लाल किले से 12 वर्षों का हिसाब क्यों नहीं? वादे, उपलब्धियां और अधूरी हकीकत
12 वर्षों में लाल किले से किए गए बड़े वादों और लक्ष्यों का तथ्य-आधारित विश्लेषण—किसानों की आय, रोजगार, 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था, स्मार्ट सिटी और आवास से लेकर विकसित भारत@2047 तक। उपलब्धियों के साथ अधूरे वादों पर प्रधानमंत्री को जवाबदेही का हिसाब क्यों देना चाहिए?
लाल किले से 12 वर्षों के वादों का हिसाब क्यों नहीं दिया गया?
उपलब्धियों के साथ अधूरे संकल्पों पर भी बोलना चाहिए था
लेखक: चौधरी सुधीर तालियान
15 अगस्त भारत के लोकतांत्रिक जीवन का केवल एक राष्ट्रीय पर्व नहीं है। लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री का संबोधन देश के सामने सरकार के कामकाज, उसकी प्राथमिकताओं और भविष्य की दिशा का सार्वजनिक रिपोर्ट कार्ड भी होना चाहिए। प्रधानमंत्री जब वहां खड़े होकर राष्ट्र को संबोधित करते हैं तो वे केवल सरकार की उपलब्धियां नहीं बताते, बल्कि देश से किए गए वादों और संकल्पों के प्रति भी जवाबदेह होते हैं।
2026 का स्वतंत्रता दिवस इस दृष्टि से और अधिक महत्वपूर्ण था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2026 को लाल किले से अपना 13वां लगातार स्वतंत्रता दिवस संबोधन दिया। पिछले बारह वर्षों में उनके भाषणों में अनेक बड़े लक्ष्य सामने रखे गए—स्वच्छ भारत, किसानों की आय दोगुनी करना, गरीबों को पक्का घर, युवाओं को अवसर, स्मार्ट शहर, आर्थिक महाशक्ति बनना, आत्मनिर्भर भारत और अंततः विकसित भारत@2047।
लेकिन इस बार एक बुनियादी सवाल फिर सामने आया: पिछले बारह वर्षों में लाल किले से किए गए प्रमुख वादों में से कितने पूरे हुए, कितने आंशिक रूप से पूरे हुए और कितने समयसीमा के बावजूद अधूरे रह गए?
प्रधानमंत्री ने 2026 के भाषण में उपलब्धियों, उत्पादन, आत्मनिर्भरता, ऊर्जा सुरक्षा, युवाओं, सेमीकंडक्टर, परमाणु ऊर्जा और विकसित भारत की भविष्य-दृष्टि पर विस्तार से बात की। उन्होंने पिछले 12 वर्षों की प्रगति के अनेक आंकड़े भी रखे। लेकिन ऐसा कोई व्यवस्थित सार्वजनिक हिसाब प्रस्तुत नहीं किया गया जिसमें 2014 से 2025 तक लाल किले से घोषित प्रमुख समयबद्ध लक्ष्यों की सूची बनाकर बताया जाता कि कौन-सा वादा पूरा हुआ, कौन-सा अधूरा है और कौन-सा लक्ष्य बदल दिया गया।
यही वह कमी है जिस पर लोकतांत्रिक समाज में सवाल उठना चाहिए।
लाल किले का भाषण घोषणा-पत्र नहीं, जवाबदेही का मंच भी होना चाहिए
2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से पहली बार संबोधित करते हुए खुद को “प्रधान सेवक” के रूप में प्रस्तुत किया था। उन्होंने कहा था कि सरकार शासक के रूप में नहीं, सेवक के रूप में काम करेगी।
यदि प्रधानमंत्री स्वयं को प्रधान सेवक कहते हैं तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में सेवक से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह जनता को बताए—
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पिछले वर्ष क्या किया?
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पिछले पांच वर्षों में क्या बदला?
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दस वर्ष पहले किए गए वादों में क्या पूरा हुआ?
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क्या पूरा नहीं हुआ?
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क्यों नहीं हुआ?
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और आगे उसे पूरा करने की समयसीमा क्या है?
यही वास्तविक Accountability है।
किसी सरकार की आलोचना करने के लिए उसकी उपलब्धियों को नकारना जरूरी नहीं है। उसी प्रकार सरकार की उपलब्धियों को स्वीकार करने के लिए उसके अधूरे वादों पर सवाल करना बंद करना भी जरूरी नहीं है।
भारत जैसे लोकतंत्र में दोनों बातें एक साथ संभव हैं।
1. किसानों की आय दोगुनी करने का वादा: सबसे बड़ा सवाल
किसानों के संदर्भ में यह सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है।
2017 में लाल किले से प्रधानमंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा था कि किसानों की आय 2022 तक दोगुनी होगी। उन्होंने कहा था कि ऐसा भारत बनाना है जहां किसान चिंता के बिना सो सके और 2022 तक उसकी आय आज की तुलना में दोगुनी हो।
2018 के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में भी प्रधानमंत्री ने किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य को दोहराया। सरकार के अपने दस्तावेजों में भी 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए समिति गठित किए जाने और आय के वास्तविक अर्थों में दोगुना करने की रणनीति पर काम किए जाने का उल्लेख मिलता है।
2020 के बजट में भी सरकार ने इस लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई।
लेकिन 2022 बीत गया।
आज 2026 है।
इसलिए अब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि सरकार ने किसानों के लिए कितनी योजनाएं शुरू कीं। सवाल यह होना चाहिए कि 2022 के लक्ष्य के मुकाबले किसान की वास्तविक आय कितनी बढ़ी?
सरकार ने किसान सम्मान निधि, सिंचाई, फसल बीमा, कृषि ऋण, भंडारण और अन्य योजनाओं के माध्यम से किसानों को सहायता दी है। कृषि क्षेत्र ने भी कई वर्षों में सकारात्मक वृद्धि दिखाई है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र FY26 में लगभग 3.1 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान था और H1 FY26 में कृषि GVA वृद्धि 3.6 प्रतिशत रही।
लेकिन किसान आय दोगुनी और कृषि उत्पादन बढ़ना दो अलग-अलग बातें हैं।
उत्पादन बढ़ सकता है, लेकिन यदि लागत उससे अधिक बढ़ जाए तो किसान की वास्तविक आय नहीं बढ़ती। इसी तरह MSP में वृद्धि और सरकारी खरीद में वृद्धि भी तब तक पर्याप्त नहीं है जब तक अधिकांश किसानों को उनकी उपज के लिए लाभकारी मूल्य और बाजार की सुरक्षा नहीं मिलती।
इसलिए 2026 के लाल किले से एक स्पष्ट तालिका होनी चाहिए थी:
2016 की किसान आय — 2022 का लक्ष्य — वास्तविक उपलब्धि — 2026 की स्थिति।
देश के किसान इस उत्तर के अधिकारी हैं।
2. पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था: लक्ष्य बड़ा था, हिसाब भी बड़ा होना चाहिए
2018 के आसपास भारत को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य राष्ट्रीय आर्थिक विमर्श का प्रमुख हिस्सा बना। सरकार के दस्तावेजों में 2025 तक पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की संभावना और लक्ष्य का उल्लेख हुआ था।
यह लक्ष्य पूरा नहीं हुआ।
यह कहना सरकार की आलोचना नहीं बल्कि एक तथ्यात्मक स्थिति का उल्लेख है।
भारत की अर्थव्यवस्था आज भी दुनिया की प्रमुख और तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में है। 2025-26 के लिए सरकार द्वारा जारी संशोधित आंकड़ों में वास्तविक GDP वृद्धि 7.6 प्रतिशत बताई गई।
अर्थात आर्थिक प्रदर्शन को केवल असफलता कहना भी सही नहीं होगा।
लेकिन सवाल यह है कि जिस समयसीमा में पांच ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य रखा गया था, उस लक्ष्य की विफलता पर प्रधानमंत्री को देश के सामने स्पष्ट स्पष्टीकरण नहीं देना चाहिए था?
COVID-19 महामारी ने अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका दिया। वैश्विक परिस्थितियों, युद्ध, तेल की कीमतों और विनिमय दर में बदलाव का भी प्रभाव पड़ा। ये सभी वास्तविक कारण हैं।
लेकिन लोकतांत्रिक जवाबदेही का अर्थ ही यही है कि सरकार बताए:
“यह लक्ष्य हमने रखा था। परिस्थितियां बदलीं। यह हिस्सा पूरा हुआ। यह हिस्सा नहीं हुआ। अब नई समयसीमा यह है।”
ऐसा करने से सरकार कमजोर नहीं होती।
बल्कि जनता का भरोसा मजबूत होता है।
3. स्मार्ट सिटी: 100 शहरों की घोषणा और जमीन की कहानी
2014 के बाद 100 स्मार्ट शहरों का सपना देश के सामने रखा गया। यह विचार केवल सड़क, लाइट और कैमरे लगाने तक सीमित नहीं था। उद्देश्य आधुनिक शहरी सेवाओं, बेहतर परिवहन, स्वच्छता, तकनीक और नागरिक सुविधाओं वाले शहरों का निर्माण था।
दस साल बाद सरकार के आंकड़े बताते हैं कि Smart Cities Mission के तहत 100 शहरों में हजारों परियोजनाएं पूरी हुईं। मई 2025 तक 8,067 परियोजनाओं में से 7,555 यानी लगभग 94 प्रतिशत परियोजनाएं पूरी होने की जानकारी सरकार ने दी।
यह उपलब्धि है।
लेकिन दूसरी तरफ एक महत्वपूर्ण तथ्य भी सामने आया: मार्च 2025 तक केवल 18 शहरों ने अपने सभी स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट पूरे किए थे।
इसलिए यहां भी कहानी न पूरी सफलता की है, न पूरी विफलता की।
परियोजनाएं पूरी होना और शहर का वास्तव में “स्मार्ट” हो जाना अलग-अलग बातें हैं।
क्या नागरिकों को 24 घंटे पानी मिलता है?
क्या सार्वजनिक परिवहन पर्याप्त है?
क्या सीवेज व्यवस्था सुधरी?
क्या प्रदूषण घटा?
क्या कचरा प्रबंधन बेहतर हुआ?
क्या गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग को बेहतर शहरी जीवन मिला?
यही असली प्रश्न हैं।
4. “सबके लिए पक्का घर”: संख्या बनाम वास्तविक आवास सुरक्षा
गरीबों के लिए पक्का घर 2014 के बाद सरकार की बड़ी प्राथमिकताओं में रहा। 2017 के लाल किले के भाषण में भी गरीबों के पक्के घर, बिजली और पानी की बात की गई थी।
प्रधानमंत्री आवास योजनाओं के तहत करोड़ों घरों के निर्माण और स्वीकृति की जानकारी सरकार देती रही है।
यह निश्चित रूप से महत्वपूर्ण सामाजिक उपलब्धि है।
लेकिन आवास का अर्थ केवल मकान की छत नहीं है।
एक गरीब परिवार के लिए घर तभी पूर्ण आवास है जब उसके साथ—
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सुरक्षित पेयजल,
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बिजली,
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शौचालय,
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सड़क,
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स्कूल,
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स्वास्थ्य सुविधा,
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रोजगार के अवसर
भी उपलब्ध हों।
इसलिए 2026 में प्रधानमंत्री को यह बताना चाहिए था कि “आवास” की घोषणा से आगे बढ़कर कितने परिवारों को वास्तव में सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन मिला।
5. स्वच्छ भारत: बड़ी उपलब्धि, लेकिन सवाल भी जरूरी
2014 के पहले लाल किले के भाषण में प्रधानमंत्री ने स्वच्छता और शौचालय को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया। उन्होंने कहा कि गरीबों को सम्मान देने के लिए स्वच्छता आवश्यक है।
2015 में उन्होंने स्कूलों में लड़के और लड़कियों के लिए अलग शौचालय बनाने का लक्ष्य भी सामने रखा और बाद में बताया कि प्रारंभिक आकलन में लाखों शौचालयों की आवश्यकता सामने आई थी।
स्वच्छ भारत अभियान के तहत बड़े पैमाने पर शौचालय निर्माण हुआ। यह सरकार की उन पहलों में है जहां केवल घोषणा नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर भौतिक निर्माण भी हुआ।
लेकिन आज नई चुनौती सामने है—
शौचालय से आगे क्या?
सीवेज कहां जाता है?
फीकल स्लज का उपचार कैसे होता है?
नदियों और भूजल की गुणवत्ता कैसी है?
2026 में प्रकाशित एक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि यदि शौचालय निर्माण के साथ अपशिष्ट और सीवेज प्रबंधन पर्याप्त न हो तो जल प्रदूषण जैसी अनपेक्षित समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
इसलिए सरकार की उपलब्धि को स्वीकार करते हुए भी यह पूछना जरूरी है कि स्वच्छ भारत का अगला चरण क्या है।
6. युवाओं को अवसर: रोजगार का प्रश्न अभी भी केंद्रीय है
2017 के लाल किले के भाषण में प्रधानमंत्री ने युवाओं और महिलाओं के लिए पर्याप्त अवसर पैदा करने की बात कही थी।
आज 2026 में भी रोजगार और गुणवत्तापूर्ण रोजगार भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े प्रश्नों में हैं।
सरकारी PLFS आंकड़ों में बेरोजगारी दर को नियमित रूप से मापा जाता है और जून 2026 में 15 वर्ष और उससे ऊपर की आबादी के लिए Current Weekly Status के आधार पर बेरोजगारी दर 5.5 प्रतिशत बताई गई।
लेकिन केवल कुल बेरोजगारी दर से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती।
युवा बेरोजगारी, शिक्षित बेरोजगारी, महिलाओं की श्रम भागीदारी, अनौपचारिक रोजगार, कम वेतन और रोजगार की गुणवत्ता भी उतने ही महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।
2026 के भाषण में युवाओं पर विशेष जोर दिया गया। प्रधानमंत्री ने AI प्रशिक्षण और मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग जैसी नई पहलों की घोषणा की।
यह भविष्य की दिशा हो सकती है।
लेकिन जनता का सवाल यह भी है:
पिछले वर्षों में जिन युवाओं को रोजगार के अवसर देने का वादा किया गया था, उनके लिए वास्तविक रोजगार सृजन कितना हुआ?
7. उपलब्धियों को गिनाना जरूरी है—लेकिन केवल उपलब्धियां गिनाना पर्याप्त नहीं
यह लेख सरकार की हर उपलब्धि को खारिज करने के लिए नहीं है।
भारत में पिछले बारह वर्षों में कई क्षेत्रों में वास्तविक परिवर्तन हुए हैं।
डिजिटल भुगतान का विस्तार, आधार आधारित सेवाएं, बैंक खातों का विस्तार, बुनियादी ढांचा, राजमार्ग, रेलवे विद्युतीकरण, मोबाइल निर्माण, रक्षा उत्पादन, UPI, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, ग्रामीण विद्युतीकरण, शौचालय निर्माण और कई कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार महत्वपूर्ण बदलाव हैं।
2026 के भाषण में प्रधानमंत्री ने इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, खादी, रेल कोच और अन्य क्षेत्रों में उत्पादन वृद्धि का उल्लेख किया। उन्होंने सेमीकंडक्टर, ऊर्जा सुरक्षा और परमाणु ऊर्जा को भविष्य की प्राथमिकताओं में रखा।
इन उपलब्धियों पर चर्चा होनी चाहिए।
लेकिन लोकतांत्रिक रिपोर्ट कार्ड केवल “क्या अच्छा हुआ” का दस्तावेज नहीं होता।
रिपोर्ट कार्ड में “क्या नहीं हुआ” का कॉलम भी होता है।
असली कमी: वादों की कोई सार्वजनिक “ट्रैकिंग शीट” क्यों नहीं?
कल्पना कीजिए कि 15 अगस्त 2026 को लाल किले से प्रधानमंत्री एक डिजिटल स्क्रीन पर पिछले 12 वर्षों के 50 प्रमुख वादों की सूची दिखाते।
| वादा/लक्ष्य | समयसीमा | स्थिति |
|---|---|---|
| किसानों की आय दोगुनी | 2022 | स्वतंत्र ऑडिट आवश्यक |
| 100 स्मार्ट शहर | चरणबद्ध | अधिकांश परियोजनाएं पूर्ण, परिणाम मिश्रित |
| गरीबों के लिए पक्के घर | 2022/आगे | बड़े पैमाने पर प्रगति, शेष परिवारों का आकलन आवश्यक |
| स्वच्छ भारत | 2019 प्रारंभिक लक्ष्य | बड़े पैमाने पर शौचालय निर्माण, अब अपशिष्ट प्रबंधन चुनौती |
| $5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था | 2024/25 | लक्ष्य समय पर हासिल नहीं हुआ |
| युवाओं के लिए रोजगार | निरंतर लक्ष्य | रोजगार की मात्रा और गुणवत्ता पर निरंतर चुनौती |
| विकसित भारत | 2047 | दीर्घकालिक लक्ष्य |
ऐसी प्रस्तुति राजनीति से ऊपर होती।
क्योंकि इसमें सरकार अपनी उपलब्धियां भी दिखा सकती थी और अपनी कमियां भी स्वीकार कर सकती थी।
प्रधानमंत्री को क्या कहना चाहिए था?
प्रधानमंत्री यदि 2026 के लाल किले से यह कहते—
“देशवासियो, पिछले 12 वर्षों में हमने अनेक लक्ष्य हासिल किए हैं। लेकिन हर लक्ष्य हासिल नहीं हुआ। किसानों की आय दोगुनी करने का 2022 का लक्ष्य हमारे अनुसार उस रूप में पूरा नहीं हुआ जैसा हमने संकल्प लिया था। पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य भी निर्धारित समय में हासिल नहीं हुआ। स्मार्ट सिटी मिशन में बड़ी प्रगति हुई, लेकिन सभी शहरों में अपेक्षित परिणाम नहीं आए। हम इन कमियों को स्वीकार करते हैं और अगले पांच वर्षों के लिए स्पष्ट समयसीमा तय कर रहे हैं।”
तो क्या इससे सरकार कमजोर होती?
नहीं।
बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करता।
https://politicsinsightindia.com/new/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
प्रधानमंत्री की राजनीतिक शक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण केवल बड़ी घोषणाएं नहीं, बल्कि गलत या अधूरे लक्ष्य को स्वीकार करने का साहस भी हो सकता है।
2047 का सपना और 2022 के अधूरे सवाल
आज देश के सामने “विकसित भारत@2047” का लक्ष्य है।
यह लक्ष्य महत्वाकांक्षी है और भारत को इसकी आवश्यकता भी है।
लेकिन 2047 तक विकसित भारत बनाने का रास्ता 2026 से शुरू नहीं हो रहा। यह रास्ता पिछले बारह वर्षों की नीतियों और उपलब्धियों से होकर गुजरता है।
इसलिए 2047 की चर्चा के साथ 2022 के सवालों को बंद नहीं किया जा सकता।
अगर किसान की आय दोगुनी करने का लक्ष्य पूरा नहीं हुआ तो 2047 तक किसान की आय किस गति से बढ़ेगी?
यदि युवाओं के लिए पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण रोजगार अभी भी चुनौती है तो विकसित भारत की युवा आबादी को उत्पादक रोजगार कैसे मिलेगा?
https://politicsinsightindia.com/new/mmdr-amendment-bill-2026-farmer-land-acquisition-partnership
यदि शहरों में परियोजनाएं बन गईं लेकिन नागरिक सेवाओं की गुणवत्ता असमान है तो विकसित शहर कैसे बनेंगे?
यदि GDP बढ़ती है लेकिन आय और संपत्ति की असमानता बनी रहती है तो विकास का लाभ किसे मिलेगा?
यदि भारत विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्था बनता है लेकिन ग्रामीण परिवारों की क्रय शक्ति कमजोर रहती है तो क्या वह विकास समावेशी कहलाएगा?
ये सवाल सरकार विरोधी नहीं हैं।
ये विकास के सवाल हैं।
लाल किले से “रिपोर्ट कार्ड” की परंपरा शुरू होनी चाहिए
भारत को अब घोषणाओं की राजनीति से आगे बढ़कर मापने योग्य शासन की ओर जाना चाहिए।
हर स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री के भाषण के साथ एक सार्वजनिक “Red Fort Governance Report” जारी हो सकती है।
उसमें पांच श्रेणियां हों:
1. पूरा हुआ
लक्ष्य और समयसीमा के अनुसार पूरा।
2. अधिकांशतः पूरा
80-90 प्रतिशत या उससे अधिक प्रगति।
3. आंशिक रूप से पूरा
महत्वपूर्ण प्रगति लेकिन लक्ष्य अधूरा।
4. समयसीमा चूक गई
निर्धारित समय बीत गया लेकिन लक्ष्य पूरा नहीं हुआ।
5. लक्ष्य पुनर्निर्धारित
मूल लक्ष्य बदला गया और नई समयसीमा तय की गई।
इस रिपोर्ट को संसद में रखा जाना चाहिए।
https://politicsinsightindia.com/new/upi-bill-2026-merchant-consumer-government-mdr-analysis
CAG, संसद की स्थायी समितियां, स्वतंत्र विशेषज्ञ और नागरिक समाज इसकी समीक्षा करें।
तभी “जवाबदेह सरकार” की अवधारणा वास्तविक अर्थ पाएगी।
निष्कर्ष: उपलब्धियों का सम्मान, अधूरे वादों का हिसाब
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 वर्षों के शासन में भारत ने कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रगति की है। इसे नकारना तथ्यात्मक दृष्टि से गलत होगा। आर्थिक वृद्धि, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, बुनियादी ढांचे, कल्याणकारी योजनाओं और कुछ विनिर्माण क्षेत्रों में बदलाव दिखाई देता है। सरकार ने भी इन उपलब्धियों को बार-बार आंकड़ों के साथ प्रस्तुत किया है।
लेकिन उसी तरह यह कहना भी उचित नहीं होगा कि हर घोषित लक्ष्य पूरा हो गया।
किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य समयसीमा के साथ रखा गया था और उस पर आज भी स्पष्ट, सार्वजनिक और तुलनात्मक आय-आधारित रिपोर्ट की आवश्यकता है। पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य निर्धारित समय में हासिल नहीं हुआ। स्मार्ट सिटी मिशन में भारी प्रगति के बावजूद सभी शहरों में अपेक्षित परिणाम नहीं आए। रोजगार, आय, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में अभी भी गंभीर चुनौतियां मौजूद हैं।
इसलिए 15 अगस्त का लाल किला केवल भविष्य के सपनों की घोषणा का मंच नहीं होना चाहिए।
यह अतीत के वादों का हिसाब देने का मंच भी होना चाहिए।
देश को यह सुनने का अधिकार है कि सरकार ने क्या किया।
लेकिन देश को यह सुनने का उससे भी बड़ा अधिकार है कि सरकार क्या नहीं कर पाई।
एक मजबूत लोकतंत्र में सरकार का सबसे बड़ा साहस यह नहीं कि वह हर उपलब्धि को अपनी सफलता बताए।
सबसे बड़ा साहस यह है कि वह जनता के सामने खड़े होकर कहे—
“यह हमारा वादा था। यह हमने पूरा किया। यह अधूरा रह गया। यहां हम असफल हुए। और इसे पूरा करने के लिए अब यह समयसीमा है।”
यही जवाबदेही है।
यही लोकतंत्र है।
और यदि लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करने वाला प्रधानमंत्री यह रिपोर्ट कार्ड स्वयं जनता के सामने रखे, तो उसका भाषण केवल राजनीतिक भाषण नहीं रहेगा—वह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का दस्तावेज बन जाएगा।
विकसित भारत@2047 का सपना तभी विश्वसनीय होगा, जब भारत 2014 से 2026 तक की अपनी यात्रा का ईमानदार हिसाब भी सामने रखे।
क्योंकि भविष्य की ऊंची इमारतें केवल बड़े सपनों से नहीं बनतीं।
उनकी नींव पिछले वादों की जवाबदेही पर टिकती है।
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