"अब अंध आज्ञाकारिता का समय नहीं रहा": Gen Z, RSS और भारत के लोकतंत्र की नई वैचारिक परीक्षा

क्या 15–19 वर्ष की नई पीढ़ी भारत की राजनीति और लोकतंत्र की दिशा बदल रही है? CJP आंदोलनों के बाद RSS प्रमुख मोहन भागवत के Gen Z संवाद, "अब अंध आज्ञाकारिता का समय नहीं रहा" वाले संदेश, किशोर मनोविज्ञान, वैचारिक संवाद और लोकतांत्रिक चुनौतियों का गहन विश्लेषण।

"अब अंध आज्ञाकारिता का समय नहीं रहा": Gen Z, RSS और भारत के लोकतंत्र की नई वैचारिक परीक्षा

संवाद या संस्कार? CJP आंदोलनों के बाद Gen Z की ओर RSS का बढ़ता कदम और भारत की नई वैचारिक चुनौती

Writer- Ch. Sudhir Taliyan

"अब अंध आज्ञाकारिता का समय नहीं रहा।"

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का यह कथन केवल एक भाषण का हिस्सा नहीं है। यह उस बदलते भारत की स्वीकृति भी है, जहाँ नई पीढ़ी केवल सुनना नहीं चाहती, बल्कि पूछना चाहती है; केवल मानना नहीं चाहती, बल्कि समझना चाहती है; केवल अनुयायी नहीं बनना चाहती, बल्कि सहभागी बनना चाहती है।

विडंबना यह है कि इसी विचार के साथ जब 6 अगस्त को लगभग दो हजार किशोरों—जिनकी आयु 15 से 19 वर्ष के बीच है—को संबोधित करने का कार्यक्रम सामने आता है, तो अनेक प्रश्न स्वतः जन्म लेते हैं। क्या यह केवल युवा संवाद है? क्या यह एक वैचारिक परिचर्चा है? या फिर यह उस पीढ़ी तक पहुँचने का प्रयास है जिसने हाल के महीनों में भारतीय राजनीति को यह अहसास कराया कि सोशल मीडिया पर सक्रिय युवा अब केवल दर्शक नहीं, बल्कि राजनीतिक घटनाक्रम के निर्णायक सहभागी भी बन सकते हैं?

इन प्रश्नों के उत्तर केवल किसी एक संगठन या एक कार्यक्रम में नहीं छिपे हैं। वे उस व्यापक परिवर्तन में छिपे हैं जो भारत के सामाजिक और राजनीतिक मानस में घटित हो रहा है।

बदलता भारत और बदलती पीढ़ी

हर पीढ़ी अपने समय का प्रश्न लेकर आती है। स्वतंत्रता आंदोलन की पीढ़ी ने स्वराज का प्रश्न उठाया। सत्तर के दशक की पीढ़ी ने लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रश्न उठाया। उदारीकरण के बाद की पीढ़ी ने अवसर और विकास का प्रश्न पूछा। लेकिन आज की Gen Z—जिसका बड़ा हिस्सा 15 से 25 वर्ष की आयु के बीच है—एक बिल्कुल अलग प्रश्न पूछ रही है:

"हम जो सुन रहे हैं, क्या वह सत्य है?"

यह पीढ़ी किसी एक पुस्तक, एक समाचार पत्र, एक शिक्षक या एक संगठन से अपना दृष्टिकोण निर्मित नहीं करती। उसके सामने हर दिन हजारों वीडियो, लाखों पोस्ट और अनगिनत विचार आते हैं। वह एक ही घटना के पाँच अलग-अलग संस्करण देखती है। यही कारण है कि उसके भीतर विश्वास जितनी तेजी से बनता है, उतनी ही तेजी से टूट भी जाता है।

यहीं से संवाद की आवश्यकता जन्म लेती है।

CJP आंदोलन ने क्या बदल दिया?

हाल के छात्र आंदोलनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि युवाओं की राजनीतिक चेतना का स्वरूप बदल चुका है। इन आंदोलनों की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं थी कि उनमें कितने लोग शामिल हुए, बल्कि यह थी कि वे पारंपरिक राजनीतिक ढाँचे से बाहर निकलकर डिजिटल माध्यमों से संगठित हुए।

कोई बड़ा संगठनात्मक ढाँचा नहीं था। कोई वर्षों पुरानी शाखाएँ नहीं थीं। कोई स्थायी कार्यालय नहीं थे। फिर भी कुछ ही दिनों में देश के अनेक शहरों में समान मुद्दों पर आवाज़ें उठीं।

यह भारत की नई राजनीतिक भाषा थी।

और शायद यही कारण है कि आज लगभग हर राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और वैचारिक मंच युवाओं से सीधे संवाद करने की आवश्यकता महसूस कर रहा है।

15 से 19 वर्ष: केवल उम्र नहीं, व्यक्तित्व निर्माण का काल

मनोविज्ञान हमें बताता है कि किशोरावस्था वह समय है जब व्यक्ति अपनी पहचान गढ़ रहा होता है। वह परिवार से मिले मूल्यों, विद्यालय से प्राप्त शिक्षा, मित्रों के प्रभाव, डिजिटल संसार और समाज के अनेक अनुभवों को जोड़कर स्वयं तय करने लगता है कि वह कौन है और किन विचारों के साथ खड़ा होना चाहता है।

यही वह अवस्था है जिसमें जिज्ञासा अत्यधिक होती है, आदर्शों का आकर्षण प्रबल होता है और नई बातों को स्वीकार करने की प्रवृत्ति भी अधिक होती है। इसी कारण यह आयु वैचारिक संवाद के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि इस आयु के सभी युवा किसी भी विचार से आसानी से प्रभावित हो जाते हैं। यह कहना न तो वैज्ञानिक होगा और न ही न्यायपूर्ण। हाँ, यह अवश्य कहा जा सकता है कि इस अवस्था में आलोचनात्मक सोच (Critical Thinking), तथ्य-जांच (Fact Checking) और स्वतंत्र निर्णय क्षमता का विकास अत्यंत आवश्यक होता है, क्योंकि यही गुण उन्हें किसी भी प्रकार के एकांगी प्रभाव से बचाते हैं।

इसीलिए यदि किसी भी संस्था—चाहे वह राजनीतिक हो, सामाजिक हो, धार्मिक हो या शैक्षणिक—का संवाद इस आयु वर्ग से हो, तो उसका उद्देश्य प्रश्न पूछने की क्षमता को प्रोत्साहित करना होना चाहिए, न कि केवल उत्तर स्वीकार करने की अपेक्षा करना।

"अंध आज्ञाकारिता" पर भागवत का कथन

यदि वास्तव में समय बदल गया है और "अंध आज्ञाकारिता" का युग समाप्त हो रहा है, तो यह विचार केवल संगठन के भीतर अनुशासन की नई व्याख्या भर नहीं है। यह लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत है।

लोकतंत्र की आत्मा आज्ञापालन में नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण सहभागिता में निहित होती है।

एक अच्छा नागरिक वह नहीं जो हर बात पर ताली बजाए। अच्छा नागरिक वह है जो प्रश्न पूछ सके, असहमति दर्ज करा सके, तथ्यों की जाँच कर सके और आवश्यकता पड़ने पर अपनी ही पसंद के नेताओं से भी जवाब माँग सके।

यही वह कसौटी है जिस पर किसी भी युवा संवाद की सफलता को परखा जाना चाहिए।

वैचारिक संगठन और युवाओं की ओर बढ़ते कदम

इतिहास गवाह है कि किसी भी विचारधारा की सबसे बड़ी पूँजी उसकी वर्तमान शक्ति नहीं, बल्कि उसकी अगली पीढ़ी होती है। यही कारण है कि दुनिया के लगभग सभी सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संगठन युवाओं के बीच अपनी उपस्थिति बनाए रखने का प्रयास करते हैं। कोई नेतृत्व प्रशिक्षण के माध्यम से, कोई छात्र संगठनों के जरिए, कोई सांस्कृतिक कार्यक्रमों द्वारा, तो कोई डिजिटल मंचों के माध्यम से युवाओं से जुड़ने का प्रयास करता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी इस दृष्टि से कोई अपवाद नहीं है। स्थापना काल से ही उसकी शाखाओं का एक बड़ा उद्देश्य अनुशासन, सेवा, शारीरिक प्रशिक्षण और सांस्कृतिक चेतना का विकास रहा है। वर्षों तक शाखाएँ ही संवाद का प्रमुख माध्यम थीं। वहाँ प्रत्यक्ष संपर्क, नियमित बैठकें और व्यक्तिगत संबंध संगठन की शक्ति माने जाते थे।

किन्तु इक्कीसवीं सदी का भारत बदल चुका है। आज एक किशोर का "समुदाय" केवल उसके विद्यालय या मोहल्ले तक सीमित नहीं है। उसका समुदाय उसके मोबाइल फोन में है। वह एक दिन में जितनी सूचनाएँ ग्रहण करता है, उतनी शायद पिछली पीढ़ियाँ कई महीनों में भी नहीं करती थीं। ऐसे में कोई भी संगठन यदि उसी पुराने ढाँचे में युवाओं तक पहुँचना चाहे, तो उसके सामने स्वाभाविक कठिनाइयाँ आएँगी।

यही कारण है कि आज संवाद की भाषा भी बदल रही है और संवाद के मंच भी।

क्या यह केवल RSS की चुनौती है?

यदि इस पूरे घटनाक्रम को केवल RSS बनाम CJP के रूप में देखा जाए, तो विश्लेषण अधूरा रह जाएगा। वास्तविकता यह है कि यह चुनौती लगभग सभी राजनीतिक दलों, छात्र संगठनों और सामाजिक संस्थाओं के सामने है।

आज का युवा किसी विचारधारा का स्थायी समर्थक बनने से पहले उसके व्यवहार को देखता है। वह भाषण से अधिक आचरण पर विश्वास करता है। वह घोषणाओं से अधिक पारदर्शिता चाहता है। यही कारण है कि डिजिटल युग में किसी भी संगठन के लिए केवल अपने समर्थकों से संवाद करना पर्याप्त नहीं रह गया है; उसे अपने आलोचकों के प्रश्नों का उत्तर भी देना पड़ता है।

किशोर मन: जिज्ञासा, आदर्श और पहचान

15 से 19 वर्ष की आयु जीवन का वह दौर है जब व्यक्ति अपने भीतर अनेक प्रश्नों से जूझ रहा होता है—

  • मैं कौन हूँ?
  • मुझे किस प्रकार का समाज चाहिए?
  • सही और गलत का निर्णय कैसे करूँ?
  • किस पर विश्वास करूँ?

मनोविज्ञान बताता है कि इस आयु में मस्तिष्क का वह भाग, जो दीर्घकालिक निर्णय, जोखिम का मूल्यांकन और जटिल तर्क से जुड़ा होता है, अभी पूर्ण रूप से विकसित हो रहा होता है। दूसरी ओर भावनात्मक ऊर्जा, आदर्शवाद और समूह से जुड़ने की इच्छा अपेक्षाकृत अधिक प्रबल होती है।

इसी कारण इस आयु के युवाओं के सामने यदि प्रेरणादायक नेतृत्व आता है, तो उसका सकारात्मक प्रभाव भी पड़ सकता है। वहीं यदि उन्हें एकांगी सूचनाएँ, भय, घृणा या भ्रामक जानकारी मिले, तो उसका नकारात्मक प्रभाव भी संभव है।

इसलिए प्रश्न किसी एक संगठन का नहीं है; प्रश्न यह है कि युवाओं को कैसी बौद्धिक संस्कृति उपलब्ध कराई जा रही है।

विचार देना और विचार थोपना—दोनों में अंतर

लोकतंत्र में प्रत्येक संस्था को अपने विचार रखने का अधिकार है। यह अधिकार संविधान द्वारा संरक्षित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है। परंतु विचार रखना और विचार थोपना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।

संवाद तब जन्म लेता है जब प्रश्न पूछने की अनुमति हो। यदि किसी मंच पर केवल बोलने वाले को अधिकार हो और सुनने वाले से केवल सहमति की अपेक्षा की जाए, तो वह संवाद नहीं, एकतरफा संप्रेषण बन जाता है।

यही कारण है कि "अब अंध आज्ञाकारिता का समय नहीं रहा" जैसी बात अपने आप में तभी सार्थक सिद्ध होगी, जब उसके साथ प्रश्न पूछने, असहमति रखने और वैकल्पिक दृष्टिकोण व्यक्त करने की स्वतंत्रता भी जुड़ी हो।

डिजिटल पीढ़ी को आदेश नहीं, तर्क चाहिए

आज का युवा इंटरनेट पर किसी भी दावे की पुष्टि करने का प्रयास करता है। वह एक वीडियो देखकर निर्णय नहीं बनाता; वह दूसरे, तीसरे और चौथे स्रोत भी देखता है। कभी-कभी वह भ्रमित भी होता है, क्योंकि उसके सामने सत्य और असत्य दोनों समान गति से पहुँचते हैं।

इसलिए आज की सबसे बड़ी आवश्यकता "सूचना" नहीं, बल्कि "सूचना का विवेक" है।

यदि विद्यालय, परिवार और सामाजिक संस्थाएँ युवाओं को यह सिखा दें कि किसी भी दावे की सत्यता कैसे परखी जाए, स्रोतों का मूल्यांकन कैसे किया जाए और अलग-अलग विचारों को सुनकर निष्कर्ष कैसे निकाला जाए, तो वे किसी भी प्रकार के वैचारिक अतिवाद या दुष्प्रचार से कहीं अधिक सुरक्षित रहेंगे।

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती

भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में है। यह जनसांख्यिकीय शक्ति तभी राष्ट्रीय संपदा बनेगी जब युवा केवल राजनीतिक समर्थक नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक बनेंगे।

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देश को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो विज्ञान पर विश्वास करें, संविधान को समझें, इतिहास को अनेक दृष्टिकोणों से पढ़ें, समाज की विविधता का सम्मान करें और मतभेद को लोकतंत्र का स्वाभाविक अंग मानें।

यदि युवा केवल किसी एक विचार को अंतिम सत्य मानने लगें, तो लोकतंत्र कमजोर होता है। यदि वे हर विचार को बिना सोचे अस्वीकार करने लगें, तब भी लोकतंत्र कमजोर होता है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति आलोचनात्मक विवेक में है।

यही कारण है कि आज किसी भी युवा सम्मेलन, छात्र संवाद या वैचारिक कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि उसमें कितने लोग आए, बल्कि यह होना चाहिए कि वहाँ कितने प्रश्न पूछे गए और कितने प्रश्नों का उत्तर ईमानदारी से दिया गया।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी प्रयोगशाला: युवा मन

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संसद, न्यायपालिका या चुनाव आयोग भर नहीं हैं। उसकी सबसे बड़ी शक्ति वे करोड़ों युवा हैं जो हर पाँच वर्ष में केवल मतदान नहीं करते, बल्कि प्रतिदिन अपने विचारों, प्रश्नों और संवादों से लोकतंत्र को जीवित रखते हैं।

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आज का युवा केवल भविष्य का नागरिक नहीं है; वह वर्तमान का सक्रिय भागीदार है। उसकी एक पोस्ट, एक वीडियो, एक प्रश्न और एक जन-आंदोलन राष्ट्रीय विमर्श की दिशा बदल सकता है। यही कारण है कि प्रत्येक राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन, धार्मिक संस्था और वैचारिक मंच युवाओं तक पहुँचना चाहता है। इसमें कोई अस्वाभाविक बात नहीं है। असली प्रश्न यह है कि युवाओं तक पहुँचा कैसे जाए?

यदि उद्देश्य उन्हें स्वतंत्र चिंतक बनाना है, तो यह लोकतंत्र को सशक्त करेगा। यदि उद्देश्य केवल उन्हें बिना प्रश्न किए किसी विचारधारा का अनुयायी बनाना है, तो यह लोकतांत्रिक संस्कृति को सीमित करेगा।

विचारों का बाज़ार नहीं, विवेक का विद्यालय

भारतीय परंपरा का सौंदर्य इस बात में रहा है कि यहाँ प्रश्न पूछना अपराध नहीं माना गया। उपनिषदों में शिष्य अपने गुरु से प्रश्न करता है। बुद्ध ने तर्क का आग्रह किया। महावीर ने आत्मानुभूति पर बल दिया। कबीर ने स्थापित मान्यताओं को चुनौती दी। स्वामी विवेकानंद ने युवाओं से निर्भीक होकर सोचने का आह्वान किया। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने शिक्षित बनो, संगठित हो और संघर्ष करो का संदेश दिया। महात्मा गांधी ने असहमति को राष्ट्र-विरोध नहीं माना।

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इन विविध परंपराओं में एक सूत्र समान है—विचार का सम्मान, व्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रश्न की गरिमा।

यदि भारत को अपनी लोकतांत्रिक आत्मा बचाए रखनी है, तो युवाओं को यही विरासत देनी होगी।

"अंध आज्ञाकारिता" का वास्तविक विकल्प

मोहन भागवत का यह कथन कि "अब अंध आज्ञाकारिता का समय नहीं रहा" एक महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत करता है। किंतु इसका वास्तविक अर्थ तभी पूर्ण होगा जब इसका विस्तार हर संस्था, हर संगठन और हर सार्वजनिक जीवन में दिखाई दे।

यदि अंध आज्ञाकारिता समाप्त होनी है, तो उसके स्थान पर क्या आएगा?

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उसके स्थान पर आएँ—

  • तर्कपूर्ण संवाद,
  • तथ्य-आधारित बहस,
  • असहमति का सम्मान,
  • और उत्तरदायी नेतृत्व।

युवा पीढ़ी को यह नहीं सिखाया जाना चाहिए कि किससे सहमत होना है; उसे यह सिखाया जाना चाहिए कि सहमति बनाने से पहले सोचना कैसे है।

15–19 वर्ष: विश्वास का नहीं, विवेक का निवेश

यह आयु केवल परीक्षा और करियर की तैयारी का समय नहीं है; यह नागरिकता के निर्माण का भी समय है। इसी उम्र में व्यक्ति संविधान, लोकतंत्र, समानता, विविधता और मानवाधिकार जैसे मूल्यों से परिचित होता है। इसी समय वह अपने पहले राजनीतिक विचार बनाता है।

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इसलिए जो भी संस्था इस आयु वर्ग से संवाद करे, उसकी सबसे बड़ी नैतिक जिम्मेदारी है कि वह उन्हें सोचने की स्वतंत्रता दे, न कि केवल तैयार निष्कर्ष।

एक शिक्षक का आदर्श वही है जो विद्यार्थियों को अपने से आगे बढ़ते देखना चाहता है। उसी प्रकार किसी भी सामाजिक या वैचारिक संगठन की परिपक्वता का प्रमाण यह नहीं कि उसके कितने अनुयायी हैं, बल्कि यह है कि उसके संपर्क में आने वाले युवा कितने स्वतंत्र, जिम्मेदार और विवेकशील नागरिक बनते हैं।

भारत की अगली लड़ाई विचारों की होगी

आने वाले वर्षों में भारत की प्रतिस्पर्धा केवल अर्थव्यवस्था, तकनीक या सैन्य शक्ति में नहीं होगी। सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धा विचारों की होगी।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता, एल्गोरिद्म, सोशल मीडिया और डिजिटल प्रचार के युग में सूचना की गति इतनी तेज़ है कि सत्य और असत्य दोनों समान वेग से फैलते हैं। ऐसे समय में किसी भी राष्ट्र की वास्तविक सुरक्षा केवल उसकी सीमाओं से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों की आलोचनात्मक सोच से सुनिश्चित होगी।

यदि युवा तथ्य और प्रचार में अंतर करना सीख जाते हैं, तो लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा। यदि वे हर वायरल संदेश को सत्य मानने लगेंगे, तो कोई भी समाज दुष्प्रचार का शिकार हो सकता है।

निष्कर्ष: भारत को अनुयायी नहीं, नागरिक चाहिए

मुंबई में होने वाला यह संवाद चाहे RSS का हो, किसी विश्वविद्यालय का हो, किसी छात्र संगठन का हो या किसी सामाजिक मंच का—उसका मूल्यांकन भीड़ की संख्या से नहीं, बल्कि विचारों की गुणवत्ता से होना चाहिए।

भारत की नई पीढ़ी को किसी एक विचारधारा के साँचे में ढालना शायद संभव भी नहीं है और लोकतांत्रिक दृष्टि से वांछनीय भी नहीं। यह पीढ़ी प्रश्न पूछती है, तुलना करती है, प्रमाण खोजती है और फिर अपना निर्णय बनाती है। यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।

यदि वास्तव में "अंध आज्ञाकारिता" का समय समाप्त हो रहा है, तो यह केवल एक संगठन के लिए नहीं, पूरे समाज के लिए शुभ संकेत है। इसका अर्थ है कि भारत का भविष्य उन युवाओं के हाथ में होगा जो सम्मानपूर्वक सुनेंगे, निर्भीक होकर प्रश्न पूछेंगे और तथ्यों के आधार पर निर्णय लेंगे।

राष्ट्र का निर्माण अनुयायियों की लंबी कतारों से नहीं, बल्कि ऐसे नागरिकों से होता है जिनके भीतर स्वतंत्र विचार की रोशनी जलती हो। विचारों का वैभव तभी सुरक्षित रहता है जब उसे प्रश्नों की हवा मिलती रहे। इसलिए भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता किसी भी विचारधारा की विजय नहीं, बल्कि विवेक की विजय है।

क्योंकि अंततः एक मजबूत लोकतंत्र वही होता है जहाँ युवाओं को यह नहीं सिखाया जाता कि क्या सोचो, बल्कि यह सिखाया जाता है कि कैसे सोचो। यही शिक्षा उन्हें किसी भी प्रकार के वैचारिक आकर्षण, दुष्प्रचार या अंध-समर्थन से बचाने वाली सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है।

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