जमीन पर बच्चे, कागजों पर निरीक्षण: चंद्रपुर की आश्रमशालाओं में सरकारी लापरवाही का भयावह सच
चंद्रपुर की 32 सरकारी और अनुदानित आश्रमशालाओं में 8,786 विद्यार्थियों में से 8,442 के पास पलंग नहीं हैं। करीब ₹99 करोड़ के खर्च के बावजूद बच्चे जमीन पर सोने को मजबूर हैं। बार-बार निरीक्षण और कमियां दर्ज होने के बावजूद जवाबदेही तय नहीं हुई। गढ़चिरौली में सर्पदंश से तीन छात्राओं की मौत ने सरकारी लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
By- Ch. Sudhir Taliyan
चंद्रपुर की आदिवासी आश्रमशालाओं की कहानी सिर्फ पलंग की कमी की कहानी नहीं है। यह उस सरकारी व्यवस्था का आईना है, जहां निरीक्षण बार-बार होते हैं, कमियां बार-बार दर्ज होती हैं, आदेश बार-बार जारी होते हैं, लेकिन जवाबदेही तय नहीं होती। गढ़चिरौली में सर्पदंश से तीन आदिवासी छात्राओं की मौत ने अब इस लापरवाही की कीमत तीन जिंदगियों के रूप में सामने रख दी है। सवाल यह है कि क्या सरकार अगली मौत का इंतजार करेगी?
महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले से सामने आई तस्वीर किसी सामान्य सरकारी स्कूल की बदहाली की तस्वीर नहीं है। यह उन बच्चों की तस्वीर है जिन्हें उनके परिवारों ने बेहतर भविष्य की उम्मीद में राज्य की आवासीय शिक्षा व्यवस्था के भरोसे भेजा है। लेकिन जिन आश्रमशालाओं में इन बच्चों को शिक्षा, भोजन और सुरक्षित आवास मिलना चाहिए, वहां हजारों बच्चे आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
आंकड़ों के अनुसार चंद्रपुर जिले की 32 सरकारी और अनुदानित आश्रमशालाओं में 8,786 विद्यार्थी पढ़ते हैं। इनमें से 8,442 विद्यार्थियों के पास सोने के लिए पलंग नहीं है। केवल 344 विद्यार्थियों को पलंग उपलब्ध है। यानी लगभग 96.1 प्रतिशत विद्यार्थी बिना पलंग के सोने को मजबूर हैं।
यह आंकड़ा अपने आप में इतना बड़ा है कि इसे किसी एक स्कूल की समस्या कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
और सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह स्थिति किसी ऐसे विभाग की नहीं है जिसके पास संसाधन नहीं हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इन आश्रमशालाओं पर शिक्षा, आवास और अन्य व्यवस्थाओं के लिए सालाना करीब 99 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। इसमें लगभग 26.35 करोड़ रुपये विद्यार्थियों पर और करीब 73.36 करोड़ रुपये शिक्षकों एवं अन्य कर्मचारियों के वेतन पर खर्च होने की जानकारी सामने आई है।
फिर सवाल सीधा है—
अगर 99 करोड़ रुपये सालाना खर्च हो रहे हैं, तो 8,442 बच्चों के पास सोने के लिए पलंग क्यों नहीं हैं?
यह सिर्फ पलंग का सवाल नहीं है
सरकार शायद इस समस्या को फर्नीचर की कमी के रूप में देखना चाहे। लेकिन ऐसा करना वास्तविक समस्या को छोटा करना होगा।
आश्रमशाला में रहने वाला बच्चा सामान्य डे-स्कॉलर नहीं होता। वह अपने घर से दूर रहता है। उसके भोजन, स्वास्थ्य, सुरक्षा, सोने की जगह, स्वच्छता और शिक्षा की जिम्मेदारी काफी हद तक उस संस्था और अंततः सरकार की होती है।
महाराष्ट्र का आदिवासी विकास विभाग स्वयं आश्रमशाला व्यवस्था को आवासीय शिक्षा के रूप में संचालित करता है। विभाग की योजनाओं में विद्यार्थियों के लिए रहने, भोजन, कपड़े, शैक्षणिक सामग्री और बिस्तर जैसी सुविधाओं का प्रावधान है।
इसलिए जब कोई बच्चा जमीन पर चटाई या गद्दा बिछाकर सोता है, तो यह सिर्फ एक पलंग की अनुपलब्धता नहीं है।
यह सवाल है कि सरकार की घोषित कल्याणकारी व्यवस्था बच्चे तक पहुंची या नहीं।
और यदि नहीं पहुंची, तो जिम्मेदार कौन है?
दिन में कक्षा, रात में वही कमरा शयनकक्ष
चंद्रपुर की बोर्डा आश्रमशाला की स्थिति इस पूरे संकट का एक प्रतीक बनकर सामने आती है।
ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया कि छोटे बच्चों के लिए जिस टीन शेड में दिन के समय पढ़ाई होती है, उसी जगह रात में जमीन पर गद्दे बिछाकर उन्हें सोना पड़ता है। बड़ी छात्राओं के रहने की व्यवस्था भी टीन शेड वाले कमरों में होने और एक कमरे में लगभग 45 छात्राओं के रहने की स्थिति रिपोर्ट की गई है।
एक पल के लिए उस दृश्य की कल्पना कीजिए।
सुबह वही जमीन कक्षा है।
वहीं बच्चे बैठते हैं।
वहीं पढ़ते हैं।
और रात होते ही वही जगह उनका शयनकक्ष बन जाती है।
यह किसी गरीब परिवार के अस्थायी घर की मजबूरी नहीं है। यह एक ऐसी आवासीय शिक्षा व्यवस्था है जिसके लिए सरकार हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च करती है।
बच्चों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे प्रतियोगी दुनिया में आगे बढ़ें, डॉक्टर बनें, इंजीनियर बनें, शिक्षक बनें, अधिकारी बनें।
लेकिन उनके लिए रात में एक सुरक्षित बिस्तर तक सुनिश्चित नहीं किया जा रहा।
यह कैसी शिक्षा व्यवस्था है जिसमें भविष्य बनाने की बात तो होती है, लेकिन वर्तमान की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जाती?
96 प्रतिशत बच्चे बिना पलंग—यह आंकड़ा सरकार को शर्मिंदा करने के लिए काफी है
8,786 में से 8,442 विद्यार्थियों के पास पलंग नहीं होना मामूली कमी नहीं है।
इसका अर्थ है कि लगभग हर 100 विद्यार्थियों में से 96 विद्यार्थी बिस्तर से वंचित हैं।
यहां सरकार से यह पूछना जरूरी है कि यदि किसी एक स्कूल में 10 या 20 पलंग खराब हैं तो इसे maintenance problem कहा जा सकता है।
लेकिन जब हजारों विद्यार्थी बिना पलंग के हों तो यह system failure है।
और system failure में केवल प्रधानाध्यापक जिम्मेदार नहीं होता।
उसके ऊपर अधीक्षक हैं।
प्रकल्प अधिकारी हैं।
सहायक आयुक्त हैं।
अपर आयुक्त हैं।
आदिवासी विकास विभाग है।
मंत्रालय है।
निरीक्षण व्यवस्था है।
बजट है।
सरकारी आदेश हैं।
और सबसे ऊपर राजनीतिक नेतृत्व है।
इस पूरी श्रृंखला में अगर कोई बच्चा जमीन पर सो रहा है, तो सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “प्रधानाध्यापक ने पलंग क्यों नहीं खरीदा?”
सवाल होना चाहिए:
“पूरी सरकारी निगरानी व्यवस्था ने यह कमी समय रहते क्यों नहीं पकड़ी या पकड़ने के बाद दूर क्यों नहीं कराई?”
निरीक्षण होते हैं, फिर भी हालात क्यों नहीं बदलते?
यहीं से इस कहानी का सबसे गंभीर अध्याय शुरू होता है।
सरकार यह नहीं कह सकती कि उसे आश्रमशालाओं की स्थिति की जानकारी नहीं थी।
महाराष्ट्र आदिवासी विकास विभाग ने स्वयं आश्रमशालाओं, अनुदानित स्कूलों, छात्रावासों और अन्य परिसरों के लिए digital inspection and audit system विकसित करने की योजना बनाई है। सरकारी दस्तावेज में inspection application के जरिए non-compliances यानी कमियों को दर्ज करने, निरीक्षण का रिकॉर्ड रखने और infrastructure की निगरानी करने की बात स्पष्ट रूप से कही गई है।
यानी सरकार को मालूम है कि निरीक्षण जरूरी है।
सरकार को यह भी मालूम है कि कमियां दर्ज करनी जरूरी हैं।
सरकार को यह भी मालूम है कि infrastructure की निगरानी करनी जरूरी है।
फिर सवाल है—
कमियां मिलने के बाद क्या होता है?
यही वह हिस्सा है जिस पर सरकारी व्यवस्था सबसे कमजोर दिखाई देती है।
किसी अधिकारी का दौरा होता है।
रजिस्टर में निरीक्षण दर्ज होता है।
कुछ कमियां लिखी जाती हैं।
रिपोर्ट ऊपर भेजी जाती है।
फिर फाइल आगे बढ़ती है।
और बच्चे वहीं रहते हैं।
अगले वर्ष फिर निरीक्षण होता है।
फिर वही समस्या सामने आती है।
फिर रिपोर्ट बनती है।
फिर आदेश जारी होता है।
लेकिन बच्चा फिर भी जमीन पर सोता है।
यह निरीक्षण नहीं, निरीक्षण का चक्र है।
और अगर निरीक्षण का परिणाम सुधार नहीं है, तो वह निरीक्षण किस काम का?
यह समस्या आज की नहीं है
सरकारी रिकॉर्ड और पुराने ऑडिट दस्तावेज बताते हैं कि आश्रमशालाओं में बुनियादी सुविधाओं और निगरानी की समस्या वर्षों पुरानी है।
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG की महाराष्ट्र से संबंधित रिपोर्ट में आदिवासी विद्यार्थियों के लिए संचालित शैक्षणिक योजनाओं के प्रदर्शन का परीक्षण किया गया था। उस audit में आश्रमशालाओं में basic and essential amenities की कमी, नए आश्रमशालाओं और छात्रावासों के निर्माण में देरी, कमजोर oversight और monitoring से जुड़ी समस्याएं दर्ज की गई थीं।
CAG ने इससे भी पहले निरीक्षण व्यवस्था में कमियों की ओर ध्यान दिलाया था। सरकारी एवं अनुदानित छात्रावासों तथा आश्रमशालाओं के निरीक्षण के लिए लक्ष्य निर्धारित होने के बावजूद कई क्षेत्रों में inspection shortfalls दर्ज हुए थे।
इसका अर्थ बेहद गंभीर है।
आज चंद्रपुर में जो दिखाई दे रहा है, वह अचानक पैदा हुई समस्या नहीं है।
यह उस प्रशासनिक संस्कृति का परिणाम हो सकता है जिसमें वर्षों से कमियां दर्ज तो होती हैं, लेकिन उनके समाधान की निगरानी उतनी कठोरता से नहीं होती।
2016 से 2026: दस साल में क्या बदला?
एक दशक पहले भी आदिवासी विकास विभाग के सामने आश्रमशाला infrastructure का प्रश्न था।
सरकारी दस्तावेजों में आश्रमशालाओं और छात्रावासों के निर्माण में देरी, विद्यार्थियों को पुरानी या किराये की इमारतों में रहने की मजबूरी और निर्माण पूरा होने के बाद भी भवनों के उपयोग में नहीं आने जैसी समस्याएं दर्ज की गई थीं।
सरकार ने infrastructure management को मजबूत करने के लिए अलग निर्माण प्रबंधन व्यवस्था तक बनाने की आवश्यकता महसूस की थी।
दस वर्ष बाद फिर वही सवाल सामने है।
फर्क इतना है कि अब हमारे पास digital systems हैं।
ऑनलाइन पोर्टल हैं।
निरीक्षण ऐप हैं।
फोटो अपलोड किए जा सकते हैं।
डेटा dashboards बनाए जा सकते हैं।
अधिकारी दौरे कर सकते हैं।
फिर भी बच्चा जमीन पर सो रहा है।
तो फिर समस्या technology की नहीं है।
समस्या जवाबदेही की है।
गढ़चिरौली ने जो चेतावनी दी, क्या चंद्रपुर उसे सुनेगा?
यह सवाल अब सबसे ज्यादा जरूरी है।
महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में जपतलाई की एक अनुदानित आश्रमशाला में सो रही छह छात्राओं को सांप ने काट लिया। तीन छात्राओं की मौत हो गई और अन्य छात्राओं को अस्पताल में भर्ती कराया गया। रिपोर्टों के अनुसार छात्राएं फर्श पर सो रही थीं।
इस घटना ने पूरे राज्य में आदिवासी आवासीय विद्यालयों की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए।
महाराष्ट्र सरकार ने संबंधित आश्रमशाला के खिलाफ कार्रवाई की दिशा में कदम उठाए और राज्यभर की अनुदानित आश्रमशालाओं के third-party audit की घोषणा की। 553 aided ashram schools के audit के लिए 90 दिन की समयसीमा की रिपोर्ट सामने आई है। कमियां गंभीर पाए जाने पर संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई, यहां तक कि closure की संभावना भी बताई गई है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या हर त्रासदी के बाद ही सरकार जागेगी?
क्या किसी छात्रावास की सुरक्षा तब तक जांची जाएगी जब तक कोई बच्चा मर न जाए?
क्या पलंग तब तक नहीं दिए जाएंगे जब तक कोई सांप जमीन पर सो रहे बच्चे को न डस ले?
क्या जर्जर भवन की मरम्मत तब होगी जब उसमें कोई बच्चा घायल हो जाए?
अगर जवाब “नहीं” है, तो फिर चंद्रपुर में अभी कार्रवाई क्यों नहीं?
गढ़चिरौली की तीन मौतें सिर्फ दुर्घटना नहीं, चेतावनी हैं
किसी भी सर्पदंश को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है।
लेकिन बच्चों को जमीन से ऊपर सुरक्षित सोने की जगह देना संभव है।
दरवाजे और खिड़कियों को सुरक्षित करना संभव है।
जाली लगाना संभव है।
झाड़ियों की सफाई करना संभव है।
रात में निगरानी बढ़ाना संभव है।
मच्छरदानी उपलब्ध कराना संभव है।
सांप-बिच्छू से बचाव की SOP बनाना संभव है।
और सबसे महत्वपूर्ण—जोखिम वाले भवनों में बच्चों को रहने से रोकना संभव है।
इसलिए गढ़चिरौली में हुई मौतों को केवल “सांप के काटने” के रूप में देखना गलत होगा।
प्राकृतिक खतरा था, लेकिन उसके सामने बच्चों की सुरक्षा के लिए संस्थागत व्यवस्था कितनी मजबूत थी—यह प्रशासनिक सवाल है।
इसीलिए महाराष्ट्र सरकार अब नई safety measures और व्यापक audit की ओर बढ़ रही है।
लेकिन सरकार को यह समझना होगा कि audit का मूल्य तभी है जब उसके बाद action हो।
अनुदानित आश्रमशालाएं: जवाबदेही का सबसे कमजोर कड़ी?
चंद्रपुर की कहानी में एक और महत्वपूर्ण पहलू है—सरकारी और अनुदानित आश्रमशालाओं के बीच प्रशासनिक जवाबदेही।
यदि किसी अनुदानित आश्रमशाला में सुविधा खराब है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि कार्रवाई की अंतिम शक्ति किसके पास है?
क्या ITDP तुरंत कार्रवाई कर सकता है?
क्या वह अनुदान रोक सकता है?
क्या वह प्रबंधन को निलंबित कर सकता है?
क्या वह मान्यता रद्द करने की प्रक्रिया शुरू कर सकता है?
या मामला Commissioner स्तर पर जाता है?
और अगर फाइल ऊपर जाती है तो उस पर निर्णय की समयसीमा क्या है?
यह स्पष्ट प्रशासनिक chain जनता के सामने होनी चाहिए।
क्योंकि यदि निरीक्षण करने वाले अधिकारी के पास कार्रवाई की शक्ति नहीं और कार्रवाई करने वाले अधिकारी के पास मौके की जानकारी नहीं, तो दोनों के बीच बच्चा फंस जाता है।
और यही जवाबदेही का सबसे खतरनाक vacuum है।
₹99 करोड़ का सवाल केवल खर्च का नहीं, परिणाम का है
₹99 करोड़ सुनने में बड़ी राशि है।
लेकिन किसी भी सरकारी योजना का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कितना पैसा खर्च हुआ।
असली प्रश्न है:
उस पैसे से क्या मिला?
अगर 8,786 बच्चों में 8,442 के पास पलंग नहीं है, तो expenditure outcome पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यदि ₹99 करोड़ का बड़ा हिस्सा वेतन और अन्य नियमित खर्चों में जाता है, तो सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि infrastructure और student safety के लिए अलग से कितना धन उपलब्ध कराया गया।
यदि beds के लिए budget provision है, तो खरीद क्यों नहीं हुई?
यदि खरीद हुई, तो beds कहां हैं?
यदि beds खराब हो गए, तो replacement क्यों नहीं हुआ?
यदि भवन पर्याप्त नहीं है, तो temporary accommodation कब तक चलेगा?
और यदि निरीक्षण में यह सब दर्ज है, तो responsible officer के खिलाफ क्या action हुआ?
सरकार को अब expenditure statement से ज्यादा outcome statement देना चाहिए।
आदिवासी बच्चे किसी दूसरे दर्जे के नागरिक नहीं हैं
यह बात सबसे साफ शब्दों में कहने की जरूरत है।
आदिवासी परिवार अपने बच्चों को आश्रमशालाओं में इसलिए भेजते हैं क्योंकि उन्हें उम्मीद होती है कि सरकार उनके बच्चों को वह शिक्षा और सुविधा देगी जो वे अपने सीमित संसाधनों में उपलब्ध नहीं करा सकते।
इन बच्चों को किसी एहसान की जरूरत नहीं है।
उन्हें अधिकार चाहिए।
सुरक्षित भवन उनका अधिकार है।
स्वच्छ पानी उनका अधिकार है।
पौष्टिक भोजन उनका अधिकार है।
साफ शौचालय उनका अधिकार है।
सुरक्षित बिस्तर उनका अधिकार है।
सम्मानजनक आवास उनका अधिकार है।
और सबसे बढ़कर—
जीवित और सुरक्षित घर लौटना उनका अधिकार है।
गढ़चिरौली की तीन बच्चियां अब अपने घर नहीं लौटेंगी।
उनकी मौत को किसी फाइल के एक पन्ने में “snakebite incident” लिखकर समाप्त नहीं किया जा सकता।
https://politicsinsightindia.com/new/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
उनकी मौत यह पूछती है:
किसने देखा था कि वे जमीन पर सो रही थीं?
किसने देखा था कि छात्रावास सुरक्षित है या नहीं?
किसने निरीक्षण किया था?
क्या कमी दर्ज हुई थी?
किसने सुधार की जिम्मेदारी ली थी?
और सबसे महत्वपूर्ण—
अगर कमी पहले से पता थी, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
अब सरकार को क्या करना चाहिए?
सिर्फ एक और समिति बनाना पर्याप्त नहीं होगा।
सिर्फ एक और inspection पर्याप्त नहीं होगा।
https://politicsinsightindia.com/new/gen-alpha-activism-up-school-children-protest-for-fans-water
सिर्फ एक और circular जारी करना पर्याप्त नहीं होगा।
जरूरत है time-bound accountability mechanism की।
पहला कदम: हर आश्रमशाला की सार्वजनिक safety scorecard
हर स्कूल के लिए वेबसाइट पर प्रकाशित किया जाए:
-
कुल विद्यार्थी
-
कुल beds
-
usable beds
-
भवन की स्थिति
-
छात्रावास की क्षमता
-
प्रति कमरे विद्यार्थी
-
toilets
-
drinking water
-
electricity
-
fire safety
-
snake/insect protection
-
CCTV
- https://politicsinsightindia.com/new/pradhanmantri-grihamantri-sansad-se-door-sawal-jawabdehi-loktantra
-
medical kit
-
nearest hospital
-
night staff
-
latest inspection date
-
inspection में मिली कमियां
-
action taken
-
action की deadline
दूसरा कदम: inspection officer की जवाबदेही
यदि किसी निरीक्षण में कमी दर्ज होती है तो:
कमी + जिम्मेदार अधिकारी + सुधार की deadline + अगला verification
सार्वजनिक होना चाहिए।
तीसरा कदम: repeated failure पर automatic action
एक ही कमी लगातार दो निरीक्षणों में बनी रहती है तो केवल “निर्देश दिए गए” नहीं लिखा जाना चाहिए।
जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
चौथा कदम: aided schools के लिए स्वतंत्र monitoring
अनुदानित संस्थाओं को सरकारी पैसा मिलता है तो उन्हें सरकारी accountability standards भी स्वीकार करने होंगे।
सरकारी पैसा निजी जवाबदेही का बहाना नहीं बन सकता।
पांचवां कदम: गढ़चिरौली के बाद तत्काल safety audit
https://politicsinsightindia.com/new/upi-bill-2026-merchant-consumer-government-mdr-analysis
चंद्रपुर के सभी वन-सीमावर्ती आश्रमशालाओं में:
-
snake-proofing
-
window/door mesh
-
building cracks
-
roof condition
-
floor sleeping
-
sanitation
- https://politicsinsightindia.com/new/allahabad-university-fee-hike-seat-cuts-student-protests-india-higher-education-crisis
-
vegetation clearance
-
night supervision
का तत्काल निरीक्षण होना चाहिए।
सरकार के सामने अब असली परीक्षा है
महाराष्ट्र सरकार ने गढ़चिरौली की घटना के बाद third-party audit की घोषणा की है। यह सही दिशा में कदम है। लेकिन इसका मूल्यांकन घोषणा से नहीं, परिणाम से होगा।
अगर audit केवल एक रिपोर्ट बनकर रह गया तो कुछ नहीं बदलेगा।
https://politicsinsightindia.com/new/gen-z-rss-mohan-bhagwat-blind-obedience-democracy-analysis
अगर रिपोर्ट में 500 कमियां निकलती हैं और 500 action-taken reports बन जाती हैं, लेकिन जमीन पर बच्चे फिर भी उसी फर्श पर सोते हैं, तो audit भी एक सरकारी रस्म बन जाएगा।
सरकार को निरीक्षण से आगे बढ़कर जवाबदेही तक जाना होगा।
क्योंकि निरीक्षण का उद्देश्य कमी ढूंढना नहीं है।
कमी दूर करना है।
रिपोर्ट बनाना उद्देश्य नहीं है।
बच्चे को सुरक्षित करना उद्देश्य है।
बजट खर्च करना उपलब्धि नहीं है।
उस खर्च का असर बच्चे के जीवन में दिखाई देना उपलब्धि है।
निष्कर्ष: अगली मौत से पहले जागना होगा
चंद्रपुर के 8,442 बच्चे आज सरकार से कोई असंभव मांग नहीं कर रहे।
वे महंगे स्मार्ट क्लासरूम नहीं मांग रहे।
वे आलीशान छात्रावास नहीं मांग रहे।
वे केवल इतना चाहते हैं कि रात में सोते समय उन्हें यह डर न हो कि जमीन पर कोई सांप आ सकता है।
वे चाहते हैं कि जिस कमरे में वे पढ़ते हैं, उसी कमरे में मजबूरी में न सोना पड़े।
वे चाहते हैं कि 45 बच्चों को एक छोटे कमरे में ठूंसकर न रखा जाए।
वे चाहते हैं कि सरकार उन्हें आंकड़ा नहीं, इंसान समझे।
और गढ़चिरौली की तीन बच्चियों की मौत के बाद यह मांग और भी न्यायसंगत हो जाती है।
तीन जिंदगियां खत्म हो चुकी हैं।
अब अगर सरकार फिर निरीक्षण करेगी, कमियां दर्ज करेगी, फाइल भेजेगी, बैठक करेगी और फिर इंतजार करेगी—तो यह केवल प्रशासनिक देरी नहीं होगी।
यह उस व्यवस्था की विफलता होगी जिसने चेतावनी मिलने के बाद भी कार्रवाई नहीं की।
चंद्रपुर के 8,442 बच्चे सरकार के सामने एक आंकड़ा नहीं, एक सवाल बनकर खड़े हैं।
अगर 99 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद 96 प्रतिशत बच्चे बिना पलंग सो रहे हैं, तो आखिर सरकारी व्यवस्था की प्राथमिकता क्या है?
और गढ़चिरौली में तीन आदिवासी छात्राओं की मौत के बाद यह सवाल और कठोर हो जाता है—
क्या सरकार को हर कमी की कीमत एक जिंदगी देकर ही समझ में आती है?
महाराष्ट्र के आदिवासी बच्चों को अगली त्रासदी का इंतजार नहीं चाहिए।
उन्हें अभी सुरक्षित स्कूल चाहिए।
निरीक्षण बहुत हो चुके। अब जवाबदेही सुनिश्चित कीजिए।
क्योंकि अगली बार किसी रिपोर्ट में सिर्फ यह न लिखा जाए कि “कमी पाई गई।”
रिपोर्ट में यह लिखा जाना चाहिए—
“कमी पाई गई थी, जिम्मेदारी तय की गई, सुधार हुआ और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित हुई।”
यही सुशासन है।
बाकी सब कागज है।
Get every story on your phone
Join our channel and never miss an update.
What's Your Reaction?