हरित भारत का हिसाब: CAG की रिपोर्ट ने खोली सरकारी दावों, कमजोर निगरानी और संभावित भ्रष्टाचार के रास्तों की परतें
CAG की Green India Mission रिपोर्ट ने सरकारी दावों की गंभीर पड़ताल की है। लक्ष्य से भारी पिछड़ने, कमजोर निगरानी, inflated आंकड़ों, वित्तीय अनियमितताओं और पारदर्शिता की कमी ने जनता के पैसे और पर्यावरणीय नीतियों की जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े किए हैं।
By- Ch. Sudhir Taliyan
जब सरकार पेड़ लगाने के आंकड़ों को उपलब्धि बताती है, लेकिन CAG को जमीन पर उसी अनुपात में हरियाली दिखाई नहीं देती, तो सवाल केवल पर्यावरण का नहीं रहता—सवाल जनता के पैसे, सरकारी जवाबदेही और भ्रष्टाचार की संभावनाओं का भी बन जाता है।
भारत में पर्यावरण बचाने के नाम पर वर्षों से बड़े-बड़े लक्ष्य घोषित किए गए। करोड़ों-अरबों रुपये की योजनाएं बनीं। पौधे लगाने के अभियान चले। सरकारी विज्ञापनों में हरित भारत की तस्वीरें दिखाई गईं। लेकिन अब नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG की Green India Mission पर Performance Audit Report ने उस चमकदार तस्वीर के पीछे छिपी गंभीर प्रशासनिक कमियों को सामने रखा है।
यह रिपोर्ट केवल यह नहीं कहती कि लक्ष्य पूरे नहीं हुए। इससे कहीं अधिक गंभीर बात यह है कि योजना के लक्ष्य, वित्तीय प्रबंधन, निगरानी, आंकड़ों की विश्वसनीयता, GIS verification, convergence और उपलब्धियों की reporting—हर स्तर पर समस्याएं मिलीं।
और जब किसी सरकारी योजना में CAG को inflated data और overstated achievements जैसी स्थितियां मिलती हैं, तो सार्वजनिक हित में यह पूछना बिल्कुल जायज है कि आखिर ये आंकड़े कैसे तैयार हुए, किस स्तर पर सत्यापित हुए और यदि गलत आंकड़ों के आधार पर उपलब्धियां दिखाई गईं तो जिम्मेदारी किसकी है?
CAG की मूल रिपोर्ट के अनुसार Green India Mission का उद्देश्य केवल पेड़ लगाना नहीं था। मिशन का लक्ष्य forest और tree cover बढ़ाने, forest quality सुधारने, biodiversity, hydrological services और carbon sequestration को मजबूत करने तथा climate change से प्रभावित forest-dependent communities की आजीविका में सुधार करना था।
लेकिन दस वर्ष से अधिक समय बाद सवाल यह है—क्या भारत को वास्तव में वह हरित परिणाम मिला जिसके लिए यह मिशन बनाया गया था?
Green India Mission: लक्ष्य कितना बड़ा था?
Green India Mission को National Action Plan on Climate Change के आठ प्रमुख मिशनों में शामिल किया गया था।
2011 के Mission Document के अनुसार लक्ष्य था:
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50 लाख हेक्टेयर में forest/tree cover बढ़ाना;
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अन्य 50 लाख हेक्टेयर में forest/tree cover की quality सुधारना;
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कुल 1 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर ecological improvement;
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biodiversity और hydrological services को मजबूत करना;
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carbon sequestration बढ़ाना;
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forest-dependent communities की आजीविका में सुधार करना।
मिशन का अनुमानित कुल खर्च लगभग ₹46,000 करोड़ रखा गया था।
बाद में 2014 में Cabinet Committee on Economic Affairs ने GIM को Centrally Sponsored Scheme के रूप में मंजूरी दी और चार वर्षों में 28 लाख हेक्टेयर में afforestation activities का लक्ष्य रखा गया, जिसकी अनुमानित लागत ₹13,000 करोड़ थी।
योजना कागज पर महत्वाकांक्षी थी।
लेकिन समस्या यहीं से शुरू हुई।
28 लाख हेक्टेयर का लक्ष्य और उपलब्धि केवल 1.48 लाख हेक्टेयर
CAG की रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2025 तक Green India Mission के अंतर्गत 2015-16 से 2024-25 के बीच केवल 0.14793 million hectare यानी लगभग 1.48 लाख हेक्टेयर भूमि पर afforestation interventions किए गए।
यह उस 2.8 million hectare यानी 28 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले बेहद कम है, जिसे मूल स्वीकृति के अनुसार 2018 तक हासिल किया जाना था।
यहां सरकार से सीधा सवाल बनता है:
जब लक्ष्य 28 लाख हेक्टेयर था तो दस वर्ष बाद भी काम 1.48 लाख हेक्टेयर के आसपास क्यों रहा?
क्या लक्ष्य अव्यावहारिक था?
क्या धन की कमी थी?
क्या राज्यों ने काम नहीं किया?
क्या केंद्र और राज्यों के बीच coordination विफल रहा?
या फिर योजना को कागज पर सफल दिखाने की कोशिश वास्तविक ecological restoration से अधिक महत्वपूर्ण हो गई?
CAG की रिपोर्ट इन सवालों का एक बड़ा हिस्सा खोलती है।
पैसा आया कितना और लक्ष्य कितना था?
योजना के लिए मूल वित्तीय संरचना भी बहुत महत्वाकांक्षी थी।
2014 में ₹13,000 करोड़ की लागत वाली योजना में बड़ी राशि दूसरी सरकारी योजनाओं से convergence के माध्यम से जुटाने की कल्पना की गई थी।
लगभग:
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₹6,000 करोड़ CAMPA से,
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₹4,000 करोड़ MGNREGS से,
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₹600 करोड़ National Afforestation Programme से
लाने का प्रस्ताव था।
अर्थात योजना का बड़ा वित्तीय आधार केवल Green India Mission के बजट पर निर्भर नहीं था।
लेकिन CAG ने पाया कि प्रस्तावित ₹10,600 करोड़ का convergence हासिल नहीं हो पाया।
नतीजा यह हुआ कि मिशन को सीमित annual budgetary support पर निर्भर रहना पड़ा।
दस वर्षों में budgetary support के रूप में केवल ₹1,149.14 करोड़, यानी लगभग 47.88 प्रतिशत, उपलब्ध हुआ।
यह सरकार के लिए एक गंभीर सवाल है।
यदि किसी योजना के लिए हजारों करोड़ की financial architecture तैयार की गई थी और उसका convergence mechanism काम ही नहीं कर पाया, तो जिम्मेदारी केवल "पैसा नहीं मिला" कहकर समाप्त नहीं हो सकती।
योजना बनाने वाले कौन थे?
Convergence की निगरानी कौन कर रहा था?
राज्यों को समय पर पैसा क्यों नहीं मिला?
क्या केंद्र ने समय रहते योजना की वित्तीय संरचना की समीक्षा की?
और सबसे महत्वपूर्ण—
जब लक्ष्य लगातार पीछे जा रहा था तो corrective action कब लिया गया?
भ्रष्टाचार का सवाल क्यों उठता है?
यहां एक बात बिल्कुल स्पष्ट रहनी चाहिए।
CAG की रिपोर्ट को पढ़कर यह कहना कि "Green India Mission में भ्रष्टाचार सिद्ध हो गया", तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
CAG की Performance Audit किसी व्यक्ति को आपराधिक रूप से भ्रष्ट घोषित नहीं करती।
लेकिन दूसरी तरफ यह कहना भी गलत होगा कि रिपोर्ट में भ्रष्टाचार की संभावना से जुड़े सवाल ही नहीं उठते।
जब एक सरकारी योजना में CAG को:
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inflated data,
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overstated achievements,
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कमजोर financial controls,
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deficient monitoring,
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non-validated records,
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accounting deficiencies,
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transparency gaps,
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और ground verification में वास्तविक गतिविधि की कमी
जैसी बातें मिलती हैं, तो corruption risk और accountability का सवाल स्वतः पैदा होता है।
यहां "भ्रष्टाचार" शब्द को केवल रिश्वत के अर्थ में नहीं देखना चाहिए।
भ्रष्टाचार का एक व्यापक प्रशासनिक रूप भी होता है—
गलत आंकड़े देना, वास्तविक उपलब्धि से अधिक उपलब्धि दिखाना, कमजोर verification के बावजूद भुगतान करना, monitoring में लापरवाही बरतना और जनता को वास्तविक परिणामों से दूर रखना।
यदि कोई अधिकारी या agency पौधे लगाने का दावा करती है, भुगतान हो जाता है, रिकॉर्ड में achievement दर्ज हो जाती है, लेकिन independent satellite या ground verification में उसका ecological impact दिखाई नहीं देता, तो सवाल उठेगा कि public money के बदले वास्तव में क्या मिला?
यही वह जगह है जहां जांच की आवश्यकता पैदा होती है।
CAG को inflated data और overstated achievements क्यों मिले?
CAG ने monitoring और evaluation system की जांच करते हुए गंभीर कमियां दर्ज कीं।
Audit ने पाया कि कुछ मामलों में उपलब्धियों के आंकड़ों में inflation और achievements के overstating की समस्या थी।
और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि audit ने GIS analysis का उपयोग करके plantation sites की वास्तविक स्थिति जांची।
CAG ने भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु की सहायता से 170 plantation sites, लगभग 1,397 hectares क्षेत्र में satellite imagery आधारित assessment कराया और इनमें से 46 sites का ground truthing भी किया। कुल 675 plantation sites, लगभग 14,785 hectares, physical verification के लिए चुने गए थे।
यह केवल कागजी जांच नहीं थी।
जब satellite data और जमीन पर जाकर verification किया जाता है, तभी पता चलता है कि file में दर्ज "achievement" और जमीन पर मौजूद वास्तविकता के बीच कितना अंतर है।
70 प्रतिशत sampled sites में GIM का स्पष्ट प्रभाव नहीं
Audit के सबसे चिंताजनक निष्कर्षों में से एक है कि sampled sites के GIS analysis में बड़ी संख्या में sites पर GIM intervention से attributable noticeable change नहीं मिला।
यहां सावधानी जरूरी है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत के 70 प्रतिशत जंगल खत्म हो गए या पूरे देश के 70 प्रतिशत जंगलों में कोई सुधार नहीं हुआ।
यह निष्कर्ष audit द्वारा जांचे गए sampled plantation sites के संदर्भ में है।
लेकिन इसका महत्व फिर भी बहुत बड़ा है।
क्योंकि सरकार जिस योजना के लिए खर्च करती है, उसके intervention का measurable ecological outcome दिखाई देना चाहिए।
अगर plantation की तस्वीरें हैं लेकिन canopy improvement नहीं है;
अगर plantation register है लेकिन satellite imagery में स्पष्ट बदलाव नहीं है;
अगर payment record है लेकिन ground verification कमजोर है;
तो public accountability का सवाल उठता है।
पौधा लगाना और जंगल बनाना एक ही बात नहीं
भारत में पर्यावरणीय योजनाओं की सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि अक्सर plantation को achievement और survival को secondary issue समझ लिया जाता है।
एक पौधा लगाना आसान है।
उस पौधे को पांच, दस और बीस वर्षों तक जीवित रखना कठिन है।
एक forest ecosystem बनाना उससे भी कठिन है।
प्राकृतिक जंगल में:
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अनेक native species होती हैं;
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soil ecosystem विकसित होता है;
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insects और microorganisms का network होता है;
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wildlife habitat बनता है;
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पानी का प्राकृतिक चक्र मजबूत होता है;
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carbon लंबे समय तक store होता है;
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local communities को forest produce मिलता है।
इसलिए केवल पौधों की संख्या गिनकर "हरित भारत" की घोषणा करना ecological success नहीं है।
सरकार को यह बताना चाहिए:
कितने पौधे लगाए गए?
नहीं।
सरकार को बताना चाहिए:
कितने पौधे जीवित हैं?
कितना canopy बढ़ा?
कितनी native biodiversity लौटी?
कितना carbon capture हुआ?
कितना groundwater recharge हुआ?
कितने ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ी?
यही वास्तविक performance है।
Carbon sink का दावा और measurement की कमजोरी
भारत ने Paris Agreement के तहत 2030 तक forest और tree cover के माध्यम से अतिरिक्त 2.5 से 3 billion tonnes CO₂ equivalent carbon sink बनाने का लक्ष्य रखा है।
Green India Mission को इस climate strategy में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई थी।
लेकिन CAG audit ने carbon sequestration assessment को लेकर गंभीर कमी दर्ज की।
यदि किसी योजना को carbon sink बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, तो carbon sequestration का वैज्ञानिक measurement अनिवार्य होना चाहिए।
सिर्फ यह कहना कि "इतने हेक्टेयर में plantation हुआ" carbon sink का प्रमाण नहीं है।
Carbon sink का वास्तविक सवाल है:
उस भूमि पर biomass कितना बढ़ा?
पेड़ कितने बड़े हुए?
soil carbon में क्या परिवर्तन आया?
कितना carbon स्थायी रूप से store हुआ?
यदि measurement ही नहीं है तो climate achievement का दावा किस आधार पर किया जा रहा है?
₹3.50 करोड़ के flux towers भी सवालों में
CAG ने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में carbon sequestration measurement के लिए लगाए गए flux towers से संबंधित infrastructure पर भी सवाल उठाए।
Maintenance और upkeep की उचित व्यवस्था न होने के कारण infrastructure idle रहने की बात audit में सामने आई।
इस पर लगभग ₹3.50 करोड़ खर्च हुए थे।
यह घटना छोटी लग सकती है, लेकिन यह सरकारी परियोजनाओं की एक बड़ी बीमारी बताती है:
पहले infrastructure बनाओ, उद्घाटन करो, पैसा खर्च करो—फिर maintenance और उपयोगिता पर ध्यान दो।
Public money केवल निर्माण पर नहीं, उसके उपयोग पर भी जवाबदेह होना चाहिए।
यदि carbon measurement infrastructure ही काम नहीं कर रहा, तो सरकार अपने carbon claims को scientifically कैसे validate करेगी?
आठ राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में Annual Accounts की समस्या
CAG ने sampled States/UTs की financial records की जांच में पाया कि आठ राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों ने Annual Accounts maintain नहीं किए।
जहां accounts तैयार किए गए, वहां भी audit ने records में deficiencies और discrepancies जैसी समस्याएं दर्ज कीं।
यह सिर्फ accounting की technical गलती नहीं है।
यह जनता के पैसे का सवाल है।
किसी भी सरकारी योजना में नागरिक को यह जानने का अधिकार है:
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कितना पैसा आया?
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किस विभाग को मिला?
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किस agency को दिया गया?
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किस काम पर खर्च हुआ?
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कितने पौधे लगाए गए?
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कितने जीवित हैं?
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किस contractor या implementing agency को भुगतान हुआ?
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भुगतान किस verification के आधार पर हुआ?
यदि accounts ही व्यवस्थित नहीं हैं तो accountability कैसे होगी?
Transparency भी कमजोर: 14 राज्यों ने public web links नहीं दिए
Digital India के दौर में जनता से कहा जाता है कि सरकारी कामकाज पारदर्शी हो रहा है।
लेकिन CAG के अनुसार audit के दौरान 14 राज्यों ने आवश्यक public web links उपलब्ध नहीं कराए।
यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है।
क्योंकि आज satellite imagery उपलब्ध है।
GPS उपलब्ध है।
GIS उपलब्ध है।
Online dashboards बनाए जा सकते हैं।
हर plantation site का geo-tagged record सार्वजनिक किया जा सकता है।
फिर भी अगर जनता और auditors को basic information तक पहुंचने के लिए बार-बार सरकारी files और correspondence पर निर्भर रहना पड़े, तो transparency का दावा कमजोर पड़ता है।
योजना में bottom-up approach थी, लेकिन जमीन पर क्या हुआ?
Green India Mission की मूल अवधारणा centralized plantation programme बनाने की नहीं थी।
इसमें village-level planning और Gram Sabha/JFMC जैसे स्थानीय संस्थानों की भूमिका महत्वपूर्ण रखी गई थी।
अर्थात स्थानीय समुदाय को यह तय करने में भूमिका मिलनी थी कि:
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कौन सी भूमि उपयुक्त है;
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कौन सी species लगाई जाए;
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ecosystem की जरूरत क्या है;
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स्थानीय livelihood कैसे जुड़ेगा।
लेकिन CAG ने planning में deficiencies और bottom-up approach के प्रभावी implementation पर सवाल उठाए।
इससे एक बड़ा policy lesson निकलता है:
दिल्ली में बैठकर तय की गई plantation policy हर गांव के लिए सही नहीं हो सकती।
रेगिस्तानी क्षेत्र, पहाड़ी क्षेत्र, नदी किनारा, grassland, dry deciduous forest और tropical forest—हर ecosystem की जरूरत अलग है।
गलत landscape selection भी गंभीर समस्या
CAG ने पाया कि vulnerability को महत्वपूर्ण criterion माना जाना चाहिए था, लेकिन कई मामलों में low-to-moderate priority वाले landscapes को चुना गया, जबकि अधिक vulnerable areas को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिली।
जलवायु परिवर्तन के दौर में यह policy failure है।
जहां:
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सूखा बढ़ रहा हो,
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भूजल गिर रहा हो,
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भूमि क्षरण हो रहा हो,
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biodiversity संकट में हो,
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जंगलों पर ग्रामीण निर्भरता अधिक हो,
वहां ecological restoration की priority अधिक होनी चाहिए।
https://politicsinsightindia.com/new/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
यदि संसाधन उन जगहों पर लगाए जाएं जहां ecological urgency कम है, तो सरकारी खर्च तो हो सकता है, लेकिन climate resilience का लक्ष्य कमजोर हो जाता है।
Green cover बढ़ा है—लेकिन इसका श्रेय GIM को कितना?
यहां सरकार के पक्ष को भी तथ्यात्मक रूप से समझना जरूरी है।
Forest Survey of India की India State of Forest Report 2023 के अनुसार भारत का forest और tree cover कुल भौगोलिक क्षेत्र का 25.17 प्रतिशत था। FSI इसे 2021 के मुकाबले वृद्धि के रूप में दर्ज करता है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि इस पूरी वृद्धि का श्रेय Green India Mission को दे दिया जाए।
क्यों?
क्योंकि national forest/tree cover पर अनेक factors प्रभाव डालते हैं:
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natural regeneration,
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agroforestry,
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trees outside forests,
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private plantations,
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CAMPA,
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MGNREGS,
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state schemes,
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urban forestry,
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अन्य government interventions।
इसलिए देश का green cover बढ़ना एक सकारात्मक राष्ट्रीय तथ्य है, लेकिन उससे यह साबित नहीं होता कि GIM अपने निर्धारित outcomes में सफल रहा।
यही अंतर CAG की audit findings को महत्वपूर्ण बनाता है।
सरकार को अब सिर्फ प्रेस विज्ञप्ति नहीं, जवाब देना चाहिए
CAG रिपोर्ट के बाद सरकार का उत्तर केवल यह नहीं होना चाहिए कि "हमने इतने लाख हेक्टेयर में plantation किया।"
सरकार को हर audited state के लिए public accountability report जारी करनी चाहिए।
https://politicsinsightindia.com/new/lucknow-mook-badhir-pradarshan-20-sutriya-maange-vidhan-sabha
जनता के सामने ये आंकड़े आने चाहिए:
1. कुल स्वीकृत राशि
2. वास्तविक जारी राशि
3. वास्तविक expenditure
4. प्रत्येक plantation site का GPS location
5. plantation date
6. species-wise plantation data
7. survival rate
8. satellite-based canopy change
9. carbon sequestration
10. implementing agency
11. contractor/vendor payment
12. physical verification report
13. failed plantation sites
14. जिम्मेदार अधिकारियों की accountability
यही transparency है।
https://politicsinsightindia.com/new/mmdr-amendment-bill-2026-farmer-land-acquisition-partnership
भ्रष्टाचार रोकने का सबसे आसान तरीका: पैसा परिणाम से जोड़िए
यदि सरकार वास्तव में भ्रष्टाचार रोकना चाहती है तो plantation payment का मॉडल बदलना होगा।
आज यदि किसी agency को पौधे लगाने के आधार पर भुगतान मिलता है, तो उसके लिए incentive है:
जितने अधिक पौधे दिखाओ, उतना अधिक काम दिखेगा।
लेकिन यदि भुगतान को पांच वर्षों के survival और ecological outcome से जोड़ा जाए तो incentive बदल जाएगा।
उदाहरण के लिए:
30% भुगतान — plantation के बाद
20% — पहले वर्ष survival
20% — तीसरे वर्ष survival
20% — पांचवें वर्ष ecological verification
10% — satellite/GIS और independent audit clearance
तब contractor का हित पौधे लगाने में नहीं बल्कि पौधे बचाने में होगा।
जनता को "हरित उत्सव" नहीं, हरित परिणाम चाहिए
भारत में वृक्षारोपण को अक्सर उत्सव बना दिया जाता है।
नेता पौधा लगाते हैं।
फोटो खिंचती है।
प्रेस विज्ञप्ति जारी होती है।
सोशल मीडिया पर पोस्ट आती है।
फिर अगले वर्ष वही अभियान दोबारा शुरू हो जाता है।
लेकिन जनता का
https://politicsinsightindia.com/new/upi-bill-2026-merchant-consumer-government-mdr-analysis
सवाल इससे अलग है:
पिछले वर्ष लगाया गया पौधा आज कहां है?
यदि वह मर गया तो किसने जिम्मेदारी ली?
यदि हजारों पौधे मर गए तो भुगतान क्यों हुआ?
यदि plantation site satellite image में नहीं दिखती तो achievement report में कैसे दिखाई गई?
यदि data गलत था तो किस स्तर पर verification विफल हुआ?
और यदि inflated achievement जानबूझकर दर्ज की गई थी तो क्या disciplinary या criminal investigation हुई?
यही वे प्रश्न हैं जिनका जवाब अब सरकार को देना चाहिए।
https://politicsinsightindia.com/new/yuva-bharat-barricade-rozgar-paper-leak-jantar-mantar
यह केवल पेड़ों का मामला नहीं—जनता के भविष्य का मामला है
एक कमजोर environmental programme का नुकसान केवल जंगल विभाग तक सीमित नहीं रहता।
इसका असर सीधे जनता पर पड़ता है।
जंगल कमजोर होंगे तो:
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जल स्रोत प्रभावित होंगे;
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भूजल recharge घट सकता है;
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soil erosion बढ़ सकता है;
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heat stress बढ़ सकता है;
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biodiversity को नुकसान होगा;
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ग्रामीण livelihoods प्रभावित होंगी;
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climate vulnerability बढ़ेगी।
अर्थात Green India Mission की विफलता का आर्थिक और सामाजिक मूल्य भी है।
गरीब ग्रामीण परिवार, forest-dependent communities और छोटे किसान climate shocks से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
इसलिए पर्यावरण पर खर्च कोई luxury नहीं है।
यह public welfare expenditure है।
और public welfare money में transparency और accountability अनिवार्य है।
CAG रिपोर्ट सरकार के लिए चेतावनी है, विपक्ष के लिए केवल राजनीतिक हथियार नहीं
इस रिपोर्ट को केवल सरकार विरोधी भाषण का विषय बना देना भी पर्याप्त नहीं होगा।
यह रिपोर्ट शासन प्रणाली की समस्या दिखाती है।
आज सत्ता में एक सरकार है।
कल दूसरी होगी।
लेकिन यदि monitoring system वही रहा, plantation measurement वही रहा, financial accounting वही रही और public disclosure कमजोर रहा, तो समस्या बनी रहेगी।
इसलिए समाधान किसी पार्टी के खिलाफ अभियान नहीं बल्कि institutional reform होना चाहिए।
निष्कर्ष: सवाल पेड़ लगाने का नहीं, पेड़ बचाने और पैसा बचाने का है
Green India Mission के बारे में CAG की Performance Audit Report ने भारत के पर्यावरणीय शासन के सामने एक कठोर सवाल खड़ा कर दिया है।
एक ओर सरकार देश के बढ़ते forest और tree cover का आंकड़ा प्रस्तुत करती है।
दूसरी ओर उसी सरकार की flagship Green India Mission की audit में:
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लक्ष्य के मुकाबले बेहद कम intervention,
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₹10,600 करोड़ के planned convergence की विफलता,
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दस वर्षों में केवल ₹1,149.14 करोड़ budgetary support,
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28 लाख हेक्टेयर के approved target के मुकाबले लगभग 1.48 लाख हेक्टेयर intervention,
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monitoring deficiencies,
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inflated data और overstated achievements,
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sampled sites में कमजोर measurable impact,
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accounting problems,
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transparency gaps,
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carbon sequestration measurement की कमी,
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और ₹3.50 करोड़ के idle infrastructure जैसी समस्याएं सामने आती हैं।
यह स्थिति केवल पर्यावरण मंत्रालय के लिए असहज नहीं है।
यह पूरे सरकारी accountability system के लिए चेतावनी है।
अगर कागज पर जंगल बढ़ता रहे और जमीन पर उसका प्रमाण कमजोर हो, तो आंकड़ों की हरियाली जनता को नहीं बचा सकती।
अगर पौधे लगाए जाएं लेकिन बचें नहीं, तो अभियान सफल नहीं है।
अगर पैसा खर्च हो लेकिन outcome मापा न जाए, तो expenditure को achievement नहीं कहा जा सकता।
अगर आंकड़े independently verify न हों, तो सरकारी उपलब्धि का दावा अधूरा है।
और अगर CAG को inflated या overstated achievements दिखाई दें, तो यह पूछना लोकतंत्र में जनता का अधिकार है कि गलत आंकड़े किसने बनाए, किसने प्रमाणित किए और किसने उनके आधार पर उपलब्धि घोषित की?
यह प्रश्न किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष का नहीं है।
यह जनता के पैसे और जनता के भविष्य का प्रश्न है।
भारत को अब "कितने पौधे लगाए" वाली राजनीति से आगे जाना होगा।
देश को चाहिए—
कितने पेड़ बचे,
कितना जंगल मजबूत हुआ,
कितना पानी बचा,
कितना carbon capture हुआ,
कितनी biodiversity लौटी,
कितने ग्रामीण परिवारों को लाभ मिला,
और जनता के पैसे का कितना हिस्सा वास्तव में जमीन पर परिणाम में बदला।
यही वास्तविक Green India होगी।
और जब तक इन सवालों के जवाब पारदर्शी तरीके से जनता के सामने नहीं आते, तब तक सरकार के हर बड़े हरित दावे के साथ एक छोटा-सा लेकिन जरूरी सवाल खड़ा रहेगा—
"दावा कितना है और जमीन पर सच कितना?"
स्रोत
नोट: इस लेख में "भ्रष्टाचार" को CAG द्वारा किसी व्यक्ति या संस्था पर सिद्ध आपराधिक आरोप के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। CAG की findings के आधार पर भ्रष्टाचार, financial mismanagement, inflated reporting और accountability की संभावित जांच की आवश्यकता पर सवाल उठाया गया है।
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