्रमुख है। इन उपलब्धियों को नकारना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।

लेकिन GDP किसी परिवार की रसोई का पूरा हिसाब नहीं है।

आर्थिक विकास का दूसरा सवाल है—उस विकास का वितरण कैसा है?

एक तरफ पूंजी और संपत्ति का केंद्रीकरण बढ़ता है, दूसरी तरफ सामान्य परिवार महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास की लागत से दबता है। ऐसी स्थिति में केवल GDP की ऊंचाई दिखाकर आर्थिक संतोष की घोषणा करना अधूरा विश्लेषण है।

महंगाई की समस्या भी केवल headline inflation का विषय नहीं है। परिवार उस कीमत से परेशान होता है जो उसे दूध, दाल, सब्जी, स्कूल फीस, किराये, दवा और यात्रा में चुकानी पड़ती है।

गरीब के लिए महंगाई statistical average नहीं—रसोई का कटता हुआ बजट है।

देश पर कर्ज: सवाल आंकड़े का नहीं, दिशा का है

केंद्र सरकार की liabilities लगातार बढ़ी हैं। 2025-26 के Receipt Budget में 31 मार्च 2026 तक भारत सरकार की कुल internal और external debt तथा अन्य liabilities ₹196.79 लाख करोड़ अनुमानित थीं। उसी दस्तावेज में EBRs और cash balance adjustment सहित केंद्रीय सरकार की debt/liabilities लगभग ₹200.16 लाख करोड़ बताई गई हैं।

यहां एक जरूरी तथ्यात्मक सावधानी भी है: सरकारी कर्ज बढ़ना अपने-आप में विफलता का प्रमाण नहीं है। विकसित अर्थव्यवस्थाएं भी कर्ज लेती हैं। असली प्रश्न है—कर्ज लेकर क्या बनाया गया, उससे कितनी उत्पादक क्षमता पैदा हुई और भविष्य में उससे कितनी आय उत्पन्न होगी?

यहीं सरकार से कठोर जवाब मांगना चाहिए।

कर्ज बढ़ रहा है तो productive capacity भी उतनी ही मजबूत क्यों नहीं दिखाई देनी चाहिए?

यदि कर्ज infrastructure, manufacturing, research, education और रोजगार पैदा करने वाली productive assets में जाता है तो उसका आर्थिक औचित्य अलग है। लेकिन यदि राजकोषीय दबाव बढ़ता जाए और नागरिक को रोजगार, किसान को लाभकारी मूल्य तथा युवा को अवसर नहीं मिले, तो कर्ज की गुणवत्ता पर सवाल उठेंगे ही।

“नया बना रहे हैं या पुराना monetize कर रहे हैं?”

सरकार ने National Monetisation Pipeline को infrastructure assets से private capital जुटाने और नई infrastructure creation के लिए संसाधन उपलब्ध कराने की नीति के रूप में प्रस्तुत किया है।

2021 की NMP में FY2022–25 के लिए लगभग ₹6 लाख करोड़ के asset monetisation की indicative pipeline थी।

अब NMP 2.0 के तहत FY2025-26 से FY2029-30 तक लगभग ₹16.72 लाख करोड़ के monetisation value का लक्ष्य रखा गया है। इसमें highways, railways, power, ports, coal, mines, warehousing, telecom आदि शामिल हैं।

सरकार का तर्क है कि asset monetisation से private capital आएगा और उससे नए infrastructure projects को वित्त मिलेगा। इस तर्क को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।

लेकिन जनता का प्रश्न अधिक सीधा है:

संपत्ति का monetisation हो रहा है तो उसके बदले बनने वाली नई संपत्ति की गति, गुणवत्ता और रोजगार-क्षमता का सार्वजनिक हिसाब कहां है?

पुरानी संपत्तियों से मूल्य निकालना और नई productive capacity बनाना एक ही बात नहीं है।

देश को asset recycling चाहिए, लेकिन केवल asset extraction नहीं।

प्रशासन: नागरिक सेवा या सत्ता की दीवार?

लोकतंत्र की सबसे खतरनाक बीमारी वह होती है जब प्रशासन नागरिक को “समस्या” समझने लगे और सत्ता को “आदेश”।

किसान प्रदर्शन करे—barricade।

विद्यार्थी प्रश्न पूछे—बैरिकेड।

पत्रकार सवाल पूछे—पहचान और अनुमति की दीवार।

नागरिक सड़क पर आए—प्रशासनिक रोक।

यह कहना गलत होगा कि हर barricade लोकतंत्र-विरोधी है। कानून-व्यवस्था और सुरक्षा की वास्तविक जरूरतें होती हैं। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब प्रशासन संवाद की जगह अवरोध को अपना प्राथमिक उपकरण बना ले।

लोकतंत्र में पुलिस का काम सरकार को आलोचना से बचाना नहीं है।

पुलिस का काम कानून लागू करना है।

सरकार का काम जनता के सवालों का उत्तर देना है।

और लोकतंत्र का काम सत्ता को यह याद दिलाते रहना है कि जनता शासित प्रजा नहीं, संप्रभु नागरिक है।

प्रशासनिक खर्च का सवाल भी गंभीर है

Economic Survey 2025-26 के अनुसार केंद्र का pay & allowances expenditure FY22 के ₹2.49 लाख करोड़ से FY26 BE में ₹3.52 लाख करोड़ और interest payments ₹8.05 लाख करोड़ से ₹12.76 लाख करोड़ हुए। कुल revenue expenditure इसी अवधि में ₹32.01 लाख करोड़ से बढ़कर ₹39.44 हो गया है 

सरकार के बढ़ते खर्च में नागरिक के लिए कितना हिस्सा productive public investment है और कितना committed expenditure?

यही असली fiscal accountability है।

क्या जनता भाषणों से थक चुकी है?

यह दावा कि “पूरी जनता थक चुकी है” सर्वेक्षण के बिना तथ्य नहीं कहा जा सकता।

लेकिन लोकतंत्र में जनता की थकान का सबसे विश्वसनीय संकेत चुनावी परिणामों से ज्यादा सवालों की प्रकृति होती है।

जब लोग पूछते हैं—

नौकरी कहां है?
किसान की आय सुरक्षित क्यों नहीं?
शिक्षा इतनी महंगी क्यों है?
महंगाई का वास्तविक दबाव कब कम होगा?
कर्ज क्यों बढ़ रहा है?
सरकारी संपत्तियों के monetisation का अंतिम लाभ किसे मिलेगा?
सरकार आलोचना से इतना असहज क्यों होती है?
पुलिस नागरिक को रोकने में इतनी तत्पर और प्रशासन जवाब देने में इतना धीमा क्यों है?

—तो यह केवल विपक्ष का शोर नहीं है।

यह शासन की परीक्षा है।

सबसे बड़ा संकट: जवाबदेही का क्षरण

मोदी सरकार के सामने आज सबसे गंभीर राजनीतिक प्रश्न यह नहीं है कि प्रधानमंत्री कितने भाषण देते हैं।

प्रश्न यह है कि उन भाषणों के बाहर नागरिक को क्या बदलता हुआ दिखाई देता है।

यदि हर संकट का कारण पिछली सरकार है, हर उपलब्धि वर्तमान सरकार की है, हर आलोचना षड्यंत्र है और हर असहमति राष्ट्र-विरोध की सीमा तक पहुंच जाती है, तो लोकतंत्र का accountability mechanism कमजोर होता है।

सरकार को आलोचना से डरना नहीं चाहिए।

उसे आलोचना की जरूरत है।

क्योंकि लोकतंत्र में विपक्ष सरकार का दुश्मन नहीं होता। पत्रकार शत्रु नहीं होता। विद्यार्थी राष्ट्र-विरोधी नहीं होता। किसान विकास-विरोधी नहीं होता। प्रदर्शनकारी अराजक तत्व नहीं होता।

ये सभी लोकतांत्रिक चेतावनी तंत्र हैं।

जब चेतावनी तंत्र बंद होने लगते हैं, तब सत्ता को सबसे पहले अपने भीतर देखना चाहिए।

अब देश को भाषण नहीं, हिसाब चाहिए

बारह साल बाद भारत को नई कहानी नहीं चाहिए।

उसे नया हिसाब चाहिए।

कितने स्थायी रोजगार?

कितने नए manufacturing jobs?

कितनी वास्तविक किसान आय वृद्धि?

कितना कृषि ऋण संकट कम हुआ?

कितनी सरकारी स्कूल व्यवस्था सुधरी?

कितने विद्यार्थी रोजगार तक पहुंचे?

कितनी संपत्ति monetize हुई और उससे कितनी नई productive assets बनीं?

कर्ज बढ़ने के मुकाबले GDP और प्रति व्यक्ति आय की वास्तविक स्थिति क्या रही?

कितना खर्च प्रशासन पर और कितना नागरिक सेवाओं पर गया?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या नागरिक सत्ता से सवाल पूछ सकता है, बिना पुलिस की दीवार के?

यही लोकतंत्र का अंतिम परीक्षण है।

https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra

भारत को मजबूत प्रधानमंत्री से अधिक मजबूत संस्थाओं की जरूरत है। मजबूत सरकार का अर्थ ऐसी सरकार नहीं जो विरोध को रोक दे। मजबूत सरकार वह है जो विरोध के बीच भी निर्णय ले, सवालों के बीच भी जवाब दे और आलोचना के बावजूद अपनी नीतियों को सार्वजनिक जांच के लिए प्रस्तुत करे।

https://politicsinsightindia.com/eci-vivad-48-ghante-gyanesh-kumar-istifa-sir-voter-list-14-aapattiyan

यदि सरकार के पास उपलब्धियां हैं, तो उसे आलोचकों से डरने की जरूरत नहीं।

और यदि समस्याएं हैं, तो भाषण उन्हें छिपा नहीं सकते।

https://politicsinsightindia.com/pranab-doley-nsa-assam-jairam-ramesh-land-rights-kaziranga-analysis

क्योंकि भारत को अब “किसने क्या नहीं किया” की कहानी से आगे बढ़ना होगा।

https://politicsinsightindia.com/exam-paper-to-nuclear-data-leak-india

जनता का सवाल अब अधिक कठोर है—

https://politicsinsightindia.com/mehangai-ka-dosh-kisan-par-kyon

“आपने बारह वर्षों में क्या किया, उसका प्रमाण क्या है और अगले पांच वर्षों की स्पष्ट दिशा क्या है?”

https://politicsinsightindia.com/journalists-detained-jantar-mantar-police-india-freedom

यही वह सवाल है जिससे कोई भी लोकतांत्रिक सत्ता हमेशा के लिए नहीं बच सकती।

https://politicsinsightindia.com/gnanesh-kumar-eci-vivad-janata-ke-asli-mudde

और शायद यही वह बिंदु है जहां “policy paralysis” का असली अर्थ सामने आता है।

सरकार चल रही हो सकती है।

https://politicsinsightindia.com/form-6-badla-voter-rights-cec-accountability-sir-vivad

फाइलें चल रही होंगी।

घोषणाएं चल रही होंगी।

https://politicsinsightindia.com/sambhal-nsa-case-supreme-court-shock-to-up-government

भाषण चल रहे होंगे।

लेकिन यदि जनता के मूल प्रश्नों पर निर्णायक नीति-परिवर्तन की गति रुक जाए, तो राजनीतिक व्यवस्था बाहर से सक्रिय और भीतर से जड़ दिखाई देने लगती है।

https://politicsinsightindia.com/krishi-mein-nivesh-badha-kisan-ki-aay-kahan-badhi

भारत को ऐसी सत्ता नहीं चाहिए जो केवल दिखाई दे।

भारत को ऐसी शासन-व्यवस्था चाहिए जो जवाब दे, सुने, सुधारे और नागरिक के सामने अपने काम का हिसाब रखे।

https://politicsinsightindia.com/karj-mein-kisan-munafe-mein-bazaar-kisan-ki-aamdani-par-kiska-niyantran

यही लोकतंत्र है।

बाकी सब—सिर्फ मंच है।

https://politicsinsightindia.com/barricade-ke-peeche-satta-janata-ke-sawal

References / संदर्भ

  • Economic Survey 2025–26, Ministry of Finance, Government of India — अर्थव्यवस्था, राजकोषीय स्थिति, महंगाई और कृषि संबंधी आधिकारिक आंकड़े।
  • NITI Aayog — National Monetisation Pipeline 2.0 (2026) — FY2026–30 के लिए ₹16.72 लाख करोड़ की indicative monetisation pipeline और sector-wise विवरण।
  • NABARD — NAFIS 2021–22 — 52% households में outstanding debt; agricultural households में 55% indebtedness और औसत landholding 1.08 से घटकर 0.74 hectare।
  • MoSPI — PLFS 2023–24 — 15–29 वर्ष आयु वर्ग की बेरोजगारी और श्रम-बाजार संबंधी आंकड़े।
  • MoSPI — PLFS 2025 — नवीनतम युवा एवं राज्यवार बेरोजगारी के आंकड़े।
  • Union Budget / Receipt Budget, Government of India — केंद्र सरकार के debt, liabilities, expenditure और fiscal position के आधिकारिक आंकड़े।
  • PIB, Government of India — प्रधानमंत्री के भाषण, सरकारी नीतियों और योजनाओं के आधिकारिक दावे/विवरण।
  • NSS/MoSPI — Situation Assessment of Agricultural Households — कृषि परिवारों की आय, ऋण और सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधिकारिक सर्वेक्षण आंकड़े।

Disclaimer

यह लेख संपादकीय एवं विचारात्मक विश्लेषण है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के हैं। तथ्य एवं आंकड़े उपलब्ध सार्वजनिक/आधिकारिक स्रोतों पर आधारित हैं; राजनीतिक दावों और व्याख्याओं को स्वतंत्र रूप से सत्यापित किया जाना चाहिए।

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