“‘जियो और जीने दो’ बनाम ‘मारो और जियो’: क्या भारतीय राजनीति में लोकतंत्र की आत्मा खतरे में है?”
भारतीय राजनीति में बदलती राजनीतिक संस्कृति, विपक्ष के प्रति रवैया, असहमति की आज़ादी, सत्ता के केंद्रीकरण और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर तीखा सवाल। कांग्रेस और भाजपा से ऊपर लोकतंत्र, नागरिक अधिकार और सवाल पूछने की स्वतंत्रता क्यों जरूरी है?
लेखक- प्रकाश कमळताई गोपाळराव पोहरे
Editor in Chief- देशोन्नति दैनिक समाचार पत्र , महाराष्ट्र
भारतीय राजनीति में पार्टियाँ बदलती हैं, चेहरे बदलते हैं, घोषणाएँ बदलती हैं; लेकिन जनता के मन में एक सवाल हमेशा कायम रहता है—“सत्ता आखिर किसके लिए और किसलिए?”
क्या सत्ता का अर्थ केवल चुनाव जीतना, विरोधियों को हराना और सरकार चलाना है? या सत्ता का अर्थ अलग-अलग विचारों वाले लोगों को साथ लेकर देश चलाने की जिम्मेदारी भी है?
यहीं आज की राजनीति को देखते हुए एक चुभती हुई तुलना सामने आती है—
“कांग्रेस यानी जियो और जीने दो...”
“भाजपा यानी मारो और जियो!”
यह तुलना किसी एक पार्टी के पूरे इतिहास का अंतिम फैसला नहीं है। कांग्रेस के शासनकाल में भी गलतियाँ हुईं, अन्याय हुए और विरोधियों पर कार्रवाई हुई। आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक काला अध्याय था, ऐसा मानने वाले भी हैं; जबकि कुछ लोगों के लिए वह “अनुशासन पर्व” था। इसलिए कांग्रेस को लोकतंत्र का प्रमाणपत्र देना इस लेख का उद्देश्य नहीं है।
मुद्दा उससे कहीं बड़ा है।
आज के राजनीतिक माहौल में विपक्ष के प्रति बदलती भाषा, संस्थाओं के कथित दुरुपयोग को लेकर उठते सवाल, मीडिया पर दबाव की शिकायतें, जाँच एजेंसियों के राजनीतिक इस्तेमाल के आरोप और सत्ता के बढ़ते केंद्रीकरण की प्रवृत्ति—इन सबके कारण एक बुनियादी सवाल खड़ा हो रहा है:
क्या हम केवल सत्ता परिवर्तन देख रहे हैं या राजनीति की मानसिकता ही बदलते हुए देख रहे हैं?
लोकतंत्र में विपक्ष दुश्मन नहीं होता।
वह आपके फैसलों पर सवाल उठाने वाला जनता का प्रतिनिधि होता है।
लेकिन जब विपक्ष को राष्ट्रविरोधी, भ्रष्ट, देशद्रोही, साजिशकर्ता, विकास विरोधी या “अर्बन नक्सल” करार देना ही राजनीतिक रणनीति बन जाए, तब सवाल केवल विपक्ष का नहीं रह जाता; वह लोकतंत्र के अस्तित्व का सवाल बन जाता है।
असहमति का अधिकार कहाँ गया?
लोकतंत्र का एक सरल नियम था—
“आप मुझसे असहमत हों, फिर भी आपको बोलने का अधिकार है।”
सरकार की आलोचना करने वाले लोग थे। आंदोलन होते थे। अखबार सरकार पर खुलकर हमला करते थे। संसद में सरकार को घेरा जाता था। सरकारें गिरती थीं, प्रधानमंत्री बदलते थे, मंत्रियों के इस्तीफे होते थे, राज्य सरकारें बदलती थीं।
इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि अतीत पूर्ण और निर्दोष था।
लेकिन सत्ता का विरोध करने का अधिकार लोकतांत्रिक संस्कृति का स्वीकार किया हुआ हिस्सा था।
आज राजनीतिक माहौल में दूसरी ही भाषा अधिक सुनाई देती है.
“अगर आप हमसे असहमत हैं, तो पहले आपको संदेह के कठघरे में खड़ा किया जाएगा।”
और इसी मानसिकता से “मारो और जियो” वाली राजनीतिक संस्कृति जन्म लेती है।
विपक्ष को खत्म करना यानी देश को मजबूत करना नहीं!
लोकतंत्र में मजबूत सरकार आवश्यक है; लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है मजबूत विपक्ष।
क्योंकि सरकार को आईना दिखाने वाला कोई न हो, तो सत्ता के स्वयं की छवि के प्रेम में पड़कर निरंकुश होने का खतरा बढ़ जाता है।
सवाल पूछने वाले पत्रकार नहीं होंगे, तो सत्ता को जवाबदेही का एहसास ही नहीं रहेगा।
सवाल पूछने वाला विपक्ष नहीं होगा, तो संसद केवल बहुमत की मुहर बन जाएगी।
और अगर नागरिकों ने सवाल पूछना बंद कर दिया, तो लोकतंत्र केवल पाँच साल में एक बार होने वाले मतदान के कार्यक्रम में बदल जाएगा।
यही सबसे बड़ी चिंता है।
देश को विपक्ष-विहीन राजनीति नहीं चाहिए
देश को जवाबदेह राजनीति चाहिए।
“जियो और जीने दो” कमजोरी नहीं है!
कुछ लोगों को लगता है कि विपक्ष को खुलकर बोलने देना यानी सरकार का कमजोर होना। यह धारणा ही पूरी तरह गलत है।
वास्तव में विपक्ष के अस्तित्व को सहन करने की क्षमता ही सत्ता की असली ताकत होती है।
संत तुकाराम महाराज ने इसलिए कहा था—
“निंदकाचे घर असावे शेजारी।”
आपकी आलोचना करने वाले व्यक्ति को आप बोलने देते हैं, उसके सवाल का जवाब देते हैं, उसके आरोप की जाँच करते हैं और आरोप गलत हो तो तथ्यों के साथ उसका खंडन करते हैं; या आरोप सही हो तो माफी माँगकर सुधार करते हैं—यही तो परिपक्व लोकतंत्र है।
इसीलिए दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में लोकतांत्रिक संस्थाओं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जवाबदेही को विशेष महत्व दिया जाता है।
लेकिन आलोचना करने वाले को चुप कराने के लिए जाँच एजेंसियों, कानूनों, प्रशासन, मीडिया या सत्ता की ताकत का इस्तेमाल किया जा रहा है, ऐसी भावना पैदा हो जाए; या कल तक जिन लोगों पर गंभीर आरोप लगाए गए, उन्हीं लोगों को बाद में अपनी पार्टी में शामिल करके सत्ता में भागीदारी दी जाए, तो जनता के मन में “वॉशिंग मशीन” वाली भावना पैदा होना स्वाभाविक है।
यहीं से राजनीति पर जनता का विश्वास कमजोर होता है।
इसलिए “जियो और जीने दो” विपक्ष पर कोई उपकार नहीं है; यह लोकतंत्र का मूल संस्कार है।
सत्ता कभी स्थायी नहीं होती!
इतिहास का सबसे बड़ा सबक एक ही है—
कोई भी सत्ता स्थायी नहीं होती।
जिन्होंने दूसरों को जेल में डाला, उनसे भी समय ने सवाल पूछे।
जिन्होंने विरोधियों को खत्म करने की कोशिश की, उनके राजनीतिक साम्राज्य भी समाप्त हुए।
जिन्होंने स्वयं को अजेय समझा, जनता ने उन्हें भी जमीन पर ला दिया।
इंदिरा गांधी की हार और फिर सत्ता में वापसी इसका ऐतिहासिक उदाहरण है। इससे एक बात स्पष्ट होती है, की अंतिम सत्ता किसी पार्टी के पास नहीं, मतदाता के पास है।
आज आप बहुमत में हैं; कल जनता आपको विपक्ष की बेंच पर बैठा सकती है।
आज आपके हाथ में जाँच एजेंसियाँ हैं; कल वही संस्थाएँ किसी और के हाथ में हो सकती हैं।
आज आप कानून बना रहे हैं; कल उन्हीं कानूनों की छाया में आपको भी खड़ा होना पड़ सकता है।
इसलिए राजनीति में एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए—
सत्ता बदलती है; व्यवस्था रहती है।
और अगर व्यवस्था को आज कमजोर किया गया, तो कल उसकी कीमत हर किसी को चुकानी पड़ेगी।
भाजपा से सवाल करना यानी देश से सवाल करना नहीं!
आज भाजपा देश की एक बड़ी राजनीतिक पार्टी है। अनेक राज्यों में उसने सत्ता हासिल की है। इसलिए उस पर सवाल पूछने वालों को जवाब देना भी उसकी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है, लेकिन आज की राजनीति में एक खतरनाक प्रवृत्ति बढ़ती दिखाई दे रही है...
सरकार की आलोचना = देश की आलोचना!
यही सोच लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
प्रधानमंत्री से सवाल करना देश का अपमान नहीं है।
गृहमंत्री से सवाल करना राष्ट्रद्रोह नहीं है।
मुख्यमंत्री की नीतियों की आलोचना करना विकास विरोधी होना नहीं है।
सरकार की आर्थिक नीतियों का विरोध करना देश की अर्थव्यवस्था का विरोध नहीं है।
और सबसे महत्वपूर्ण—
सत्ता से सवाल पूछने वाला नागरिक देशद्रोही नहीं होता; वह लोकतंत्र का प्रहरी होता है।
कांग्रेस हो या भाजपा, मापदंड एक ही होना चाहिए!
आज कांग्रेस हो या भाजपा—राजनीति को किसी एक पार्टी की चौखट में कैद करके कोई फायदा नहीं है।
कांग्रेस की गलतियाँ हुईं, इसलिए भाजपा की गलतियाँ माफ नहीं हो सकतीं।
और भाजपा की गलतियाँ बताने से कांग्रेस निर्दोष नहीं हो जाती।
जनता को दोनों को एक ही कसौटी पर परखना चाहिए।
जिसने गलती की, उससे सवाल।
जिसने अन्याय किया, उसका विरोध।
जिसने भ्रष्टाचार किया, उस पर कार्रवाई।
और जिसने अच्छा काम किया, उसकी प्रशंसा।
https://politicsinsightindia.com/education-cess-ka-hisab-government-schools-badhaal
यही लोकतंत्र की असली राजनीति है।
पार्टी कोई भी हो, सत्ता किसी की भी हो—
न्याय का मापदंड एक ही होना चाहिए।
अंतिम सवाल जनता से!
क्या हमें ऐसा लोकतंत्र चाहिए—
“तुम अपने विचार से जियो, मैं अपने विचार से जीता हूँ; लेकिन देश हम दोनों का है।”
या ऐसा—
https://politicsinsightindia.com/beej-khad-dawa-kisan-hi-jahar-ka-doshi-kyon
“जो मेरे साथ नहीं है, वह मेरे खिलाफ है; और जो मेरे खिलाफ है, उसे जीने की जगह ही नहीं दूँगा!”
पहली विचारधारा लोकतंत्र का निर्माण करती है।
दूसरी विचारधारा भय का साम्राज्य खड़ा करती है।
इसलिए आज जरूरत कांग्रेस की नहीं, भाजपा की नहीं और न ही किसी एक पार्टी की अंधभक्ति की है, जरूरत है लोकतंत्र के पक्ष में खड़े होने की।
क्योंकि कल सत्ता में कौन होगा, यह कोई नहीं बता सकता।
लेकिन जो एक चीज हमारे हाथ में है, वो है सत्ताधारी से सवाल पूछने का अधिकार जीवित रखना।
क्योंकि जिस दिन नागरिक ने सवाल पूछना बंद कर दिया, उस दिन केवल विपक्ष समाप्त नहीं होता,
उस दिन लोकतंत्र की आत्मा मरना शुरू हो जाती है।
इसलिए आज का नारा होना चाहिए,
“जियो और जीने दो!”
क्योंकि—
“यह देश किसी के बाप की जागीर नहीं है!”
यह देश जनता का है।
लोकतंत्र जनता का है।
सत्ता जनता ने दी है।
और सत्ता में आने के कारण नागरिकों के मूलभूत अधिकार किसी को भी छीनने का अधिकार नहीं मिल जाता।
पार्टियाँ बदलेंगी...चेहरे बदलेंगे...सरकारें बदलेंगी...लेकिन लोकतंत्र को जीवित रखना है तो एक चीज नहीं बदलनी चाहिए—
https://politicsinsightindia.com/lal-kile-se-bade-sapne-zameen-par-jankalyan-ki-khamoshi
सवाल पूछने वाले नागरिक की आवाज!
क्योंकि, सत्ता किसी की भी हो, लोकतंत्र से बड़ा कोई नहीं!
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