बारिश में विधानसभा के बाहर मूक-बधिरों की आवाज: 20 सूत्रीय मांगों के साथ लखनऊ में प्रदर्शन

लखनऊ में बारिश के बीच विधानसभा के बाहर मूक-बधिर समुदाय ने 20 सूत्रीय मांगों को लेकर प्रदर्शन किया। शिक्षा, रोजगार, सांकेतिक भाषा स्कूल, ITI प्रशिक्षण, परिवहन और अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगा गया।

बारिश में विधानसभा के बाहर मूक-बधिरों की आवाज: 20 सूत्रीय मांगों के साथ लखनऊ में प्रदर्शन

20 सूत्रीय मांगों के साथ लखनऊ में प्रदर्शन, पुलिस ने रोका; सवाल—आखिर कब सुनी जाएगी सांकेतिक भाषा में उठ रही आवाज?

लखनऊ | 17 अगस्त 2026

By- Ch. Sudhir Taliyan

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में सोमवार को उस समय एक महत्वपूर्ण सामाजिक सवाल विधानसभा के बाहर खड़ा हो गया, जब उत्तर प्रदेश मूक-बधिर मानवाधिकार आंदोलन के बैनर तले बड़ी संख्या में मूक-बधिर समुदाय के लोग अपनी 20 सूत्रीय मांगों को लेकर विधानसभा के सामने पहुंचे। प्रदर्शनकारियों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम ज्ञापन सौंपकर अपनी समस्याओं के समाधान की मांग की।

यह प्रदर्शन केवल एक मांग-पत्र या एक दिन के आंदोलन की खबर नहीं है। इसके पीछे शिक्षा, रोजगार, परिवहन, कौशल विकास, सांकेतिक भाषा और प्रशासनिक संवेदनशीलता से जुड़े वे प्रश्न हैं जिनका समाधान भारत में दिव्यांग अधिकारों के लिए बनाए गए कानूनों में पहले ही काफी हद तक स्पष्ट किया जा चुका है।

विडंबना यह है कि जिस समुदाय के लिए कानून ने "समान अवसर" और "सुलभ संचार" की बात कही है, उसी समुदाय को अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए विधानसभा के बाहर सड़क पर उतरना पड़ा।

बारिश के बीच विधानसभा की ओर बढ़ा प्रदर्शन

17 अगस्त को उत्तर प्रदेश में बारिश का दौर जारी था। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए 17 अगस्त को भारी से बहुत भारी बारिश की संभावना जताई थी, जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए भी भारी बारिश की चेतावनी जारी की गई थी।

इसी मौसम के बीच लखनऊ में मूक-बधिर समुदाय के लोग विधानसभा के सामने प्रदर्शन के लिए पहुंचे।

सोशल मीडिया पर उपलब्ध वीडियो और पोस्टों में भी बारिश के बीच प्रदर्शन की तस्वीरें दिखाई दे रही हैं, हालांकि प्रदर्शनकारियों की सटीक संख्या की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी उपलब्ध नहीं है।

यहां एक महत्वपूर्ण पत्रकारिता संबंधी सावधानी जरूरी है—उपलब्ध मुख्यधारा रिपोर्टें प्रदर्शन में शामिल लोगों को व्यापक रूप से "मूक-बधिर लोग" बताती हैं; इसलिए इसे केवल "छात्र-छात्राओं का प्रदर्शन" कहना उपलब्ध पुष्ट रिपोर्टों की तुलना में अधिक संकीर्ण विवरण होगा। प्रदर्शन में विद्यार्थी शामिल रहे हों तो भी प्रकाशित रिपोर्टों के आधार पर आंदोलन को पूरे मूक-बधिर समुदाय के आंदोलन के रूप में देखना अधिक तथ्यात्मक है।

20 सूत्रीय मांगों में शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा

प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में प्रदेश में संचालित सांकेतिक भाषा स्कूलों को अपग्रेड करना और बेहतर शिक्षकों की नियुक्ति शामिल है। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने इन स्कूलों के संचालन को निजी या NGO क्षेत्र को दिए जाने की मांग भी रखी।

यह मांग सामान्य प्रशासनिक मांग नहीं है।

मूक-बधिर बच्चों के लिए शिक्षा का अर्थ केवल स्कूल भवन, किताब और परीक्षा नहीं है। यदि शिक्षक और विद्यार्थी के बीच संचार का माध्यम ही प्रभावी नहीं है तो शिक्षा की पूरी प्रक्रिया कमजोर पड़ जाती है।

यही बात Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। कानून की धारा 16 के अनुसार दिव्यांग विद्यार्थियों को शिक्षा में भेदभाव से बचाने के साथ-साथ आवश्यक सुविधाएं और व्यक्तिगत सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए। कानून विशेष रूप से कहता है कि दृष्टिबाधित या बधिर व्यक्तियों की शिक्षा उपयुक्त भाषा, संचार के माध्यम और तरीकों में दी जानी चाहिए।

अर्थात सांकेतिक भाषा कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं है जिसे सरकार अपनी सुविधा के अनुसार दे या न दे।

जहां विद्यार्थी की शिक्षा के लिए सांकेतिक भाषा आवश्यक है, वहां वह शिक्षा की बुनियादी आवश्यकता बन जाती है।

शिक्षक केवल शिक्षक नहीं—संचार का माध्यम भी हैं

RPwD Act की धारा 17 सरकार और स्थानीय निकायों से अपेक्षा करती है कि वे पर्याप्त शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थान स्थापित करें तथा ऐसे शिक्षकों को प्रशिक्षित और नियुक्त करें जो सांकेतिक भाषा और ब्रेल में सक्षम हों। इसके अलावा समावेशी शिक्षा के लिए आवश्यक पेशेवरों और कर्मचारियों को भी प्रशिक्षित करने की बात कानून में है।

इसलिए लखनऊ के प्रदर्शन को केवल "शिक्षक नियुक्त करने की मांग" के रूप में देखना समस्या को छोटा कर देना होगा।

असल प्रश्न है:

क्या उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था मूक-बधिर विद्यार्थियों को उनकी अपनी प्रभावी संचार प्रणाली में शिक्षा देने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार है?

यदि जवाब हां है तो फिर प्रदर्शन क्यों?

यदि जवाब नहीं है तो कानून लागू करने की जिम्मेदारी किसकी है?

ITI और कौशल विकास की मांग

प्रदर्शनकारियों ने ITI और तकनीकी प्रशिक्षण केंद्रों में विशेष प्रावधान की भी मांग की।

यह मांग सीधे रोजगार से जुड़ती है।

दिव्यांग विद्यार्थियों की समस्या केवल स्कूल तक सीमित नहीं है। स्कूल से निकलने के बाद उनके सामने दूसरा बड़ा प्रश्न होता है—अब रोजगार कहां है?

RPwD Act की धारा 19 सरकार को दिव्यांग व्यक्तियों के लिए vocational training और self-employment से जुड़े कार्यक्रम बनाने की जिम्मेदारी देती है। कानून में दिव्यांग व्यक्तियों को मुख्यधारा के औपचारिक और अनौपचारिक कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रमों में शामिल करने तथा प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए आवश्यक सहायता और सुविधाएं देने की बात भी कही गई है।

इस दृष्टि से ITI में विशेष प्रावधान की मांग कानून की भावना से अलग नहीं बल्कि उसी दिशा में है।

सवाल यह है कि क्या ITI और कौशल विकास केंद्रों में वास्तव में पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षक, interpreters, accessible course material और परीक्षा-संबंधी सुविधाएं उपलब्ध हैं?

यही वह क्षेत्र है जहां नीति और जमीन के बीच दूरी अक्सर दिखाई देती है।

रोजगार का सवाल: सरकारी नौकरी से लेकर चौथी श्रेणी तक

प्रदर्शन के आयोजन से पहले सोशल मीडिया पर प्रसारित आंदोलन संबंधी सामग्री में Group-D/चतुर्थ श्रेणी भर्ती और समान अधिकारों जैसे मुद्दों को भी उठाया गया था। हालांकि उपलब्ध मुख्यधारा रिपोर्टों में पूरी 20 सूत्रीय मांगों की सूची प्रकाशित नहीं हुई है, इसलिए सभी 20 मांगों को आधिकारिक रूप से उद्धृत करना अभी उचित नहीं होगा।

फिर भी रोजगार का मुद्दा महत्वपूर्ण है।

RPwD Act की धारा 20 सरकारी प्रतिष्ठानों में दिव्यांगता के आधार पर भेदभाव को रोकती है और reasonable accommodation तथा barrier-free environment का प्रावधान करती है।

कानून का संदेश साफ है—

दिव्यांग व्यक्ति को रोजगार देना केवल संख्या पूरी करना नहीं है; उसे काम करने योग्य वातावरण देना भी सरकार की जिम्मेदारी है।

निशुल्क बस सेवा: मांग और कानून का संबंध

प्रदर्शनकारियों ने मंडल स्तर पर दिव्यांगजनों के लिए निशुल्क बस सुविधा की मांग भी रखी।

यह मांग भी पूरी तरह अलग-थलग नहीं है।

RPwD Act की धारा 41 में दिव्यांग व्यक्तियों के लिए परिवहन सुविधाओं तथा व्यक्तिगत mobility को बढ़ावा देने के लिए incentives और concessions जैसी व्यवस्थाओं की बात की गई है।

केंद्र सरकार के myScheme पोर्टल पर दिव्यांगजनों के लिए बस यात्रा से संबंधित योजनाएं भी सूचीबद्ध हैं।

इसलिए उत्तर प्रदेश में मुफ्त या रियायती परिवहन सुविधा का प्रश्न केवल राजनीतिक घोषणा का विषय नहीं है। इसे दिव्यांगजनों की mobility और स्वतंत्र जीवन के बड़े अधिकार के संदर्भ में देखना चाहिए।

समस्या केवल स्कूल और बस की नहीं है—सूचना तक पहुंच भी जरूरी है

मूक-बधिर व्यक्ति के लिए सरकारी कार्यालय में जाना और अपनी समस्या बताना कई बार सामान्य नागरिक की तुलना में अधिक कठिन हो सकता है।

यहीं सांकेतिक भाषा interpreters की आवश्यकता सामने आती है।

RPwD Act की धारा 42 सरकार से यह अपेक्षा करती है कि दिव्यांगजन accessible formats में सूचना प्राप्त कर सकें और electronic media में sign-language interpretation तथा captioning जैसी सुविधाएं उपलब्ध हों।

भारत सरकार का Department of Empowerment of Persons with Disabilities भी Indian Sign Language के लिए संस्थागत ढांचा विकसित कर रहा है। Indian Sign Language Research and Training Centre (ISLRTC) का उद्देश्य ISL के उपयोग, शिक्षण और अनुसंधान में प्रशिक्षित विशेषज्ञ तैयार करना है। केंद्र ने NCERT के साथ कक्षा I से XII तक की पाठ्य सामग्री को सांकेतिक भाषा में उपलब्ध कराने के लिए भी समझौता किया है।

लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर ढांचा बनना और हर जिले में उसका वास्तविक उपयोग होना दो अलग बातें हैं।

सबसे बड़ा प्रश्न: संवाद कौन करेगा?

लखनऊ के इस प्रदर्शन की सबसे गहरी विडंबना यही है।

प्रदर्शनकारी बोलने-सुनने की सामान्य व्यवस्था के बजाय सांकेतिक भाषा में अपनी बात रख रहे थे, जबकि प्रशासन को उनके साथ संवाद के लिए ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिसमें वे अपनी भाषा में अपनी बात स्पष्ट रूप से रख सकें। TV9 की रिपोर्ट के अनुसार प्रदर्शनकारियों ने सांकेतिक रूप में अपनी मांगें रखीं और मुख्यमंत्री से सीधे समाधान की मांग की।

यहां प्रशासन के सामने एक नीति प्रश्न है:

क्या उत्तर प्रदेश के सभी प्रमुख सरकारी कार्यालयों में पर्याप्त प्रशिक्षित ISL interpreters उपलब्ध हैं?

यदि नहीं, तो दिव्यांग अधिकारों की वास्तविक पहुंच कैसे सुनिश्चित होगी?

पुलिस ने रोका, हिरासत में लेकर ईको गार्डन भेजा

प्रदर्शनकारी विधानसभा की ओर बढ़ रहे थे। रिपोर्टों के अनुसार पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोका। TV9 के अनुसार प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर ईको गार्डन धरना स्थल भेजा गया।

ABP की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच नोकझोंक हुई और बाद में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को बसों में बैठाकर सांकेतिक गिरफ्तारी के बाद रिहा किया। पुलिस का कहना था कि स्थिति नियंत्रण में रही, ज्ञापन संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाया गया और किसी के साथ मारपीट या जबरदस्ती नहीं हुई।

इस पूरे घटनाक्रम में दो अलग-अलग पहलू हैं।

पहला, विधानसभा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में कानून-व्यवस्था और सुरक्षा बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

दूसरा, कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ प्रदर्शनकारियों की आवाज सुनना भी लोकतांत्रिक प्रशासन की जिम्मेदारी है।

इन दोनों के बीच संतुलन ही लोकतांत्रिक शासन की परीक्षा है।

असली सवाल—पहले दिए गए आश्वासन का क्या हुआ?

यह प्रदर्शन सबसे अधिक गंभीर इसलिए है क्योंकि प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि उनकी मांगों को पूरा करने का पहले आश्वासन दिया गया था, लेकिन वे मांगें अभी तक पूरी नहीं हुईं।

यदि यह दावा सही है तो मामला केवल नया ज्ञापन देने का नहीं है।

मामला सरकारी आश्वासन की जवाबदेही का है।

किस अधिकारी ने आश्वासन दिया?

कब दिया?

किन मांगों पर सहमति हुई?

कितनी मांगें पूरी हुईं?

कितनी लंबित हैं?

किन मांगों के लिए बजट चाहिए?

किनके लिए शासनादेश जारी होना है?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या मूक-बधिर प्रतिनिधियों के साथ इसकी समीक्षा बैठक हुई?

सरकार को इन सवालों का जवाब सार्वजनिक रूप से देना चाहिए।

"सशक्तिकरण" और वास्तविक अधिकार में अंतर

सरकारें अक्सर दिव्यांगजनों के लिए योजनाओं, पेंशन, उपकरण, छात्रवृत्ति और सहायता कार्यक्रमों को अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती हैं।

लेकिन सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ इससे बड़ा है।

सशक्तिकरण का अर्थ है—

  • अच्छी शिक्षा,

  • अपनी भाषा में शिक्षा,

  • प्रशिक्षित शिक्षक,

  • उच्च शिक्षा तक पहुंच,

  • कौशल विकास,

  • रोजगार,

  • स्वतंत्र आवागमन,

  • सरकारी सेवाओं तक पहुंच,

  • सूचना तक पहुंच,

  • न्याय तक पहुंच,

  • और नीति निर्माण में स्वयं दिव्यांग समुदाय की भागीदारी।

RPwD Act में शिक्षा, vocational training, employment, transport, information access और accessibility के लिए अलग-अलग प्रावधान इसी व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाते हैं।

निजीकरण समाधान है या नई चुनौती?

प्रदर्शनकारियों की मांगों में सांकेतिक भाषा स्कूलों के संचालन को निजी/NGO क्षेत्र को दिए जाने की बात भी रिपोर्ट हुई है।

इस मांग को बिना संदर्भ के "निजीकरण की मांग" कहना उचित नहीं होगा।

मूक-बधिर समुदाय संभवतः बेहतर विशेषज्ञता, बेहतर प्रबंधन और प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता की समस्या की ओर संकेत कर रहा है।

लेकिन यहां सरकार को तीन बातें स्पष्ट करनी होंगी—

पहली: यदि संचालन NGO या निजी संस्था को दिया जाता है तो गुणवत्ता की निगरानी कौन करेगा?

दूसरी: फीस और गरीब परिवारों के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?

तीसरी: सांकेतिक भाषा में प्रशिक्षित शिक्षकों की पर्याप्त संख्या कैसे सुनिश्चित होगी?

इसलिए किसी भी outsourcing मॉडल का मूल्यांकन केवल प्रशासनिक लागत से नहीं बल्कि विद्यार्थी के अधिकार और शिक्षा की गुणवत्ता से होना चाहिए।

एक और महत्वपूर्ण संदर्भ: आज ही लखनऊ में दूसरा छात्र आंदोलन

17 अगस्त को लखनऊ में ही जय प्रकाश नारायण सर्वोदय गर्ल्स स्कूल की छात्राएं भी शिक्षकों की कमी सहित विभिन्न मुद्दों को लेकर प्रदर्शन करती दिखाई दीं। TV9 के अनुसार छात्राएं विधानसभा की ओर बढ़ीं और बालागंज चौराहे पर जाम भी हुआ; बातचीत के बाद प्रदर्शन समाप्त हुआ।

यह संयोग मात्र है या प्रशासनिक व्यवस्था में किसी बड़े दबाव का संकेत—इस पर निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी।

लेकिन एक तथ्य ध्यान देने योग्य है:

एक ही दिन राजधानी में अलग-अलग छात्र समूह शिक्षा और संस्थागत व्यवस्थाओं से जुड़े सवाल लेकर सड़क पर दिखाई दिए।

यह सरकार के लिए आत्ममंथन का विषय जरूर होना चाहिए।

क्या केवल आश्वासन से समस्या हल होगी?

नहीं।

इस आंदोलन का स्थायी समाधान किसी एक बैठक या आश्वासन से नहीं निकलेगा।

https://politicsinsightindia.com/new/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra

सरकार को एक समयबद्ध "Deaf Education and Employment Action Plan" बनाना चाहिए।

इसमें कम से कम ये बिंदु होने चाहिए:

1. प्रदेश के सभी सांकेतिक भाषा स्कूलों का ऑडिट

कितने स्कूल हैं, कितने विद्यार्थी हैं, कितने शिक्षक हैं और कितने पद खाली हैं—सार्वजनिक किया जाए।

2. शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात

हर विद्यालय में आवश्यक संख्या में ISL प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध कराए जाएं।

3. जिला स्तर पर ISL interpreter व्यवस्था

DM कार्यालय, पुलिस, अस्पताल, न्यायिक सहायता केंद्र और प्रमुख सरकारी कार्यालयों में प्रशिक्षित interpreters की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।

https://politicsinsightindia.com/new/gen-alpha-activism-up-school-children-protest-for-fans-water

4. ITI और कौशल प्रशिक्षण

मूक-बधिर युवाओं के लिए accessible vocational courses विकसित किए जाएं।

5. रोजगार का डेटा

सरकार बताए कि पिछले पांच वर्षों में कितने मूक-बधिर युवाओं को सरकारी और कौशल आधारित रोजगार मिला।

6. परिवहन

मंडल स्तर पर मुफ्त या पर्याप्त रियायती परिवहन सुविधा की व्यवहार्यता पर स्पष्ट शासनादेश जारी किया जाए।

https://politicsinsightindia.com/new/lala-kila-12-varsh-sapane-hisab-vade-adhoori-hakikat-2026-fir-sapane

7. शिकायत निवारण

दिव्यांग समुदाय की शिकायतों के लिए ISL-सक्षम डिजिटल और ऑफलाइन व्यवस्था बनाई जाए।

8. समुदाय की भागीदारी

नीति बनाने वाली समितियों में स्वयं Deaf community के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए।

सरकार को एक और काम करना चाहिए—20 मांगों की स्थिति सार्वजनिक करे

आज के प्रदर्शन के बाद सबसे अच्छा जवाब केवल यह नहीं होगा कि "ज्ञापन मिल गया है।"

सरकार को एक सार्वजनिक dashboard या कम से कम एक आधिकारिक स्थिति-पत्र जारी करना चाहिए:

मांग वर्तमान स्थिति जिम्मेदार विभाग समय सीमा
सांकेतिक भाषा स्कूल अपग्रेड लंबित/प्रगति संबंधित विभाग निर्धारित हो
प्रशिक्षित शिक्षक डेटा सार्वजनिक हो शिक्षा विभाग निर्धारित हो
निशुल्क/रियायती बस समीक्षा आवश्यक परिवहन विभाग निर्धारित हो
ITI में विशेष प्रावधान समीक्षा/क्रियान्वयन कौशल विकास विभाग निर्धारित हो
रोजगार/भर्ती डेटा सार्वजनिक हो संबंधित विभाग निर्धारित हो

यह व्यवस्था प्रदर्शनकारियों को भी पता देगी कि उनकी कौन-सी मांग किस टेबल पर पड़ी है।

लोकतंत्र में आवाज केवल बोलने से नहीं बनती

इस पूरे आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश शायद यही है।

https://politicsinsightindia.com/new/tax-do-phir-bhi-sab-kuch-khud-kharido-sarkari-school-hospital-aur-vyavastha-par-tootta-bharosa

लोकतंत्र में आवाज का अर्थ केवल बोल सकना नहीं है।

आवाज का अर्थ है—सरकार तक अपनी बात पहुंचा पाना और उस पर जवाब प्राप्त कर पाना।

मूक-बधिर समुदाय अपनी बात सांकेतिक भाषा में रखता है। वह भाषा कमतर नहीं है। Indian Sign Language एक वास्तविक संचार प्रणाली है और भारत सरकार के स्तर पर भी इसके प्रशिक्षण और प्रसार के लिए संस्थागत प्रयास मौजूद हैं।

इसलिए जब कोई मूक-बधिर नागरिक विधानसभा के बाहर खड़ा होकर सांकेतिक भाषा में अपनी मांग रखता है तो लोकतंत्र की जिम्मेदारी है कि कोई उसकी भाषा समझे।

https://politicsinsightindia.com/new/gen-z-rss-mohan-bhagwat-blind-obedience-democracy-analysis

उसे चुप कराने की नहीं।

उसकी बात सुनने की व्यवस्था करने की।

निष्कर्ष: बारिश में भीगते हाथों की भाषा को पढ़ना होगा

17 अगस्त 2026 का लखनऊ प्रदर्शन उत्तर प्रदेश सरकार के सामने एक सीधा प्रश्न छोड़ गया है।

यदि कानून पहले ही कहता है कि बधिर विद्यार्थियों को उपयुक्त भाषा और संचार माध्यम में शिक्षा मिलनी चाहिए; यदि कानून प्रशिक्षित सांकेतिक भाषा शिक्षकों की बात करता है; यदि कानून vocational training, रोजगार, transport और accessible communication की व्यवस्था की बात करता है—तो फिर इन अधिकारों के लिए विधानसभा के सामने प्रदर्शन क्यों करना पड़ रहा है?

सरकार का काम केवल कानून बनाना नहीं है।

https://politicsinsightindia.com/new/jab-janta-rajnitik-dalon-se-aage-nikalne-lage-loktantra-ka-naya-sawal

कानून को जमीन पर उतारना भी है।

और लोकतंत्र की असली परीक्षा उस समय होती है जब सामने खड़ा व्यक्ति अपनी बात सामान्य शब्दों में नहीं, बल्कि सांकेतिक भाषा में कह रहा हो।

आज लखनऊ की बारिश में मूक-बधिर समुदाय के हाथों ने जो सवाल उठाए हैं, उनका उत्तर भाषणों से नहीं, नीति, बजट, नियुक्ति, शिक्षा और समयबद्ध कार्रवाई से देना होगा।

क्योंकि उनके हाथ भले ही आवाज पैदा न करते हों, लेकिन उनके अधिकारों का प्रश्न बहुत स्पष्ट है—

"हमें दया नहीं, अधिकार चाहिए।
हमें आश्वासन नहीं, अवसर चाहिए।
हमें सुनने का दिखावा नहीं, हमारी भाषा में जवाब चाहिए।"

और अब गेंद सरकार के पाले में है।

सवाल यह नहीं कि प्रदर्शन खत्म हो गया।
सवाल यह है कि क्या समस्या भी खत्म होगी?


Was this article useful?

Get every story on your phone

Join our channel and never miss an update.

Join on WhatsApp Join on Telegram

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow